लोकमंगल की पत्रकारिता और वर्तमान चुनौतियां

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अपने जन्म से लेकर अब तक की पत्रकारिता लोकमंगल की पत्रकारिता रही है। लोकमंगल की पत्रकारिता की चर्चा जब करते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ होती है कि हम समाज के हितों के लिए लिखने और बोलने की बात करते हैं। लोकमंगल के वृहत्तर दायित्व के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ कहा गया है। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा आलोचना के केन्द्र में पत्रकारिता है और समाज सवाल कर रहा है कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के निहित दायित्वों से दूर कैसे हो रहा है? वह कैसे किसी के पक्ष में बोल रहा है या किसी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहा है? यह सवाल भी पत्रकारिता के समक्ष यक्ष प्रश्र की तरह खड़ा है कि पत्रकारिता पर समाज का भरोसा टूट रहा है। निश्चित रूप से यह सवाल बेबुनियाद नहीं हो सकते हैं। कोई बड़ा बदलाव पत्रकारिता के निश्चित उद्देश्यों से भटकने के कारण उपजा होगा लेकिन पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से भटकी है अथवा समाज की अपेक्षा पत्रकारिता से बढ़ी है, इस पर विवेचन करने की आवश्यकता है।

पत्रकारिता के समक्ष उपजे सवालों को टाला नहीं जा सकता है लेकिन जो आरोप दागे जा रहे हैं, उन्हें यथास्थिति भी नहीं माना जा सकता है। पत्रकारिता ने स्वाधीनता संग्राम में ओज भरने का कार्य किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात नए भारत के निर्माण में अपनी सशक्त भूमिका निर्वहन किया है। स्मरण रहे कि यही पत्रकारिता है जिसने पूरी ताकत के साथ आपातकाल का प्रतिकार किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने उन हिस्सों से पर्दा उठाने का काम किया है जिसके पीछे जाने कितने राज दफन हो चुके थे। हालांकि इन सब बातों को देखें और समझें तो लगता नहीं कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से परे हो गया है।

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके। स्वाधीनता संग्राम में अखबारों ने समाज में जन-जागरण का महती जवाबदारी का निर्वहन किया। लोगों में देश-प्रेम जगाया और अंग्रेज शासकों के खिलाफ उनके मन में क्रांति का भाव उत्पन्न किया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा। स्वाधीनता के बाद नए भारत के निर्माण की जवाबदारी पत्रकारिता की थी। पंचवर्षीय योजना के माध्यम से विकास कार्यों का श्रीगणेश हुआ और इसके साथ ही घपले-घोटाले भी शुरू हो गए थे जिस पर से पर्दा उठाने का काम पत्रकारिता ने किया। यह लोकमंगल की ही पत्रकारिता ही थी। यह वह दौर था जब अखबारों में छपने वाली खबरों से पूरा तंत्र हिल जाया करता था। गांधी समाचार-पत्र को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। इस ताकत से शासकों में भय था और इस बात का प्रमाण खुले तौर पर 1975 में आपातकाल के दरम्यान मिला जब पत्रकारिता पर बंदिशें लगा दी गई। उस दौर के शासकों को इस बात का इल्म था कि जो पत्रकारिता अंग्रेजों को देश-निकाला दे सकती है, वही पत्रकारिता उनकी कुर्सी भी डुला सकती है। आपातकाल में पत्रकारिता पर जो जोर-जुल्म हुए वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है तो यह बात भी गर्व के साथ पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज है कि पत्रकारिता झुकने के बजाय प्रतिकार करती हुई गर्व से खड़ी रही। भाजपा के वरिष्ठ राजनेता लालकृष्ण आडवाणी का यह बयान हमेशा उल्लेख में आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पत्रकारिता को झुकने के लिए कहा गया था, वह रेंगने लगी।’ यह बात सच हो सकती है लेकिन सौफीसदी सच नहीं क्योंकि बहुतेरे अखबार खिलाफ में खड़े थे अपनी बुनियादी उसूलों के साथ।

यह वह दौर था जब अधिकतम आठ पन्नों के अखबार हुआ करते थे। बहुत सारे अखबार तो चार पन्नों के ही थे। तब आधुनिक मशीनों की आमद नहीं हुई थी। पुरानी पद्धति से अखबारों का प्रकाशन होता था। यह वही दौर था जब संपादक की सत्ता सर्वोपरि थी। प्रबंधन पीछे हाथ बांधे खड़ा होता था। अखबार के पन्नों में पहले खबरों को जगह मिलती थी, विज्ञापन दूसरे क्रम पर था। साल 75 के बाद पत्रकारिता का चेहरा बदलता गया। शायद यह वही कालखंड था जब लोकमंगल की पत्रकारिता पर ग्रहण लगने लगा। अब नई तकनीक की प्रिंटिंग मशीनों का आगमन होने लगा था। अखबारों के पन्नों में भी एकाएक बढ़ोत्तरी होती गई। श्वेत-श्याम अखबार रंगीन होने लगे। पेज-थ्री का चलन उस दौर में नहीं था लेकिन छाया दिखने लगी थी। महंगी मशीनें और अखबार के पन्नों में वृद्धि से लागत में बढ़ोत्तरी होने लगी। पांच पैसे में बिकने वाला अखबार अब रुपय्या में बिकने लगा। हालांकि लागत और विक्रय मूल्य में अंतर काफी था और इस अंतर को पाटने के लिए विज्ञापनों का स्पेस लगातार बढऩे लगा। कंटेंट के स्थान पर विज्ञापनों को प्रमुखता मिलने लगी और संपादक की सत्ता भी तिरोहित होने लगी और प्रबंधन मुख्य भूमिका में आने लगा था। 

90 के दशक आते-आते लोकमंगल की पत्रकारिता की सूरत बदल चुकी थी। इधर टेलीविजन चैनल पसरने लगे थे। पाठक अब ग्राहक में और ग्राहक दर्शक में बदल रहे थे। साथ में पत्रकारिता मीडिया में हस्तांतरित हो चुका था। एक समय ऐसा आया कि लगने लगा कि मुद्रित माध्यम बीते जमाने की बात हो जाएगी और टेलीविजन पूरे समाज पर कब्जा कर लेगा। शुरुआत कुछ ऐसी ही थी लेकिन जल्द ही संकट के बादल छंट गए और संचार के दोनों माध्यमों ने अपना-अपना स्थान बना लिया। लेकिन पाठकों से दर्शकों में तब्दील हुए लोगों की लालसा-आकांक्षा बढऩे लगी। श्वेत-श्याम अखबारों की छपाई उन्हें उबाने लगी और अखबारों में भी वे टेलीविजन के अक्स देखने लगे। प्रबंधन ने इस अवसर का लाभ उठाया और अखबारों को टेलीविजन की शक्ल में बदलने में जुट गए। एकाएक अखबारों के खर्चों में मनमानी वृद्धि होने लगी और नुकसान का प्रतिशत बढ़ गया। ऐसे में विज्ञापन एकमात्र सहारा था और विज्ञापनों ने उस आधार को भी निरस्त कर दिया जिसमें तय था कि खबरें साठ प्रतिशत होंगी और विज्ञापन चालीस प्रतिशत। अब हालत यह हो गई कि जो स्थान बचा, वह खबरों के लिए। प्रतिशत की कोई भूमिका शेष नहीं रही। ऐसे में पत्रकारिता के समक्ष लोकमंगल की जवाबदारी पर सवाल उठने लगे। 

