मिस्टर मीडियाः धंधा तो है पर क्या वाकई गन्दा है?

चोरी न करें, झूठ न बोलें तो क्या करें? चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को...

Last Modified:
Wednesday, 23 January, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

चोरी न करें, झूठ न बोलें तो क्या करें? चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को।
कुछ साल पुरानी बात है। एक दिन एक फोन आया। एक प्रदेश की राजधानी से। वो जनाब ख़ुद को पत्रकार बता रहे थे। बोले-एक चैनल दिला दीजिए। ऊपर वाले की मेहरबानी से पैसे का संकट नहीं है। इसलिए पैसे नहीं चाहिए। केवल चैनल का लोगो वाला माइक चाहिए। जो भी इसकी क़ीमत होगी, दे दूंगा।

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मैंने कहा, ‘भई! ऐसा कहीं होता है? चैनल वाले बेचते नहीं हैं। आपको तो रिपोर्टिंग का पैसा देंगे चैनल वाले। आपसे पैसा क्यों लेंगे’? बोले, ‘सर! अब इलाक़े के कई चैनल ऐसे ही चल रहे हैं। माइक आईडी मिलती है। ज़िले वाले को उसका मंथली देना होता है प्रदेश वाले हेड को। प्रदेश वाले ने फ्रेंचाइजी ली है। वह ऊपर देता है। जिसके पास लाइसेंस है उसको। हर महीने ऊपर वाला तकाज़ा करता है प्रदेश वाले को। प्रदेश वाला पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट से मांगता है। मलाई वाले विभागों के अफसरों से मांगता है। पुलिस वालों से मांगता है। रिपोर्टरों से मांगता है। रिपोर्टर खबर के पैसे मांगता है। फिर कोटा पूरा होता है।‘ मैंने सुनकर हाथ जोड़ लिए। बात आई गई हो गई।

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अब एक बार फिर से ख़बरें मिलने लगी हैं। फ्रेंचाइजी धंधा ज़ोरों पर है। लोगो-धंधा ज़ोरों पर है। नए नवेले छोटे-छोटे चैनल कैसे चलेंगे? विधानसभा चुनाव में रैलियों का कवरेज सरकारी ख़र्चे पर हुआ। एक-एक मिनट जोड़कर बिल लगे। भुगतान हुआ। कई छोटे चैनलों के भी बिल कटे। भुगतान नहीं हुआ। पार्टी हार गई। अब शायद होगा भी नहीं। इसलिए अब ख़र्च निकालने के लिए चैनलों के सामने संकट है। इसलिए लोगो बेचने का धंधा फिर ज़ोरों पर है। तक़लीफ़ यह है कि  गेहूं के साथ घुन भी पिस रहा है। अच्छे चैनल भी हैं और पत्रकार भी हैं। मगर चंद मछलियां सारे तालाब को गंदा करने में लगी हुई हैं। लोग यही समझने लगते हैं कि सारे पत्रकार ऐसा करते हैं या पत्रकारिता ऐसी ही होती है। हर खबर बिकने लगी है-यह धारणा बनती जा रही है।

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और बेचारे स्ट्रिंगर्स क्या करें? उनकी तो और भी मुसीबत है। चैनलों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। खबर न भेजो तो एक झटके में बाहर। अगर भेजो तो हर समाचार के लिए कैमरामैन, कैमरा,  कवरेज स्थल तक जाने -आने का डीज़ल/पेट्रोल खर्च हो जाता है। दिन भर का कवरेज या आधा दिन का कवरेज हो तो चाय-पानी या भोजन का खर्च अलग से। लौटकर एफटीपी के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट और बिजली का बोझ भी उठाना पड़ता है। चैनल की मेहरबानी से खबर लग गई तो उसका भुगतान हो जाता है। नहीं लगी तो जयहिन्द। दिन भर की मेहनत पानी में। और मिलता भी है तो एक खबर का कहीं 500, कहीं 800, कहीं 1000 तो कहीं 1200 रुपए। वह भी चार से छह महीने बाद। इतने में क्या किसी पत्रकार का घर चलता है? फिर रोज़ तो ख़बर लगती नहीं। महीने में बमुश्किल दस-पंद्रह खबरें हो पाती हैं। स्ट्रिंगर दूसरा धंधा न करे तो क्या करे-मैंने अदब से हाथ उठाया सलाम को/समझा उन्होंने, इससे है ख़तरा निज़ाम को/चोरी न करे, झूठ न बोले तो क्या करे?चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को/माइक आईडी किराए पर देकर या बेचकर, स्ट्रिंगर्स का शोषण करके पत्रकारिता का भला नहीं कर रहे हैं हम मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: सरकारी मीडिया की साख़ भी लगी है दांव पर

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव पत्रकारिता का बहुत सम्मान और साख़ बढ़ाने वाले नहीं हैं

Last Modified:
Wednesday, 17 April, 2019
RAJESH

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव पत्रकारिता का बहुत सम्मान और साख़ बढ़ाने वाले नहीं हैं। निजी क्षेत्र के मीडिया पर हम इस स्तंभ में काफी चर्चा कर चुके हैं। इस बार सरकारी माध्यमों की भूमिका और उनकी ज़िम्मेदारी की बात। चुनाव की तारीख़ों का ऐलान होने के बाद आकाशवाणी केंद्रों के समाचार, दूरदर्शन का कवरेज और उसके प्रोफेशनल्स की पत्रकारिता सारा देश देख रहा है। इसके अलावा भारतीय संसद के दोनों चैनलों की निरपेक्षता भी समीक्षकों की बारीक़ नज़र से छिपी नहीं है।

इस सप्ताह चुनाव आयोग को एक रिपोर्ट मिली। इसके मुताबिक़ दूरदर्शन और इसके क्षेत्रीय चैनलों पर एक महीने में भारतीय जनता पार्टी को 160 घंटे और कांग्रेस को केवल 80 घंटे स्थान मिला। ज़ाहिर है कि अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की हालत इससे बेहतर नहीं है। दूरदर्शन का चुनावी राजनीतिक कवरेज निष्पक्षता और संतुलन के बुनियादी सिद्धांत का पालन नहीं कर रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्रसार भारती प्रबंधन को चुनाव आयोग के इस निष्कर्ष से अवगत करा दिया है। दूरदर्शन को संपादकीय सामग्री पर निगरानी के लिए एक कमेटी बनानी पड़ी है। यह कमेटी चुनाव आयोग को समय-समय पर अपने आंकड़ों और सामग्री की जानकारी देगी। प्रसारभारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शशि शेखर वेम्पती ने चुनाव आयोग से संतुलित और निष्पक्ष कवरेज का वादा किया है। ग़ौरतलब है कि चुनाव आयोग ने यह रिपोर्ट कांग्रेस की शिक़ायत पर मांगी थी। शिक़ायत में कहा गया था कि दूरदर्शन जानबूझकर कांग्रेस को पर्याप्त स्थान नहीं दे रहा है। जांच में यह सच पाया गया।

इन दिनों आकाशवाणी के अधिकांश बुलेटिन प्रधानमंत्री के भाषणों या उनके कार्यक्रमों से प्रारंभ होते हैं। बारीक अंतर यह है कि विपक्ष के सेकंड और मिनट उनके नेताओं के यात्रा कार्यक्रमों की जानकारी देने में निकल जाते हैं और उसी समय में सत्तारूढ़ दल के नेताओं ख़ासकर प्रधानमंत्री के संबोधनों से समाचार निकाल कर प्रसारित किए जाते हैं। यानी समय में चाहे बेशक़ बराबरी दिखाई दे, मगर उस अवधि के कंटेंट में काफी अंतर होता है। इसे कोई भी कैसे रोक सकता है। इसी तरह चुनाव पर केंद्रित जनादेश में अव्वल तो पसंदीदा पत्रकार बुलाए जाते हैं, जिससे आलोचना का स्वर न के बराबर रहे। इसके बावजूद जब कार्यक्रम का पुनर्प्रसारण होता है तो उसमें भी संपादित अंश होते हैं। स्पष्ट है कि इसमें से बीजेपी के पक्ष में धुन निकलती है। यहां तक कि एनडीए के सहयोगी दलों को भी पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है। मुझे यह देख-सुन कर 1977 की आकाशवाणी की याद आ रही है। भले ही यह संस्था सरकारी भौंपू बन गई थी, मगर सत्तारूढ़ दल को फ़ायदा दिलाने में नाकाम रही थी।

