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लोग हैरान हैं, कोरोना का कहर वहां ज्यादा है, जहां चुनाव नहीं हो रहे हैं: राजेश बादल

दिन प्रतिदिन आ रहे आंकड़े बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। सालभर बाद कोरोना ज्यादा दैत्याकार और विकराल आकार लेता जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भयावह दौर में बढ़ती सामाजिक चुनौतियां

दिन प्रतिदिन आ रहे आंकड़े बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। सालभर बाद कोरोना ज्यादा दैत्याकार और विकराल आकार लेता जा रहा है। प्रारंभिक महीने तो किसी वैज्ञानिक शोध और व्यवस्थित उपचार के बिना बीते। विश्व बैंक, चीन और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच जारी आरोप प्रत्यारोप ने समूचे संसार को एक तरह से दुविधा में डाल कर रखा। न चिकित्सा की कोई वैज्ञानिक पद्धति विकसित हो पाई और न दुनियाभर के डॉक्टर्स में कोई आम सहमति बन सकी। शुरुआत में इसे चीन की प्रयोगशाला का घातक हथियार माना गया। इसके बाद इसे संक्रामक माना गया तो कभी इसके उलट तथ्य प्रतिपादित किए गए। कभी कहा गया कि यह तेज गर्मी में दम तोड़ देगा, तो फिर बाद में बताया गया कि तीखी सर्दियों की मार कोरोना नहीं झेल पाएगा। हालांकि चार छह महीने के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब लगा कि हालात नियंत्रण में आ रहे हैं। जिंदगी की गाड़ी पटरी पर लौटने लगी है। लोग राहत की सांस भी नहीं ले पाए कि आक्रमण फिर तेज हो गया। पर यह भी एक किस्म का भ्रम ही था।

पिछले एक महीने में तो इस संक्रामक बीमारी का जिस तरह विस्तार हुआ है, उसने सारी मानव बिरादरी को हिला दिया है। रोज मिलने वाली जानकारियों पर तो एकबारगी भरोसा करने को जी नहीं करता। मानवता के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा दूसरा उदहारण होगा, जिसमें आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक ताने बाने को चरमराते देखा गया हो। कोई भी देश या समाज अपनी बदहाली, गरीबी, बेरोजगारी या व्यवस्था के टूटने पर दोबारा नए सिरे से अपनी जीवन रचना कर सकता है, लेकिन अगर सामाजिक मूल्य और सोच की शैली विकलांग हो जाए तो सदियों तक उसका असर रहता है। मौजूदा सिलसिले की यही कड़वी हकीकत है। खासकर भारत के सन्दर्भ में कहना अनुचित नहीं होगा कि बड़े से बड़े झंझावातों में अविचल रहने वाला हिन्दुस्तान अपने नागरिकों के बीच रिश्तों को अत्यंत क्रूर और विकट होते देख रहा है। क्या यह सच नहीं है कि कोरोना ने सामाजिक बिखराव की एक और कलंकित कथा लिख दी है।

एक बरस के दरम्यान हमने श्रमिकों और उनके मालिकों के बीच संबंधों को दरकते देखा। पति पत्नी, बेटा-बहू भाई बहन, चाचा-ताऊ, मामा,मौसा फूफा जैसे रिश्तों की चटकन देखी। भारतीय समाज में एक कहावत प्रचलित है कि किसी के सुख या मंगल काम में चाहे नहीं शामिल हों, मगर मातम के मौके पर हर हाल में शामिल होना चाहिए। कोरोना काल तो जैसे मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों में शामिल नहीं होने का सन्देश लेकर आया। लोग अपने दिल के बेहद निकट लोगों के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। आजादी के बाद सबसे बड़ा विस्थापन-पलायन हुआ। इस पलायन ने रोजी-रोटी का संकट तो बढ़ाया ही, आपसी संबंधों में भी जहर घोल दिया। क्या इस तथ्य से कोई इनकार कर सकता है कि कोरोना काल में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है। जो परिवार वर्षों बाद महानगरों से भागकर अपने गांवों में पहुंचे हैं, वे अपनी जड़ों में नई जमीन को तलाश रहे है और उस गांव, कस्बे के पास अपने बेटे को देने के लिए दो जून की रोटी भी नहीं है। भारतीय पाठ्य पुस्तकों में ज्ञान दिया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन हकीकत तो यह है कि हम अब असामाजिक प्राणी होते जा रहे हैं। 

यह निराशावाद नहीं है। इस कालखंड का भी अंत होगा। सालभर में अनेक दर्दनाक कथाओं के बीच मानवता की उजली कहानियां भी सामने आई हैं। संवेदनहीनता के बीच कुछ फरिश्ते भी प्रकट होते रहे हैं। पर यह तो सरकारों को ही तय करना होगा कि ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच अपनी आबादी की हिफाजत कैसे की जाए। यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आज गांवों, कस्बों, जिलों और महानगरों में तरह-तरह की विरोधाभासी खबरों के चलते निर्वाचित हुकूमतों की साख पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

आम आदमी की समझ से परे है कि नाइट कर्फ्यू का औचित्य क्या है? रात दस ग्यारह बजे के बाद तो वैसे ही यातायात सिकुड़ जाता है, फिर उस समय निकलने पर पाबंदी का क्या अर्थ है। रविवार को लॉकडाउन रखने का भी कारण स्पष्ट नहीं है। कोरोना इतना विवेकशील वायरस तो नहीं है जो दिन और समय का फर्क करते हुए अपना आकार बढ़ाए। यह सरकारी प्रपंच नहीं तो और क्या है कि खुद राजनेताओं और उनके दलीय कार्यक्रमों में पुछल्ले नेता कोरोना से बचाव के दिशा निर्देशों की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। पाबंदियों के निर्देश जितने लंबे नहीं होते, उससे अधिक सूची तो उनमें छूट देने वाले प्रशासनिक निर्देशों की होती है। जिन प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें तो लगता है किसी को कोरोना की चिंता नहीं है। न भीड़ को, न उम्मीदवारों को न सियासी पार्टियों को और न सितारा शिखर पुरुषों को। लोग हैरान हैं कि यह कैसा वायरस है, जो उन प्रदेशों में ज्यादा कहर ढा रहा है, जहां चुनाव नही हो रहे हैं। यह मात्र संयोग है कि गैर बीजेपी शासित राज्यों में लगातार स्थिति बिगड़ती जा रही है और जहां बीजेपी की सरकार है, वहां सब कुछ काबू में दिखाई देता है। इंदौर और भोपाल जैसे शहर जो अपनी जागरूकता के लिए विख्यात हैं, वहां कोरोना से बचने के लिए आम आदमी ही लापरवाह नजर आते हैं।

इसी तरह चिकित्सा तंत्र एक कसैली मंडी में बदलता दिखाई दे रहा है। इलाज के लिए कोई कीमतों का निर्धारण नहीं है। अस्पताल मनमानी फीस ले रहे हैं। गंभीर रूप से पीड़ितों को छोड़ दें तो अस्पतालों के पास गले की एंटीबायोटिक और विटामिन की गोलियां देने के सिवा कोई उपचार विधि स्पष्ट नहीं है। कुछ अस्पताल तो फाइव स्टार होटल से बाकायदा खाना ऑर्डर करते हैं और उसका चार गुना बिल में वसूलते हैं। क्या उन पर अंकुश लगाने का कोई फार्मूला सरकारों के पास है?

(साभार: लोकमत समाचार)


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