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विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ कतई मुंहजोरी नहीं हो सकता: पूरन डावर

भारत में पिछली कुछ जेनरेशन एक विचित्र स्थिति में हैं। संस्कृति की दृष्टि से हो या भाषा की दृष्टि से, न अंग्रेजी के मास्टर बन सके और न हिंदी समझ सके।

पूरन डावर 4 years ago

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

भारत में पिछली कुछ जेनरेशन एक विचित्र स्थिति में हैं। संस्कृति की दृष्टि से हो या भाषा की दृष्टि से, न अंग्रेजी के मास्टर बन सके और न हिंदी समझ सके। न भारतीय संस्कृति अपना सके और न पाश्चात्य व्यवस्था को।

हिंदू संस्कृति में माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है। भगवान उन्हें जो कुछ देता है, माता-पिता के माध्यम से देता है। माता-पिता रात-दिन मेहनत कर, हर उधेड़बुन कर, यश-अपयश प्राप्त कर जो कुछ एकत्र करते हैं, सब कुछ संतान के पालन में और बचाया या जोड़ा,  संतान के लिए छोड़ या सौंप देते हैं। विडम्बना यह है कि आज की संतान उसे अपना अधिकार मानकर अपने आपको माता-पिता का पालक समझने लगती है, इस बात को भूलकर कि सब उन्हीं का तो दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर या स्वतंत्र विचारों को रखने के अधिकार का कुतर्क, माता-पिता से उसी के अनुसार व्यवहार और संबंधों को निभाने का प्रयास ये जेनरेशन कर रही है।

यानी प्राप्ति के लिए हिंदू संस्कृति और अधिकारों के लिए पाश्चात्य या तथाकथित वैचारिक स्वतंत्रता के कुतर्क। विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ कतई मुंहजोरी नहीं हो सकता। मेरा स्पष्ट मत है कि जिसने हिंदू धर्म और संस्कृति में जन्म लिया है, उसे उसी संस्कृति का चुनाव और संस्कृति के अनुसार व्यवहार करना  चाहिए। इसमें लाभ अधिक हैं, लेकिन तथाकथित स्वतंत्र विचारों से थोड़ा समझौता और थोड़े से अनुशासन का पालन करना पड़ सकता है।

यदि आप माता-पिता की संपत्ति पर हक जताते हैं तो उनके पूरे सम्मान का ध्यान भी रखना होगा और कम से कम खाना और गुर्राना दोनों तो नहीं हो सकते। भारत में कमोबेश यही व्यवस्था भ्रष्टाचार में भी है। लेकिन संतान को पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि यदि उन्हें पाश्चात्य सभ्यता पसंद है तो उसे अंगीकार करें, जिसमें बच्चे की अच्छी परवरिश केवल बाल्यावस्था तक है या अधिकतम किशोरावस्था। हाईस्कूल में आते ही उसे अपनी स्कूल फीस भी स्वयं कमानी होती है और यदि माता-पिता से उधार लेता है तो जॉब शुरू करने पर वापस चुकाना होता है। पिता की फैक्टरी में यदि काम करता है तो अन्य कर्मचारियों की तरह अनुशासन अपनाना होता है एवं उसी योग्यतानुसार बराबर सैलरी मिलती है। दोनों व्यवस्थाएं अपनी जगह ठीक हैं।

इस व्यवस्था में हर जन्म लेने वाले को संघर्ष एवं स्वयं को स्थापित करने का मौका मिलता है और अपने जीवन को पूरी स्वतंत्रता से जीने का मौका। माता-पिता की उतनी सेवा और सम्मान, जितना बाल्यावस्था की सेवा को चुकाया जा सके।

माता-पिता की मृत्यु के बाद विरासत में भी सीमित मिलता है। बाकी बचा देश के कानून के अनुसार सरकार को जाता है।। लेकिन आज की जेनरेशन दोनों व्यवस्थाओं में अपने हित को चुनकर दोनों नावों पर पैर रख कर चलना चाहती है। यही पारिवारिक समस्याओं का मुख्य कारण है। हक भारतीय व्यवस्था और व्यवहार पाश्चात्य व्यवस्था: माता-पिता और बच्चों दोनों को ही युवावस्था आते ही बैठकर स्पष्ट विचार-विमर्श करना चाहिए और युवाओं को स्वेच्छानुसार सोच-समझकर पद्यति का चयन करना चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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