मिस्टर मीडिया: सरकारी मीडिया की साख़ भी लगी है दांव पर

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव पत्रकारिता का बहुत सम्मान और साख़ बढ़ाने वाले नहीं हैं

Last Modified:
Wednesday, 17 April, 2019
RAJESH

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव पत्रकारिता का बहुत सम्मान और साख़ बढ़ाने वाले नहीं हैं। निजी क्षेत्र के मीडिया पर हम इस स्तंभ में काफी चर्चा कर चुके हैं। इस बार सरकारी माध्यमों की भूमिका और उनकी ज़िम्मेदारी की बात। चुनाव की तारीख़ों का ऐलान होने के बाद आकाशवाणी केंद्रों के समाचार, दूरदर्शन का कवरेज और उसके प्रोफेशनल्स की पत्रकारिता सारा देश देख रहा है। इसके अलावा भारतीय संसद के दोनों चैनलों की निरपेक्षता भी समीक्षकों की बारीक़ नज़र से छिपी नहीं है।

इस सप्ताह चुनाव आयोग को एक रिपोर्ट मिली। इसके मुताबिक़ दूरदर्शन और इसके क्षेत्रीय चैनलों पर एक महीने में भारतीय जनता पार्टी को 160 घंटे और कांग्रेस को केवल 80 घंटे स्थान मिला। ज़ाहिर है कि अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की हालत इससे बेहतर नहीं है। दूरदर्शन का चुनावी राजनीतिक कवरेज निष्पक्षता और संतुलन के बुनियादी सिद्धांत का पालन नहीं कर रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्रसार भारती प्रबंधन को चुनाव आयोग के इस निष्कर्ष से अवगत करा दिया है। दूरदर्शन को संपादकीय सामग्री पर निगरानी के लिए एक कमेटी बनानी पड़ी है। यह कमेटी चुनाव आयोग को समय-समय पर अपने आंकड़ों और सामग्री की जानकारी देगी। प्रसारभारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शशि शेखर वेम्पती ने चुनाव आयोग से संतुलित और निष्पक्ष कवरेज का वादा किया है। ग़ौरतलब है कि चुनाव आयोग ने यह रिपोर्ट कांग्रेस की शिक़ायत पर मांगी थी। शिक़ायत में कहा गया था कि दूरदर्शन जानबूझकर कांग्रेस को पर्याप्त स्थान नहीं दे रहा है। जांच में यह सच पाया गया।

इन दिनों आकाशवाणी के अधिकांश बुलेटिन प्रधानमंत्री के भाषणों या उनके कार्यक्रमों से प्रारंभ होते हैं। बारीक अंतर यह है कि विपक्ष के सेकंड और मिनट उनके नेताओं के यात्रा कार्यक्रमों की जानकारी देने में निकल जाते हैं और उसी समय में सत्तारूढ़ दल के नेताओं ख़ासकर प्रधानमंत्री के संबोधनों से समाचार निकाल कर प्रसारित किए जाते हैं। यानी समय में चाहे बेशक़ बराबरी दिखाई दे, मगर उस अवधि के कंटेंट में काफी अंतर होता है। इसे कोई भी कैसे रोक सकता है। इसी तरह चुनाव पर केंद्रित जनादेश में अव्वल तो पसंदीदा पत्रकार बुलाए जाते हैं, जिससे आलोचना का स्वर न के बराबर रहे। इसके बावजूद जब कार्यक्रम का पुनर्प्रसारण होता है तो उसमें भी संपादित अंश होते हैं। स्पष्ट है कि इसमें से बीजेपी के पक्ष में धुन निकलती है। यहां तक कि एनडीए के सहयोगी दलों को भी पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है। मुझे यह देख-सुन कर 1977 की आकाशवाणी की याद आ रही है। भले ही यह संस्था सरकारी भौंपू बन गई थी, मगर सत्तारूढ़ दल को फ़ायदा दिलाने में नाकाम रही थी।

संसद के दोनों चैनल अपनी स्थापना के कई साल तक निष्पक्ष पत्रकारिता से पहचान बना चुके थे। इन दिनों ये चैनल भी सवालों के घेरे में हैं। संसद के दोनों सदनों में प्रतिपक्षी दलों की संख्या के अनुपात में चैनलों पर स्थान नहीं मिल रहा है। ज़ाहिर है इससे पेशेवर छबि को धक्का पहुंचा है। इस सिलसिले में मुझे पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक की एक टिप्पणी याद आ रही है। तेरह साल पहले कारगिल युद्ध पर उनकी एक किताब ‘कारगिल-एक अभूतपूर्व विजय’ आई थी। इसमें उन्होंने कारगिल युद्ध के बाद चुनाव के दिनों में मीडिया की भूमिका पर अपनी बेबाक राय रखी थी। उनका अनुभव था कि मीडिया ने जानबूझकर ग़लत रिपोर्टें दीं। रिपोर्टों की प्रकृति दुष्टतापूर्ण और निंदनीय थी। जनरल मलिक का यह आकलन भी था कि सरकार प्रभावित मीडिया स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाता। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि सरकारी और नियुक्त अथवा प्रायोजित मीडिया भारत में सफल नहीं हो सकता। इस तरह पेशेवर सिद्धांतों से हटने के कारण साख़ दांव पर लग जाती है मिस्टर सरकारी मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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मोदी से बोले गुलाब कोठारी, मेरी ही बात को 130 करोड़ लोगों तक पहुंचा गया आपका यह संकल्प

लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद बीजेपी मुख्यालय में नरेंद मोदी ने बताईं थी अपनी प्रतिबद्धताएं

Last Modified:
Saturday, 25 May, 2019
Gulab Kothari

लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की है। अपनी इस ऐतिहासिक जीत के बाद दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में फूलों की बारिश, मोदी-मोदी के नारों और पार्टी  कार्यकर्ताओं के उत्साह के बीच नरेंद्र मोदी ने देश के लिए अपने संकल्प, समर्पण और प्रतिबद्धताओं को गिनाया।

मोदी का कहना था कि वो गलत इरादे या बदनीयत से कोई भी काम नहीं करेंगे। मोदी का यह भी कहना था कि वो खुद के लिए कुछ भी नहीं करेंगे और साथ ही ये भी कहा कि उनके समय का पल-पल और उनके शरीर का कण-कण देशवासियों के काम आएगा।

मोदी की इस जीत और संबोधन में अपनी प्रतिबद्धताओं के बारे में की गई घोषणा को लेकर ‘राजस्थान पत्रिका’ के एडिटर-इन-चीफ गुलाब कोठारी ने 25 मई के अखबार के अंक में मुखपृष्ठ पर एक संपादकीय लिखा है। इस संपादकीय में गुलाब कोठारी ने यह भरोसा भी जताया है कि राजस्थान पत्रिका समूह मोदी की भावी योजनाओं के प्रति पूरे समर्पण से काम करेगा।

गुलाब कोठारी द्वारा लिखे गए संपादकीय को आप यहां देख सकते हैं-

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

 

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राजदीप सरदेसाई बोले, इस वजह से मोदी को करना चाहिए मीडिया का धन्यवाद

लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी ने हासिल की है प्रचंड जीत

Last Modified:
Saturday, 25 May, 2019
Rajdeep Sardesai

लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे। कहा जाता रहा कि मीडिया का एक वर्ग जानबूझकर नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रचार को तवज्जो दे रहा है। हालांकि, यह बात अलग है कि किसी भी मीडिया संस्थान ने इसे स्वीकार नहीं किया। केवल रिपब्लिक टीवी, ज़ी न्यूज़ या इंडिया टीवी ही नहीं, अन्य कई चैनल्स और अख़बारों में भी मोदी ही मोदी छाए रहे।

अब जब चुनाव के परिणाम आ गए हैं और भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल कर ली है, यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी अपने अंदाज़ में मोदी की जीत में मीडिया की भूमिका को रेखांकित किया है। राजदीप ने एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने बताया है कि नरेंद्र मोदी को अपनी जीत के लिए किस-किस को धन्यवाद कहना चाहिए।

राजदीप का यह लेख उनकी वेबसाइट rajdeepsardesai.net पर मौजूद है। लेख की शुरुआत में उन्होंने बताया है कि ऐसे कई कारक हैं, जिन्होंने भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके लिए मोदी को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए। सबसे पहले राजदीप ने अमित शाह का जिक्र किया है। उसके बाद कांग्रेस, राहुल गाँधी, क्षेत्रीय विपक्षी दल, आतंकी अजहर मसूद के बारे में बताया गया है कि कैसे भाजपा को जीत की इबारत लिखने में इनसे अप्रत्याशित मदद मिली। फिर उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया और उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला है।