अखबारों के पन्नों से गांव की खबरें हाशिये पर चली गई और सामाजिक सरोकार की खबरों का स्थान भी अपेक्षित रूप में न्यूनतम हो गया। राजनीति खबरों ने स्थान अधिक ले लिया। इसी दौर में पेड-न्यूज नाम की बीमारी ने पत्रकारिता को घेर लिया। हालांकि किसी समय पीत-पत्रकारिता का रोग था जो अब बकायदा खबरों को बेचने के लिए कुख्यात होने लगा। पीत-पत्रकारिता में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी के पक्ष या विपक्ष में खबरें या लेख लिखे जाते थे लेकिन पेड-न्यूज में तो अखबारों के स्पेस बेचे जाने की शिकायतें मिलने लगी। इन सबके बावजूद अखबार लोकमंगल की खबरों से स्वयं को दूर नहीं कर पाए क्योंकि पाठकों के लिए इन खबरों का होना जरूरी था। घपले-घोटाले से पर्दा उठाने के साथ ही जन-समस्याओं को शासन-प्रशासन के समक्ष रखना भी लोकमंगल की पत्रकारिता का दायित्व था, सो पूरी जिम्मेदारी के साथ किया गया। 

एक सच यह भी है कि पाठकों को ग्राहक में बदलने का उपक्रम अखबारों से ही शुरू हुआ। स्मरण करना होगा कि अखबारों के साहित्यिक पृष्ठों पर सवाल के जवाब मांगे जाते थे और सही जवाब देने वालों के नाम और तस्वीर प्रकाशित करने का प्रलोभन दिया जाता था। शुरुआत यहां से होती है और बाद में अखबार बाल्टी और मग तक उपहार के रूप में देने लगते हैं। इसके लिए अखबार के ग्राहकों से महीना-दो-महीना इस बात की कसरत करायी जाती है कि वे अखबार के पन्ने पर छपे कूपन को सम्हाल कर रखें और नियत तिथि पर जमा करायें। ऐसा करके अखबार प्रबंधन अपनी प्रसार संख्या तो बढ़ा ही रहा था, लोगों में लालच का भाव पैदा हो रहा था जो उनके भीतर का विरोध खत्म कर रहा था। हैरानी तो इस बात की है कि जो लोग पत्रकारिता अथवा मीडिया पर सियापा करते हैं, वही लोग एक पचास रुपए की बाल्टी के लिए घर में कूपन चिपकाते बैठे रहते हैं। हालांकि सब शामिल नहीं हैं लेकिन बहुतेरे इसमें शामिल हैं। जब आप स्वयं पाठक से ग्राहक बन जाने के लिए तैयार हों तो प्रबंधन क्यों खुश नहीं होगा? टेलीविजन मीडिया के पास बेचने के लिए बाल्टी और मग नहीं है तो वह बेबुनियाद की बहस करा कर मनोरंजन के बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाता है। सवाल यह है कि जो चीज आपको पसंद नहीं, उसे देख, सुन और पढ़ क्यों रहे हैं? क्यों उस पर टिप्पणी कर दूसरों को देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? सच तो यह है कि टेलीविजन की बहस चलती है आधे घंटे और उसकी चर्चा होती है 24 घंटे। ट्रोल करके हम आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपरोक्ष रूप से उन्हें लोकप्रिय बना रहे हैं।  

कोरोना के इस भयावह दौर में अखबार पूरी शिद्दत के साथ संकट की तस्वीर को सामने रख रहे थे तो जो कुछ अच्छा हो रहा है, उसकी तस्वीर से समाज का हौसला अफजाई कर रहे थे। यहां पर ठीक उलट टेलीविजन के पर्दे पर टीआरपी का खेल चल रहा था। हिन्दी सिनेमा के एक नायक की कथित आत्महत्या पर टेलीविजन चैनलों का ध्यान था और इसके बाद सिने-जगत में नशे के कारोबार को लेकर टेलीविजन बहस-मुबाहिस में जुट गया। कोरोना से समाज को किस संकट से गुजरना पड़ रहा है? सरकारें कितनी बेपरवाह हो रही हैं? प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जैसे गंभीर और लोकमंगल के विषय नदारद थे। यह पहला मौका नहीं था जब टेलीविजन की पत्रकारिता लोकमंगल के विषय से स्वयं को दूर कर रही थी बल्कि उसका यह रवैया हमेशा से रहा है। कुछेक अवसरों को छोड़ दें तो अखबारों के मुकाबले टेलीविजन की पत्रकारिता में लोकमंगल कोई विषय नहीं है। 

24 घंटे के खबरिया चैनलों को देखते दर्शकों को लगा कि समूची पत्रकारिता से लोकमंगल नदारद है। इसलिए पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संदेह किया जाने लगा लेकिन यह अधूरा सच है। लोकमंगल के विषय का केन्द्र में रखे बिना पत्रकारिता हो नहीं सकती है। यही कारण है जिन विषयों से समाज का सीधा रिश्ता होता है, वह खबरें पाठकों तक पहुंचायी जाती हैं। प्राकृतिक आपदाएं हों, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सडक़, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कवरेज लगातार मिलता है और लोकमंगल के लिए यह आवश्यक भी है। एक तरफ 24 घंटे के न्यूज चैनलों की चुनौती है कि वह लगातार ताजा खबरें कहां से लाए? तो दूसरी तरफ 24 घंटे में एक बार छपकर आने वाले अखबार पाठकों को निराशा में नहीं धकेलते हैं और ना ही टेलीविजन चैनलों की तरह शोर मचाते हैं। अखबारों और टेलीविजन दोनों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है तकनालाजी के खर्चों की भरपाई करने की। टेलीविजन चैनलों की टीआरपी गिरने का अर्थ है राजस्व में कमी आना और राजस्व में कमी होने से टेलीविजन का संचालन मुश्किल सा काम है। कुछ ऐसी ही हालत अखबारों की है। कोरोना के इस भयावह संकट के दरम्यान अखबारों ने अपने पैर समेट लिए हैं और अखबारों के पन्नों में कटौती कर कुछ राहत पाने की कोशिश की है। फिर भी कहा जा सकता है कि जिस दर पर पाठकों को अखबार मिलता है और जिस लागत पर अखबार प्रिंट होता है, उन दोनों में बड़ा अंतर है और इस अंतर को पाटने का एकमात्र जरिया विज्ञापन है। 

लोकमंगल की पत्रकारिता को तीन कालखंड में विभाजित करके देखना होगा। स्वाधीनता के पहले की पत्रकारिता, स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता और आपातकाल के बाद की पत्रकारिता। स्वाधीनता के पहले लोकमंगल अर्थात स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य के साथ पत्रकारिता हो रही थी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण की पत्रकारिता थी और आपातकाल के बाद पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन और बीते तीन दशकों में प्रोफेशन से व्यवसाय में बदल गई है। लोकमंगल की पत्रकारिता को धक्का पत्रकारिता शिक्षण के कारण भी हुआ है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह पत्रकारिता की डिग्री कोर्स आरंभ किया गया और देशभर के सैकड़ों पत्रकारिता संस्थानों से हर वर्ष बहुसंख्या में युवा पत्रकारिता में आए। इनमें से चुनिंदा पत्रकारों ने लोकमंगल की पत्रकारिता के मर्म को समझा और कामयाब हो गए जबकि अधिकांश इसमें नाकामयाब रहे।

