जब कोई ऐप बिना केबल कनेक्शन या DTH डिश के आपके स्मार्ट टीवी पर Live TV दिखा रहा है, तो क्या उसे भी वही नियम मानने चाहिए जो केबल या DTH कंपनियों पर लागू हैं?
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Vikas Saxena
देश में टेलीविजन देखने का तरीका बदल रहा है और बदलाव इतनी तेजी से है कि नियामक संस्थाएं भी पीछे छूट रही हैं। एक ओर करोड़ों भारतीय अपने Smart TV पर Samsung TV Plus और LG Channels जैसे ऐप्स से मुफ्त में टीवी चैनल देख रहे हैं, दूसरी ओर केबल ऑपरेटर और DTH कंपनियां चिल्ला रही हैं कि यह "रेगुलेटरी वैक्यूम" में चल रहा बिजनेस है। इसी टकराव के बीच 'टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया' यानी कि ट्राई ने अप्रैल 2026 में एक ऐसा कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जो भारतीय मीडिया इंडस्ट्री की दिशा तय कर सकता है।
सवाल सीधा है, जब कोई ऐप बिना केबल कनेक्शन या DTH डिश के आपके स्मार्ट टीवी पर Live TV दिखा रहा है, तो क्या उसे भी वही नियम मानने चाहिए जो केबल या DTH कंपनियों पर लागू हैं?
FAST क्या है और यह क्यों मायने रखता है?
FAST यानी Free Ad-Supported Streaming Television, यह वह मॉडल है जिसमें दर्शक बिना कोई सब्सक्रिप्शन दिए, सिर्फ इंटरनेट के जरिए, Live या Scheduled टीवी चैनल देख सकते हैं, ठीक वैसे जैसे पहले एंटिना से दूरदर्शन देखते थे, लेकिन अब Smart TV ऐप पर Samsung TV Plus, LG Channels, Amazon Fire TV, JioStar और ZEE5, ये सभी किसी न किसी रूप में FAST सेवाएं दे रहे हैं।
ट्राई ने इस पूरी श्रेणी को एक नया नाम दिया है, Application-based Linear Television Distribution (ALTD)। इसमें वे सभी ऐप्लिकेशन आती हैं जो स्मार्ट टीवी, मोबाइल या वेब ब्राउजर के जरिए Scheduled/Linear TV चैनल दिखाती हैं।
सूचना-प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने दिसंबर 2025 में ट्राई को रेफरेंस भेजा कि इन सेवाओं के लिए एक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाया जाए। ट्राई ने अप्रैल 2026 में कंसल्टेशन पेपर जारी किया। शुरुआत में 4 मई 2026 तक कमेंट मांगे गए थे, लेकिन इंडस्ट्री की मांग पर ट्राई ने यह डेडलाइन बढ़ाकर 11 मई 2026 कर दी (counter-comments 25 मई तक)।
आंकड़े बताते हैं, बदलाव असली है
इस पूरी बहस को समझने के लिए पहले यह देखना जरूरी है कि जमीन पर क्या हो रहा है।
Connected TV का विस्फोट: ट्राई के अपने कंसल्टेशन पेपर में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, भारत में Connected TV (CTV) दर्शकों की संख्या 2024 में 6.97 करोड़ (69.7 मिलियन) थी, जो 2025 में बढ़कर 12.92 करोड़ (129.2 मिलियन) हो गई, यानी एक साल में 85% की बढ़ोतरी। Nielsen की India Internet Report 2025 के अनुसार, साउथ इंडिया में 25% घरों में, वेस्ट इंडिया में 16%, नॉर्थ इंडिया में 10% और ईस्ट इंडिया में 5% घरों में Smart TV आ चुके हैं। 2026 में भारत में Smart TV और OTT मार्केट का आकार $26.39 अरब (करीब ₹2.2 लाख करोड़) पहुंचने का अनुमान है।