संसद के दोनों चैनल अपनी स्थापना के कई साल तक निष्पक्ष पत्रकारिता से पहचान बना चुके थे। इन दिनों ये चैनल भी सवालों के घेरे में हैं। संसद के दोनों सदनों में प्रतिपक्षी दलों की संख्या के अनुपात में चैनलों पर स्थान नहीं मिल रहा है। ज़ाहिर है इससे पेशेवर छबि को धक्का पहुंचा है। इस सिलसिले में मुझे पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक की एक टिप्पणी याद आ रही है। तेरह साल पहले कारगिल युद्ध पर उनकी एक किताब ‘कारगिल-एक अभूतपूर्व विजय’ आई थी। इसमें उन्होंने कारगिल युद्ध के बाद चुनाव के दिनों में मीडिया की भूमिका पर अपनी बेबाक राय रखी थी। उनका अनुभव था कि मीडिया ने जानबूझकर ग़लत रिपोर्टें दीं। रिपोर्टों की प्रकृति दुष्टतापूर्ण और निंदनीय थी। जनरल मलिक का यह आकलन भी था कि सरकार प्रभावित मीडिया स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाता। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि सरकारी और नियुक्त अथवा प्रायोजित मीडिया भारत में सफल नहीं हो सकता। इस तरह पेशेवर सिद्धांतों से हटने के कारण साख़ दांव पर लग जाती है मिस्टर सरकारी मीडिया!

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सावधान, प्रचार प्रगति पर है, दांव पर है कई पत्रकारों की 'चाल'

प्रचार, वोटिंग और काउंटिंग के बीच ये वो टाइम पीरियड है, जो नेताओं के साथ साथ पत्रकारों के लिए भी बहुत चुनौती भरा है

Last Modified:
Wednesday, 17 April, 2019
Pramila

प्रमिला दीक्षित
वरिष्ठ पत्रकार।।

प्रचार, वोटिंग और काउंटिंग के बीच ये वो टाइम पीरियड है, जो नेताओं के साथ साथ पत्रकारों के लिए भी बहुत चुनौती भरा है। चाहे वो कथित तौर पर ‘निष्पक्ष’ हों या निष्ठावान (ये निष्ठा किसी के भी प्रति हो सकती है)। नेताओं की खाल अपेक्षाकृत मोटी होती है। जनता का फैसला सिर आंखों पर कहकर उनके लिए पांच साल सत्ता के अंदर या बाहर काटना बड़ी बात नही है, लेकिन पत्रकार के लिए ये रोज़ी-रोटी के साथ साथ रेप्युटेशन की बात है। सबका रोल डिसाइड करने में ऊंट का रोल बड़ा महत्वपूर्ण है। कुछ नए खिलाड़ी दुविधा में हैं कि ऊंट किस करवट बैठेगा? राष्ट्रवादी का आवरण ही पहने रहें? या मुसलमान हो जाएं? या पुन: पत्रकार का चोगा पहन लें? मंझे खिलाड़ी जानते हैं कि बरसों का कमाया सुरक्षा कवच इत्ता हल्का नहीं कि पांच साल का मौसम न झेल पाए। हां, दस में दिक्कत हो सकती है, इसलिए कुछ हड़बडाहट है, लेकिन वो भी संयमित। वैसे पत्रकारिता में आर या पार की पराकाष्ठा का ये दौर नया है। पत्रकार, नेता नहीं हो सकता, बशर्ते वो आशुतोष न हो और नेता, पत्रकार नहीं हो सकता बशर्ते वो आशुतोष न हो।

नेता तो तेल मलकर प्रचार पर उतरते हैं, ताकि शरीर क्या, कान बेधकर अंतरात्मा तक कुछ न आने पाए, पर चैनल तो तेल लगा नहीं सकते और तेल लगाकर तो पत्रकारिता हो भी नहीं सकती। इसलिए ये दो महीने का टाइम कुछ चैनलों के लिए एकदम लास्ट ओवर टाइप है। जीत गए तो ट्रॉफी अपनी, नहीं तो स्टेडियम में ही इतनी छीछालेदार हो जानी है कि बाहर तो कहने ही क्या! कुछ हैं, जो निस्वार्थ भाव से लगे हुए हैं, कुछ जोखिम पर खेल रहे हैं। लोकतंत्र के इस महापर्व में ‘ज़ी न्यूज़’, ‘रिपब्लिक टीवी’ का उत्साह और ‘एनडीटीवी’ की उदासीनता देखते ही बनती है। हालांकि इस उदासीनता के बीच भी ‘एनडीटीवी’ ने कम से कम कन्हैया के नाम पर चुनाव प्रचार को चैनल पर मनमाफ़िक जगह दी, जिसे एक आम दर्शक की भाषा में ‘दिन रात यही दिखाते रहते हैं’ कह सकते हैं। यूं भी बाक़ी सब चैनल जब प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने और दिखाने की कतार में खड़े हों तो बेचारे ‘एनडीटीवी’ को कैसे न कैसे तो बैलेंस करना ही था।

मोदीजी के इंटरव्यू से याद आया, अब तक हुए तमाम इंटरव्यूज़ को परखें तो अब तक का सबसे उम्दा इंटरव्यू ‘एएनआई’ की स्मिता प्रकाश ने किया था, जिसके आधार पर राहुल गांधी ने जर्नलिस्ट को ही ‘प्लाएबल’ करार दे दिया था। वैसे हाल-फिलहाल दूरदर्शन ने भी प्रधानमंत्री का इंटरव्यू किया, जिसकी उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी योगेंद्र यादव के ‘डीडी’ वाले बयान की ट्विटर पर ऐसी तैसी हुई। बाक़ी कोई पत्रकार जब प्रधानमंत्री से ये कहे कि मै भी कभी- कभी थक जाता हूं, आप क्यूं नहीं थकते?  तो न सिर्फ सवाल बचकाना लगता है, बल्कि ये तुलना भी लगता है। जया प्रदा, हेमामालिनी, राज बब्बर राजनीति में दस साल और भी बिता लेंगे तो भी चैनल उनकी ख़बर ड्रीमगर्ल, तोहफ़ा वगैरह गाने की फुटेज लगाकर ही दिखाएंगे। नेता अपने संसदीय क्षेत्र को संबोधित कर रहे हैं और एंकर-रिपोर्टर अपनी टारगेट ऑडियंस को। हर चैनल ने अपने एंकर–पैदल, कार में, स्कूटी पर, बाइक पर, बसों में, ट्रेन में,  सड़क पर उतार रखे हैं। लाख बराबरी और ब्रेन की बात करें, लेकिन न्यूज़ चैनल फीमेल एंकर रिपोर्टर को ऐसे मौक़े पर टीआरपी के ब्रहमास्त्र की तरह इस्तेमाल करने की फिराक में रहते हैं। ‘इंडिया टीवी’ ने जीन्स-चश्मा-बूट पहनाकर बाइक पर अपनी रिपोर्टर उतारी है तो यकीन मानिए भारत में कई इलाक़े ऐसे भी हैं, जहां महज उसे देखने के लिए ही भीड़ खिंची आएगी। टीवी तो फिर बड़ा प्लेटफॉर्म है।

