इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस साल के त्योहारी सीजन से पहले बड़ी अनिश्चितता का सामना कर रही है। इसकी वजह ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की टीवी रेटिंग्स पर लगी रोक है। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे मीडिया प्लानिंग पर असर पड़ सकता है, ठीक ऐसे समय जब टीवी चैनल अपने बड़े शो लॉन्च करने की तैयारी में हैं और विज्ञापनदाता त्योहारों के लिए अपने विज्ञापन बजट को अंतिम रूप दे रहे हैं।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने BARC को निर्देश दिया है कि वह नई टेलीविजन रेटिंग एजेंसी नीति के तहत लाइसेंस रिन्यू होने तक किसी भी टीवी रेटिंग का प्रकाशन न करे। इस फैसले के बाद ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और मीडिया एजेंसियों के पास दर्शकों की संख्या मापने का सबसे बड़ा और भरोसेमंद पैमाना फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस फैसले का समय बेहद संवेदनशील है। जुलाई से सितंबर का समय आमतौर पर त्योहारी सीजन की मीडिया प्लानिंग का होता है। इसी दौरान कंपनियां गणेश चतुर्थी, ओणम, नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दशहरा, दिवाली और साल के आखिर में होने वाली खरीदारी के सीजन के लिए अपने विज्ञापन बजट तय करती हैं। दूसरी ओर, टीवी नेटवर्क भी इसी समय नए फिक्शन शो, रियलिटी शो और बड़े एंटरटेनमेंट कार्यक्रम लॉन्च करते हैं ताकि त्योहारों के दौरान ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित किया जा सके।
इंडस्ट्री का मानना है कि अगर दर्शकों के आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे तो विज्ञापनदाता डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर ज्यादा झुक सकते हैं, क्योंकि वहां उन्हें रियल-टाइम डेटा और कैंपेन की पूरी रिपोर्ट मिलती रहती है।
एक प्रमुख मीडिया एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) ने कहा कि त्योहारी तिमाही में टीवी पर सबसे ज्यादा विज्ञापन खर्च होता है, क्योंकि इसी दौरान नए शो और बड़े एंटरटेनमेंट प्रोग्राम शुरू होते हैं। लेकिन विज्ञापनदाता यह भी चाहते हैं कि उनके निवेश का सही आकलन हो सके। अगर यह भरोसा खत्म होता है तो बजट खत्म नहीं होगा, बल्कि ऐसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा जहां प्रदर्शन को मापा जा सकता है।
टीवी इंडस्ट्री के सबसे बड़े विज्ञापन सीजन पर संकट
त्योहारी सीजन टीवी चैनलों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी समय माना जाता है। इसी दौरान मनोरंजन, समाचार, फिल्म और क्षेत्रीय चैनलों की आय का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है।
एफएमसीजी कंपनियां, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, ऑटोमोबाइल कंपनियां, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन ब्रांड, ज्वेलरी रिटेलर, वित्तीय सेवा कंपनियां और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस दौरान बड़े स्तर पर विज्ञापन अभियान चलाते हैं क्योंकि त्योहारों में उपभोक्ताओं की खरीदारी बढ़ जाती है।
इसी समय टीवी चैनल भी अपने सबसे बड़े शो लॉन्च करते हैं। आने वाले हफ्तों में कई जनरल एंटरटेनमेंट चैनल नए फिक्शन शो शुरू करने वाले हैं, जबकि हिंदी और क्षेत्रीय बाजारों में बड़े रियलिटी शो और विशेष त्योहारी कार्यक्रम भी लॉन्च किए जाएंगे।
आमतौर पर BARC की साप्ताहिक रेटिंग्स से चैनलों को तुरंत पता चल जाता है कि नया शो कैसा प्रदर्शन कर रहा है। इसी आधार पर विज्ञापन दरें तय होती हैं और कंपनियां अपने विज्ञापन बजट में बदलाव करती हैं। लेकिन मौजूदा रेटिंग्स फ्रीज के कारण यह पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो गई है।
एक बड़ी एफएमसीजी कंपनी के मार्केटिंग अधिकारी का कहना है कि हर नए शो की पहचान उसकी रेटिंग से बनती है। स्वतंत्र ऑडियंस डेटा के बिना यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि शो कितने लोगों तक पहुंच रहा है और उस पर ज्यादा विज्ञापन दर क्यों ली जाए।
विज्ञापनदाता चाहते हैं साफ और मापने योग्य नतीजे
यह रेटिंग्स फ्रीज ऐसे समय आया है जब कंपनियां अपने मार्केटिंग खर्च का स्पष्ट परिणाम देखना चाहती हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म विज्ञापनदाताओं को तुरंत जानकारी देते हैं कि उनके विज्ञापन कितने लोगों ने देखे, कितने क्लिक मिले, कितने लोगों ने खरीदारी की और विज्ञापन पर खर्च का कितना फायदा हुआ।
मीडिया एजेंसियों का मानना है कि अगर टीवी लंबे समय तक बिना रेटिंग्स के रहा तो डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़त और मजबूत हो सकती है।
एक वैश्विक मीडिया बाइंग एजेंसी के अधिकारी ने कहा कि मार्केटिंग बजट सीमित होता है। अगर एक माध्यम अपने प्रदर्शन का डेटा नहीं दे पा रहा है और दूसरा लगातार विस्तृत रिपोर्ट दे रहा है तो कंपनियां स्वाभाविक रूप से अपना अतिरिक्त बजट उसी माध्यम में लगाएंगी।