FAST का बढ़ता मार्केट: ट्राई के कंसल्टेशन पेपर में Muvi की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि भारत में FAST सेवाओं के यूजर्स 2023 में 11.64 करोड़ (116.4 मिलियन) थे, जो 2027 तक 14.86 करोड़ (148.6 मिलियन) होने का अनुमान है। FAST राजस्व 2023 में USD 63.69 मिलियन (करीब ₹530 करोड़) था, जो 2027 तक USD 104 मिलियन से अधिक पहुंच सकता है। बेंगलुरू की Amagi Media Labs, जो FAST चैनल डिलीवरी की रीढ़ है, जनवरी 2026 में BSE/NSE पर लिस्ट हुई, उसका FY2025 राजस्व ₹1,162 करोड़ रहा।
DTH की गिरती दुनिया: दूसरी तरफ, पारंपरिक Pay TV का संसार सिकुड़ता जा रहा है। ट्राई के आंकड़ों के अनुसार, चारों प्रमुख DTH कंपनियों के एक्टिव सब्सक्राइबर्स जून 2024 के 6.217 करोड़ से घटकर दिसंबर 2025 तक 5.099 करोड़ रह गए, 18 महीने में करीब 1.1 करोड़ की गिरावट। EY और AIDCF की रिपोर्ट के अनुसार, Pay TV सब्सक्राइबर्स 2018 के 15.1 करोड़ से घटकर 2024 में 11.1 करोड़ रह गए। इस गिरावट का असर सीधे राजस्व पर भी दिख रहा है, Dish TV की कुल आय Q1 FY26 में 27.7% घटकर ₹329.4 करोड़ रह गई।
विज्ञापन का रुख बदला: WPP की TYNY 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत में Linear TV का विज्ञापन राजस्व 1.5% घटकर ₹47,740 करोड़ रहा। जबकि उसी साल CTV विज्ञापन खर्च करीब 20% बढ़ा। 2026 में CTV एडवर्टाइजिंग करीब ₹8,000 करोड़ (लगभग $1 अरब) तक पहुंचने का अनुमान है, 2025 के करीब $760 मिलियन से 32% अधिक। भारत का कुल विज्ञापन मार्केट 2026 में ₹2,01,891 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है और इसमें CTV और Retail Media सबसे तेज बढ़ते सेगमेंट हैं।
केबल और DTH कंपनियों की दलील, 'एक ही काम, दो तराजू'
Dish TV ने ट्राई को सबमिशन में कहा कि FAST और ALTD प्लेटफॉर्म "रेगुलेटरी वैक्यूम" में काम कर रहे हैं। Tata Play ने तर्क दिया कि कंटेंट को या तो सभी टेक्नोलॉजी पर समान रूप से रेगुलेट किया जाए, या सबको डीरेगुलेट किया जाए, "रेगुलेटरी आर्बिट्रेज" बंद होनी चाहिए।
इनकी शिकायत का सार यही है: एक केबल या DTH ऑपरेटर को लाइसेंस लेना होता है, कंटेंट कोड मानने होते हैं, टैरिफ ऑर्डर का पालन करना होता है, Interconnect Regulations का हिसाब देना होता है, लेकिन एक Smart TV ऐप उन्हीं चैनलों को बिना किसी लाइसेंस के मुफ्त में दिखा देती है। Zee Entertainment ने भी कहा कि FAST और Linear TV फंक्शनली एक जैसे हैं, दर्शक दोनों को एक ही तरह देखते हैं, इसलिए एक ही नियम होने चाहिए।
OTT और टेक कंपनियों का पलटवार, 'इनोवेशन मत दबाओ'
JioStar, भारत की सबसे बड़ी टेलीविजन और स्ट्रीमिंग कंपनी, ने ट्राई को बताया कि FAST सेवाएं इंटरनेट के "ऐप्लिकेशन लेयर" पर काम करती हैं और इन्हें टेलीकॉम या ब्रॉडकास्टिंग कैरिज सेवा नहीं माना जाना चाहिए। Sony-owned Culver Max ने कहा कि दुनिया भर में FAST प्लेटफॉर्म को डिजिटल सॉफ्टवेयर सेवाओं की तरह ट्रीट किया जाता है।