जैसे अमूल दूध-दही-छाछ बटर सब केटर करता है, ‘आजतक’ के पास कई प्लेटफॉर्म हैं। इसलिए उसने लखनऊ में अपनी एंकर अंजना की शॉपिंग को भी अलग वर्ग के लिए सोशल मीडिया पर परोस दिया। भयंकर गर्मी में भी कोट-पैंट पहनकर एबीपी की एंकर बिहार के गमछा लपेटे लोगों के बीच जाती है। ‘ज़ी न्यूज़’ ने ‘सबसे बड़े प्रचारक’ की उपाधि देकर, प्राइम टाइम का एक घंटा मोदी जी को समर्पित किया, लेकिन विडम्बना ये कि बदले में मोदी जी,  ‘ज़ी न्यूज़’ के साथ ऐसा कर दें तो लोग बुरा मान जाएंगे! ‘इंडिया टीवी’ वाया बाबा रामदेव इंटरव्यू मुकाबले में है। ख़ास बात ये कि इन चैनलों पर तो मोदीभक्त होने का आरोप सोशल मीडिया में खूब लगता है, लेकिन जो ‘निस्वार्थ’  भाव से मोदी सरकार के खिलाफ़ चैनल स्थापित करने में लगे हैं, वो खुद के लिए ‘क्रांतिकारी’ का तमगा चाहते हैं। चुनाव आयोग ने योगीजी के प्रचार पर रोक लगा दी तो वो मंदिर में पूजा करते नजर आए, ये प्रत्यक्ष रूप से सबके सामने है। रोक चुनाव आयोग ने आज़म खां पर भी लगाई, लेकिन उनके अनुयायियों ने ‘ज़ी न्यूज़’ के ‘ताल ठोक के’ को रामपुर में बीस मिनट में ही ठोक-पीटकर परोक्ष रूप से खां साहब का परचम बुलंद रखा। वैसे ख़बर लिखे जाने तक कांग्रेस ने आप के गठबंधन को दो हज़ार उन्नीसवीं बार न कर दी है, लेकिन सुनते हैं कि कार्य प्रगति पर है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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TOI में प्रकाशित मोदी के इंटरव्यू पर रवीश कुमार ने कुछ यूं दिया रिएक्शन, पढ़ें यहां

'टाइम्स आफ इंडिया' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया दी है

Last Modified:
Wednesday, 17 April, 2019
MODI

प्रधानमंत्री का दीर्ध-दीर्घउत्तरीय इंटरव्यू, मगर तस्वीर पुरानी

आज टाइम्स आफ इंडिया में प्रधानमंत्री मोदी का दस एकड़ में इंटरव्यू छपा है। पूरा दो पन्ना। तीन लोगों ने यह इंटरव्यू किया है। दिवाकर, राजीव देशपांडे और राजेश कालरा। जब तीन लोग गए ही थे तो एक फ़ोटोग्राफ़र भी साथ ले जाते। कम से कम इंटरव्यू की तस्वीर तो दिखती। ऐसा तो हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री एक अखबार से तीन लोगों को बुलाएं और फ़ोटोग्राफ़र को न आने दें। ख़ासकर जब वे कैमरे के एंगल का ध्यान फ़ोटोग्राफ़र से ज़्यादा ख़ुद रखते हों। हो सकता है कि चुनाव प्रचार के कारण प्रधानमंत्री थके दिखते हों और सोचते हों कि आज की जगह पुरानी चमकदार तस्वीर लगाई जाए। प्रधानमंत्री छवि प्रबंधन को लेकर काफ़ी सतर्क रहते हैं। पुरानी तस्वीरों के साथ नया इंटरव्यू जमा नहीं।

इस इंटरव्यू में कुल 26 सवाल पूछे गए हैं। नवभारत टाइम्स के ट्विटर हैंडल से भी सवाल मांगा गया था। पता नहीं चलता है कि पाठकों के कौन से सवाल हैं। कई सवालों के जवाब से लगता है कि प्रधानमंत्री ने इस इंटरव्यू के लिए अपनी रैली कैंसिल कर दी हो। पूरे दिन इन्हीं तीन संवाददाताओं से बात करते रहे हों। एक-एक जवाब एक संपादकीय लेख जितना बड़ा है। ऐसे समय में जब वे लगातार रैलियां कर रहे हैं, उसके लिए लंबी यात्राएं कर रहे हैं, उनके पास एक सवाल का इतना लंबा जवाब देने के लिए वक्त है! वे कई चैनलों और अख़बारों को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू भी दे रहे हैं।

‘टाइम्स आफ इंडिया’ का इंटरव्यू वाक़ई बहुत बड़ा है। कोई काउंटर सवाल नहीं है। बल्कि किसी को सभी इंटरव्यू में प्रधानमंत्री से पूछे गए सवालों का संकलन छापना चाहिए, जिसमें सिर्फ सवाल हों। पत्रकारिता के छात्र अगर इस पर प्रोजेक्ट करें तो वे काफ़ी कुछ सीखेंगे। सारे सवालों को कॉपी पेस्ट करके एक जगह रखना है और फिर देखना है कि क्या इनके बीच कोई नया पैटर्न दिखता है। बहरहाल इस दीर्घउत्तरीय इंटरव्यू को पढ़ने में कहीं चुनाव न निकल जाए। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री को किसी ने लिखित प्रश्न भेज दिया हो और वहां से किताब छपकर आ गई हो! ये तो मज़ाक़ हो गया मगर इंटरव्यू के समय की तस्वीर होती तो अच्छा रहता। आख़िर चुनावी सभाओं में लोग प्रधानमंत्री को थका हुआ भी देखते हैं और तब भी पसंद करते हैं। प्रधानमंत्री का दो पन्नों का इंटरव्यू संदेश अख़बार में भी छपा है। आज ही। हैरानी होती है। इंटरव्यू वही दे रहे हैं या कोई और!

(वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से)

रवीश कुमार ने इस इंटरव्यू का स्क्रीनशॉट भी अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर किया है, जिसे आप यहां देख सकते हैं- 

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मिस्टर मीडिया: हारने की खीज है या मीडिया से रंजिश निकालने का बहाना

चुनावी डिबेट थी। सेना की छवि के दुरुपयोग पर चर्चा थी। दो पार्टी प्रवक्ता लड़ बैठे

Last Modified:
Thursday, 11 April, 2019
RAJESH

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

आदमी समझा है वो बनकर खुदा रह जाएगा/और ख़ुदा क्या ये तमाशा देखता रह जाएगा? 

चुनावी डिबेट थी। सेना की छवि के दुरुपयोग पर चर्चा थी। दो पार्टी प्रवक्ता लड़ बैठे। बीजेपी के प्रवक्ता देशभक्ति का ठेका ले बैठे। चिल्ला-चिल्लाकर दूसरे को ग़द्दार बोलते रहे। नौबत यहां तक आ पहुंची कि एक प्रवक्ता ने पानी से भरा गिलास दूसरे पर दे मारा। बीच में एंकर संदीप चौधरी निशाना बन गए। उनके कपड़े भीग गए। उन्होंने ब्रेक लिया, प्रवक्ताओं को दरवाज़ा दिखाया, कपड़े बदले और शो शुरू कर दिया। संदीप ने इस दौरान ग़ज़ब का संयम दिखाया और शो संभाल लिया, लेकिन देश के लाखों दर्शकों ने ज़बान और एक्शन की यह जंग देखी। सार्वजनिक माध्यम पर ग़द्दार कहना मानहानि का आपराधिक मामला बनता है। जेल तक हो सकती है। इसी तरह दूसरे प्रवक्ता का आचरण अशोभनीय था। कह सकते हैं कि ये पार्टियां कुकुरमुत्तों की तरह प्रवक्ता पैदा करती हैं और उन्हें शब्दों का संयम बरतने की ट्रेनिंग भी नहीं देतीं। ये प्रवक्ता उन्हीं पार्टियों की देह पर एक्सपायर्ड दवा की तरह रिएक्ट कर जाते हैं।