इंडस्ट्री का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली तो Meta और Google जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी, ऑनलाइन वीडियो और रिटेल मीडिया प्लेटफॉर्म को सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भी कई कंपनियां सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की बढ़ती लोकप्रियता के कारण डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च बढ़ा चुकी हैं।
ब्रॉडकास्टर्स की मोलभाव करने की ताकत होगी कमजोर
टीवी चैनलों के लिए रेटिंग्स सिर्फ साप्ताहिक रिपोर्ट कार्ड नहीं होती, बल्कि विज्ञापन दरें तय करने, स्पॉन्सरशिप, इन्वेंट्री की कीमत और लंबे समय की मीडिया प्लानिंग का आधार भी होती हैं।
नई रेटिंग्स नहीं मिलने से अब विज्ञापन दरें तय करने में पुराने आंकड़ों, चैनलों के अपने डेटा और अनुमान का सहारा लेना पड़ेगा।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर ने कहा कि टेलीविजन हमेशा स्वतंत्र रेटिंग्स के दम पर अपनी विश्वसनीयता साबित करता रहा है। जब यही पैमाना उपलब्ध नहीं होगा तो व्यावसायिक बातचीत पहले से ज्यादा कठिन हो जाएगी।
मीडिया एजेंसियों का कहना है कि फिलहाल पुराने रेटिंग्स डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन नए शो आने के बाद पुराने आंकड़े ज्यादा उपयोगी नहीं रहेंगे।
सबसे ज्यादा परेशानी नए शो को होगी, क्योंकि उनके पास दर्शकों की संख्या साबित करने के लिए कोई ताजा डेटा ही नहीं होगा। एक एजेंसी अधिकारी ने कहा कि नए शो के लिए रेटिंग्स सबसे ज्यादा जरूरी होती हैं, क्योंकि विज्ञापनदाता बड़ा बजट लगाने से पहले उसके प्रदर्शन का प्रमाण चाहते हैं।
मीडिया प्लानिंग भी होगी प्रभावित
कई बड़ी कंपनियां हर सप्ताह रेटिंग्स के आधार पर अपने विज्ञापन अलग-अलग चैनलों और कार्यक्रमों में शिफ्ट करती हैं। लेकिन नए डेटा के बिना ऐसा करना मुश्किल हो जाएगा।
मीडिया प्लानर्स का कहना है कि जब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, कई विज्ञापनदाता टीवी पर नए विज्ञापन अभियान शुरू करने में सावधानी बरत सकते हैं।
एक मीडिया निवेश विशेषज्ञ ने कहा कि अगर अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रही तो कई ब्रांड अपना अतिरिक्त और लचीला बजट डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खर्च करना शुरू कर सकते हैं, जहां विज्ञापन अभियान को लगातार बेहतर बनाया जा सकता है।
पूरे टीवी इकोसिस्टम पर पड़ेगा असर
इसका असर सिर्फ टीवी चैनलों तक सीमित नहीं रहेगा। नए शो बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस रेटिंग्स के आधार पर अपने कार्यक्रम की सफलता साबित करते हैं और अगला सीजन हासिल करते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां चैनलों की प्लेसमेंट तय करने में रेटिंग्स का इस्तेमाल करती हैं। विज्ञापन एजेंसियां अपने अभियान की सफलता मापती हैं और कंपनियां निवेश पर मिलने वाले रिटर्न का आकलन करती हैं।
इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो ऐसे समय में टीवी की प्रतिस्पर्धी स्थिति कमजोर हो सकती है, जब दर्शकों का एक बड़ा वर्ग पहले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है।
हालांकि भारत में लाइव इवेंट, मनोरंजन और क्षेत्रीय कंटेंट के मामले में टीवी की पहुंच अब भी सबसे ज्यादा है, लेकिन बेहतर टारगेटिंग और विस्तृत डेटा के कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट अधिकारी ने कहा कि टीवी इंडस्ट्री ने वर्षों तक भरोसेमंद रेटिंग्स के दम पर अपनी ताकत साबित की है। अगर देश के सबसे बड़े विज्ञापन सीजन में यही रेटिंग्स उपलब्ध नहीं होंगी तो प्रतिस्पर्धी माध्यमों को स्वाभाविक रूप से फायदा मिलेगा।
त्योहारी सीजन बनेगा पहली बड़ी परीक्षा
आने वाले कुछ हफ्तों में त्योहारी विज्ञापन अभियान तेज होने वाले हैं। ऐसे में टीवी चैनलों को उम्मीद है कि रेटिंग्स पर लगी रोक जल्द हट जाएगी। क्योंकि हर गुजरता सप्ताह विज्ञापन खरीद, मीडिया प्लानिंग और नए कार्यक्रमों की रणनीति को और अधिक अनिश्चित बना रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि टीवी रातोंरात अपना महत्व नहीं खोएगा, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर पूरे इंडस्ट्री के पास दर्शकों को मापने का साझा और भरोसेमंद पैमाना नहीं होगा तो त्योहारी सीजन के अतिरिक्त विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा सकता है।
यही वजह है कि इस समय टीवी इंडस्ट्री के लिए BARC रेटिंग्स की वापसी सिर्फ साप्ताहिक रैंकिंग का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े त्योहारी विज्ञापन बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने का भी अहम सवाल बन चुकी है।