Internet and Mobile Association of India (IAMAI) ने तो सीधे कहा कि ट्राई के पास FAST और ALTD को रेगुलेट करने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं है, क्योंकि ये ओपन इंटरनेट पर चलती हैं। IAMAI ने चेतावनी दी कि टेलीकॉम-स्टाइल ऑथराइजेशन फ्रेमवर्क से "रेगुलेटरी ओवररीच" होगी और इनोवेशन को नुकसान पहुंचेगा।
Tata Communications ने बीच का रास्ता सुझाया, ALTD को पुरानी केबल TV रेगुलेशन में मत घसीटो, लेकिन Piracy control, कंटेंट accountability, Consumer grievance और Service transparency पर हल्के नियम जरूर बनाओ।
ट्राई का असली सवाल, 'फंक्शन देखो, टेक्नोलॉजी नहीं'
ट्राई का कंसल्टेशन पेपर खुद मानता है कि FAST और ALTD सेवाएं "consumer के नजरिए से पारंपरिक टेलीविजन से अलग नहीं दिखतीं।" रेगुलेटर ने Italy के AGCOM का उदाहरण दिया जहां FAST चैनलों को अब रेगुलेटरी ऑथराइजेशन लेनी पड़ती है।
ट्राई के कंसल्टेशन पेपर में 15 से ज्यादा बड़े सवाल उठाए गए हैं:
होम स्क्रीन की असली जंग, कौन तय करेगा क्या दिखेगा?
इस पूरी बहस की जड़ में एक और बड़ा सवाल है जिसे अभी तक खुलकर नहीं कहा गया: Smart TV की Home Screen का कंट्रोल किसके पास होगा?
जब आप अपना Samsung, LG या Xiaomi Smart TV ऑन करते हैं, तो सबसे पहले जो दिखता है वह उस TV OEM का होम स्क्रीन है। Samsung TV Plus सीधे उस होम स्क्रीन पर पहला बटन है। LG Channels का भी यही हाल है। यानी जो कंपनी TV बनाती है, वही तय करती है कि दर्शक को पहले क्या दिखेगा और इसमें केबल ऑपरेटर या ब्रॉडकास्टर का कोई रोल नहीं।
यही वह "डेटा और एल्गोरिद्म" की जंग है जिसके बारे में इंडस्ट्री के जानकार बात कर रहे हैं। Samsung और LG के पास Automatic कंटेंट Recognition (ACR) तकनीक है जो यह जानती है कि आप कब क्या देख रहे हैं, यह डेटा विज्ञापन टार्गेटिंग के लिए बेहद कीमती है। पारंपरिक केबल या DTH ऑपरेटर के पास ऐसा डेटा नहीं है।
विज्ञापन मार्केट का समीकरण बदला
परंपरागत टीवी विज्ञापन के लिए यह दौर कठिन है। WPP के अनुसार 2025 में Linear TV Ad Revenue ₹47,740 करोड़ रहा, 1.5% की गिरावट के साथ। वहीं, CTV पर विज्ञापन खर्च 2025 में 20% और 2026 में 22% बढ़ने का अनुमान है।
ZEE5 ने August 2025 में LG Channels पर पांच FAST चैनल लॉन्च किए। Samsung TV Plus पर भारत में NDTV, Republic, Zee News, Times Now, ABP News जैसे बड़े नाम पहले से मौजूद हैं। इसका मतलब यह है कि ब्रॉडकास्टर खुद FAST इकोसिस्टम में उतर रहे हैं, भले ही वे ट्राई के सामने ALTD को रेगुलेट करने की मांग कर रहे हों।
यह द्वंद्व भारतीय मीडिया इंडस्ट्री की असली जटिलता है: एक तरफ ब्रॉडकास्टर FAST को Level Playing Field की दृष्टि से रेगुलेट करवाना चाहते हैं, दूसरी तरफ वे खुद FAST प्लेटफॉर्म पर अपने चैनल चला रहे हैं क्योंकि वहां दर्शक हैं।
क्या भारत में अमेरिका जैसा FAST बूम आएगा?