पिछले दिनों चेन्नई में ‘द हिन्दू’ के पत्रकारों को अभिव्यक्ति के लिए सड़क पर आना पड़ा। इसके बाद दो चैनलों के प्रति प्रधानमंत्री का रवैया जगजाहिर है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक चैनल के संवाददाता ने बीजेपी के कार्यालय में प्रदेश अध्यक्ष की पत्रकार वार्ता के दौरान सवाल पूछे। मीडिया प्रभारी को पसंद नहीं आए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से उस संवाददाता को धमकाया। पत्रकारों को इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ एकजुट होना पड़ा। उत्तर प्रदेश में ही बीजेपी के एक कद्दावर प्रत्याशी ने एक पत्रकार के ख़िलाफ़ अख़बार के संपादक से शिक़ायत कर दी। पत्रकार को हटा दिया गया। गुजरात के वडोदरा में बीजेपी के एक एमएलए ने  रिपोर्टरों को खुलेआम ठीक करने की धमकी दी। उस दौरान कैमरा भी सब कुछ रिकॉर्ड कर रहा था। चंद रोज़ पहले अहमदाबाद में ‘टीवी9’ के रिपोर्टर चिराग पटेल को ज़िंदा जला दिया गया। पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। अब गुजरात भर के पत्रकारों ने एक संघर्ष समिति बनाई है। मुख्यमंत्री ख़ामोश हैं।

ये तो कुछ बानगी हैं। साबित करती हैं कि सत्ता का नशा किस तरह राजनेताओं पर सवार होता है। पत्रकार बिरादरी के पास प्रतिक्रिया के तौर पर कोई एक्शन का अधिकार नहीं है, लेकिन जब अवसर आता है तो यह एक ऐसा तीर है जो उलटकर वार करता है। सियासत और सत्ता के नियंताओं को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए थे तो तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल पत्रकारों से ग़ुलामों जैसा बर्ताव करते थे। बाद में इसी मीडिया ने अपने तीर का इस्तेमाल किया तो बिलबिला गए थे। सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी। आज जो राजनीतिक दल हुकूमत कर रहा है, कल वह हार भी सकता है। आने वाले दिन और वक़्त से डरना चाहिए। वक़्त से बड़ा जज कोई नहीं होता। जिस दिन समय करवट बदलेगा, सत्तावीरों के होश फाख़्ता हो जाएंगे। इस बात को चेतावनी समझकर लीजिए मिस्टर लीडर!

ताला लगा के आप हमारी ज़बान को/ क़ैदी न रख सकेंगे ज़ेहन की उड़ान को/

 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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पत्रकारों का लाइलाज 'दर्द-ए-दिल'

मीडिया से एक ही हफ्ते में दूसरी बुरी खबर है कि ‘दैनिक जागरण’ मथुरा के महेश चौधरी के बाद ‘फोर्ब्स इंडिया’ की फाउंडर टीम के मेंबर केपी नारायण भी नहीं रहे

Last Modified:
Wednesday, 10 April, 2019
Journalist

अनिल दीक्षित
वरिष्ठ पत्रकार

मीडिया से एक ही हफ्ते में दूसरी बुरी खबर है। ‘दैनिक जागरण’ मथुरा के महेश चौधरी के बाद ‘फोर्ब्स इंडिया’ की फाउंडर टीम के मेंबर केपी नारायण भी नहीं रहे। दोनों त्रासदियों की वजह एक ही है, दिल का रोग। दोनों का कम उम्र में ही छोडकर चले जाना भयावह संकेत दे रहा है कि मीडिया की दुनिया में सब कुछ ठीक नहीं है। अनियमित जीवन असमय विराम ले रहा है, चकाचौंध युवाओं का जीवन लील रही है।

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया का ग्लैमर बढ़ा है। नतीजतन, आईएएस-आईपीएस बनने का माद्दा रखने वाले मेधावी युवाओं का इसमें आगमन हुआ है। प्रतिभाएं अपना जलवा बिखेर रही हैं। महेश चौधरी को मैं जानता था। वह एक ईमानदार और लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित्त पत्रकार था। डेडलाइन में काम करने का आदी। प्रतिभा इतनी कि उसे हर खबर की गहराई पता होती थी और खबरें इतनी कि अकेले दम पर अखबार का काफी हिस्सा भर दे। डेस्क पर आने के बाद उसकी क्षमताएं और भी ज्यादा दिखीं। शब्दों पर पकड़ और सीखने की ललक से वह यहां भी कामयाब था। अचानक एक बुरी खबर आई। एक मीडिया वॉट्सऐप ग्रुप से पता चला कि महेश चला गया।

केपी की मृत्यु भी चिंतित और आश्चर्यचकित कर रही है। चिंता यह कि मीडिया में तनाव कहीं और दुष्प्रभाव न डालने लगे और आश्चर्य यह कि कामयाब होने पर भी क्या दबाव जानलेवा हो सकता है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत करने वाले केपी ने कई ख्यातिनाम मीडिया समूहों में खुद को साबित-स्थापित किया। ‘मिंट’ और ‘फोर्ब्स इंडिया’ की स्टार्ट अप टीमों में भी शामिल रहे। दिल की बीमारी की सबसे बड़ी वजह है अनियमित जीवनशैली और तनाव-दबाव। कुछ वक्त पर लक्षण पहचानकर इलाज करा लेते हैं तो कुछ इतना समय ही नहीं निकाल पाते कि इलाज भी करा पाएं।

तनाव के साथ ही असुरक्षा भी पत्रकारों को जीने नहीं दे रही। नहीं पता कि जाने कब नौकरी चली जाए। मुश्किल यह भी है कि मीडिया ऐसा उद्योग है, जहां छोटे निवेश से काम चलता नहीं और बड़े निवेश का रिटर्न आना और समय पर आ जाना, दोनों अनिश्चित हैं। पिछले दस साल की बात करें और सिर्फ आगरा जैसे उत्तर प्रदेश के एक मंडल का उदाहरण लें तो यहां तीन-चार अखबार लॉन्च हुए। पानी की तरह पैसा बहाकर भी यह अखबार टिक नहीं पाए और बंद हो गए। लागत और कमाई के ग्राफ में जमीन-आसमान सरीखा अंतर हिम्मत तोड़ देता है। ऊपर से, स्थापित मीडिया संस्थानों का बल चलने तो क्या, रेंगने भी नहीं देता। इसलिये पत्रकारों के लिए विकल्प कम हैं। यानी, नौकरी चली जाए तो दूसरी मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऊपर से कुकुरमुत्तों की तरह उग आए मीडिया एजुकेशन संस्थान बड़े पैमाने पर हर साल पास आउट युवाओं को और भाड़ में झोंके जाने के लिए भेज देते हैं।

संस्थानों के पास उम्मीदवारों की भीड़ है, इसलिये उन्हें छंटनी से भी गुरेज नहीं होता। समस्या विकराल है। देश-दुनिया में अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार खुद शोषण के शिकार और अंदरूनी दर्द से बेहाल हैं। सरकारी स्तर पर संरक्षण की आवश्यकता है। हालांकि, इस संरक्षण में बाधा भी उनके अपने ही संस्थान हैं जो एकजुट होकर राहत मिलने नहीं देते।

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अरसे से मीडिया पर छाई मुर्दनी तो टूटी, बड़े दिनों बाद एक पत्थर तो तबियत से उछला

लोकतंत्र सुरक्षित है तो पत्रकारिता अपने सरोकारों के साथ ही चलेगी

Last Modified:
Friday, 05 April, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

नया चैनल है। उसके तेवर और साहस मौजूदा पत्रकारिता में ताज़ी हवा के झौंके की तरह हैं। सांसदों की शर्मनाक करतूतें। क़बूलते भी हैं तो जैसे कोई बहादुरी का काम कर बैठे हों। सियासी पार्टियां कोई कार्रवाई करें या न करें, लेकिन पत्रकारिता जो काम कर सकती है, उसने कर दिया। अलबत्ता, न्यायपालिका अपनी ओर से कोई संज्ञान लेती तो क्या हमारे लोकतंत्र का चेहरा तनिक उजला नहीं हो जाता? पर अरसे से मीडिया पर छाई मुर्दनी तो टूटी। बड़े दिनों बाद एक पत्थर तो तबियत से उछला। पहले भी एक बार सांसदों को सवाल पूछने के लिए पैसे लेते हुए एक स्टिंग ऑपरेशन हुआ था। उन्हें संसद से बाहर का दरवाजा दिखाया गया था। वह भी मीडिया का ही कारनामा था।

