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मोदी की वापसी के बाद ये 'परीक्षण' तो इमरान खान के डर को ही सामने लाता है

नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की खबर से पाकिस्तान में बड़ी खलबली है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत से दोस्ती के लिए पाकिस्तान की छटपटाहट...!!

क्या पाकिस्तान के पीएम इमरान खा़न को भी मोदी जी की हलफबरदारी (शपथ ग्रहण) के प्रोग्राम में आमंत्रित किया जाएगा? पाकिस्तान के मीडिया में इस बात की काफी चर्चा है कि मोदी जी अगर इमरान को आमंत्रित करेंगे तो क्या उन्हें नई दिल्ली जाना चाहिए या नहीं? 2014 में पाकिस्तान की सियासी जमात पीएमएलएन यानी मुस्लिम लीग नून के सद्र और पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ मोदी साहब के शपथ ग्रहण समारोह में मेहमान के तौर पर आमंत्रित थे। मोदी जी के दोबारा पीएम बनने की खबर से पाकिस्तान में बड़ी खलबली है। इमरान ने मोदी जी को जीत की मुबारकबाद तो दी, मगर साथ ही भारत को डराने के लिए 1500 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइल शाहीन का परीक्षण भी कर दिया। अलबत्ता, भारत इस मिसाइल परीक्षण से क्यों डरेगा, बल्कि ये मिसाइल परीक्षण तो पाकिस्तान के डर को ही दुनिया के सामने लाता है।

साल 2014 से 2019 के बीच भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेइंतहा कड़वाहट घुल चुकी है। पुलवामा की घटना और फिर बालाकोट पर हमला करके भारत ने जिस तरह पाकिस्तान से इंतकाम लिया, उससे पाकिस्तान के साथ हर तरह का राब्ता खत्म सा हो गया। दोनों देशों के बीच क्रिकेट भी खत्म हो चुका है। हालात ये हैं कि IPL तक में पाकिस्तान का कोई खिलाड़ी नहीं खेलता। भारत ने उससे मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा भी छीन लिया। ये अलग बात है कि पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ये कह चुके हैं कि मोदी अगर पीएम बनेंगे तो दोनों देशों के बीच कश्मीर सहित कई मुद्दों पर बातचीत हो सकती है।

पाकिस्तान इस वक्त आर्थिक तौर पर पूरी तरह तबाह हो चुका है। उस पर 36 अरब ड़ॉलर का विदेशी कर्ज है। पाकिस्तान का एक्सपोर्ट 20 फीसदी है और वो 40 फीसदी ज़रूरत की चीजें आयात करता है। अभी हाल ही में उसने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पैर पड़कर 6 अरब डॉलर का कर्ज लिया है, मगर दिक्कत ये है कि कर्ज के बदले आईएमएफ ने पाकिस्तान पर इतनी कड़ी शर्तें थोप दी हैं कि अगले 20 साल तक भी पाकिस्तान ही माली हालत सुधरने वाली नहीं है।

ये बात गौर करने की है कि आईएमएफ का मुख्य डोनर अमेरिका है। लिहाजा अमेरिका कभी ये नहीं चाहता कि पाकिस्तान इस संस्था से कर्ज लेकर चीन का कर्ज अदा करे, इसलिए उसने कड़ी शर्तें लगाने के साथ साथ पाकिस्तान की वित्तीय संस्थाओं मिसाल के तौर पर स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान में अपने वफादार आदमी को बैठा दिया है, जिसकी जवाबदेही आईएमएफ को होगी। इसी तरह इमरान के वित्तीय सलाहकार के तौर पर डॉक्टर हफीज़ शेख को तैनात किया गया है। हालांकि, ये दोनों हैं तो पाकिस्तानी मूल के, लेकिन लंबे वक्त तक आईएमएफ में काम कर चुके हैं।

अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान हर दफा उससे कर्ज हासिल कर इस रकम से आतंकी तंजीमों की ही मदद करता रहा है। असल में पाकिस्तान की फौज भी इस वक्त बौखलाई हुई है, मगर लाचार है, क्योंकि भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान की वैश्विक स्तर पर घेराबंदी और अमेरिका की सख्ती से इमरान सरकार बहुत परेशान है। पाकिस्तानी फौज की परेशानी ये है कि उसे हर साल अमेरिका से 3-4 अरब डॉलर मिल जाते थे, जिसका पाकिस्तानी फौज अपनी ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल करती थी, मगर ये मदद अब बन्द हो चुकी है।

अब ईरान, अफगानिस्तान से लेकर भारत में दहशतगर्द तंजीमों को खुली मदद करने के चक्कर में पाकिस्तान दिवालिया होने के कगार पर है। भारत द्वारा पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा भी छीन लिया गया, जिससे पाकिस्तान में महंगाई के कारण हाहाकार मच गया। पाकिस्तान में इमरान की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत तेजी से नीचे गिरा है। नवाज शरीफ की हुकूमत को बेदखल कर जब PTI  के नेता इमरान खान ने सत्ता संभाली थी, तब उनकी लोकप्रियता 90 फीसदी थी, जो अब घटकर 57 प्रतिशत रह चुकी है।

हालांकि नवाज शरीफ अभी भ्रष्टाचार के मामले में लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद हैं। बलूचिस्तान, गिलगिट, बाल्टिस्तान में तो सरकार विरोधी आंदोलन चल ही रहे हैं। दूसरी ओर पश्तून नेता मंज़ूर पश्तीन ने भी पाकिस्तान आर्मी को लेटा देने की धमकी दी है। कुल मिलाकर इमरान इस वक्त अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी 9 माह की सरकार लोगों की नज़रों में गिर चुकी है। कहते तो ये हैं कि आर्मी और इमरान अभी एक हैं, लेकिन ये मोहब्बत कब तक चलेगी? पाकिस्तान में चीन का दखल भी लगातार बढ़ रहा है, इससे स्थिति और भयावह होती जा रही है। अपनी देश जनता को नए पाकिस्तान का ख्वाब दिखाकर सत्ता हासिल करने वाले इमरान इस वक्त बहुत बेज़ार हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)


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