दरअसल, पत्रकारिता शिक्षा दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह नहीं है। इसमें जमीनी अनुभव की जरूरत होती है जो पत्रकारिता को लोकमंगल की ओर ले जाती है। अधिसंख्य पत्रकारिता संस्थानों में पत्रकार नहीं पढ़ाते हैं बल्कि गैर-पत्रकार पढ़ाते हैं जो उन्हें किताबी ज्ञान तो दे देते हैं लेकिन स्वयं के पास व्यवहारिक ज्ञान नहीं होने के कारण गंभीर पत्रकार का निर्माण नहीं कर पाते हैं। अच्छे नम्बरों से पत्रकारिता की परीक्षा पास कर लेने का अर्थ अच्छा पत्रकार बन जाना नहीं है बल्कि कामयाब पत्रकार के लिए घिस-घिस कर चंदन होना पड़ता है। एक और बड़ी कमी यह है कि पत्रकारिता की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों को सपने दिखाये जाते हैं और जब वे जमीन पर काम करने आते हैं तो उन्हें सच्चाई का सामना करना पड़ता है जिससे उनके भीतर का साहस टूटने लगता है। आज भी पत्रकारों के पास अच्छी सैलरी नहीं है बल्कि कहा जाए कि एक परिवार का गुजर-बसर भी बमुश्किल होता है तो गलत नहीं होगा। इसके बाद नौकरी की गारंटी नहीं होती है क्योंकि प्रबंधन अपनी मर्जी से कभी भी बाहर का रास्ता दिखा देता है। कोरोना के इस भयानक संकट के दौर में पत्रकार सबसे ज्यादा परेशानी में हैं, यह बात हम सब जानते हैं। 

कुछ चुनौतियां हैं जो लोकमंगल की पत्रकारिता को बाधित करती हैं, तो दूसरी तरफ पत्रकारिता के निहित उद्देश्य इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि लोकमंगल की पत्रकारिता हमेशा कायम रहेगी। गांधी जी पत्रकारिता की जिस शुद्धता की बात करते थे, आज वह शायद संभव ना हो लेकिन पत्रकारिता में मिलावट हो, यह भी संभव नहीं। भारत सहित पूरी दुनिया के आंकड़ों का विशेषण करें तो पाएंगे कि सबसे खतरनाक कार्य पत्रकारिता का है। हर वर्ष बड़ी संख्या में पत्रकारीय दायित्व पूर्ण करते हुए पत्रकार मारे जाते हैं। लेकिन यह समाज को आश्वस्त करने की बात है कि पत्रकारिता पर मंडराते खतरा देखने के बाद भी डरने या पीछे हटने के स्थान पर प्रति वर्ष जज्बे से भरे युवा पत्रकारिता को करियर बनाने के लिए आते हैं और आ रहे हैं। 

लोकमंगल की पत्रकारिता पर संकट पत्रकारिता से या पत्रकारों से नहीं है बल्कि यह संकट प्रबंधन से है। प्रबंधन अपने निहित आर्थिक स्वार्थ के लिए किसी भी तरह का करार कर लेता है और लोकमंगल से जुड़ी कई बातें दबकर रह जाती है। किसी समय शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ इस बात का गवाह है। पत्रकारिता में आने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को एक बार यह फिल्म जरूर दिखायी जानी चाहिए। यह वह सच है जो लोकमंगल की पत्रकारिता के रास्ते में तब भी बाधा थी और आज तो इसका स्पेस लगातार बढ़ रहा है। हालांकि यह भी सच है कि जब-जब पत्रकारिता के समक्ष संकट बढ़ा है, तब-तब पत्रकारिता और तल्ख हुई है। वर्तमान समय का संकट यह है कि हर कोई पत्रकारिता से उम्मीद रखता है कि वह उसके पक्ष में बोले और ऐसा नहीं करने पर पत्रकारिता को अनेक उपमा दी जाती है। इस बात को मान लेना अनुचित नहीं होगा कि किसी दौर में सहिष्णुता अधिक थी तो किसी दौर में यह सहिष्णुता कम हुई है लेकिन सत्ता के लिए पत्रकारिता हमेशा से संकट रही है और बनी रहेगी क्योंकि समाज के चौथे स्तम्भ होने के कारण यह उसका मूल कर्तव्य है। सबसे बड़ी बात यह है कि पत्रकारिता पर समाज एक तरफ अविश्वास करता है और अखबार और टेलीविजन की खबरें समाज के लिए नजीर बनती हैं। अब समय आ गया है कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था का अधिकार क्षेत्र बढ़ना चाहिए और बेलाग होती मीडिया पर नियंत्रण हो। यह एक पहल है जिसकी जरूरत वर्तमान समय को है। हालांकि दौर कितना भी बुरा आए और कैसी भी परिस्थिति हो, पत्रकारिता अपने लोकमंगल की जवाबदारी से विमुख नहीं हो सकती है। क्योंकि लोकमंगल की पत्रकारिता की नींव में गांधी, तिलक और विद्यार्थीजी की सोच और दृष्टि समाहित है। 

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

भारतीय पत्रकारिता के तमाम रूपों में इस नेक व्यवसाय की आड़ में ऐसी ढेरों कलंक कथाएं बिखरी पड़ी हैं।

राजेश बादल by
Published - Friday, 15 January, 2021
Last Modified:
Friday, 15 January, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक कारोबारी चैनल के लोकप्रिय एंकर को पेशागत बेईमानी के लिए जिम्मेदार पाया है। पूरी पड़ताल के बाद पता चला कि इस एंकर ने पत्रकारिता की आड़ में अपने धंधे का विस्तार किया और शेयरों की खरीद-फरोख्त के जरिये करोड़ों रुपये कमाए। अब ये रुपये इस एंकर को लौटाने होंगे। सेबी ने एंकर और उसके परिवार के दो सदस्यों पर शेयर व्यापार की वित्तीय बंदिशें भी लगा दी हैं। त्वरित कार्रवाई करते हुए चैनल प्रबंधन ने एंकर को नौकरी से निकाल दिया है। निश्चित रूप से इस कार्रवाई का स्वागत किया जाना चाहिए। यह मामला जांच की मांग करता है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता के तमाम रूपों में इस नेक व्यवसाय की आड़ में ऐसी ढेरों कलंक कथाएं बिखरी पड़ी हैं। मेरी दृष्टि में इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अपने किस्म का यह अनूठा मामला सा लगता है, मगर तमाम कारोबारी चैनलों और समाचारपत्रों में व्यापार डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों-संपादकों के लिए इस खबर पर चौंकने जैसी कोई नई जानकारी नहीं है। बिजनेस कवर करने वाले अधिकांश पत्रकारों की प्रतिक्रिया यही है कि इसमें नया क्या है? इस प्रोफेशन में तो ऐसा होता है अथवा वर्षों से हो रहा है। यानी शेयर की सूचना होने और उसके आधार पर खरीदने-बेचने वाली प्रक्रिया भले ही न अपनाई जाए, मगर यह भी सच है कि बिजनेस कवर करने वाले तमाम पत्रकारों के पास वेतन के अतिरिक्त कमाई करने के अनेक रास्ते होते हैं। वे अपनी पत्रकारिता का इस्तेमाल अपने बैंक बैलेंस को गुब्बारे की तरह फुलाने में करते हैं। इसे एक तरह से छल की श्रेणी में रखा जाना चहिए। सेबी जैसी संस्था ने शुचिता बनाए रखने के लिए झटपट फ़ैसला लिया, किन्तु पत्रकारिता का सहारा लेकर अनेक क्षेत्रों में अभी भी यह धड़ल्ले से चल रहा है। व्यक्तिगत मुनाफे को न देखें तो टीआरपी घोटाला भी इसी प्रकार की कालिख कहानी है। वह संस्थान की ओर से प्रोत्साहित करने वाली साज़िश है।