राजदीप लिखते हैं ‘नए साल के पहले दिन पीएम मोदी ने एक न्यूज़ एजेंसी को इंटरव्यू दिया, जिसे सभी मीडिया संस्थानों ने चलाया। इसके बाद चुनावी समर के बीच अभिनेता अक्षय कुमार मोदी का गैर-राजनीतिक इंटरव्यू लेने आये और यह सिलसिला मतदान के आखिरी दिन उनकी केदारनाथ की धार्मिक यात्रा के साथ समाप्त हुआ। इस दौरान मीडिया नेरेटिव को 'पक्षपातपूर्ण' तरीके से 'कैद' कर लिया गया और विपक्ष लगभग अदृश्य था’

उन्होंने आगे लिखा है कि ‘2019 के चुनाव को सबसे अच्छी तरह से कोरियोग्राफ्ड 'इवेंट मैनेजमेंट' संचालित चुनाव के रूप में याद किया जाएगा, जहां आसानी से झुक जाने वाले मीडिया की भूमिका मोदी को सहयोग देने और जीत दिलाने के लिए यह सुनिश्चित करनी थी कि किसी भी तरह बराबरी का मुकाबला न हो। एक टीवी चैनल की शोध रिपोर्ट से पता चलता है कि अप्रैल में मोदी को टीवी समाचार चैनलों द्वारा 722 घंटे से अधिक समय तक दिखाया गया, जबकि राहुल गांधी को महज 252 घंटे’।

राजदीप ने इस बात का भी जिक्र किया है कि एक चैनल ने खबर और प्रोपेगंडा के बीच के अंतर को ख़त्म करते हुए प्रत्येक मतदान दिवस पर पीएम मोदी के इंटरव्यू को जगह दी। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी मोदी को सुपरमैन के रूप में पेश किया गया। फेसबुक से लेकर वॉट्सऐप तक लगभग हर मंच पर मोदी ही मोदी छाए रहे। इस मैन्युफैक्चर्ड छवि के बीच स्थानीय मुद्दों को हवा कर दिया गया। कुल मिलाकर राजदीप सरदेसाई का कहना है कि मीडिया ने मोदी की जीत सुनिश्चित करने के लिए काफी कुछ किया, लिहाजा अब उन्हें इसके लिए मीडिया को धन्यवाद कहना चाहिए।

राजदीप का पूरा लेख आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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ये परीक्षण तो पाकिस्तान के डर को ही दुनिया के सामने लाता है, बोले पत्रकार टीपी पाण्डेय

नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की खबर से पाकिस्तान में बड़ी खलबली है

Last Modified:
Saturday, 25 May, 2019
India Pakistan

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत से दोस्ती के लिए पाकिस्तान की छटपटाहट...!!

क्या पाकिस्तान के पीएम इमरान खा़न को भी मोदी जी की हलफबरदारी (शपथ ग्रहण) के प्रोग्राम में आमंत्रित किया जाएगा? पाकिस्तान के मीडिया में इस बात की काफी चर्चा है कि मोदी जी अगर इमरान को आमंत्रित करेंगे तो क्या उन्हें नई दिल्ली जाना चाहिए या नहीं? 2014 में पाकिस्तान की सियासी जमात पीएमएलएन यानी मुस्लिम लीग नून के सद्र और पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ मोदी साहब के शपथ ग्रहण समारोह में मेहमान के तौर पर आमंत्रित थे। मोदी जी के दोबारा पीएम बनने की खबर से पाकिस्तान में बड़ी खलबली है। इमरान ने मोदी जी को जीत की मुबारकबाद तो दी, मगर साथ ही भारत को डराने के लिए कल ही 15 सौ किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइल शाहीन का परीक्षण भी कर दिया। अलबत्ता, भारत इस मिसाइल परीक्षण से क्यों डरेगा, बल्कि ये मिसाइल परीक्षण तो पाकिस्तान के डर को ही दुनिया के सामने लाता है।

साल 2014 से 2019 के बीच भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेइंतहा कड़वाहट घुल चुकी है। पुलवामा की घटना और फिर बालाकोट पर हमला करके भारत ने जिस तरह पाकिस्तान से इंतकाम लिया, उससे पाकिस्तान के साथ हर तरह का राब्ता खत्म सा हो गया। दोनों देशों के बीच क्रिकेट भी खत्म हो चुका है। हालात ये हैं कि IPL तक में पाकिस्तान का कोई खिलाड़ी नहीं खेलता। भारत ने उससे मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा भी छीन लिया। ये अलग बात है कि पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ये कह चुके हैं कि मोदी अगर पीएम बनेंगे तो दोनों देशों के बीच कश्मीर सहित कई मुद्दों पर बातचीत हो सकती है।

पाकिस्तान इस वक्त आर्थिक तौर पर पूरी तरह तबाह हो चुका है। उस पर 36 अरब ड़ॉलर का विदेशी कर्ज है। पाकिस्तान का एक्सपोर्ट 20 फीसदी है और वो 40 फीसदी ज़रूरत की चीजें आयात करता है। अभी हाल ही में उसने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पैर पड़कर 6 अरब डॉलर का कर्ज लिया है, मगर दिक्कत ये है कि कर्ज के बदले आईएमएफ ने पाकिस्तान पर इतनी कड़ी शर्तें थोप दी हैं कि अगले 20 साल तक भी पाकिस्तान ही माली हालत सुधरने वाली नहीं है।

ये बात गौर करने की है कि आईएमएफ का मुख्य डोनर अमेरिका है। लिहाजा अमेरिका कभी ये नहीं चाहता कि पाकिस्तान इस संस्था से कर्ज लेकर चीन का कर्ज अदा करे, इसलिए उसने कड़ी शर्तें लगाने के साथ साथ पाकिस्तान की वित्तीय संस्थाओं मिसाल के तौर पर स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान में अपने वफादार आदमी को बैठा दिया है, जिसकी जवाबदेही आईएमएफ को होगी। इसी तरह इमरान के वित्तीय सलाहकार के तौर पर डॉक्टर हफीज़ शेख को तैनात किया गया है। हालांकि, ये दोनों हैं तो पाकिस्तानी मूल के, लेकिन लंबे वक्त तक आईएमएफ में काम कर चुके हैं।

अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान हर दफा उससे कर्ज हासिल कर इस रकम से आतंकी तंजीमों की ही मदद करता रहा है। असल में पाकिस्तान की फौज भी इस वक्त बौखलाई हुई है, मगर लाचार है, क्योंकि भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान की वैश्विक स्तर पर घेराबंदी और अमेरिका की सख्ती से इमरान सरकार बहुत परेशान है। पाकिस्तानी फौज की परेशानी ये है कि उसे हर साल अमेरिका से 3-4 अरब डॉलर मिल जाते थे, जिसका पाकिस्तानी फौज अपनी ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल करती थी, मगर ये मदद अब बन्द हो चुकी है।

अब ईरान, अफगानिस्तान से लेकर भारत में दहशतगर्द तंजीमों को खुली मदद करने के चक्कर में पाकिस्तान दिवालिया होने के कगार पर है। भारत द्वारा पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा भी छीन लिया गया, जिससे पाकिस्तान में महंगाई के कारण हाहाकार मच गया। पाकिस्तान में इमरान की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत तेजी से नीचे गिरा है। नवाज शरीफ की हुकूमत को बेदखल कर जब PTI  के नेता इमरान खान ने सत्ता संभाली थी, तब उनकी लोकप्रियता 90 फीसदी थी, जो अब घटकर 57 प्रतिशत रह चुकी है।

हालांकि नवाज शरीफ अभी भ्रष्टाचार के मामले में लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद हैं। बलूचिस्तान, गिलगिट, बाल्टिस्तान में तो सरकार विरोधी आंदोलन चल ही रहे हैं। दूसरी ओर पश्तून नेता मंज़ूर पश्तीन ने भी पाकिस्तान आर्मी को लेटा देने की धमकी दी है। कुल मिलाकर इमरान इस वक्त अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी 9 माह की सरकार लोगों की नज़रों में गिर चुकी है। कहते तो ये हैं कि आर्मी और इमरान अभी एक हैं, लेकिन ये मोहब्बत कब तक चलेगी? पाकिस्तान में चीन का दखल भी लगातार बढ़ रहा है, इससे स्थिति और भयावह होती जा रही है। अपनी देश जनता को नए पाकिस्तान का ख्वाब दिखाकर सत्ता हासिल करने वाले इमरान इस वक्त बहुत बेज़ार हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद बोले, मोदी के इस अंदाज में दिखा उनकी शख्सियत का नया रूप

