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मिस्टर मीडिया: बेशर्मी के साथ हो रही है अखबार के इस गरिमावान अंग की चरित्र हत्या
सितंबर में हिंदी पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम होते हैं, लेकिन यह माह निकलने के बाद जैसे हमारा हिंदी प्रेम गहरी नींद में चला जाता है
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
सितंबर का महीना आमतौर पर हिंदी के लिए समर्पित होता है। इस दौरान हिंदी पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम होते हैं। हिंदी माह निकलने के बाद जैसे हमारा हिंदी प्रेम गहरी नींद में चला जाता है। हिंदी के प्रति एक किस्म की उदासीनता और हीनता का भाव हमारे सोच-विचार की जड़ों को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है।
बीते तीन-चार दशकों में हिंदी समाचार पत्रों के पन्नों पर शीर्षक से लेकर संपादकीय टिप्पणी और लेखों की गुणवत्ता में भी गिरावट आई है। इस गिरावट का परिणाम यह है कि हमारी नई पीढ़ियां अखबार-संस्कृति से कटती जा रही हैं। इसका दूरगामी नुकसान किसको होने जा रहा है? जाहिर है पत्रकारिता को ही इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा। यानी हम उसी पेड़ को काट रहे हैं, जिस डाल पर बैठे हुए हैं।
अखबार संस्कृति में परंपरा यह है कि पढ़ने वाला सबसे पहले संपादकीय पन्ना खोले और उसे पूरा पढ़ जाए। यह उसकी मानसिक भूख़ शांत करता है। इसके बाद ही प्रथम या कोई अन्य पृष्ठ पर जाकर सूचना संसार में झांके। आज हम देखते हैं कि यह पेज चूं चूं का मुरब्बा बन गया है। उस पर कार्टून भी मिल जाता है तो कहीं आध्यात्मिक जीवन दर्शन समझाने वाले ज्ञानी पुरुष ज्ञान बघारते हैं।
किसी अखबार में संपादकीय पन्ना किसी छुटभैए राजनेता के फोटो के साथ पहला आलेख प्रकाशित कर जगह बरबाद करता है। किसी संपादकीय पन्ने पर तस्वीरों की नुमाइश होती है तो किसी एक पृष्ठ पर पांच से छह आलेखों की बेकाबू भीड़ नजर आती है।
एक पाठक के विचारों को इसी पन्ने पर जगह मिलती थी-संपादक के नाम पत्र स्तंभ में। इससे आम अवाम की सोच की दिशा भी पता चलती थी। यह एक अखबार की अपनी खुराक भी थी। अब तो यह स्तंभ शायद ही कहीं दिखाई देता है। तकलीफ तब बढ़ जाती है, जब इस बेहद जिम्मेदार पेज पर कहानी, कविता या धार्मिक ग्रंथों के किस्से पढ़ने को मिलते हैं। इस सामग्री के लिए साप्ताहिक परिशिष्ट होते हैं। उनको वहीं देना जरूरी है। लब्बोलुआब यह कि एक समाचारपत्र के इस गरिमावान अंग की चरित्र हत्या बेशर्मी के साथ हो रही है। किसी को इसका अफसोस तक नहीं है।
इसके उलट भारतीय भाषाओं के चंद रिसाले और अंग्रेजी के समाचारपत्र संपादकीय पृष्ठ की गुणवत्ता पर अभी भी गंभीर ध्यान दे रहे हैं। ऐसा क्यों है? वेतन से लेकर क्वालिटी तक हिंदी के साथ यह अत्याचार हम हिंदी वाले ही कर रहे हैं।
सुनाएं गम की किसे कहानी, हमें तो अपने सता रहे हैं/
न कोई रशियन, न कोई जर्मन,न कोई इंग्लिश, न कोई टर्की/
मिटाने वाले हैं अपने हिंदी, जो आज हमको मिटा रहे हैं/
जिस तरह एक अखबार को उसके मत्थे से पहचानते हैं, उसी तरह संपादकीय पन्ने से उसकी मानसिक सेहत का पता चलता है। क्या हम इस स्थान की गरिमा और प्रतिष्ठा वापस लाएंगे मिस्टर मीडिया?
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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