पत्रकारिता में इस प्रवृति का प्रवेश दशकों पहले ही हो गया था । तब समाचार पत्र की अन्य डेस्क के पत्रकार बिजनेस डेस्क के संवाददाताओं/संपादकों की तरफ़ बड़ी ईर्ष्या भरी नजरों से देखा करते थे। लगभग हर रिपोर्टर कारोबारी रिपोर्टिंग की बहती गंगा में हाथ धोना चाहता था। जब पत्रकारों का औसत वेतन हजार रुपये भी नहीं होता था तो वाणिज्य, खेल, सिनेमा और महानगरों के सिटी डेस्क पर काम करने वाले तमाम लोग महीने भर का वेतन यूं ही कमा लेते थे। कोई मिट्टी मोल जमीन खरीद लेता तो कोई सोना-चांदी। किसी को बिना मूल्य चुकाए फ्लैट की चाबी मिल जाती तो कोई महंगी कार का मालिक बन जाता था। इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है। क्या पेशे की आड़ में चल रहा गोरखधंधा कभी रुकेगा मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

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मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

अजब दौर है। भारतीय पत्रकारिता का अंधकार युग। कब तक चलेगा? कोई नहीं जानता। विचार और निरपेक्ष-निर्भीक विश्लेषण की क्षमता खोते जाने का नतीजा क्या होगा।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 29 December, 2020
Last Modified:
Tuesday, 29 December, 2020
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।। 

अजब दौर है। भारतीय पत्रकारिता का अंधकार युग। कब तक चलेगा? कोई नहीं जानता। विचार और निरपेक्ष-निर्भीक विश्लेषण की क्षमता खोते जाने का नतीजा क्या होगा। पत्रकारिता के मूक और चौपाया युग की ओर बढ़ते जाने का अर्थ यही है कि मूल्यों और सरोकारों की संचित निधि का खजाना अब रीतने वाला है और हमारे पास दोबारा उस पात्र को लबालब भरने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती। आपस की होड़ और गलाकाट और रंजिश भरे माहौल ने सोचने पर विवश कर दिया है कि अतीत की गौरवशाली परंपराओं को भूलकर आने वाली नस्लों के लिए हम क्या छोड़कर जा रहे हैं?

जब भारत में प्रेस काउंसिल का गठन हुआ, तब भी पत्रकारिता में कोई निर्मल गंगा की धारा नहीं बहती थी, लेकिन उन दिनों इस पेशे में अपने समर्पण और सेवा भाव से काम करने वालों की तादाद इतनी अधिक थी कि रास्ते से भटकने के इक्का दुक्का उदाहरण ही सामने आते थे। इसी कारण प्रेस काउंसिल को अधिक ताकतवर और अधिकार संपन्न बनाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। साल में एकाध नमूना ही देखने को मिलता था, जब यह शिखर संस्था किसी संपादक या संस्थान की भर्त्सना या निंदा करती थी। निंदा का यह निर्णय बड़ा अभूतपूर्व होता था। वह संपादक या संस्थान एक तरह से जग-हंसाई का केंद्र बन जाता था। प्रेस काउंसिल के निंदा करने का अर्थ ही भरे चौराहे पर निर्वस्त्र कर देने जैसा होता था। पत्रकार और संपादक इस संस्था से खौफ खाते थे। इसके मुखिया निर्विवाद और निष्पक्ष हुआ करते थे। उनकी एक टिप्पणी साल भर तक चर्चा का विषय बनी रहती थी। वह पत्रकारिता संस्था अरसे तक एक नैतिक अपराध बोध से ग्रस्त रहती थी, लेकिन बाद के वर्षों में क्या हुआ? पत्रकारिता के नए नए अवतार आते गए और हम स्वभाव से पत्रकार कम, चतुर व्यापारी, निरंकुश, बेशर्म और खूंखार अधिक होते गए। अत्याधुनिक संचार साधनों, तकनीक, बाजार और सियासत ने हमें अपना गुलाम बना लिया। यह गुलामी अंग्रेजी राज से कहीं ज्यादा खतरनाक और भयानक है, क्योंकि यह हमारे अपने आजाद तंत्र में विकसित हुई है। इसके लिए हम गोरी हुकूमत को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। पहले इस गुलामी ने हमें आर्थिक जंजीरों से जकड़ा, फिर उसकी चाबी राजनीति के पैरोकारों को दे दी। अब छटपटाहट ही नियति बन गई है। चाहकर इस जाल से बाहर निकलना हमारे बूते से बाहर है, तो क्या हिन्दुस्तान की पत्रकारिता इसी तरह बेड़ियों में रहेगी?

हम जानते हैं कि सत्ता पर काबिज कोई भी पार्टी अपनी आलोचना के तीखे स्वर बर्दाश्त नहीं कर सकती। इसलिए वह लगातार पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है। पहले वह लालच की रोटियां इस व्यवसाय (अप्रिय किन्तु आज के हाल के लिए सही शब्द) पर फेंकती है। मालिक और पेशेवर पत्रकार- संपादक उसमें फंस जाते हैं। इस पर भी बात नहीं बनती तो वह सियासी सुविधाओं का लालच देती है। उसका भी असर न हो तो वह आपस में लड़ाती है। तरकश के सारे तीर बेकार हो जाएं तो वह उत्पीड़न और अत्याचार का अंतिम हथियार चलाती है। आज की पत्रकारिता में परदे के पीछे की यही कहानी है। 

तो अब क्या किया जाए?  इसके बाद भी हमें निर्वाचित सरकार की ओर ही ताकना पड़ेगा। वह भारतीय संविधान से बंधी है। प्रेस काउंसिल जब अस्तित्व में आई, तब केवल अखबार ही पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करते थे। रेडियो तब सरकारी नियंत्रण में था। इसके बाद टेलिविजन, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के कई प्लेटफॉर्म समाज के दिलो दिमाग पर छा गए। अब प्रेस काउंसिल हाथी के दांत जैसी रह गई है। उसके दायरे में नए अवतार नहीं आते। अब एक सशक्त, सर्वांग, संपूर्ण और शक्तियों से लबरेज मीडिया काउंसिल की दरकार है। हम यह भी जानते हैं कि बीते चालीस-पैंतालीस साल में सरकार की ओर से आचार संहिता थोपे जाने का लगातार विरोध करते रहे हैं। मगर अब हालात बेकाबू हो रहे हैं तो सुप्रीम कोर्ट के किसी निष्पक्ष न्यायाधीश (निष्पक्षता का पैमाना कैसे तय होगा) की अगुआई में तत्काल इसका गठन हो। यह सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करे। काउंसिल में पत्रकार हों, वकील हों, बुद्धिजीवियों के प्रतिनिधि हों और स्वयंसेवी संगठन भी हों। उनकी छवि विवादों से परे हो, तभी इस तरह की आला संस्था काम कर पाएगी। देखते हैं बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो चौथे स्तंभ की साख पर घने काले बादल तो मंडरा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!  