इसी चैनल के कुछ चेहरे प्रधानमंत्री को पसंद नहीं हैं। उनका आरोप है कि वे उन्हें हरदम गाली देते रहते हैं। उन्होंने तो बाक़ायदा उलाहना भी दे डाला। विडंबना है कि राजनीतिक लोग अब अपनी आलोचना भी स्वीकार नहीं करते। आलोचना में अगर वे तर्क देखें और उस पर सकारात्मक नज़रिया रखें तो उनका ही भला होगा। एक पत्रकार को मुल्क़ के प्रधानमंत्री से भला क्या रंजिश हो सकती है? हां यह ज़रूर है कि आलोचना स्वीकार करने के लिए खुले दिल और दिमाग़ से काम लेना होता है।

एक उदाहरण याद आता है। जब देश में आपातकाल लगा तो हिंदी के एक अग्रणी अख़बार ‘नई दुनिया’ के प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर ने सेंसरशिप के विरोध में संपादकीय स्थान को ख़ाली छोड़ने का साहस दिखाया। इंदिरागांधी ग़ुस्से में थीं। उनकी नाराज़गी सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने अख़बार के मैनेजमेंट तक पहुंचाई। अख़बार ने उन्हें टका सा उत्तर दे दिया कि पत्रकारिता के मान्य सिद्धांतों की रक्षा के लिए उसका फ़ैसला सही था। विद्याचरण जी उदास लौट आए। जब आपातकाल समाप्त हुआ और चुनाव का ऐलान हुआ तो राजेंद्र माथुर ने सात मुद्दों को लेकर एक श्रृंखला लिखी। यह श्रृंखला झकझोरने वाली थी। आज भी यह श्रृंखला भारतीय पत्रकारिता का एक दुर्लभ दस्तावेज़ है। इसमें व्यवस्था पर इतना तीखा और तथ्यपरक विश्लेषण था कि किसी भी प्रधानमंत्री या सत्ता प्रतिष्ठान के लिए मंज़ूर करना आसान नहीं था। पर प्रधानमंत्री इंदिराजी ने राजेंद्र माथुर को स्वयं फ़ोन किया और कहा, ‘ काश! मुझे अपने संगठन, सरकार,मीडिया और लोकतंत्र के बारे में इस कोण से व्याख्या पहले मिल जाती। मुझे फीडबैक पहले मिलता तो मैं अपने विचार और सोचने के नज़रिये में बदलाव भी करती।‘ बहरहाल! इस घटना के बाद इंदिरा गांधी ने माथुर जी के हर आलेख को पढ़ना शुरू कर दिया। यह सिलसिला 1984 तक चलता रहा।

बात यहीं समाप्त नहीं होती। सतहत्तर में हारने के बाद जब इंदिराजी दोबारा प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने दूसरे प्रेस आयोग के गठन का ऐलान किया। उसमें राजेंद्र माथुर को सदस्य बनाया। यह सूचना उन्होंने ख़ुद पत्रकारों को दी। इसका संदेश यह नहीं था कि वे अपनी आलोचना करने वाले को प्रसन्न करना चाहती थीं। बल्कि इसका मक़सद यह था कि प्रेस आयोग निष्पक्षता और निर्भीक रहते हुए अपनी रिपोर्ट दे। हुआ भी यही, आज पत्रकारों को इस रिपोर्ट को ज़रूर पढ़ना चाहिए। लब्बोलुआब यह कि जब तक हिंदुस्तान है, तब तक लोकतंत्र को कोई आँच नहीं आ सकती। लोकतंत्र सुरक्षित है तो पत्रकारिता अपने सरोकारों के साथ ही चलेगी। अस्थाई दौर आते-जाते रहते हैं। अधिनायक इतिहास में कभी भी हीरो की तरह याद नहीं किए जाते। उन्हें विलेन ही माना जाता है। यह बात याद रखिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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जयंतीः रचना और संघर्ष का पाठ पढ़ाने की माखनलाल चतुर्वेदी को चुकानी पड़ी थी ये कीमत

पं.माखनलाल चतुर्वेदी हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है, जिसे छोड़कर...

Last Modified:
Thursday, 04 April, 2019
Makhanlal Chaturvedi

यह सुधार समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली

प्रो. संजय द्विवेदी।।

पं.माखनलाल चतुर्वेदी हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है, जिसे छोड़कर हम पूरे नहीं हो सकते। उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले की यात्रा है। रचना और संघर्ष की भावभूमि पर समृद्ध हुयी उनकी लेखनी में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध का जज्बा न चुका, न कम हुआ। वस्तुतः वे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे और कोई मोर्चा ऐसा न था, जहां उन्होंने अपनी छाप न छोड़ी हो।

माखनलाल जी ने जब पत्रकारिता शुरू की तो सारे देश में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव देखा जा रहा था। राष्ट्रीयता एवं समाज सुधार की चर्चाएं और फिरंगियों को देश बदर करने की भावनाएं बलवती थीं। इसी के साथ महात्मा गांधी जैसी तेजस्वी विभूति के आगमन ने सारे आंदोलन को एक नई ऊर्जा से भर दिया। दादा माखनलाल जी भी उन्हीं गांधी भक्तों की टोली में शामिल हो गए। गांधी के जीवन दर्शन से अनुप्राणित दादा ने रचना और कर्म के स्तर पर जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन को ऊर्जा एवं गति दी, वह महत्व का विषय है।

इस दौर की पत्रकारिता भी कमोवेश गांधी के विचारों से खासी प्रभावित थी। सच कहें तो हिंदी पत्रकारिता का वह जमाना ही अजीब था। आम कहावत थी– जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। और सच में अखबार की ताकत का अहसास आजादी के दीवानों को हो गया था। इसी के चलते सारे देश में आंदोलन से जुड़े नेताओं ने अपने पत्र निकाले। जिनके माध्यम से ऐसी जनचेतना पैदा की कि भारत आजादी की सांस ले सका। वस्तुतः इस दौर में अखबारों का इस्तेमाल एक अस्त्र के रूप में हो रहा था और माखनलाल जी का ‘कर्मवीर’ इसमें एक जरूरी नाम बन गया था।

हालांकि इस दौर में राजनीतिक एवं सामाजिक पत्रकारिता के समानांतर साहित्यिक पत्रकारिता का एक दौर भी चल रहा था। सरस्वती और उसके संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी उसके प्रतिनिधि के रूप में उभरे। माखनलाल जी ने भी 1913 में ‘प्रभा’ नाम की एक उच्चकोटि की साहित्यिक पत्रिका के माध्यम से इस क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया। लोगों को झकझोरने एवं जगानेवाली रचनाओं के प्रकाशन के माध्यम से ‘प्रभा’ शीध्र ही हिंदी जगत का एक जरूरी नाम बन गयी। दादा की 56 सालों की ओजपूर्ण पत्रकारिता की यात्रा में प्रताप, प्रभा व कर्मवीर उनके विभिन्न पड़ाव रहे। साथ ही उनकी राजनीतिक वरीयता भी बहुत उंची थी। वे बड़े कवि थे, पत्रकार थे पर उनके इन रूपों पर राजनीति कभी हावी न हो पायी। इतना ही नहीं जब प्राथमिकताओं की बात आयी तो मप्र कांग्रेस का वरिष्टतम नेता होने के बावजूद उन्होंने सत्ता में पद लेने के बजाय मां सरस्वती की साधना को ही प्राथमिकता दी।

आजादी के बाद 30 अप्रैल, 1967 तक वे जीवित रहे पर सत्ता का लोभ उन्हें स्पर्श भी नहीं कर पाया। इतना ही नहीं, 1967 में भारतीय संसद द्वारा राजभाषा विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति को वह पद्मभूषण का अलंकरण भी लौटा दिया, जो उन्हें 1963 में दिया गया था। उनके मन में संघर्ष की ज्वाला हमेशा जलती रही। वे निरंतर समझौतों के खिलाफ लोंगों में चेतना जगाते रहे। उन्होंने स्वयं लिखा है-