एनडीए संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी नई सरकार का गठन करेंगे

Last Modified:
Saturday, 25 May, 2019
Amar Anand

'विनम्रता', 'संस्कार' और सरोकार पर ज़ोर

अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार।।

लोकसभा चुनाव 2019 में अपनी पार्टी बीजेपी को 300 के पार पहुंचाकर दोबारा जिताने वाले नरेंद्र मोदी की जीत ने उन्हें अपराजेय और अपरिहार्य बना दिया है। सारा देश नरेंद्र मोदी के वादों और बातों पर यकीन करता हुआ उनके साथ ख़ड़ा नजर आ रहा है।  यहां तक कि बीजेपी की जीत पर बादलों और हवाओं ने भी दिल से खुशी जाहिर की। एनडीए संसदीय दल के नेता चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी नई सरकार का गठन करेंगे। फूलों की बारिश, मोदी-मोदी के नारों, कार्यकर्ताओं के उत्साह और स्वागत कर रहे साथियों की बीच मोदी ने जो भी बातें कहीं, उनसे नजर आ रहा है कि एक तरह से उनकी बदौलत हुई ऐतिहासिक जीत के बावजूद उनके लहजे में गुरूर नाममात्र भी नहीं था। चुनावी रैलियों के अपने अंदाज से कहीं दूर, नरेंद्र मोदी की सादगी उनकी शख्सियत को नए तरीके से परिभाषित करती हुई नजर आ रही थी।

नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर देश के लिए अपने संकल्प, समर्पण और प्रतिबद्धताओं को गिनाते हुए कहा कि वो गलत इरादे या बदनीयत से कोई भी काम नहीं करेंगे। मोदी ने कहा कि वो खुद के लिए कुछ भी नहीं करेंगे और साथ ही ये भी कहा कि उनके समय का पल-पल और उनके शरीर का कण-कण देशवासियों के काम आएगा। बीजेपी कार्यालय में गुरुवार शाम को हुए उत्सव के दौरान नरेंद्र मोदी की जो सबसे अच्छी बात लगी, वो थी उनकी विनम्रता। सबका साथ-सबका विकास नारे पर ज़ोर देने वाले नरेंद्र मोदी ने स्वागत संबोधन में ये बातें साफ की कि विनम्रता, विवेक और संस्कार उनकी पार्टी का मूल स्वभाव है और वो इस पर कायम रहेंगे।

संविधान के शब्दों और भावनाओं के साथ सरकार चलाने की बात करने वाले नरेंद्र मोदी ये भी साफ करते हैं कि सरकार बहुमत से जरूर बनी है, लेकिन इसे वो सर्वमत से ही चलाएंगे और इस काम में सारा देश उनके साथ खड़ा होगा। विरोधियों को साथ लेकर चलने की बात तो नरेंद्र मोदी ने की ही, उन्होंने साफ तौर पर अपनी नई सरकार को सरोकार से जोड़ते हुए कहा कि देश में सिर्फ दो ही तबके होंगे। एक गरीब, जो अपनी गरीबी से बाहर निकलना चाहते हैं और एक वो अमीर, जो गरीबों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद करना चाहते हैं।

मोदी के मुताबिक इन दोनों को मजबूत करना सरकार की जिम्मेदारी होगी। नरेंद्र मोदी के वादों और इरादों से ये साफ जाहिर हो रहा है कि इस बार वो उन उम्मीदों, मुद्दों औऱ बातों को तरजीह देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, जिनके लिए जनता ने उन्हें दोबारा चुना है।

नरेंद्र मोदी ने अपनी विनम्रता और संस्कार का परिचय जीत के दूसरे दिन यानी शुक्रवार को उस वक्त दिया, जब वो अपनी पार्टी के दोनों बड़े नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से मिलने के लिए उनके घर गए। दोनों ही नेताओं से मुलाकात के दौरान जो श्रद्धा और विनम्रता नरेंद्र मोदी ने अमित शाह के साथ मिलकर दिखाई, वो काबिले तारीफ थी। पार्टी के बुजुर्ग नेताओं खास तौर से आडवाणी की उपेक्षा के आरोपों का सामना करने वाले नरेंद्र मोदी ने जिस भावना से उनसे मुलाकात की, वो दिल को छूने वाली थी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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आशीष चौबे की ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ को सलाह, अपनी बुद्धि अब ऊपर वाले माले में शिफ्ट कर दो

सियासी दल तो अपने नफे के लिए एकता-अखंडता की जड़ों को खोखला कर ही रहे हैं, लेकिन आप जो कर रहे हो, वो तो और भी शर्मनाक है

Last Modified:
Saturday, 25 May, 2019
Media

आशीष चौबे, वरिष्ठ पत्रकार।।

पढ़ोगे तो मिर्ची लगेगी और मेरा मकसद भी शायद यही!

आम चुनाव के अप्रत्याशित परिणाम सामने हैं। देश के बुद्धिजीवी और ज्ञानवान पत्रकार जीत की वजह तलाशते हुए उलट-पुलट हो रहे हैं। फैसला तो जनता जनार्दन का है। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, नायडू जैसे नेताओं ने असलियत को स्वीकार कर लिया है, लेकिन भगवान जाने दिमागी पीड़ित लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों/पत्रकारों के लेख/टिप्पणियां/पोस्ट पढ़कर गुस्सा तो ठीक, शर्म भी आ रही है। भाई लोग लिख रहे हैं कि मुस्लिम वोटर इस बार एकजुट नहीं हो पाया। हिंदू वोट 2014 के बाद से एकतरफा वोट रहा है। एक बड़े पत्रकार साहब लिखते हैं कि इस देश में हिंदुओं की संख्या अधिक है, इसलिए मोदी की झोली में जीत आती है। अब समय है कि दलित/मुस्लिम एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ वोट करें, तभी परिणाम जुदा होंगे। एक जनाब और अपने दिमाग के अजीर्ण होने का परिचय देते हुए लिखते हैं कि यूपी में यादव/दलित समाज वोट को लेकर भटका है, जिसकी वजह से बड़ा नुकसान महागठबंधन को हुआ।

अरे दिमाग के पीरों...हम सब मिलकर सियासी दलों पर आरोप लगाते हैं कि वो जाति, मजहब,वर्ग की राजनीति करते हैं। लोगों को बांटने का काम करते हैं तो आप जो ज़हर फैला रहे हो, वो क्या है? सियासी दल तो अपने नफे के लिए एकता-अखंडता की जड़ों को खोखला कर ही रहे हैं, लेकिन आप जो कर रहे हो, वो तो और भी शर्मनाक है। समझिए ज़रा, आप पर आम लोग भरोसा करते हैं। आपकी कही बात को गंभीरता से लेते हैं, लेकिन उफ़्फ़...आप ही लोगों को भटकाने का काम कर रहे हो| सच कहूं तो आप ही सबसे बड़े अपराधी हो।

ओह्ह..अक्ल के जमींदारों...! ज़रा आंकड़े देखो। चौंक जाओगे। देश बदल रहा है। इस देश में अब युवाओं का बोलबाला है। यूपी में जातीय समीकरणों को ठोकर पर रखा गया। बुआ-बबुआ फुस्स हो गए। 20 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली 96 सीटों में से 46 पर भाजपा का कब्जा हो गया तो वहीं 40 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली सीटों में भाजपा को 29 सीट हासिल हुयीं| यहाँ कांग्रेस की हालत का ज़िक्र करने का कोई मतलब नहीं।

जाति/धर्म/वर्ग को दरकिनार कर आम मतदाता ने अपने विवेक से निर्णय कर मतदान किया। आज का युवा समझदार भी है और अपने निर्णय करने की काबिलियत भी रखता है। इंटेरनेट के इस दौर में युवाओं को बरगलाना आसान नहीं। जानकारी और समझदारी से भरपूर है आज की पीढ़ी।

अब प्रभु इन आंकड़ों पर भी अपनी तीखी नज़र डाल लो। हासिल आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण और शहरी युवा लगातार भाजपा की ओर बढ़ा है। आप जितना मोदी को गरिया रहे हो, उतना ही लोग करीब जा रहे हैं। 2014 की तुलना में इस बार 20 फीसदी नए वोटर्स कांग्रेस से भाजपा की ओर मुड़े हैं। भाजपा का सबसे ज्यादा नकारात्मक पक्ष रखा जाता है तो वो है..धर्म/घृणा की राजनीति। अरे बुद्धि के देवताओं, तो आप क्या कर रहे हो?