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यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

लगातार दो दिन। दिल दहलाने वालीं वीभत्स और जघन्य तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर छपीं। एक घटना राजस्थान की थी।

राजेश बादल by
Published - Monday, 14 December, 2020
Last Modified:
Monday, 14 December, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

लगातार दो दिन। दिल दहलाने वालीं वीभत्स और जघन्य तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर छपीं। एक घटना राजस्थान की थी। उसमें एक स्कूल शिक्षिका दुपहिया वाहन पर स्कूल जा रही थी। अचानक हाईटेंशन लाइन वाला तार उस पर आ गिरा। शिक्षिका धू-धू कर जलने लगी। देखते ही देखते उसने सबके सामने छटपटाते हुए दम तोड़ दिया। कोई बचाव के लिए नहीं आया। लोग दर्शक बने चुपचाप देखते रहे। उल्टे प्रेस फोटोग्राफर ने जलती महिला की तस्वीरें क्लिक कीं और एक राष्ट्रीय अखबार ने छाप दीं। बड़ी-तीन कॉलम में। उसके अगले दिन फिर एक ऐसी ही तस्वीर। वह भी राजस्थान से ही। एक सड़क दुर्घटना में कई लोग कुचलकर मर गए। वे जीप में सवार थे। इनमें तीन नवविवाहित युगल थे। अखबार ने क्लोज अप में उन कुचले-पिचले शवों की बड़ी तस्वीर प्रकाशित कीं। खौफनाक और बेहद दर्दनाक। एक पाठक होने के नाते कह सकता हूं कि सपने में भी कोई ऐसी फोटो समाचार पत्र के पन्नों में सुबह-सुबह देखना पसंद नहीं करेगा।

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं? जैसे-जैसे पत्रकार आधुनिक, साक्षर और विचारवान होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे अधिक अभद्र,शर्मनाक़ तथा बेशर्म पत्रकारिता के बियाबान में भटकते जा रहे हैं। क्या किसी सभ्य लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का यह बरताव जिम्मेदार कहा जा सकता है? हम अनेक अवसरों पर पाश्चात्य और यूरोपीय संस्कृति तथा सोच का उपहास उड़ाते हुए भारतीय संस्कृति पर गर्वबोध करते दिखाई देते हैं। लेकिन यह भी सच है कि पश्चिम और यूरोप के मुल्कों में अखबार के पन्नों और चैनलों में तस्वीरें तथा वीडियो नहीं दिखाए जाते और न ही वहां के दर्शक-पाठक इसे पसंद करते हैं। उनकी पत्रकारिता इस मामले में हमारी पत्रकारिता से बेहतर और साफ सुथरी है। हम किस मुंह से सामाजिक सरोकारों वाली पत्रकारिता की बात करें?

करीब पैंतीस-चालीस साल पहले समाचार पत्रों की गैरजिम्मेदार पत्रकारिता के खिलाफ वातावरण बना था और अखबारों में आंतरिक लोकपाल की व्यवस्था पर जोर दिया जाने लगा था। मैं उन दिनों एक राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह में मुख्य उप संपादक था। उस समूह ने अपनी प्रेरणा से लोकपाल की नियुक्ति भी की थी। कुछ साल तक अखबारनवीसी में शुचिता और नैतिकता की गंध पन्नों पर पसरी नजर आई। थोड़े दिन ही सिलसिला चला और यह गंध कपूर की तरह उड़ गई। बाद में वही ढाक के तीन पात। इसके बाद उपग्रह क्रांति हुई। खबरें, फोटो और वीडियो पलक झपकते समंदर पार पहुंचने लगे तो समाचार दर्शकों-पाठकों तक जल्द भेजने की होड़ में उचित-अनुचित, जायज-नाजायज, नैतिक-अनैतिक कंटेंट परोसा जाने लगा। अब किसी भी स्तर पर कोई छन्नी लगी नहीं दिखाई देती। इसके भयावह परिणाम दिखाई देने लगे हैं।

टेलिविजन चैनलों में फूहड़पन, अतिरंजित और अश्लीलता भरी सामग्री रोकने के लिए प्रेस काउंसिल जैसी कोई संस्था नहीं है, मगर अखबारों के लिए तो यह एजेंसी सिर्फ हाथी का दांत साबित हुई है। तो इस तरह की क्रूर, अमानवीय और लोमहर्षक सामग्री का प्रकाशन रोकने की जिम्मेदारी कौन लेगा? डर है कि अगर यह क्रम जारी रहा तो एक दिन पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में भी कहीं यह डरावना अध्याय न पढ़ाया जाने लगे मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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देश की बेहतरी में मीडिया का इस्तेमाल कैसे करें, सीखने की जरूरत: श्रीपाद नाईक

यह विचार रक्षा राज्य मंत्री श्रीपाद नाईक ने गुरुवार को भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा सैन्य अधिकारियों के लिए आयोजित मीडिया संचार पाठ्यक्रम के समापन समारोह में व्यक्त किए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 11 December, 2020
Last Modified:
Friday, 11 December, 2020
sripadnaik

'भारत विरोधी ताकतों से निपटने में मीडिया की अहम भूमिका है। इसलिए मीडियाकर्मियों सहित हम सभी की यह जिम्मेदारी है कि भारत विरोधी ताकतें हमारे देश के खिलाफ मीडिया का दुरुपयोग न कर पाएं।' यह विचार रक्षा राज्य मंत्री श्रीपाद नाईक ने गुरुवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा सैन्य अधिकारियों के लिए आयोजित मीडिया संचार पाठ्यक्रम के समापन समारोह में व्यक्त किए।

इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, अपर महानिदेशक (प्रशासन) के. सतीश नंबूदिरीपाड व अपर महानिदेशक (प्रशिक्षण) ममता वर्मा भी उपस्थित थीं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के तौर पर पर बोलते हुए श्रीपाद नाईक ने कहा कि आज जब फेक न्यूज और हेट न्यूज का चलन बढ़ रहा है, तब मीडिया साक्षरता की आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति को है। न्यू मीडिया के इस दौर में सिर्फ संचारकों के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए मीडिया साक्षरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आज जब लगभग हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है, तब मीडिया के दुरुपयोग की संभावना कई गुना बढ़ गई है और इसे केवल मीडिया साक्षरता के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है।

रक्षा राज्य मंत्री के अनुसार, मीडिया साक्षरता से हमें उस मनोवैज्ञानिक युद्ध का मुकाबला करने में भी मदद मिलेगी, जिसे आज हम पूरी दुनिया में देख रहे हैं। हमें भारत विरोधी ताकतों द्वारा एक उपकरण के रूप में अपनाए जा रहे इस मनोवैज्ञानिक युद्ध से सचेत रहना होगा। हमें यह सीखना होगा कि देश और देशवासियों की बेहतरी के लिए मीडिया की ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

नाईक ने कहा कि भारतीय रक्षा बलों का साहस, वीरता, प्रतिबद्धता और समर्पण अद्वितीय है। लेकिन देश में कुछ ऐसे तत्व हैं, जो भारतीय सेना की छवि को धूमिल करने के लिए चौबीस घंटे सक्रिय रहते हैं। हम सही मीडिया दृष्टिकोण अपनाकर और संगठित तरीके से विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करके रक्षा बलों के खिलाफ ऐसे शातिर अभियानों का मुकाबला कर सकते हैं।

इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि आज पूरा विश्व कोरोना महामारी का सामना कर रहा है। कोरोना के इस दौर में एक शब्द अत्यंत प्रचलित हुआ है और उसके अनेक परिणाम और दुष्परिणाम भी देखने को मिले हैं। ये शब्द है - ‘इन्फोडेमिक (Infodemic)’। इस शब्द का तात्पर्य अतिशय सूचना या आम बोलचाल की भाषा में सूचनाओं के विस्फोट से है। उन्होंने कहा कि जब इन अतिशय सूचनाओं में से जब यह चुनना मुश्किल हो जाए कि किस सूचना पर विश्वास करें और किस पर नहीं, तो ऐसी स्थिति एक विमर्श को जन्म देती है और इस विमर्श नाम है मीडिया एवं सूचना साक्षरता।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि आज फेक न्यूज अपने आप में एक बड़ा व्यापार बन गई है और डिजिटल मीडिया ने भी इसे प्रभावित किया है। ऐसे में मीडिया साक्षरता की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

कार्यक्रम का संचालन विष्णुप्रिया पांडे ने किया। आईआईएमसी प्रतिवर्ष सैन्य अधिकारियों के लिए मीडिया एवं संचार से जुड़े शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग कोर्सेज का आयोजन करता है। इन पाठ्यक्रमों में तीनों सेनाओं के कैप्टन लेवल से लेकर ब्रिगेडियर लेवल तक के अधिकारी हिस्सा लेते हैं। कोरोना के कारण इस वर्ष पहली बार ये ट्रेनिंग प्रोग्राम ऑनलाइन आयोजित किया गया है। इस वर्ष लोक मीडिया से लेकर न्यू मीडिया एवं आधुनिक संचार तकनीकों की जानकारी सैन्य अधिकारियों को प्रदान की गई है। इसके अलावा न्यू मीडिया के दौर में किस तरह सेना एवं मीडिया के संबंधों को बेहतर बनाया जा सकता है, इसका प्रशिक्षण भी अधिकारियों को दिया गया है।

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पंजाब-हरियाणा के ही किसान क्यों हैं आंदोलित, समझने की जरूरत: पूरन डावर

देश में बड़े बदलाव आवश्यक हैं और एक-एक करके सभी किए जा रहे हैं। हर बदलाव में गहराई है, दूरदर्शिता है। अभी बात कृषि सुधारों पर हो रही है।

पूरन डावर by
Published - Wednesday, 09 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 09 December, 2020
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

देश में बड़े बदलाव आवश्यक हैं और एक-एक करके सभी किए जा रहे हैं। हर बदलाव में गहराई है, दूरदर्शिता है। अभी बात कृषि सुधारों पर हो रही है। समझने की जरूरत है कि पंजाब और हरियाणा के ही किसान क्यों आंदोलित हैं। इसकी जड़ ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी), मंडियां और मंडियों पर राजनीतिक नियंत्रण है। देश की एमएसपी पर कुल खरीद में पंजाब का हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक और हरियाणा का 15-20 प्रतिशत है।

एमएसपी पर खरीद केवल गेहूं और चावल की होती है, इसलिए पंजाब में अधिकांश खेती गेहूं और चावल की ही जाती है और एमएसपी पर मंडी के माध्यम से सरकार को बेच दी जाती है। यही बड़ा ‘खेल’ है। मंडियों पर राजनीतिज्ञों का वर्चस्व है। मनमाफिक एमएसपी दलालों के माध्यम से तय होता है। किसान से मोटा कमीशन, साथ ही सरकार से 2.5 प्रतिशत कमीशन। ये अनाज सरकार के गोदामों में सड़ता है। सरकार के पास पर्याप्त गोदाम हैं भी नहीं। पेपर पर खरीद भी हो जाती है और सड़ा भी दिखाया जा सकता है। पंजाब की पूरी राजनीति इसी पर आधारित है।

नए प्रावधानों से ‘खेल’ पूरी तरह बंद तो नहीं होगा, लेकिन इससे बड़ी चोट अवश्य लग सकती है। कृषि सुधार कानून में तीन प्रावधान किए गए हैं। पहला है 'कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020'। इसमें किसान अब अपनी फसल को मात्र मंडी के माध्यम से ही बेचने को बाध्य नहीं हैं। अब वह सीधे भी देश में कहीं भी अपनी फसल को बेच सकते हैं। मंडियो के चंगुल से मुक्त हो सकते हैं। अपनी खेती कांट्रैक्ट पर भी दे सकते हैं। बोने से पहले ही फसल का सौदा कर सकते हैं। इससे उसका स्वतः बीमा हो सकता है और वह सुरक्षित हो सकते हैं।    

एसडीएम व्यवस्था: सरकार ने किसी भी विवाद की स्थिति में हल के लिए एसडीएम को अधिकृत किया है, क्योंकि वही एक अधिकारी है जो सीधे किसान से जुड़ा होता है। प्राकृतिक स्थितियों और विपत्ति में हानि-लाभ तय करता है। अदालतों के झंझट से मुक्त रखता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य अदालत की लंबी प्रक्रिया में किसान को उलझाना नहीं है। एसडीएम के साथ जन प्रतिनिधि भी मदद कर सकते हैं और प्रक्रिया आसान की गई है।

आवश्यक वस्तु सेवा अधिनियम 1955 में परिवर्तन के बिना बदलाव नहीं हो सकता। यह तब बना था जब देश में अन्न की काफ़ी कमी थी। व्यापारी अनुचित भंडारण कर फसल रोककर दाम बढ़ाते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। खाद्यान बहुतायत में है। सरकार के पास खरीदकर भंडारण की व्यवस्था भी नहीं है और की भी क्यों जाए, जब निस्तारण ही नहीं है और पूरी व्यवस्था में बड़ा झोल भी है।

इस अधिनियम में छूट दी गई है कि अब आप आपातकाल और युद्ध को छोड़कर भंडारण कर सकते हैं। कृषि उत्पाद और उनके उत्पादनों का निर्यात भी कर सकते हैं। इससे किसानों की आय भी बढ़ेगी। भंडारण की व्यवस्था व्यापारी स्वयं करेंगे, सरकार पर भंडारण और एमएसपी पर खरीद का दबाव भी कम होगा। किसानों के विश्वास के लिए अभी दोनो प्रक्रियाएं चलेंगीं। सच्चाई यही है। बाकी सब अटकलें और विपक्ष विलाप है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 04 December, 2020
Last Modified:
Friday, 04 December, 2020
RajeshBadal7

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है। उसके पास कोई सुबूत नहीं है। लाखों किसान ठिठुरते मौसम में गेंहू की फसल सेवा छोड़कर कोरोना के भयावह दौर में बचाव की बंदिशों को धता बताते हुए जान जोखिम में डालकर छह महीने का राशन लेकर सड़कों पर उतरे हैं तो उनका अभिनंदन क्यों नहीं होना चाहिए? इससे तो लोकतंत्र अधिक जीवंत और स्वस्थ्य होता है। इसलिए एडिटर्स गिल्ड का अपने सरोकारों के प्रति संवेदनशील होना पूरी तरह जायज है। सवाल तो यह है कि आंदोलन को विपक्ष की साजिश और उग्रवाद-पोषित बताने वाली बेसिर पैर की पत्रकारिता की भर्त्सना कहां और किस प्लेटफॉर्म पर होनी चाहिए? 