अमर राष्ट्र, उदंड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र, यह मेरी बोली

यह सुधार-समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।

माखनलाल जी सदैव असंतोष एवं मानवीय पीड़ाबोध को अपनी पत्रकारिता के माध्यम से स्वर देते रहे। पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई भी जंजीर उन्हें बांध नहीं पायी। उनकी लेखनी भद्रता एवं मर्यादा की तो कायल थी किंतु वे भय, संत्रास एवं बंधनों के खिलाफ थे। एक बार उन्होंने अपनी इसी भावना को स्वर देते हुए कहा था, ‘हम फक्कड़ सपनों के स्वर्गों को लुटाने निकले हैं। किसी की फरमाइश पर जूते बनानेवाले चर्मकार नहीं हैं हम।‘ यह निर्भीकता ही उनकी पत्रकारिता की भावभूमि का निर्माण करती थी। स्वाधीनता आंदोलन की आँच को तेज करने में उनका ‘कर्मवीर’ अग्रणी बना। ‘कर्मवीर’ की परिधि व्यापक थी। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर समान अधिकार से चलने वाली संपादक की लेखनी हिंदी को सोच की भाषा देने वाली तथा युगचिंतन को भविष्य के परिप्रेक्ष्य में व्यक्त करने वाली थी। ‘कर्मवीर’ जिस भाषा में अंग्रेजी राजसत्ता से संवाद कर रहा था, उसे देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय जनमानस में आजादी पाने की ललक कितनी तेज थी।

स्वाधीनता आंदोलन में अपने प्रखर हस्तक्षेप के अलावा ‘कर्मवीर’ ने जीवन के विविध पक्षों को भी पर्याप्त महत्व दिया। आए दिन होने वाली घटनाओं को मापने- जोखने एवं उनसे रास्ता निकालने की दिव्यदृष्टि भी ‘कर्मवीर’ के संपादक के पास थी। अपनी पत्रकारिता के माध्यम से राजनीति के अलावा साहित्य कला और संस्कृति को भी उन्होंने महत्व दिया। साहित्यिक पत्रों के संदर्भ में उनकी समझदारी विलक्षण थी वो कहते हैं, ‘हिंदी भाषा का मासिक साहित्य बेढंगे और बीते जमाने की चाल चल रहा है। यहां बरसाती कीड़ों की तरह पत्र पैदा होते हैं। फिर भी यह आश्चर्य नहीं कि वे मर क्यों जाते हैं। यूरोप में हर पत्र अपनी एक निश्चित नीति रखता है। हिंदी वालों को इस मार्ग में रीति की गंध नहीं लगी।‘ यह टिप्पणी आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है।

वस्तुतः माखनलाल जी आम लोगों के बीच से उपजे पत्रकार थे। उनका कहना था कि पत्र संपादक की दृष्टि परिणाम पर सतत लगी रहनी चाहिए। क्योंकि वह समस्त देश के समक्ष उत्तरदायी है। वे समाचार पत्रों में उत्तरदायित्तव की भावना भरना चाहते थे। वहीं उनके मन में समाचार पत्र की पूर्णता को लेकर भी विचार थे। उनकी सोच थी कि हमें अपने पत्रों को ऐसा बनाना चाहिए कि हम पर ज्ञान की कमी का लांछन न लगे। वे पत्रकारिता जगत में फैल सकने वाले प्रदूषण के प्रति भी आशंकित थे। इसी के चलते उन्होंने अपने लिए आचार संहिता भी बनाई। आज जब पत्रकारिता और पत्रकारों के चरित्र पर सवालिया निशान लग रहे हैं तो यह सहज ही पता लग जाता है कि दादा वस्तुतः कितनी अग्रगामी सोच के वाहक थे। हिंदी पत्र साहित्य को उनकी एक बड़ी देन यह है कि उन्होंने कई तरह से हिंदी को मोड़ा और लचीला बनाया। भाषा को समृद्ध एवं जनप्रिय बनाने में उनका योगदान सदा स्मरणीय रहेगा। ‘कर्मवीर’ के संपादक के रूप में पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने संपादन-सिद्धांत बनाए और उन्हें घोषित किया जो इस प्रकार थे-

1.‘कर्मवीर’ संपादन और ‘कर्मवीर परिवार’ की कठिनाइयों का उल्लेख न करना।

2.कभी धन के लिए अपील न निकालना।

3.ग्राहक संख्या बढ़ाने के लिए ‘कर्मवीर’ के कालमों में न लिखना।

4.क्रांतिकारी पार्टी के खिलाफ वक्तव्य नहीं छापना। (गांधीजी का वक्तव्य भी कर्मवीर में नहीं छपा था।)

5.सनसनीखेज खबरें नहीं छापना।

6.विज्ञापन जुटाने के लिए किसी आदमी की नियुक्ति न करना।

अपने लंबे पत्रकारीय जीवन के माध्यम से दादा ने नई पीढ़ी को रचना और संघर्ष का जो पाठ पढ़ाया वह आज भी हतप्रभ कर देने वाला है। कम ही लोग जानते होंगे कि दादा को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उनके संपादकीय कार्यालय यानी घर पर तिरसठ बार छापे पड़े, तलाशियां हुयीं। 12 बार वे जेल गए। कर्मवीर को अर्थाभाव में कई बार बंद होना पड़ा। लेखक से लेकर प्रूफ रीडर तक सबका कार्य वे स्वयं कर लेते थे। इन अर्थों में दादा विलक्षण स्वावलंबी थे।

माखनलाल जी ने ही देश में एक पत्रकारिता विद्यापीठ स्थापित करने का स्वप्न देखा था। उन्होंने भरतपुर(राजस्थान) में 1927 में आयोजित संपादक सम्मेलन में कहा था, ‘हिंदी समाचार पत्रों में कार्यालय में योग्य व्यक्तियों के प्रवेश कराने के लिए, एक पाठशाला आजकल के नए नामों की बाढ़ में से कोई शब्द चुनिए तो कहिए कि एक संपादन कला के विद्यापीठ की आवश्यक्ता है। ऐसी विद्यापीठ किसी योग्य स्थान पर बुद्धिमान, परिश्रमी, अनुभवी, संपादक-शिक्षकों द्वारा संचालित होना चाहिए। उक्त पीठ में अन्यान्य विषयों का एक प्रकांड ग्रंथ संग्रहालय होना चाहिए।’ यह संयोग ही है कि उनके इस स्वप्न को 1990 में मध्यप्रदेश सरकार ने साकार करते हुए उनके नाम पर ही भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की। आज जब पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संकट के बादल हैं, पाठक एवं अखबार के बीच एक नया रिश्ता जन्म ले रहा है ऐसे संक्रमण में दादा जैसे ज्योतिपुंज की याद आना बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में प्रोफेसर हैं।)

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सब इंतज़ार में हैं...देखते हैं सरकार किस चैनल की बनती है!

घर से बाहर निकल के तो चुनाव वाला फील आ नहीं रहा। हां, चैनलों पर...

Last Modified:
Wednesday, 03 April, 2019
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित
वरिष्ठ पत्रकार।।

घर से बाहर निकल के तो चुनाव वाला फील आ नहीं रहा। हां, चैनलों पर चुनाव प्रचार ने गति पकड़ ली है। मोर्चे बांट भी लिए गए हैं और साध भी लिए गए हैं। एक राज्य में रैली करके आप जितनी जनता को संबोधित कर सकते हैं, उससे बड़ा प्लेटफॉर्म तो चैनल हैं ही!