अमेरिका में Tubi, Pluto TV और Roku Channel जैसे FAST प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक केबल TV को बड़ी चुनौती दी है। (Peacock का Free FAST टियर 2023 में बंद हो चुका है, वह अब paid subscription सेवा है।) Pluto TV के करीब 8 करोड़ Monthly Active Users हैं। Pew Research (2025) के अनुसार, अमेरिका में अब सिर्फ 36% वयस्क केबल या सैटेलाइट TV के subscriber हैं, जबकि 55% Americans streaming-only हैं।
भारत में FAST का बूम जरूर आएगा, लेकिन कुछ फर्क के साथ। MiQ की Advanced TV Report India के अनुसार, भारत में 93% दर्शक mobile पर और 71% TV स्क्रीन पर वीडियो देखते हैं, यानी यह exclusive नहीं, बल्कि multi-screen मार्केट है। FAST का "lean-back" यानी सोफे पर बैठकर TV देखने का अनुभव Smart TV पर ज्यादा Natural है। जैसे-जैसे Smart TV घरों में पहुंचेगी, FAST का भारतीय मार्केट और बड़ा होगा।
APAC FAST मार्केट 2033 तक $38.77 अरब तक पहुंचने का अनुमान है, जो 15.2-16.5% CAGR पर बढ़ेगा।
उपभोक्ता के लिए क्या मायने रखता है?
अभी उपभोक्ता के नजरिए से FAST सेवाएं फायदेमंद हैं, मुफ्त, बिना सब्सक्रिप्शन, सिर्फ इंटरनेट चाहिए। लेकिन समस्याएं भी हैं:
कंटेंट जवाबदेही का अभाव: यदि किसी FAST ऐप पर गलत या भड़काऊ कंटेंट आता है, तो कोई स्पष्ट Grievance System नहीं है।
Pay Channels का मुफ्त वितरण: कुछ FAST प्लेटफॉर्म वे चैनल मुफ्त दे रहे हैं जिन्हें DTH पर सब्सक्रिप्शन लेकर देखना पड़ता, यह Market Distortion का मामला है।
डेटा की निजता: ACR जैसी तकनीक से OEM आपकी Viewing Habits Track कर रहे हैं और यह डेटा Ad-Targeting में इस्तेमाल हो रहा है।
रेगुलेशन इन्हीं समस्याओं का हल दे सकता है, बशर्ते वह इनोवेशन को दबाने वाला न हो।
रेगुलेशन बनाम इनोवेशन, कहां खींचें लकीर?
ट्राई के सामने सबसे कठिन काम यही है। यदि FAST ऐप्स को DTH जैसे भारी लाइसेंस नियमों में बांधा गया, तो Startup-friendly FAST Ecosystem का विकास रुक जाएगा। अगर बिल्कुल नहीं बांधा, तो पारंपरिक ऑपरेटर नाइंसाफी का शोर मचाते रहेंगे और Consumer Protection के मुद्दे अनसुलझे रहेंगे।
ABC Live के विश्लेषण के अनुसार, भारत को एक अलग ALTD फ्रेमवर्क चाहिए, न DTH का Copy-Paste, न IT Rules 2021 की सीमित छाया। इसमें Local Compliance Presence अनिवार्य हो, Grievance Officer हो, केवल MIB-Approved Channels FAST पर दिखें और Audience Measurement BARC में Integrate हो।
Tata Communications ने जो "Light-Touch, Technology-Neutral" नजरिया सुझाया है, वह सबसे व्यावहारिक लगता है: कंटेंट Accountability, Piracy Control और Consumer Protection पर नियम हों, लेकिन पुराने ढांचे का बोझ न लादा जाए।
टीवी का अगला मॉडल कैसा होगा?