मैं भाजपा का पक्षधर नहीं, बल्कि कोफ्त इस बात की है कि बुद्धि मालिकों को तो मूल मुद्दों की बात करनी चाहिए, लेकिन वो भी उसी रास्ते पर अपना #गधा दौड़ाए पड़े हैं, जो कि एक देश के लिए बेहतर सोच नहीं मानी जा सकती। आश्चर्य होता है दोहरे मापदंड को लेकर। आप राम,कृष्ण को लेकर कुछ भी बोलने के अधिकारी हैं? आप आतंकी कसाब,अफ़ज़ल का पक्ष ले सकते हैं, क्योंकि आप स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। आपकी सोच और आपके विचार प्रकट करने पर कोई रोक नहीं। लेकिन साहब, आप गांधी पर चर्चा नहीं कर सकते? इन मुद्दों पर बोलना बुद्धिजीवियों की निगाह में गुनाह है।

खूब राम पर बोलो..लपक कृष्ण को टटोलो, लेकिन इतनी भी हिम्मत रखो कि गांधी के सकारात्मक पक्ष पर चर्चा हो तो नकारात्मक पक्ष से भी पल्ला न झाड़ा जाए। ममता बनर्जी जैसी नेत्री यदि हवा में राजनीति करती हैं तो आईना दिखाया जाए। आज हिंदू हों या मुस्लिम, दलित हों या पिछड़े, उनके लिए रोजगार,विकास जैसे अन्य मुद्दे अहम हैं, न कि हल्की सोच। सबसे बड़ा उदाहरण हाल में आया हुआ जनादेश है।

बुद्धि मालिकों यदि वाकई भाजपा की जीत की वजह खोजनी है तो सबसे बड़ी वजह तो आप खुद हो। हर जगह अपनी टूटी टांग फंसाकर भाजपा को इतना मजबूत कर दिया कि सिर्फ सोशल मीडिया पर सिर पटकने के अलावा तुम्हारे पास कुछ नहीं बचा। समाचार पत्रों/टीवी पर तुम्हारी चुरचुरी तो मोदी चलने न देगा। यहाँ सारा मीडिया मोदी की गोद में बैठकर लल्ला लल्ला लोरी गायेगा।

बुरा लगेगा, शायद मिर्ची लगाने के मकसद से ही पहला काम आज यही किया है। अपनी बुद्धि को बस्ते से निकाल अब ऊपर वाले माले में शिफ्ट कर दो प्रभु, वरना मोदी 2019 में तो भनभना कर आ ही गया। 2024 में भी सनसना कर आ धमकेगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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संतोष भारतीय बोले, राहुल के इस्तीफे के बाद कल ये बन सकते हैं नए कांग्रेस अध्यक्ष

राहुल के इस्तीफे के साथ ही वर्किंग कमेटी के पदाधिकारी भी देंगे अपने पदों से इस्तीफा

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Rahul-Santosh

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे घोषित हो चुके हैं और इनमें भाजपा ने काफी शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी जीत हासिल की है। इस बारे में ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान संपादक संतोष भारतीय का कहना है, ‘चुनाव के नतीजे सामने आते ही सभी तरह के सवाल समाप्त हो चुके हैं और भाजपा में जीत का जश्न शुरू हो चुका है। कल हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की विनम्रता का पैमाना देखा। बीजेपी मुख्यालय में हुए स्वागत समारोह के दौरान उन्होंने जिस तरह का भाषण दिया, उससे लगा कि देश में विनम्र सरकार होगी और अति विनम्र तरीके से प्रशासन चलेगा।’

अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट एक विडियो में संतोष भारतीय का कहना था, ‘लोकतंत्र में लोग सवाल उठाएंगे भी, लेकिन उनका कोई उत्तर नहीं मिलेगा। लेकिन लोकतंत्र में अब अगर ये कोशिश हो कि सवाल भी न उठें तो फिर हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि इस लोकतंत्र को किसी भी दिन हम शीर्षासन की स्थिति में पाएंगे। ये भी सवाल चलते रहेंगे कि राहुल गांधी अपनी हार स्वीकार कर कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले थे और वे मीडिया के सामने इसी उद्देश्य से आए थे, लेकिन पार्टी की पूर्व अध्यक्ष और उनकी मां सोनिया गांधी ने राहुल को ऐसा करने से रोक दिया। सोनिया का कहना था कि इस निर्णय से कांग्रेस बिल्कुल अधर में रह जाएगी और अफरातफरी मच जाएगी।’

संतोष भारतीय ने बताया, ‘अब ये तय हो गया है कि 25 मई को राहुल गांधी अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। उनके इस्तीफे के साथ ही कांग्रेस की वर्किंग कमेटी के पदाधिकारी भी इसी दिन अपने पदों से इस्तीफा दे देंगे। राहुल की जगह अगले कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी दो लोगों के नामों पर अपना मन बना चुकी हैं, इनमें से एक के नाम पर कल मुहर लग जाएगी। इनमें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह में से किसी एक के नाम पर मुहर लग सकती है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक,माना जा रहा है कि अगर अमरिंदर का नाम तय हुआ तो फिलहाल उनकी पत्नी परनीत कौर, जो हाल ही में पटियाला से लोकसभा चुनाव जीती हैं, वे सूबे की कमान संभाल सकता है। और अगर अशोक गहलोत का नाम फाइनल हुआ, तो सचिन पायलट को राजस्थान सरकार की जिम्मेदारी पूरी तौर पर दी जाएगा ।’

संतोष भारतीय के इस विडियो को आप यहां देख सकते हैं-

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रवीश कुमार बोले- मुझे पता है गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने मतगणना के दिन वॉट्सऐप पर मिले तीन तरह के मैसेज का किया जिक्र

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Ravish Kumar

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे वॉट्सऐप पर तीन तरह के मैसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मैसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मैसेज की। बहुत सारे मैसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूबकर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपनी शक्ल की फोटो भेज दो, ज़रा हम देखना चाहते हैं।

मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं और लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मैसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मैसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें, मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा-बोला है, क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई, क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनकी समस्या वास्तविक थी, इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी कि वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं, जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है, जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे, जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों नौकरियां निकालनी पड़ीं। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वैकेंसी आईं और आखिरी साल में कितनी वैकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैंने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच-पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इन पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया। उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे, मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी, वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझ पर हमला करते हैं, इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया, लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं, जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिंदी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था, बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिंदी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटों लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेशे से कुछ ज्यादा प्रेम था, इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था, अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछकर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टूडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखाकर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं, जिन्हें मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं, लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी, वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं, जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नहीं कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग ही क्या कर लेंगे। फिर भी ऐसे काम को सिर्फ मोदी विरोध के चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं होगा। यह अपने पेशे के भीतर आई गिरावट का विरोध ज्यादा है। यह बात मोदी समर्थकों को इस दौर में समझनी होगी। मोदी का समर्थन अलग है। अच्छी पत्रकारिता का समर्थन अलग है। मोदी समर्थकों से भी अपील करूगा कि आप गोदी मीडिया का चैनल देखना बंद कर दें। अख़बार पढ़ना बंद कर दें। इसके बग़ैर भी मोदी का समर्थन करना मुमकिन है।

बहरहाल, 23 मई 2019 को आई आंधी गुज़र चुकी है, लेकिन हवा अभी भी तेज़ चल रही है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के दिलो-दिमाग़ पर एकछत्र राज कायम कर लिया है। 2014 में उन्हें मन से वोट मिला था, 2019 में तन और मन से वोट मिला है। तन पर आई तमाम तक़लीफों को झेलते हुए लोगों ने मन से वोट किया है। उनकी इस जीत को उदारता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं भी करता हूं। जन को ठुकरा कर आप लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं। उस ख़ुशी में भविष्य के ख़तरे देखे जा सकते हैं लेकिन उसे देखने के लिए भी आपको शामिल होना होगा। यह समझने के लिए भी शामिल होना चाहिए कि आख़िर वह क्या बात है जो लोगों को मोदी बनाती है। लोगों को मोदी बनाने का मतलब है अपने नेता में एकाकार हो जाना। एक तरह से विलीन हो जाना। यह अंधभक्ति कही जा सकती है, मगर इसे भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए। मोदी के लिए लोगों का मोदी बन जाना उस श्रेष्ठ अवस्था का प्रतीक है। घर-घर मोदी की जगह आप जन-जन मोदी कह सकते हैं।

मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि 2014 के बाद से इस देश के अतीत और भविष्य को समझने का संदर्भ बिन्दु( रेफरेंस प्वाइंट) बदल गया है। चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी नए भारत की बात करने लगे थे। वह नया भारत उनकी सोच का भारत बन गया है। हर जनादेश में संभावनाएं और आशंकाएं होती हैं। इससे मुक्त कोई जनादेश नहीं होता है। जनता ने तमाम आशंकाओं के बीच अगर एक संभावना को चुना है तो इसका मतलब है कि उसमें उन आशंकाओं से निपटने का पर्याप्त साहस भी है। वह भयभीत नहीं है। न तो यह भय का जनादेश है और न ही इस जनादेश से भयभीत होना चाहिए। ऐतिहासिक कारणों से जनता के बीच कई संदर्भ बिंदु पनप रहे थे। दशकों तक उसने इसे अपने असंतोष के रूप में देखा। बहुत बाद में वह अपने इस अदल-बदल के असंतोष से उकता गई। उसने उस विचार को थाम लिया, जहां अतीत की अनैतिकताओं पर सवाल पड़े हुए थे। जनता ‘अतीत के असंतोषों की स्मृतियों’ से उबर नहीं पाई है। इस बार असंतोष की उस स्मृति को विचारधारा के नाम पर प्रकट कर आई है, जिसे नया भारत कहा जा रहा है।

मैंने हमेशा कहा है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही बनेगा, जिसमें नैतिक शक्ति होगी। आप मेरे लेखों में नैतिक बल की बात देखेंगे। बेशक नरेंद्र मोदी के पक्ष में अनैतिक शक्तियों और संसाधनों का विपुल भंडार है, मगर जनता उसे ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ के गुण-दोष की तरह देखती है। बर्दाश्त कर लेती है। नरेंद्र मोदी उस ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ को ज़िंदा भी रखते हैं। आप देखेंगे कि वह हर पल इसे रेखांकित करते रहते हैं। जनता को ‘अतीत के वर्तमान’ में रखते हैं। जनता को पता है कि विपक्ष में भी वही अनैतिक शक्तियां हैं जो मोदी पक्ष में हैं। विपक्ष को लगा कि जनता दो समान अनैतिक शक्तियों में से उसे भी चुन लेगी। इसलिए उसने बची-खुची अनैतिक शक्तियों का ही सहारा लिया। नरेंद्र मोदी ने उन अनैतिक शक्तियों को भी कमज़ोर और खोखला भी कर दिया। विपक्ष के नेता बीजेपी की तरफ भागने लगे। विपक्ष मानव और आर्थिक संसाधन से ख़ाली होने लगा। दोनों का आधार अनैतिक शक्तियां ही थीं, लेकिन इसी परिस्थिति ने विपक्ष के लिए नया अवसर उपलब्ध कराया। उसे चुनाव की चिंता छोड़ अपने राजनीतिक और वैचारिक पुनर्जीवन को प्राप्त करना था, उसने नहीं किया।

विपक्ष को अतीत के असंतोष के कारणों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। नया भरोसा देना था कि अब से ऐसा नहीं होगा। इस बात को ले जाने के लिए तेज़ धूप में पैदल चलना था। उसने यह भी नहीं किया। 2014 के बाद चार साल तक घर बैठे रहे। जनता के बीच नहीं गए। उसकी समस्याओं पर तदर्थ रूप से बोले और घर आकर बैठ गए। 2019 आया तो बची-खुची अनैतिक शक्तियों के समीकरण से वह एक विशालकाय अनैतिक शक्तिपुंज से टकराने की ख्वाहिश पाल बैठा। विपक्ष को समझना था कि अलग-अलग दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल के ज़रिये लोकतंत्र में जो सामाजिक संतुलन आया था उसकी आज कोई भूमिका नहीं रही।

बेशक इन दलों ने समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को सत्ता-चक्र घुमाकर शीर्ष पर लाने का ऐतिहासिक काम किया, लेकिन इसी क्रम में वे दूसरे पिछड़े और वंचितों को भूल गए। इन दलों में उनका प्रतिनिधित्व उसी तरह बेमानी हो गया जिस तरह अन्य दलों में होता है। अब इन दलों की प्रासंगिकता नहीं बची है तो दलों को भंग करने का साहस भी होना चाहिए। अपनी पुरानी महत्वकांक्षाओं को भंग कर देना था। भारत की जनता अब नए विचार और नए दल का स्वागत करेगी तब तक वह नरेंद्र मोदी के विचार पर चलेगी।

समाज और राजनीति का हिंदूकरण हो गया है। यह स्थायी रूप से हुआ है, मैं नहीं मानता। उसी तरह जैसे बहुजन शक्तियों का उभार स्थायी नहीं था, इसी तरह से यह भी नहीं है। यह इतिहास का एक चक्र है, जो घूमा है। जैसे मायावती सवर्णों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थी, उसी तरह आज संघ बहुजन के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बना रहा है। जो सवर्ण थे वो अपनी जाति की पूंजी लेकर कभी सपा-बसपा और राजद के मंचों पर अपना सहारा ढूंढ रहे थे। जब वहां उनकी वहां पूछ बढ़ी तो बाकी बचा बहुजन सर्वजन के बनाए मंच पर चला गया।

बहुजन राजनीति ने कब जाति के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया। जातियों के संयोजन की राजनीति थी तो संघ ने भी जातियों के संयोजन की राजनीति खड़ी कर दी। बेशक क्षेत्रिय दलों ने बाद में विकास की भी राजनीति की और कुछ काम भी किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के लिए अपनी भूमिका को हाईवे बनाने तक सीमित कर गए। चंद्रभान प्रसाद की एक बात याद आती है। वह कहते थे कि मायावती क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बोलती हैं, क्यों नहीं विदेश नीति पर बोलती हैं। यही हाल सारे क्षेत्रीय दलों का है। वह प्रदेश की राजनीति तो कर लेते हैं मगर देश की राजनीति नहीं कर पाते हैं।

बहुजन के रूप में उभरकर आए दल अपनी विचारधारा की किताब कब का फेंक चुके हैं। उनके पास अंबेडकर जैसे सबसे तार्किक व्यक्ति हैं लेकिन अंबेडकर अब प्रतीक और अहंकार का कारण बन गए हैं। छोटे-छोटे गुट चलाने का कारण बन गए हैं। हमारे मित्र राकेश पासवान ठीक कहते हैं कि दलित राजनीति के नाम पर अब संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही मिलते हैं, राजनीति नहीं मिलती है। बहुजन राजनीति एक दुकान बन गई है जैसे गांधीवाद एक दुकान है। इसमें विचारधारा से लैस व्यक्ति आज तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प नहीं बना पाया। वह दल नहीं बनाता है। अपने हितों के लिए संगठन बनाता है। अपनी जाति की दुकान लेकर एक दल से दूसरे दल में आवागमन करता है। उसके भीतर भी अहंकार आ गया। वह बसपा या बहुजन दलों की कमियों पर चुप रहने लगा।

वह अहंकार ही था कि मेरे जैसों के लिखे को भी जाति के आधार पर खारिज किया जाने लगा। मैं अपनी प्रतिबद्धता से नहीं हिला, लेकिन प्रतिबद्धता की दुकान चलाने वाले अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे। वे लोगों को आदेश देने लगे कि किसे क्या लिखना चाहिए। जिस तरह भाजपा के समर्थक राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटते हैं, उसी तरह अंबेडकरवादियों में भी कुछ लोग सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि बहुजन पक्ष में कोई कांशीराम नहीं है। कांशीराम की प्रतिबद्धता का मुकाबला नहीं है। वह वैचारिक प्रतिबद्धता थी। अब हमारे पास प्रकाश आंबेडकर हैं जो अंबेडकर के नाम पर छोटे मकसद की राजनीति करते हैं। यही हाल लोहिया का भी हुआ है। जो अंबेडकर को लेकर प्रतिबद्ध हैं उनकी भी हालत गांधी को लेकर प्रतिबद्ध रहने वाले गाधीवादियों की तरह है। दोनों हाशिये पर जीने के लिए अभिशप्त हैं। विकल्प गठजोड़ नहीं है। विकल्प विलय है। पुनर्जीवन है। अगले चुनाव के लिए नहीं है। भारत के वैकल्पिक भविष्य के लिए है।