अगर मुझे ठीक से याद है तो परसाईं जी के एक व्यंग्य में कहा गया है-इंटरव्यू दो तरह के होते हैं, एक जब नौकरी को आवेदक की ज़रूरत हो, दूसरा जब खास आवेदक को नौकरी की ज़रूरत हो। तो कोई चैनल अपनी-अपनी कैटेगरी के हिसाब से नेताओं को चेकोस्लोवाकिया की स्पैलिंग पूछकर नेस्तनाबूद कर दे रहे थे तो कोई नाश्ते में क्या पसंद है, पूछकर गदगद हुए जा रहा था।

देश, मुल्क, वतन, राष्ट्र, भारत अब इन शब्दों पर चैनलों की होड़ है और ख़बरों के व्यापार में, बाज़ार में लगभग सबको डपटता हुआ, जब एक 'दूध का धुला चैनल' आया तो वो भी मोदी मोह या टीआरपी मोह को न त्याग सका। ये अलग बात है कि इसी चैनल ने प्रोमो में मीडिया को लेकर जितने भी बुरे भाव या चेहरे दिखाए, सुनते हैं कि टीवी की दुनिया में उन सब हरकतों के प्रणेता, उसके सूत्रधार, इस चैनल के चलाने वाले लोग ही रहे हैं। ख़ैर, जब केजरीवाल राजनीति को बुरा बताकर,राजनीति में आकर, राजनीति कर सकते हैं तो चैनल भी क्यूं नहीं बाक़ी चैनलों को बुरा बताकर, नया चैनल लाकर, ख़बरों का कारोबार कर सकते?

कांग्रेस के मैनीफैस्टो को ‘रिपब्लिक भारत’ ने बिना निष्कर्ष खुलकर कांग्रेस का एक और झूठ घोषित कर दिया। ‘रिपब्लिक भारत’ ने मैनीफैस्टो को झूठ बताया तो ‘ज़ी न्यूज’ ने दो-एक से लीड लेते हुए इसे पाकिस्तान का घोषणा पत्र करार दिया। क्योंकि भारत मां के इन दो सपूत चैनलों में होड़ है खुद को मां का सबसे राष्ट्रवादी बेटा साबित करने की।

‘एनडीटीवी’ की ख़ास बात ये है कि जब न्यूज़ चैनल देखकर आपको लगने लगता है कि दुनिया दो फाड़ हो चुकी है, अब पतन निश्चित है। या तो युद्ध होगा या आत्मसमर्पण, तब ‘एनडीटीवी’ देखकर आपको समझ आता है दुनिया एक सतत गति से ही चल रही है। होने दो हो हल्ला, किसी भी मसले को लेकर ज्यादा  भावुक होने की ज़रूरत नहीं है, रात नौ बजे के प्राइम टाइम से पहले।

नेता चैनल पर चीख-चीखकर कह रहे हैं, जनता मन बना चुकी है, लेकिन अलग-अलग चैनल आए दिन अलग-अलग ओपिनियन पोल भी दिखा रहे हैं। शिखर,  मुखर,  प्रखर, जबर सम्मेलनों की बाढ़ आई है। जनता ओपिनियन पोल से कन्फ्यूज है, कहां जाना है?  नेता सम्मेलनों से कन्फ्यूज़ हैं, कहां जाना है?

‘इंडिया टीवी’ पर रजत शर्मा ने मोर्चा संभाल रखा है तो ‘ज़ी’ पर सुधीर चौधरी अपनी फौज के साथ खुद डटे हुए हैं। ‘जी’ और ‘इंडिया टीवी’ सबको घर में लाओ के सिद्धांत पर चल रहे हैं तो ‘आजतक’ कह रहा है चुनाव हैं, खुद ही दसों दिशाओं में बिखर जाओ। ‘आजतक’ का हर एंकर उत्तराखंड से अहमदाबाद तक सड़कों पर उतरा हुआ है। हालांकि, नए चैनलों के नए आइडियाज़ नए ज़ोश के मुकाबले ‘आजतक’ अपने ठेठ खबरिया अंदाज़ पर टिका है, लेकिन परिवर्तन संसार का नियम ही नहीं, समय की दरकार भी होता है। ‘आजतक’ की ये ढर्रे वाली कवरेज कभी कभी उकताती है।

तेजी से आगे बढ़ रहा ‘रिपब्लिक भारत’ कहता है कि चुनाव का नंबर वन चैनल रिपब्लिक भारत .तो ‘ज़ी’ इस एक गोली पर दस तोपें दागता है। 2019 चुनाव मतलब ज़ी न्यूज़, क्योंकि हम देश के लिए एजेंडा चलाते हैं, क्योंकि हम देश के लिए पक्षपात करते हैं, क्योंकि हम सोच राष्ट्रीय रखते हैं आदि आदि...

तू डाल डाल, मैं पात पात वाली इस लड़ाई में वो रैलियों वाला स्लोगन बड़ा याद आता है ‘जो हिंदू हित की बात करेगा वही देश में राज करेगा’। यकीन मानिए, लोग भी कभी-कभी नेताओं की बहस से ज्यादा मज़े चैनलों के इस आपसी दंगल के लेते हैं। और वो भी इंतज़ार में हैं...। देखते हैं सरकार किस चैनल की बनती है!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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IIMC: एक उत्साही महानिदेशक का यादगार कार्यकाल

देश में पत्रकारिता के सर्वोच्च संस्थान का महानिदेशक एक वरिष्ठ पत्रकार हो तो सभी की...

Last Modified:
Monday, 01 April, 2019
KG SURESH

विष्णुप्रिया पांडेय।।

देश में पत्रकारिता के सर्वोच्च संस्थान का महानिदेशक एक वरिष्ठ पत्रकार हो तो सभी की अपेक्षाएं स्वमेव बढ़ जाती हैं और इस पद पर आसीन व्यक्ति यदि इन अपेक्षाओं से भी बढ़कर काम करे तो इतिहास में उसका नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो जाता हैI केजी सुरेश एक ऐसा ही नाम है, जो भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के इतिहास में हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा। अपने तीन वर्षों के उपलब्धियों से भरे कार्यकाल में केजी सुरेश के कई निर्णय संस्थान के लिए मील का पत्थर साबित हुए। फिर चाहे संस्थान को विश्वविद्यालय में परिवर्तित करने का मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय से प्राप्त आशय-पत्र हो या फिर इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च संस्थान का खिताब, केजी सुरेश की दूरदृष्टि और प्रशासनिक समझ हर योजना के सफल क्रियान्वयन में परिलक्षित होती है।

विद्यार्थियों में ख़ासे लोकप्रिय केजी सुरेश को भाषायी पत्रकारिता जैसे कि मलयालम,मराठी और उर्दू पत्रकारिता में परास्नातक डिप्लोमा प्रारम्भ करने का श्रेय तो जाता ही है, साथ ही पुराने पाठ्यक्रम में आग्युमेंटेड रियलिटी, ड्रोन जर्नलिज्म, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स आदि के समावेश का श्रेय भी जाता है। तेजी से बदलती हुई दुनिया के साथ संस्थान अपना संतुलन बनाये रख सके, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने न्यू मीडिया विभाग की शुरुआत की। पूरे देश में मीडिया शिक्षण की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय संचार संकाय विकास केंद्र की स्थापना की और इन्हीं के प्रयासों से प्रेरित होकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने मुंबई में देश के प्रथम नेशनल सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन एनिमेशन, विज़ुअल इफेक्ट्स गेमिंग एन्ड कॉमिक्स के निर्माण की मंजूरी दी I इन्हीं के प्रयासों से न सिर्फ केरल के कोट्टायम और मिज़ोरम के आइज़ोल में स्थायी परिसर का निर्माण संभव हुआ, बल्कि जम्मू के स्थाई परिसर की नींव भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में डाली गई!