सभी संकेत एक ही दिशा में इशारा कर रहे हैं, Hybrid TV का युग। वह युग जिसमें DTH Set-Top Box और Smart TV App एक ही स्क्रीन पर साथ चलेंगे। Tata Play और Airtel पहले से Hybrid STB ला चुके हैं जो DTH के साथ OTT Apps को Integrate करते हैं। IPTV तेजी से बढ़ रहा है, Airtel के पास दिसंबर 2025 तक 25.4 लाख Active IPTV Subscribers थे।
पारंपरिक केबल और DTH खत्म नहीं होंगे, लेकिन उनकी भूमिका बदलेगी। जहां Broadband कमजोर है, वहां Satellite TV काम आएगा। जहां Smart TV और Fast Internet है, वहां FAST और OTT राज करेंगे।
जो नहीं बदलेगा वह है, कंटेंट की भूख। और उस भूख को कौन किस तरह, किस कीमत पर, किस प्लेटफॉर्म पर पूरा करता है, यही तय करेगा कि अगले 5 साल में भारतीय टेलीविजन का नक्शा कैसा दिखेगा।
ट्राई का FAST/ALTD कंसल्टेशन पेपर सिर्फ एक रेगुलेटरी दस्तावेज नहीं है, यह उस बड़े युद्ध की अगली कड़ी है जिसमें केबल, DTH, OTT, Smart TV OEM और Big Tech कंपनियां भारत के 90 करोड़ TV दर्शकों (23 करोड़ TV households) की स्क्रीन पर कब्जे के लिए लड़ रही हैं। जो आंकड़े सामने हैं वे साफ बोलते हैं, Connected TV का उभार रोकना किसी के बस में नहीं। सवाल सिर्फ यह है कि इस नई दुनिया के नियम कौन और कैसे लिखेगा।
Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) अपने म्यूजिक कारोबार Zee Music में 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की संभावना तलाश रही है।
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Samachar4media Bureau
Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) अपने म्यूजिक कारोबार Zee Music में 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की संभावना तलाश रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रक्रिया के तहत कंपनी पहले Zee Music को अपने मौजूदा बिजनेस यूनिट ढांचे से अलग कर एक स्वतंत्र सब्सिडियरी (सहायक कंपनी) बनाएगी। इसके बाद हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
रिपोर्ट के अनुसार, Zee Entertainment ने Zee Music का करीब 6,000 करोड़ रुपये का वैल्यूएशन तय किया है और 49 फीसदी हिस्सेदारी के लिए संभावित निवेशकों से बातचीत की जा सकती है।
फिलहाल Zee Music, Zee Entertainment के भीतर एक बिजनेस यूनिट के रूप में काम कर रही है। कंपनी का मानना है कि इसे अलग सब्सिडियरी बनाने से निवेशकों के लिए इसमें निवेश करना आसान होगा और हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया भी बेहतर तरीके से पूरी की जा सकेगी।
बताया जा रहा है कि Zee Entertainment इस कदम के जरिए अपने म्यूजिक कारोबार की वास्तविक वैल्यू को सामने लाना चाहती है। कंपनी का उद्देश्य रणनीतिक निवेशकों को जोड़कर इस बिजनेस को आगे बढ़ाना और इसके विस्तार के लिए नई पूंजी जुटाना है।
प्रस्तावित योजना के तहत:
Zee Music को पहले बिजनेस यूनिट से बदलकर अलग सब्सिडियरी बनाया जाएगा।
इसके बाद कंपनी इसमें 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की संभावनाएं तलाशेगी।
Zee Music का अनुमानित वैल्यूएशन 6,000 करोड़ रुपये रखा गया है।
हालांकि, कंपनी की ओर से इस संभावित हिस्सेदारी बिक्री को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, Zee Entertainment फिलहाल इस रणनीतिक पुनर्गठन (Strategic Restructuring) पर काम कर रही है और संभावित निवेशकों के विकल्पों का आकलन कर रही है।