आपने देखा होगा कि इन पांच सालों में मैंने इन दलों पर बहुत कम नहीं लिखा। लेफ्ट को लेकर बिल्कुल ही नहीं लिखा। मैं मानता हूं कि वाम दलों की विचारधारा आज भी प्रासंगिक हैं मगर उनके दल और उन दलों में अपना समय व्यतीत कर रहा राजनीतिक मानवसंसाधन प्रासंगिक नहीं हैं। उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी है। वह सड़ रहा है। उनके पास सिर्फ कार्यालय बचे हैं। काम करने के लिए कुछ नहीं बचा है। वाम दलों के लोग शिकायत करते रहते थे कि आपके कार्यक्रम में लेफ्ट नहीं होता है। क्योंकि दल के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी थी। बेशक महाराष्ट्र में किसान आंदोलन खड़ा करने का काम बीजू कृष्णन जैसे लोगों ने किया। यह उस विचारधारा की उपयोगिता थी। न कि दल की। दल को भंग करने का समय आ गया है। नया सोचने का समय आ गया है। मैं दलों की विविधता का समर्थक हूं, लेकिन उपयोगिता के बग़ैर वह विविधता किसी काम की नहीं होगी। यह सारी बातें कांग्रेस पर भी लागू होती है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में आपको भाजपा दिखती है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आपको कांग्रेस छोड़ सबकुछ दिखता है। कांग्रेस चुनाव लड़ना छोड़ दे या चुनाव को जीवन-मरण के प्रश्न की तरह न लड़े। वह कांग्रेस बने।

कांग्रेस नेहरू का बचाव नहीं कर सकी। वह पटेल से लेकर बोस तक का बचाव नहीं कर सकी। आज़ादी की लड़ाई की विविधता और खूबसूरती से जुड़ी ‘अतीत की स्मृतियों’ को ज़िंदा नहीं कर पाई। गांधी के विचारों को खड़ा नहीं कर पाई। आज आप भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ग़लत टिप्पणी कर दीजिए वह अपनी तरह से सौ बातें बताएंगे, पांच साल में कांग्रेस पार्टी नेहरू को लेकर समानांतर विमर्श पैदा नहीं कर पाई, मैं इसी एक पैमाने से कांग्रेस को ढहते हुए देख रहा था। राजनीति विचारधारा की ज़मीन पर खड़ी होती है, नेता की संभावना पर नहीं। एक ही रास्ता बचा है। भारत के अलग अलग राजनीतिक दलों में बचे मानव संसाधान को अपना अपना दल छोड़ कर किसी एक दल में आना चाहिए। जहां विचारों का पुनर्जन्म हो, नैतिक बल का सृजन हो और मानव संसाधन का हस्तांतरण। यह बात 2014 में भी लोगों से कहा था। फिर खुद पर हंसी आई कि मैं कौन सा विचारक हूं जो यह सब कह रहा हूं। आज लिख रहा हूं।

इसके बाद भी विपक्ष को लेकर सहानुभूति क्यों रही। हालांकि उनके राजनीतिक पक्ष को कम ही दिखाया और उस पर लिखा बोला क्योंकि 2014 के बाद हर स्तर पर नरेंद्र मोदी ही प्रमुख हो गए थे। सिर्फ सरकार के स्तर पर ही नहीं, सांस्कृतिक से लेकर धार्मिक स्तर पर मोदी के अलावा कुछ दिखा नहीं और कुछ था भी नहीं। जब भारत का 99 प्रतिशत मीडिया लोकतंत्र की मूल भावना को कुचलने लगा तब मैंने उसमें एक संतुलन पैदा करने की कोशिश की। असहमति और विपक्ष की हर आवाज़ का सम्मान किया। उसका मज़ाक नहीं उड़ाया। यह मैं विपक्षी दलों के लिए नहीं कर रहा था बल्कि अपनी समझ से भारत के लोकतंत्र को शर्मिंदा होने से बचा रहा था। मुझे इतना बड़ा लोड नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यह मेरा लोड नहीं था फिर भी लगा कि हर नागरिक के भीतर और लोकतंत्र के भीतर विपक्ष नहीं होगा तो सबकुछ खोखला हो जाएगा। मेरी इस सोच में भारत की भलाई की नीयत थी।

नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत हुई है। मीडिया की जीत नहीं हुई है। हर जीत में एक हार होती है। इस जीत में मीडिया की हार हुई है। उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं किया। आज गोदी मीडिया के लोग मोदी को मिली जीत के सहारे ख़ुद की जीत बता रहे हैं। दरअसल उनके पास सिर्फ मोदी बचे हैं। पत्रकारिता नहीं बची है। पत्रकारिता का धर्म समाप्त हो चुका है। मुमकिन है भारत की जनता ने पत्रकारिता को भी खारिज कर दिया हो। उसने यह भी जनादेश दिया हो कि हमें मोदी चाहिए, पत्रकारिता नहीं। इसके बाद भी मेरा यकीन उन्हीं मोदी समर्थकों पर है। वे मोदी और मीडिया की भूमिका में फर्क देखते हैं। समझते हैं। शायद उन्हें भी ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां जनता का प्रतिनिधि पत्रकार अपने पेशेवर धर्म को छोड़ नेता के चरणों में बिछा नज़र आए। मुझे अच्छा लगा कि कई मोदी समर्थकों ने लिखा कि हम आपसे असहमत हैं, मगर आपकी पत्रकारिता के कायल हैं। आप अपना काम उसी तरह से करते रहिएगा। ऐसे सभी समर्थकों का मुझ में यकीन करने के लिए आभार। मेरे कई सहयोगी जब चुनावी कवरेज के दौरान अलग-अलग इलाकों में गए तो यही कहा कि मोदी फैन भी तुम्हीं को पढ़ते और लिखते हैं। संघ के लोग भी एक बार चेक करते हैं कि मैंने क्या बोला। मुझे पता है कि रवीश नहीं रहेगा तो वे रवीश को मिस करेंगे।

दो साल पहले दिल्ली में रहने वाले अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग ने मुझे छोटी सी गीता भेजी। लंबा सा पत्र लिखा और मेरे लिए लंबे जीवन की कामना की। आग्रह किया कि यह छोटी सी गीता अपने साथ रखूं। मैंने उनकी बात मान ली। अपने बैग में रख लिया। जब लोगों ने कहा कि अब आप सुरक्षित नहीं हैं। जान का ख़्याल रखें तो आज उस गीता को पलट रहा था। उसका एक सूत्र आपसे साझा कर रहा हूं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

मुझे प्यार करते रहिए। मुझे ज़लील करने से क्या मिलेगा। आपका ही स्वाभिमान टूटेगा कि इस महान भारत में आप एक पत्रकार का साथ नहीं दे सके। मेरे जैसों ने आपको इस अपराध बोध से मुक्त होने का अवसर दिया है। यह अपराध बोध आप पर उसी तरह भारी पड़ेगा, जैसे आज विपक्ष के लिए उसकी अतीत की अनैतिकताएं भारी पड़ रही हैं। इसलिए आप मुझे मज़बूत कीजिए। मेरे जैसों के साथ खड़े होइये। आपने मोदी को मज़बूत किया। आपका ही धर्म है कि आप पत्रकारिता को भी मज़बूत करें। हमारे पास जीवन का दूसरा विकल्प नहीं है। होता तो शायद आज इस पेशे को छोड़ देता। उसका कारण यह नहीं कि हार गया हूं। कारण यह है कि थक गया हूं। कुछ नया करना चाहता हूं। लेकिन जब तक हूं, तब तक तो इसी तरह करूंगा। क्योंकि जनता ने मुझे नहीं हराया है। मोदी को जिताया है। प्रधानमंत्री मोदी को बधाई।

साभार: https://naisadak.org/is-2019-mandate-is-against-me-also/

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पुण्य प्रसून बाजपेयी बोले, बीजेपी की जीत ने दे दिए हैं भविष्य के ये संकेत

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों का किया विश्लेषण

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Punya Prasun

पुण्य प्रसून बाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार।।

न मुद्दे, न उम्मीदवार सिर्फ मोदी सरकार

गुलाब की पंखुडियों से पटी पड़ी जमीन। गेंदा के फूलों से दीवार पर लिखा हुआ धन्यवाद। दरवाजे से लेकर छत तक लड्डू बांटते हाथ। सड़क पर एसयूवी गाड़ियों की कतार और पहली बार पांचवीं मंजिल तक पहुंचने का रास्ता भी खुला हुआ, ये नजारा कल दिल्ली के नये बीजेपी हेडक्वार्टर का था। दीनदयाल मार्ग पर बने इस पांच सितारा हेडक्वार्टर को लेकर कई बार चर्चा यही रही कि दीनदयाल के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के उलट आखिरी व्यक्ति तो दूर, बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिये हेडक्वार्टर एक ऐसा किला है, जिसमें कोई आसानी से दस्तक दे नहीं सकता, जबकि अशोक रोड के बीजेपी हेडक्वार्टर में तो हर किसी की पहुंच हमेशा से होती रही।

