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‘अधिकांश हिंदी चैनल्स के संपादकों का भी यही सच है’

कुछ एंकर ऐसे भी मिले जो सचेत होना ही नहीं चाहते। वे जिस हिंग्लिश के अभ्यस्त हो गए हैं, उसे छोड़ना नहीं चाहते, खुद को बदलना नहीं चाहते

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार।।

ऐसा नहीं कि सभी हिंदी एंकर अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हुए हैं और अंग्रेजी की पृष्ठभूमि से आए हैं। अधिकांश हिंदी पृष्ठभूमि और माध्यम के हैं। संपादकों का भी यही सच है। गिने-चुने ही अंग्रेजी के हैं, लेकिन कई बड़े विचारवान अथवा गंभीर संपादक भी अपनी मूल भाषा, अपने चैनल की भाषा की गरिमा, शील और प्रतिष्ठा के प्रति अगंभीर, उदासीन दिखते हैं। वे भी अपने आप पर पड़े अंग्रेजी-ज्ञानी दिखने के व्यापक दबाव के असर को देख नहीं पाते शायद। यह दबाव हर हिंदी वाला महसूस करता है। जो सजग हैं, वे बच जाते हैं। जो अपने भाषा-व्यवहार में अचेत हैं, कहीं उसी हीनता बोध से ग्रस्त हैं, वे नहीं बच पाते।

कुछ एंकर ऐसे भी मिले जो सचेत होना ही नहीं चाहते। वे जिस हिंग्लिश के अभ्यस्त हो गए हैं, उसे छोड़ना नहीं चाहते, खुद को बदलना नहीं चाहते। उसकी जरूरत ही महसूस नहीं करते। कुछ ऐसे हैं, जो टोके जाने पर चिढ़ जाते हैं। टोके जाना किसी को अच्छा नहीं लगता। मुझे भी। पर यह हमारे ऊपर है कि टोके जाने पर हम उसके कारण को तटस्थ होकर देख सकते हैं, उसपर विचार कर सकते हैं और अपने को बेहतरी के लिए बदल सकते हैं या सिर्फ अपने अहंकार के आहत होने पर जिद करके वही काम करने लग जाते हैं।

एक सामूहिक समस्या यह भी है कि अधिकांश टीवी न्यूजरूम्स में, चैनलों की संपादकीय नीतियों में सही हिंदी लिखने, बोलने और भाषा के दूसरे गंभीर पक्षों पर कोई ध्यान और जोर नहीं दिखता। जहां संपादक ही घोर हिंग्लिश बोलते हैं, वहां ऐसी किसी भाषा नीति, नियम और संवेदनशीलता की उम्मीद करना नादानी ही होगी।

ऐसे अपने सभी मित्रों से विनम्रता के साथ सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं-आपकी, हमारी और आपके चैनलों की पहचान, उनके अस्तित्व का आधार हिंदी है। आप हिंदी पत्रकार और हिंदी चैनल के रूप में ही जाने जाते हैं। इसलिए आपकी हिंदी अच्छी होगी, सिर्फ हिंदी होगी तो आपकी निजी और आपके चैनल की ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आप बाजारू हिंग्लिश बोल-लिखकर अपनी ही पहचान को मटमैला और बाजारू कर रहे हैं।

जरा अंग्रेजी चैनलों के संपादकों, संवाददाताओं, एंकरों का भाषा-व्यवहार देखिए। क्या वह अपनी अंग्रेजी में हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं के शब्द, वाक्यांश, वाक्य, अभिव्यक्तियां मिलाते हैं, जैसे हम? क्या हम उनसे कमतर, कमजोर और हीन हैं?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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