केजी सुरेश ने यूनिसेफ, थॉमस रॉयटर्स फाउंडेशन और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर पब्लिक हेल्थ में क्रिटिकल एप्रेज़ल स्किल्स कार्यक्रम की शुरुआत की और साथ ही इस क्षेत्र में काम कर रहे पत्रकारों को ध्यान में रखते हुए इसी विषय पर एक ऑनलाइन कोर्स की शुरुआत भी की। इसके अलावा उन्होंने सामुदायिक रेडियो सशक्तिकरण और संसाधन केंद्र की स्थापना द्वारा देश भर के सामुदायिक रेडियो को सशक्त बनाने का महत्वपूर्ण कार्य कियाI इनके कार्यकाल में आईआईएमसी ने न सिर्फ भाषायी पत्रकारिता और प्रशिक्षण में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया, बल्कि सत्रहवें साइंस कम्युनिकेशन कांग्रेस का आयोजन भी किया। इसके अलावा 15वीं एशिया मीडिया समिट के आयोजन में भी संस्थान सहयोगी रहा।

‘कम्युनिकटर’ और ‘संचार माध्यम’ नामक दो क्रमशः अंग्रेजी और हिंदी के जर्नल्स की पुनः शुरुआत भी केजी सुरेश ने की I ऍफ़टीआईआई के सहयोग से डिजिटल सिनमेटोग्राफी, स्क्रीन प्ले राइटिंग और एक्टिंग में शॉर्ट कोर्स की शुरुआत इनके कार्यकाल की एक उल्लेखनीय उपलब्धि रही। केजी सुरेश एक लोकप्रिय महानिदेशक के रूप में याद किये जाएंगे, जिन्होंने संस्थान को नई ऊंचाइयां दीं और परिसर में लोकतान्त्रिक माहौल को बढ़ावा दिया। कर्मचारियों, विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों ने जैसी अश्रुपूरित विदाई उन्हें दी, इससे यह बात तो तय हो जाती है कि वह वाकई ‘पीपल्स डीजी’ थेI

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जानें, सुधीर चौधरी को क्यों याद आया ये डायलॉग-मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता’

स्कूल में हमेशा से हमको यह पढ़ाया गया है कि परिश्रम का फल मीठा होता...

Last Modified:
Monday, 01 April, 2019
sudhir

सुधीर चौधरी
वरिष्ठ पत्रकार।।

स्कूल में हमेशा से हमको यह पढ़ाया गया है कि परिश्रम का फल मीठा होता है, लेकिन राजनीति पाठ्यक्रम में वोटों का फल जहां मीठा होता है, वहां स्वाभिमान की सेल लगा दी जाती है। हमारे नेता जनता को मुफ्त के माल की लत लगवाते हैं  और लोग भी बिना मेहनत किए इन फेंके पैसों को उठा लेते हैं। हिंदी सिनेमा का एक मशहूर डायलॉग है, ‘मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता’। लेकिन इस डायलॉग और इसमें छिपे स्वाभिमान की मौत हो चुकी है। राजनीतिक दल और नेताओं ने इस कमजोर नब्ज को पकड़ लिया है।

कांग्रेस ने नया ट्रंप कार्ड खेला है। राहुल गांधी ने ये वादा किया है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो वह 5 करोड़ गरीब परिवारों को 6 हज़ार रुपये प्रति महीना यानी 72000 रुपये प्रति साल की सहायता राशि देंगे। इस वादे से 1975 की फिल्म दीवार का यह डायलॉग याद आता है, जिसमें नायक कहता है कि मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। ये स्वाभिमान, उस दौर के भारत की खासियत थी। दीवार फिल्म के दौर में युवा नौकरियों के लिए सड़कों पर भटक रहे थे। तब बेरोजगारी और गरीबी चरम पर थी। युवा निराश और क्रोधित थे। इंदिरा गांधी के खिलाफ नारेबाजी और विरोध हो रहे थे। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था। लेकिन उस दौर में भी स्वाभिमान नहीं खोया था।

वो एंग्री यंग मैन का दौर था। एंग्री यंग मैन मतलब है वह युवा जो गरीब तो था लेकिन उसूलों का पक्का था। बुराइयों और नाइंसाफी को लेकर उसमें गुस्सा था। लेकिन वह संघर्ष करना चाहता था। उसे मुफ्त का पैसा नहीं चाहिए था। लेकिन आज लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। लोकतंत्र में वोट आत्मा और स्वाभिमान का प्रतिबिंब है। लेकिन एक किलो चावल, नकद पैसा और एक बोतल शराब ईमान पर भारी पड़ता है। लोग बेटिकट यात्रा करना चाहते हैं। कर्ज माफी चाहते हैं। मुफ्त बिजली और पानी चाहिए और यहां तक कि बिना पात्रता के सरकारी नौकरी भी चाहिए।

इस रिश्वत को राजनीतिक दल सामाजिक न्याय साबित करते हैं। राहुल गांधी की न्याय योजना का मतलब यह है कि चुपचाप अंधेरे में शराब और पैसा बांटकर चुनाव जीतने की कोशिश अब दिन के उजाले में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वोटर के अकाउंट में पैसे डालने पर पहुंच गई है। राहुल गांधी ने मुफ्त का पैसा बांटने की योजना लाकर यह स्वीकार कर लिया कि उनके पास नौकरियां देने की ठोस नीति नहीं हैं। गरीबी हटाने का विजन नहीं है। यानी कांग्रेस के पास ऐसी योजना नहीं है कि लोग परिश्रम से पैसा कमाकर गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर निकलें। लेकिन वह यह भूल गए कि मुफ्तखोरी के नशे से गरीबी नहीं मिटाई जा सकती।

योजना के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी। ये रकम भारत के रक्षा बजट से करीब 40 हजार करोड़ रुपए, केंद्रीय शिक्षा बजट से 3.8 गुना और  केंद्रीय स्वास्थ्य बजट से 5.8 गुना ज्यादा है। जनवरी 2019 तक सरकार का राजकोषीय घाटा साढ़े सात लाख करोड़ रुपये से ज्यादा था। अब सवाल यह है कि राहुल गांधी योजना के लिए पैसा कहां से लाएंगे?

इसके 3 उपाय हो सकते हैं। पहला उपाय तो ये कि सरकार आमदनी बढ़ाए या खर्च कम करे। आमदनी का बड़ा जरिया टैक्स है। टैक्स बढ़ाने से आम जनता का नुकसान होगा और आर्थिक दबाव बढ़ जाएगा। दूसरा, सरकार खर्च कम करे।  अन्य सामाजिक योजनाओं के लिए जारी राशि और सब्सिडी खत्म करे। लेकिन इससे गरीबों को लाभ नहीं होगा क्योंकि उन्हें फायदा पहुंचा रही एक योजना को बंद कर दूसरी के जरिये नकद पैसा दिया जाएगा। तीसरा उपाय है कि सरकार कर्ज ले। लेकिन इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। लगातार ऐसा चला तो तमाम क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत की आर्थिक रेटिंग्स घटा देंगी। इससे देश को बड़ा नुकसान होगा।

यानी योजना को जमीनी स्तर पर लागू करने में बहुत सारे किंतु- परंतु मौजूद हैं। राहुल गांधी ने कहा है कि वह योजना को पायलट प्रोजेक्ट की तरह लागू करेंगे। बाद में यह अलग-अलग चरणों में लोगों को लाभ पहुंचाएगी। यह लंबी प्रक्रिया लोगों को नाराज कर सकती है।

भारत के नेता सोचते हैं कि किसानों का कर्ज माफ कर या लोगों के बैंक अकाउंट में पैसा ट्रांसफर कर वोटों को खरीदा जा सकता है। लेकिन राष्ट्र निर्माण तभी होगा, जब वह किसानों और गरीबों को इतना सक्षम बना दे कि उन्हें कर्ज माफी की जरूरत ही न पड़े। वह खुद अपना कर्ज चुकाने में सक्षम हों। लेकिन नेताओं की समस्या यह है कि ऐसा हो गया तो सक्षम वोटर नेताओं से बड़े मुद्दों पर सवाल करने लगेंगे। राजनीतिक दलों को सस्ता उपाय यही लगता है कि सामाजिक न्याय के नाम पर पैसा फेंककर लोगों का वोट ख़रीद लिया जाए। ये स्कीम नेताओं के लिए तो अच्छी है, लेकिन यह देश के लिए मुफ्तखोरी के नशे की तरह है, जो लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खोखला कर देगा। एक ना एक दिन हमें स्वाभिमान की इस सेल को रोकना ही होगा।

(साभार: दैनिक भास्कर)

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