अगर यह सौदा पूरा होता है, तो इससे Zee Entertainment को अपने म्यूजिक कारोबार की वैल्यू अनलॉक करने, नई पूंजी जुटाने और बिजनेस को अलग पहचान के साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) ने GoodTimes चैनल के अधिग्रहण (Acquisition) को लेकर नया अपडेट जारी किया है।
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Vikas Saxena
न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) ने GoodTimes चैनल के अधिग्रहण (Acquisition) को लेकर नया अपडेट जारी किया है। कंपनी ने बताया कि यह सौदा अब तय समय पर पूरा नहीं हो पाएगा और इसके पूरा होने में करीब तीन महीने और लग सकते हैं।
NDTV ने बताया कि उसने 18 जून 2026 को Lifestyle & Media Broadcasting Limited से GoodTimes चैनल के बिजनेस अंडरटेकिंग (Business Undertaking) के अधिग्रहण की घोषणा की थी। हालांकि, फिलहाल इस सौदे से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी है।
कंपनी के मुताबिक, इन्हीं लंबित मुद्दों के चलते अब इस अधिग्रहण के पूरा होने में लगभग तीन महीने का अतिरिक्त समय लगने की उम्मीद है।
NDTV ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सौदा अभी भी विभिन्न वैधानिक (Statutory) और नियामकीय (Regulatory) मंजूरियों के साथ-साथ अन्य आवश्यक शर्तों के पूरा होने पर निर्भर करेगा।
कंपनी ने कहा कि सभी जरूरी मंजूरियां और औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही GoodTimes चैनल के अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
NDTV ने यह जानकारी सेबी (SEBI) के लिस्टिंग नियमों के तहत बीएसई (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को भेजी है।
GTC Network के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. रवींद्र नारायण ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक पत्र लिखा है
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Samachar4media Bureau
GTC Network के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर (Founder & MD) डॉ. रबिन्द्र नारायण ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक पत्र लिखकर 15 जनवरी 2025 को जारी TRAI की ग्राउंड-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स (Ground-based Broadcasters) संबंधी सिफारिशों को जल्द लागू करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि टीवी चैनलों के प्रसारण के लिए केवल सैटेलाइट पर निर्भर रहने की अनिवार्यता अब खत्म की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस सुधार प्रक्रिया की शुरुआत खुद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने की थी। TRAI अपनी सिफारिशें दे चुका है और अब सिर्फ इन्हें लागू किया जाना बाकी है।
MIB ने शुरू की थी यह प्रक्रिया
22 मई 2024 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने TRAI अधिनियम, 1997 की धारा 11(1)(a) के तहत ग्राउंड-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स के लिए नियामकीय ढांचे (Regulatory Framework) पर TRAI से सिफारिशें मांगी थीं।
इसके बाद TRAI ने पूरी परामर्श प्रक्रिया पूरी की। 18 अक्टूबर 2024 को परामर्श पत्र (Consultation Paper) जारी किया गया, 20 दिसंबर 2024 को ओपन हाउस चर्चा आयोजित हुई और 15 जनवरी 2025 को अंतिम सिफारिशें जारी कर दी गईं। हालांकि, सिफारिशें जारी हुए 18 महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक इन्हें अधिसूचित (Notification) नहीं किया गया है।
TRAI ने क्या सिफारिश की है?