2014 की जीत का नजारा कैसे 2019 में कहीं ज्यादा बड़ी जीत के जश्न के साथ अशोका रोड से दीनदयाल मार्ग में इस तरह तब्दील हो जायेगा कि बीजेपी को समाज का पहला और आखिरी व्यक्ति एक साथ वोट देंगे, ऐसा कभी पहले हुआ नहीं था। ये कभी किसी ने सोचा नहीं होगा कि बहुमत की सरकार दूसरी बार अपने बूते करीब 50 फीसदी वोट के साथ सत्ता में बरकरार रहेगी और सिर्फ चार राज्य छोड़कर (तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश,केरल और पंजाब) हर जगह बीजेपी ऐसी धमक के साथ सत्ता की डोर अपने हाथ रखेगी कि न सिर्फ क्षत्रप बल्कि राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को भी अपनी राजनीति को बदलने या फिर नये सिरे से सोचने की जरूरत पड़ेगी, जबकि देश के सामने सारे मुद्दे बरकरार हैं।

बेरोजगारी, किसान, मजदूर, उत्पादन कुछ इस तरह गहराया हुआ है कि आर्थिक हालात बिगड़े हुये हैं। उस पर घृणा, पाकिस्तान से युद्ध, हिंदू राष्ट्र की सोच और गोडसे को ‘जिंदा’ भी किया गया, लेकिन फिर भी जनादेश के सामने मुद्दे-उम्मीदवार मायने रखे ही नहीं। जातियां टूटती नजर आयीं। उम्मीद और आस हिंदुत्व का चोगा ओढ़कर देशभक्ति व राष्ट्रवाद में इस तरह खोया कि न सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक सोच, बल्कि अतीत की समूची राजनीतिक थ्योरी ही काफूर हो गई।

पश्चिम बंगाल में धर्म को अफीम कहने-मानने वाले वामपंथी वोटर खिसककर धर्म का जाप करने वाली बीजेपी के साथ आ खड़े हुये। जिस तरह 22 फीसदी वामपंथी वोट एकमुश्त बीजेपी के साथ जुड़ गया, उसने तीन संदेश साफ दे दिये। पहला, वामपंथी जमीन पर जब वर्ग संघर्ष के नारे तले काली पूजा मनायी जाती है तो फिर वही काली पूजा, दशहरा और राम की पूजा तले धार्मिक होकर मानने में क्या मुश्किल है। दूसरा, वाम जमीन पर सत्ता विरोध का स्वर हमेशा रहा है। वाम के तेवर-संगठन-पावर खत्म हुआ तो फिर विरोध के लिये बीजेपी के साथ ममता विरोध में जाने से कोई परेशानी है नहीं। तीसरा, मुस्लिम के साथ किसी जाति का कोई साथ न हो तो फिर मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम के हक के सवाल भी मुस्लिमों के एकमुश्त वोट के साथ सत्ता दिला नहीं सकते या फिर सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में नहीं आ सकते हैं।

दरअसल, जनादेश तले कुछ सच उभरकर आ गये और कुछ सच छुप भी गये। क्योंकि 2019 का जनादेश इतना स्थूल नहीं है कि उसे सिर्फ मोदी सत्ता की ऐतिहासिक जीत बताकर खामोशी बरती जाये। लालू यादव की गैरमौजूदगी में लालू परिवार के भीतर के झगड़े और महागठबंधन के तौर तरीके ने उस मिथ को तोड़ दिया, जिसमें यादव सिर्फ आरजेडी से बंधा हुआ है और मुस्लिमों को ठौर महागठबंधन में ही मिलेगी, ये मान लिया गया था। चूंकि तेजस्वी, राहुल, मांझी, कुशवाहा, साहनी के एक साथ होने के बावजूद अगर महागठबंधन की हथेली खाली रह गयी तो ये सिर्फ नीतीश-मोदी-पासवान की जीत भर नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरण के बदलने के संकेत भी हैं।

जिस तरह बिहार से सटे यूपी में अखिलेश-मायावती के साथ आने के बावजूद यादव-जाटव तक के वोट ट्रांसफर नहीं हुये, उसने भविष्य के संकेत तो दे ही दिये कि अखिलेश यादव ओबीसी के नेता हो नहीं सकते और मायावती का सामाजिक विस्तार अब सिर्फ जाटव भर है और उसमें भी बिखराव हो रहा है। फिर बीजेपी ने जिस तरह हिंदू राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर वोट का ध्रुवीकरण किया, उसने भी संकेत उभार दिये कि कांग्रेस जिस तरह सपा-बसपा से अलग होकर ऊंची जातियों के वोट बैंक को बीजेपी से छीनकर अपने अनुकुल करने की सोच रही थी कि जिससे 2022 (यूपी विधानसभा चुनाव) तक उसके लिये जमीन तैयार हो जाये और संगठन खड़ा हो जाये, उसे भारी धक्का लगा है।

जाहिर है बीजेपी और कांग्रेस के लिये भी बड़ा संदेश इस जनादेश में छुपा है। एक तरफ बीजेपी का संकट ये है कि अब वह संगठन वाली पार्टी कम कद्दावर नेता की पहचान के साथ चलने वाली सफल पार्टी के तौर पर ज्यादा है। यानी यहां पर बीजेपी कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवक की भूमिका भी मोदी के सामने लुप्त सी हो गई। यह वाजपेयी-आडवाणी युग से आगे और बहुत ज्यादा बदली हुई सी पार्टी है, क्योंकि वाजपेयी काल तक नैतिकता का महत्व था। मौरल राजनीति के मायने थे। तभी तो मोदी को भी राजधर्म बताया गया और भ्रष्ट यदुरप्पा को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया। लेकिन मोदी काल में महत्वपूर्ण सिर्फ जीत है, इसलिये महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे भी देशभक्त है और सबसे ज्यादा कालाधन खर्च कर चुनाव जीतने का शाह मंत्र भी मंजूर है।

इसके समानांतर कांग्रेस के लिये संभवतः ये सबसे मुश्किल दौर है, क्योंकि बीजेपी तो मोदी सरीखे लारजर दैन लाइफ वाले नेता को साथ लेकर भी पार्टी के तौर पर लड़ती दिखायी दी, लेकिन कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होकर भी सिर्फ अपने नेता राहुल गांधी को ही देखकर मंद-मंद खुश होती रही। लड़ सिर्फ राहुल रहे थे। प्रियंका गांधी का जादुई स्पर्श अच्छा लग रहा था, लेकिन कांग्रेस कहीं थी ही नहीं। शायद 2019 के जनादेश में जिस तरह की सफलता जगन रेड्डी को आंध्र प्रदेश में मिली, उसने कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी को भी उभार दिया कि उसे न तो अपनों को सहेजना आता है और न ही राजनीतिक दल के तौर पर संभालना आता है।

एक वक्त ममता भी कांग्रेस से निकलीं और जगन रेड्डी भी कांग्रेस से निकले। दोनों वक्त गांधी परिवार में सिमटी कांग्रेस ने दिल बड़ा नहीं किया, उल्टे अपने ही पुराने नेताओं के सामने कांग्रेस के ऐतिहासिक सफर के अहंकार में खुद को डुबो लिया। जिस मोड़ पर राहुल गांधी ने कांग्रेस संभाली, वह पार्टी को कम, नेताओं को ही ज्यादा तरजीह दे मान बैठे कि नेताओं से कांग्रेस चलेगी। इसी का असर है कि कांग्रेस शासित किसी भी राज्य में नेता को इतनी पावर नहीं कि वह बाकियों को हांक सके। मध्य प्रदेश में कमलनाथ के समानांतर दिग्विजय हों या सिंधिया या फिर राजस्थान में गहलोत हो या पायलट या फिर छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल हों या ताम्रध्वज साहू व टीएस सिंह देव, सभी अपने-अपने तरीके से अपने ही राज्य में कांग्रेस को हांकते रहे।

कार्यकर्ता भी इसे ही देखता रहा कि कौन सा नेता कितना पावरफुल है और किसके साथ खड़ा हुआ जा सकता है या फिर अपनी-अपनी कोटरी में सिमटे कांग्रेसी नेताओं को संघर्ष की जरूरत क्या है। ये सवाल न तो किसी ने जानना चाहा और न किसी ने पूछा। तीन महीने पहले अपने ही जीते राज्य में कांग्रेस की 2014 से भी बुरी गत क्यों हो गई, इसका जवाब कांग्रेसी होने में ही छिपा है, जो मानकर चलते हैं कि वे सत्ता के लिये ही बने हैं।