याद आ रहा है कि एक दो दिन पहले किसान आंदोलन के बारे में वॉट्सऐप के एक समाचार समूह पर चर्चा चल रही थी। एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी किसान आंदोलन को पहले खालिस्तानी ठहराते रहे, फिर आतंकवादियों का हाथ बताते रहे, फिर उन्होंने चीन और पाकिस्तान को जिम्मेदार बताया, इसके बाद कांग्रेस का हाथ बताया और जब उनके तरकश के सारे तीर खाली गए तो वे मुझ पर ही आक्रामक हो गए। बोले, ‘आप तो विपक्ष की भाषा बोलते हैं।’ मेरे लिए उनके हमलावर होने की वजह बेतुकी थी। सवाल यह है कि क्या एक पत्रकार को सिर्फ सरकारी जबान बोलनी चाहिए? यदि ऐसा होता तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने से पहले लोकनायक जेपी के आंदोलन को पत्रकारों का कोई समर्थन ही नहीं मिलता। दूसरी बात यह कि अगर पत्रकारिता विपक्ष की भाषा बोल भी रही है तो उसमें क्या कोई राजद्रोह जैसा पाप छिपा है? लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की अवधारणा का अर्थ ही यह है जब सरकार की गाड़ी पटरी से उतरे तो उसके कान उमेठने का काम पत्रकारिता करे?

भारतीय पत्रकारिता के कालजयी संपादक राजेंद्र माथुर मानते थे कि सौ फीसदी निष्पक्षता जैसी कोई चीज नहीं होती। आखिर आपातकाल के दरम्यान पत्रकार सड़कों पर सरकार के खिलाफ ही तो उतरे थे। उसके बाद बिहार प्रेस बिल तथा मानहानि विधेयक के विरोध में भी अखबारनवीस सड़कों पर आए थे। पालेकर अवॉर्ड के लिए, भचावत और मणिसाना आयोग की सिफारिशों के लिए जब पत्रकारों ने संघर्ष छेड़ा तो उसे श्रम संगठनों, रेलवे यूनियनों और तमाम औद्योगिक कर्मचारी संगठनों ने अपना भरपूर समर्थन दिया था। राजेंद्र माथुर के मुताबिक एक संपादक या पत्रकार के पेशेवर जीवन में अक्सर निष्पक्षता पर चुनौती आती है। पत्रकारिता को कोई एक पक्ष लेने की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में उसे सरकार का नहीं, बल्कि आम अवाम का पक्ष लेना चाहिए। यही पत्रकारिता का धरम है। वैसे तो इस मुल्क का अतीत गवाह है कि राष्ट्रीय संकट की घड़ी में पत्रकारिता हरदम निर्वाचित हुकूमत के साथ खड़ी रही है। चाहे वह 1962, 1965, 1971 और कारगिल की जंगें रहीं हों अथवा पोखरण में परमाणु परीक्षण, अंतरिक्ष अनुसंधानों से मिले गर्व के पल हों अथवा कोरोना जैसे भयावह दौर का मुकाबला। गुजरात का भूकंप हो या सुनामी का कहर। हर स्थिति में पत्रकारिता ने अपनी व्यवस्था का साथ दिया है। लेकिन अगर चुनी हुई सरकार गलत फैसले लेती है तो उसका विरोध भी पत्रकारिता का राष्ट्रीय कर्तव्य है। अगर हुकूमत सोचती है कि पत्रकारिता हरदम उसकी बजाई धुन पर नृत्य करती रहेगी तो यह उसकी ग़लतफहमी है। पत्रकारिता दलदल में नहीं जाए, इसके लिए जरूरी है कि वह किसी दल के दामन में नहीं बंधे मिस्टर मीडिया! 

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

  

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एक बेमिसाल मोती थे राजीव कटारा, जिन्हें हमने असमय ही खो दिया: क़मर वहीद नक़वी

राजीव कटारा जैसे बेमिसाल मोती आसानी से नहीं मिलते। उन्हें हमने ऐसे खो दिया, इसका बड़ा मलाल है और रहेगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
rajivkatara5

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

राजीव कटारा जैसे बेमिसाल मोती आसानी से नहीं मिलते। उन्हें हमने ऐसे खो दिया, इसका बड़ा मलाल है और रहेगा।

1986 में जब हम लोग साप्ताहिक ‘चौथी दुनिया’ को शुरू करने के लिए ऐसे पत्रकार ढूँढ रहे थे, जिन्हें पत्रकारिता का कोई अनुभव हो या न हो, लेकिन जिनमें पत्रकारिता को लेकर एक अलग तरह का जज़्बा हो, तब पहली बार राजीव कटारा से मुलाक़ात हुई और तुरन्त ही वह ‘चौथी दुनिया’ का हिस्सा बन गये।

‘चौथी दुनिया’ केवल एक अख़बार नहीं था, बल्कि हिन्दी पत्रकारिता में एक विलक्षण प्रयोग था, सिर्फ़ कंटेंट के तौर पर ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता के पेशेगत ढाँचे को लेकर भी वह एक प्रयोग था, छोटी-सी टीम, मामूली संसाधन लेकिन कहीं कोई दफ़्तरशाही नहीं।

राजीव बेहद ख़ुशनुमा और जीवन के हर मामले में 100 टंच खरे और ईमानदार इनसान थे। अपने काम को लेकर पूरी तरह गम्भीर, कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते थे। पढ़ना-लिखना, समझना, सीखना और पत्रकारिता के उसूलों से इंच भर भी नहीं डिगना, राजीव पूरी ज़िन्दगी इसी तरह जिये। न किसी के प्रति कभी कोई दुर्भावना, न क्रोध और न किसी प्रकार की राजनीति में शामिल होना। लेकिन जो बात ग़लत है, आप राजीव से कभी उसे ‘सही’ नहीं कहलवा सकते थे। जो ग़लत है, सो ग़लत है, चाहे वह बात कहीं से भी आयी हो।

वह कुछ दिनों के लिए टीवी में भी आये और  1995 में ‘आज तक’ की शुरुआती टीम का हिस्सा बने, लेकिन उन दिनों टीवी की 90 सेकेंड की स्टोरी की सीमा में बँधना उन्हें कभी अच्छा नहीं लगा और वह प्रिंट में वापस लौट गये। इस तरह की सीमाओं से उन्हें हमेशा ही परेशानी होती थी।

राजीव जैसे प्रतिभासम्पन्न, प्रतिबद्ध, पेशे और जीवन के हर सम्बन्धों के प्रति सौ फ़ीसदी ईमानदार और बेहद संवेदनशील पत्रकार बिरले ही मिलते हैं। वह वाक़ई एक बेमिसाल मोती थे, जिन्हें हमने असमय ही खो दिया। श्रद्धाँजलि।

(साभार: वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी की फेसबुक वाल से)

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गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 20 November, 2020
Last Modified:
Friday, 20 November, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है। देखते ही देखते जंगल में आग की तरह यह समाचार फैल गया। सोशल मीडिया के तमाम अवतारों पर और कुछ टीवी चैनलों ने इसे ब्रेक कर दिया। लेकिन शाम होते होते डायरेक्टर जनरल (मिलिट्री ऑपरेशंस) ने इसका खंडन जारी कर दिया।

‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ भारत की ऐसी समाचार एजेंसी है, जिसकी साख दशकों से दुनिया भर में है। इसकी खबर सौ फ़ीसदी सत्यता की गारंटी मानी जाती रही है। सरकारी मंत्रालय और आला अफसर तक पीटीआई के समाचार पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं। जब ऐसी संस्था से गलत जानकारी जारी हो जाती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? ताज्जुब है कि इस समाचार संस्था ने खंडन तो जारी किया मगर खेद प्रकट करने की जरूरत तक नहीं समझी। इन दिनों ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ पर वैसे भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में असत्य सूचना से उसकी छवि पर यकीनन आंच आएगी। एजेंसी से यह देश जानने का हक रखता है कि इतना संवेदनशील समाचार उसने किस आधार पर जारी किया?

