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मिस्टर मीडिया: पत्रकार कोई ग़रीब की जोरू नहीं है नेता जी!
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार के सवाल पूछने पर जो व्यवहार किया, वह परदे पर लाखों लोगों ने देखा
राजेश बादल 6 years ago
अपने आपको समझते क्या हैं नेता जी? सवाल पसंद न आए तो कुछ भी बोलेंगे आप? संभव है कि आप और आपके जैसे दूसरी पार्टियों में मौजूद नेताओं ने मीडिया के एक वर्ग को चांदी के सिक्कों में तौला हो, लेकिन अभी भी देश के पत्रकारों का आत्मसम्मान बचा है नेताजी! आप उसे ग़रीब की जोरू समझेंगे तो घाटे में रहेंगे। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार के सवाल पूछने पर जो व्यवहार किया, वह परदे पर लाखों लोगों ने देखा। उस पत्रकार को उन्होंने क्या-क्या नहीं कहा? सार्वजनिक रूप से अपमान की हद पार कर गए। क्या समाजवादी पार्टी के भीतर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से निपटने का यही तरीक़ा बचा है।
जब पार्टी का मुखिया इस तरह की दादागीरी दिखाए तो पार्टी के दूसरे छुटभैये,पत्रकारों के साथ क्या व्यवहार करेंगे-आप कल्पना कर सकते हैं। एक और कद्दावर नेता आज़म ख़ां तीन दिन पहले मध्यप्रदेश में थे। समाजवादी नेता मुनव्वर सलीम के अंतिम संस्कार में शिरकत करने गए थे। पत्रकारों ने उनसे जयाप्रदा वाले बयान को लेकर तीख़े सवाल कर लिए। मूर्खतापूर्ण उत्तर दिया, ’आपके वालिद के मातम में आया था।‘ एक सप्ताह में दो समाजवादियों के बयान। दोनों ही मीडिया के ख़िलाफ़। दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों की हरकतों के बारे में इसी स्तंभ में पहले लिखा जा चुका है। अब प्रश्न है कि क्या इस देश के राजनेताओं के दिमाग़ की सड़ांध निकालने का कोई उपाय शेष है?
एक तो सार्वजनिक मंचों पर आप लोग घटिया और शर्मनाक भाषा बोलते हैं। फिर यह भी चाहते हैं कि मीडिया उसका प्रोपेगंडा करे। हिमाचल में एक नेता अपनी सभा में माइक पर खुल्लमखुल्ला माँ की गाली देता है। उत्तर प्रदेश में कोई मतदाताओं को सीधे-सीधे धमकी देता है। मध्यप्रदेश में लालच देता है। गुजरात में पत्रकारों को सड़कों पर आना पड़ा। तमिलनाडु में भी ऐसा ही हुआ। छत्तीसगढ़ में बीजेपी के दफ्तर में पत्रकारों को बुलाकर बदसलूकी होती है। कहीं मैनेजमेंट से शिकायत करके नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।
क्या इस देश के मीडिया को आपने अपना ग़ुलाम समझ रखा है? चैनलों और अख़बारों के मालिकों को आप खरीद सकते हैं, क्योंकि वे उद्योगपति हैं। उन्होंने पूँजीनिवेश धर्मशाला चलाने के लिए नहीं किया है। मगर आम पत्रकार को लेकर ग़लतफ़हमी मत पालिए। इमरजेंसी के दरम्यान एक हेकड़ीबाज सूचना प्रसारण मंत्री होते थे। डायलॉग बोलते थे, ‘अखबार मालिकों को जेब में रखता हूं।’ लेकिन, कुछ समय बाद ही खोज-खोज कर गली-गली पत्रकारों से अपने व्यवहार के लिए माफी मांगा करते थे। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनके चेहरे पर अतीत की करतूत-कालिख़ इतनी लग चुकी थी कि कभी साफ़ नहीं हुई। पत्रकारों को आप भी मजबूर न करिए। जिस दिन पिटारे से आपके काले कारनामों का कीचड़ निकलेगा तो मरते दम तक लगा रहेगा। यह बात गांठ बांध लीजिए मिस्टर नेताजी!
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