आखिरी सवाल है,  इस जनादेश के बाद होगा क्या? क्योंकि देश न तो विज्ञान को मान रहा है। न ही विकास को समझ सका। न ही सच जानना चाह रहा है। न ही प्रेम या सौहार्द उसकी रगों में दौड़ रहा है। वह तो हिंदू होकर, देशभक्त बनकर कुछ ऐसा करने पर आमादा है, जहां शिक्षा-स्वास्थ्य-पानी-पर्यावरण बेमानी से लगे। देश का प्रधानमंत्री उस राजा की तरह नजर आये, जिसे जनता की फिक्र इतनी है कि वह दुश्मन के घर में घुसकर वार करने की ताकत रखता हो। राजा किसी देवता सरीखा नजर आये, जहां संविधान, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग भी बेमानी हो जाये, क्योंकि तीन महीने पहले ‘इस बार 300 पार’ का ऐलान करते हुये तीन महीने बाद तीन सौ पार कर देना किसी पीएम के लिये चाहे मुश्किल हो, लेकिन किसी राजा या देवता के लिये कतई मुश्किल नहीं है।

साभार: http://prasunbajpai.itzmyblog.com/

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वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ने इस जनादेश से निकाले ये 10 सबक

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे सामने आने के बाद रखी अपनी राय

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Amitabh Agnihotri

अब जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और भाजपा ने इनमें शानदार जीत दर्ज की है, ‘नेटवर्क18’ (हिंदी नेटवर्क) के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री ने जनादेश के 10 सबक बताए हैं। इसमें उन्होंने विभिन्न राज्यों का जिक्र करते हुए बताया है कि कैसे जनता के बीच नेता अपनी छवि बरकरार रख पाएंगे और आने वाले चुनावों में जीत दर्ज कर पाएंगे। आइए, जानते हैं कि जनादेश के इन दस सबक के बारे में अमिताभ अग्निहोत्री ने क्या लिखा है।

1:  राजनीतिक पर्यटन करने वाले नेताओं के दिन लदने के संकेत-365 दिन की सक्रियता ही देगी परिणाम।

2: विकास और सुशासन को थाम कर रखने वाले दल ही सियासी सुनामियों में बचा सकेंगे अपने घर-(ओडिशा)।

3:  इलाकों पर पुश्तैनी दावेदारी का युग भी समाप्ति की ओर, जमीन पर सक्रिय रहेंगे तभी टिकेंगे। जैसे-गुना, बागपत, अमेठी।

4: परंपरागत जातीय समीकरणों से परे भी आर्थिक आधार पर बन रहा है एक नया मतदाता समूह। जातियां हैं, लेकिन उनकी जकड़न ढीली हो रही है-यूपी, बिहार इसके उदाहरण हैं।

5: बड़े नाम वालों को अब तुलनात्मक रूप से छोटे नाम वालों से हारने के लिए भी तैयार रहना होगा।

6: मोटेतौर पर दबंग नेताओं के प्रति देश भर में नकार का भाव- हालांकि कुछ अपवाद अभी भी हैं।

7: राज्य और केंद्र को लेकर जनता में पसंद अलग-अलग। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो रीजनल पार्टियां विधानसभा चुनाव में जनता की पसंद हो सकती हैं, लेकिन केंद्र को लेकर जन-मन अलग।

8: गरीब जनता से जुड़ी योजनाओं का मतदान में निर्णायक असर-चाहे राज्य हों या केंद्र।

9: राजशाही की पृष्टभूमि से जुड़े नेताओं को लेकर जनता का सम्मोहन तेजी से टूट रहा है।

10: 40 फीसदी तक भी काम करेंगे तो जनता शेष 60 फीसदी के लिए वादों पर भरोसा कर सकती है, लेकिन बिना डिलीवरी के वादों पर अब भरोसा मुश्किल।

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क्यों इस विदेशी नेता के ट्वीट से पुख्ता हुआ कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’?

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में हिंदी की रौनक बढ़ी है

Last Modified:
Thursday, 23 May, 2019
Narendra Modi

नीरज नैयर, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘मोदी है तो मुमकिन है’, यह बात केवल चुनावी परिणामों पर ही लागू नहीं होती, ऐसा बहुत कुछ है जो नरेंद्र मोदी ने मुमकिन कर दिखाया है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को आज जिस नज़रिये से देखा जाता है, उसकी एक बहुत बड़ी वजह मोदी हैं। पाकिस्तान जिस तरह से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है, उसकी एक बहुत बड़ी वजह मोदी हैं। हठी चीन के अपनी हठधर्मिता छोड़ने के पीछे एक बड़ी वजह मोदी हैं। हालांकि, ये बात अलग है कि इन मुद्दों को सियासी चश्मे से देखा जाता है और इसीलिए ‘मोदी है तो मुमकिन है’ केवल पार्टी विशेष का नारा बनकर रह गया है। इसलिए चलिए इसे छोड़ देते हैं।

अब एक ऐसे ‘मुमकिन’ की बात करते हैं, जिसे यकीकन मोदी ही मुमकिन कर पायें हैं और शायद ही कोई इससे इनकार करे। वो ‘मुमकिन’ है हिंदी की रौनक बढ़ाना। पिछली सरकार यानी यूपीए काल में हिंदी और अंग्रेजी में से कौन आगे था, सभी जानते हैं। सरकार के अधिकांश सदस्य तक अंग्रेजी में संवाद करते थे, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल गई है। मोदी खुद हिंदी में बोलते हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी इंग्लिश कमजोर है।

आप गूगल में सर्च करके देख लीजिये, उनके अंग्रेजी वाले सवाल-जवाब भी मिल जायेंगे। वह हिंदी में बोलने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं, इसलिए हिंदी बोलते हैं, दूसरों को प्रोत्साहित करते हैं और ‘हिंदी में हर कार्य संभव’ को सरकारी दफ्तरों में टंगे बोर्ड से बाहर निकालकर अमल में लाते हैं। वैसे भी हमारे देश में हिंदी बोलने वालों के विषय में यह मान लिया जाता है कि उनकी अंग्रेजी अच्छी नहीं होगी। अब ऐसा क्यों है, यह शोध का विषय है, क्योंकि हम सभी हिंदी बोलते हुए ही बड़े हुए हैं।

मोदी के होने से यह मुमकिन हुआ है कि सात समुन्दर पार रहने वाले भी हिंदी से प्रेम करने लगे हैं। यदि यकीन न हो तो इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का ट्वीट देख लीजिये। नेतन्याहू सिर्फ अंग्रेजी में मोदी को जीत की शुभकामनाएं देते तो कोई उनसे सवाल नहीं करता, कोई उनकी आलोचना नहीं करता। हम अपने ही देश में हिंदी की अनदेखी करने वालों के साथ ऐसा नहीं करते तो फिर नेतन्याहू तो विदेशी हैं। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर मोदी के बारे में हिंदी में लिखा है।

जीत पर बधाई मिलना स्वाभाविक है, और प्रधानमंत्री बनने पर मनमोहन सिंह को भी दूसरे देशों के प्रमुख से बधाई मिली होगी, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी विदेशी पीएम या राष्ट्रपति ने इस तरह हिंदी के प्रति प्रेम दर्शाया हो। संभव है कि मेरी याददाश्त कमजोर हो गई हो या बधाई संदेश बेहद गुप्त रूप से भेजा हो, लेकिन इतना तो तय है कि मोदी ने हिंदी को लेकर जो ‘मुमकिन’ कर दिखाया है, वो पहले नहीं हुआ। इस ‘मुमकिन’ के चलते हिंदी में कामकाज बढ़ा है, काम बढ़ा है तो रोज़गार बढ़ा है। कम से कम हिंदी से जुड़े पत्रकारों या लेखकों के पास तो विकल्प बढ़े ही हैं। हाँ, रोज़गार के आंकड़ों में यदि आप उलझाएंगे तो शायद मैं गलत हो जाऊं, लेकिन इसे सिरे से कोई नहीं नकार पायेगा।

मोदी है तो मुमकिन है, यह बात चुनाव से पहले भी कही जा रही थी, मगर स्वीकार नहीं किया गया। अब परिणाम सबके सामने हैं तो विपक्षी भी यही कहते सुने जा सकते हैं कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’ लिहाजा हिंदी से जुड़े हम लोगों को उम्मीद करनी चाहिए कि मोदी इस मुमकिन को गाड़ी को और आगे ले जायेंगे। उनके पास फ़िलहाल पांच साल हैं, पांच इसलिए कि इससे आगे का मैं नहीं बता सकता, क्योंकि एग्जिट पोल्स वाली एजेंसियों के लिए भी कुछ छोड़ना ज़रूरी है। हाँ, तो उनके पास हिंदी की चमक को और निखारने के लिए फ़िलहाल पांच साल हैं और हम सभी जानते हैं कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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