गौरतलब यह है कि जम्मू कश्मीर प्रदेश में आने वाले दिन स्थानीय चुनाव की सरगर्मियों से भरे होंगे। इसके बाद बंगाल राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इस चुनावी माहौल में सियासी फ़ायदा उठाने के लिए कुछ राजनीतिक दल और असामाजिक तत्व अक्सर झूठे समाचारों के जरिये अफ़वाहों का बाजार गर्म करने का प्रयास करते हैं। जाहिर है कि वे पत्रकारों के कंधे पर से बंदूक चलाते हैं। उनका उल्लू सीधा हो जाता है,  लेकिन पत्रकारिता को नुक़सान हो जाता है।

गंभीर प्रश्न यह है कि पत्रकारिता में हमेशा तथ्य की दोबारा पड़ताल करने और जांचने की समझाइश दी जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सैनिक ऑपरेशन जैसे संवेदनशील मामलों में तो यह और भी आवश्यक है कि प्राप्त सूचना को क्रॉस चेक किया जाए। एजेंसी को अपनी साख के कारण इस पर ध्यान देना जरूरी था। यह नहीं हुआ। पीटीआई की खबर थी, इसलिए चैनलों के पास अविश्वास करने का कोई आधार नहीं था। गनीमत थी कि यह समाचार उसने दिन में जारी किया। इससे अखबारों में छपने से पहले ही डीजीएमओ ने उसके गलत होने का प्रतिवाद जारी कर दिया। यदि यही सूचना रात में जारी होती तो बेहद मुश्किल हो जाती। अखबारों और सोशल मीडिया के तमाम अवतारों को भी अब यह ध्यान देना पड़ेगा कि एजेंसी की खबर की भी सरकारी या अधिकृत प्रवक्ता से पुष्टि कर ली जाए। बिना जांच पड़ताल के खबर प्रकाशित और प्रसारित करना तो अपराध ही है। इस पर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: TRP के खेल में उलझ गया बाजार!

मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

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भारत-अमेरिकी संबंध: रिश्ते देश से होते हैं न कि किसी व्यक्ति से: पूरन डावर

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में विश्व में उस देश की छवि बिगड़ी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2020
Last Modified:
Saturday, 07 November, 2020
PuranDabar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अमेरिका की छवि विश्व में बिगड़ी है। पहले चुनाव में जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के लिए ट्रम्प की प्रत्याशी के रूप में घोषणा हुई थी। मैं अमेरिका में ही व्यावसायिक भ्रमण पर था और उनका पहला भाषण टीवी पर सुनकर लगा कि ऐसा व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति कभी हो ही नहीं सकता। भारतीय राजनीति से भी कहीं नीचा स्तर और मेरे दिमाग में अमेरिका की इमेज सदैव ब्रह्मा जी की तरह रही। मेरा मानना था कि अमेरिकी जनता ऐसे व्यक्ति को कभी स्वीकार कर ही नहीं सकती।

उसके बाद पूरा चुनाव फॉलो ही नहीं किया। यदा कदा मेरे एक मित्र मुझे बताते थे कि ट्रम्प जीत रहा है तो मैं उन पर बिगड़ जाता और कहता कि अमेरिका भारत नहीं है, ऐसा हो ही नहीं सकता, लेकिन ऐसा ही हुआ। अमेरिका में अधिकांशतः हर राष्ट्रपति को दो टर्म मिले हैं। अमेरिका ने गलती सुधारी और एक टर्म में उतरना पड़ा। हालांकि जो बिडेन का स्तर भी कमोबेश एक सा है।

विश्व में अमेरिका के आधिपत्य के ह्रास के लक्षण हैं। स्पष्ट है कि जहां तक भारत के अमेरिका से संबंध की बात है तो दोनों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। दोनों को सदैव एक-दूसरे की आवश्यकता है। ओबामा से भी उतने ही संबंध थे, ट्रम्प से भी हैं और अब बिडेन से भी रहेंगे। वैसे भारत सहित एशियंस ने ट्रम्प को कतई वोट नहीं किया। उनके रहते सबकी नौकरियां-वीजा खतरे में थे। जहां तक मोदी जी की बात है, उन्हें ट्रम्प हों या बिडेन कोई फर्क नहीं पड़ता। रिश्ते देश से होते हैं, न कि किसी व्यक्ति से। कल ट्रम्प थे, आज मोदी हैं कल कोई और...।

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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, अनुचित था पुलिस का यह तरीका

मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई बहस चल पड़ी है

राजेश बादल by
Published - Thursday, 05 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 05 November, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई बहस चल पड़ी है। एक वर्ग अरनब पर इस कार्रवाई के खिलाफ है और मानता है कि अरनब गोस्वामी लगातार महाराष्ट्र सरकार को निशाने पर लेते हुए चैनल में खबरें और बहसें चला रहे थे। इस वजह से यह एक्शन हुआ। दूसरा धड़ा यह मानता है कि अरनब अपनी पत्रकारिता में संतुलन का पालन नहीं कर रहे थे। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार, शिवसेना और कांग्रेस के खिलाफ निंदनीय अभियान छेड़ दिया था। यह एक पक्षीय पत्रकारिता इस पेशे के सिद्धांतों का पालन नहीं करती। इसलिए ऐसी कार्रवाई तो होनी ही थी।

दोनों पक्ष अपनी अपनी जगह सच हैं, लेकिन मेरा नजरिया कुछ हटकर है। मेरा निवेदन है कि जब हम पत्रकारिता के पेशे में कदम रखते हैं तो खोजी, निष्पक्ष और साहसी पत्रकारिता के लिए सरकार या किसी अन्य पक्ष की ओर से बदले की कार्रवाई के लिए भी तैयार रहते हैं। अगर आप किसी पर हमला करते हैं तो वह पक्ष जवाबी कार्रवाई के लिए आजाद है। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक भावना पत्रकार को संरक्षण देने की होनी चाहिए। पर यह संरक्षण उसके कर्तव्य निर्वहन के कारण ही मिलना चाहिए। अरनब गोस्वामी को उनके पत्रकारिता कर्म के कारण हिरासत में नहीं लिया गया है। वह एक आपराधिक मामला है, जो पहले से चल रहा था। किसी आपराधिक कृत्य के लिए किसी पत्रकार को अपनी बिरादरी, समाज अथवा सरकार से संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। हम तहलका के संपादक के मामले में यह देख चुके हैं।

पर मुंबई पुलिस ने जिस तरीके से हिरासत में लिया, वह उचित नहीं था। अरनब का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और न ही वे कोई शातिर बदमाश हैं। वैसे तो भारतीय दण्ड संहिता भी किसी अपराधी तक को इस तरह अरेस्ट करने की अनुमति नहीं देती। इसलिए मैं कहूंगा कि अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी का तरीका अनुचित है। मगर महाराष्ट्र पुलिस का यह कदम देश के पत्रकारों के लिए यह गंभीर संदेश है कि अगर वे संतुलन की लक्ष्मण रेखा लांघेंगे तो फिर किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार रहें मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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