होम / विचार मंच / 'जेटली जी ने वायदा पूरा करने का समय ही नहीं दिया'
'जेटली जी ने वायदा पूरा करने का समय ही नहीं दिया'
मीडिया का अरुण जी बहुत संम्मान करते थे लेकिन अपने अंतिम इंटरव्यू में उन्होंने राफेल पर कुछ मीडिया समूहों की पत्रकारिता पर बहुत दुख जताते हुए कहा था कि आपके जीवन में विश्वस्नीयता आपकी सबसे बड़ी चीज
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
अशोक श्रीवास्तव, वरिष्ठ एंकर, डीडी न्यूज
एक वायदा सुषमा स्वराज जी ने मुझसे किया था, जिसे उन्होंने पूरा नहीं किया और एक वायदा मैंने अरुण जेटली जी से किया था जिसे मैं पूरा नहीं कर पाया। क्योंकि ये दोनों ही प्रखर राजनेता असमय ही हम सबको छोड़ कर चले गए।
सुषमा जी से 2016 में मुझसे वायदा किया था कि जब भी वो टेलीविज़न चैनलों को इंटरव्यू देना शुरु करेंगी तो सबसे पहला इंटरव्यू मुझे ही देंगी। ये बात तब की है जब वो भारत की विदेश मंत्री थीं। विदेश मंत्री बनने के बाद से ही मैं डीडी न्यूज़ के लिए उनका इंटरव्यू करना चाहता था। भारत में ही नहीं एक बार न्यूयॉर्क में भी संयुक्त राष्ट्र की बैठक में जब वो हिस्सा लेने गईं थीं तब भी मैंने उनसे ऐसा अनुरोध किया था। 2016 में एक बार उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि वो किसी न्यूज़ चैनल को इंटरव्यू नहीं दे रहीं हैं पर साथ ही वायदा किया कि जब ये सिलसिला शुरू करेंगी, सबसे पहले मुझे बुलाएंगी।
विधि का विधान देखिए कि सुषमा जी का इंटरव्यू तो मैं नहीं कर पाया पर अरुण जेटली जी का अंतिम टीवी इंटरव्यू मैंने ही किया।
लोकसभा चुनावों के दौरान 23 मार्च को उनका समय मिला। शाम को जब मैं अपनी कैमरा टीम के साथ अरुण जी के घर पहुंचा तब मैंने अपनी पुस्तक "नरेन्द्र मोदी सेंसर्ड" की एक प्रति साथ रख ली और सोचा कि मौका मिला तो उनको पुस्तक भेंट कर दूंगा। हम लोग अरुण जी के स्टडी रूम में उनका इंतज़ार कर रहे थे। मैंने अपनी पुस्तक टेबुल पर रख दी। जैसे ही अरुण जी आये हम सब लोग एक-एक करके उनका अभिवादन करने लगे। हम लोग अरुण जी को देख रहे थे पर उनकी नज़र मेरी पुस्तक पर थी जो उनकी पहुंच से थोड़ी दूर पर थी। अचानक जेटली जी आगे बढ़े और पूरा हाथ बढ़ा कर पुस्तक उठा ली और बोले -ये क्या है?
मैंने कहा कि सर यह मेरी पुस्तक है अभी कुछ दिन पहले ही इसका लोकार्पण हुआ है। जेटली जी पुस्तक को पूरी दिलचस्पी के साथ उलट-पलट कर देखने लगे तो मैं उन्हें पुस्तक की विषय-वस्तु के बारे में बताने लगा। फिर उन्होंने पुस्तक हाथ में ली और बोले तस्वीर खींचों। मैं सकपका गया। फटाफट उनके साथ खड़ा हो गया और अपने प्रोड्यूसर तुमुल को कहा कि जल्दी से फोटो खींच लो। फोटो सेशन खत्म हुआ तो बोले -"मैं इसको पढूंगा ज़रूर, लेकिन हिन्दी में किताबें पढ़ने का अभ्यास छूट गया है। तुम इसको इंग्लिश में भी प्रकाशित करो। मैंने उनसे वायदा किया कि जल्द ही मैं "नरेन्द्र मोदी सेंसर्ड" का इंग्लिश अनुवाद प्रकाशित करूँगा। मैंने मन ही मन सोचा कि अंग्रेजी संस्करण का लोकार्पण अरुण जेटली जी के हाथों से ही कराऊंगा। लेकिन इससे पहले कि मैं पुस्तक का अनुवाद करवाता जेटली जी दुनिया को अलविदा कह गए।
जितने साल से मैं पत्रकारिता कर रहा हूँ, जेटली जी से मेरा परिचय लगभग उतना ही पुराना है। क्योंकि मैंने बीजेपी बीट की रिपोर्टिंग के साथ अपने करियर की शुरुआत की इसलिए जेटली जी से परिचय तो होना ही था। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस और औपचारिक पीसी के बाद पत्रकारों के साथ अनौपचारिक पीसी में बहुत कुछ जानने को मिलता था, सीखने को मिलता था। हालांकि मेरी उनसे बहुत निकटता कभी नहीं रही। क्योंकि वो बड़े-बड़े और खासकर अंग्रेज़ी के पत्रकारों से घिरे रहते थे तो मैं दूर से ही उन्हें सुनता था दूर से ही उनसे सवाल करता था।
पर वो मेरे जैसे युवा और नए पत्रकारों को भी पूरा सम्मान दिया करते थे। मुझे लगता था कि अरुण जी मुझे पहचानते नहीं होंगे लेकिन एक दिन अचानक उन्होंने जब मुझे नाम से पुकारा और मेरी एक रिपोर्ट पर चर्चा करने लगे तब मुझे अहसास हुआ कि वो बीजेपी कवर करने वाले सभी पत्रकारों को पहचानते थे और उनकी रिपोर्ट्स पढ़ते थे।
हालांकि पत्रकारों का, मीडिया का अरुण जी बहुत संम्मान करते थे लेकिन अपने अंतिम इंटरव्यू में उन्होंने राफेल पर कुछ मीडिया समूहों की पत्रकारिता पर बहुत दुख जताते हुए कहा था कि आपके जीवन में विश्वस्नीयता आपकी सबसे बड़ी चीज होती है, जब आप इसे गंवा देते हैं तो कुछ नहीं बचता।"
2014 के लोकसभा चुनावों के बाद जब अरुण जेटली जी को सूचना प्रसारण मंत्रालय का दायित्व दिया गया उसके बाद कई बार मेरी उनसे निजी मुलाकात हुई और कई बार उनका इंटरव्यू करने का मौका मिला। ऐसा ही एक अवसर 2017 में बजट के बाद आया। जब मैंने और नीलम शर्मा दोनों ने मिल कर अरुण जी का इंटरव्यू लिया था। दुर्भाग्य देखिए पिछले शनिवार नीलम हम सबको छोड़ कर चली गईं और इस शनिवार अरुण जी !
टैग्स अरुण जेटली श्रद्धांजलि अशोक श्रीवास्तव