2022 की अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग गाइडलाइंस के तहत टीवी चैनलों को अपना सिग्नल डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (DPOs) तक पहुंचाने के लिए सैटेलाइट का उपयोग करना अनिवार्य है। TRAI ने सिफारिश की है कि इस अनिवार्यता को समाप्त किया जाए और ब्रॉडकास्टर्स को किसी भी स्थलीय (Terrestrial) माध्यम जैसे केबल, फाइबर, सेल्युलर नेटवर्क, माइक्रोवेव, वाई-फाई, इंटरनेट और क्लाउड के जरिए चैनल पहुंचाने की अनुमति दी जाए। साथ ही किसी एक तकनीक को अनिवार्य न बनाया जाए और ब्रॉडकास्टर्स को अपनी व्यावसायिक जरूरत के अनुसार एक या कई तकनीकों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता दी जाए।
TRAI ने यह भी सिफारिश की है कि ग्राउंड-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स (GBBs) और सैटेलाइट-बेस्ड ब्रॉडकास्टर्स (SBBs) के लिए समान नियामकीय ढांचा हो। कोई भी ब्रॉडकास्टर केंद्र सरकार की अनुमति से सैटेलाइट और स्थलीय दोनों माध्यमों का इस्तेमाल कर सके या जरूरत के अनुसार एक से दूसरे माध्यम में बदलाव कर सके।
TRAI ने यह भी स्पष्ट किया है कि सेवा क्षेत्र (Service Area) राष्ट्रीय स्तर पर ही रहेगा। आयोग का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर तकनीक-तटस्थ (Technology Neutral) और ट्रांसमिशन माध्यम से स्वतंत्र व्यवस्था होने से निगरानी करना आसान रहेगा। यदि राज्यवार अनुमति दी गई तो सरकार के लिए निगरानी करना अधिक कठिन हो जाएगा। कंटेंट रेगुलेशन, प्रोग्राम कोड और विज्ञापन कोड से जुड़े सभी मौजूदा नियम पहले की तरह लागू रहेंगे।
जल्द लागू करने से देश को क्या फायदा होगा?
डॉ. रबिन्द्र नारायण ने अपने पत्र में कहा है कि इन सिफारिशों को जल्द लागू करने से कई बड़े फायदे होंगे।
सबसे पहला फायदा विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) की बचत का होगा। वर्तमान में हर टीवी चैनल को सैटेलाइट ट्रांसपोंडर क्षमता किराये पर लेनी पड़ती है, जिसका भुगतान अधिकांश मामलों में विदेशी कंपनियों को अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। यदि फाइबर, ब्रॉडबैंड और क्लाउड के जरिए चैनल डिलीवरी की अनुमति मिलती है तो यह खर्च भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा और भुगतान रुपये में किया जाएगा।
दूसरा बड़ा फायदा नए चैनलों की लागत कम होने का होगा। किसी नए चैनल के लिए सैटेलाइट अपलिंकिंग सबसे बड़ा निश्चित खर्च होता है। स्थलीय तकनीक अपनाने से यह लागत काफी कम हो जाएगी, जिससे क्षेत्रीय और छोटी भाषाओं के चैनलों के लिए बाजार में प्रवेश करना आसान होगा। इससे सरकार की Ease of Doing Business नीति को भी मजबूती मिलेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर में क्लाउड प्लेआउट और IP आधारित डिलीवरी अब ब्रॉडकास्टिंग का नया मानक बन चुके हैं। लेकिन मौजूदा व्यवस्था भारतीय ब्रॉडकास्टर्स को पुरानी तकनीक अपनाने के लिए मजबूर कर रही है।
डिजिटल इंडिया अभियान के तहत भारतनेट, 5G नेटवर्क और देश के डेटा सेंटर आज इस तरह के ट्रैफिक को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं। ऐसे में यह सुधार पूरी वैल्यू चेन को भारत के भीतर रखने में मदद करेगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस बदलाव से नियामकीय व्यवस्था कमजोर नहीं होगी। TRAI ने ऐसा ढांचा तैयार किया है जो 2022 की गाइडलाइंस जैसा ही है। केवल सैटेलाइट से जुड़ी अनिवार्यता हटाई गई है। मंत्रालय की निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था पहले की तरह बनी रहेगी।
मंत्रालय से क्या मांग की गई है?
डॉ. रबिन्द्र नारायण ने अनुरोध किया है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय 15 जनवरी 2025 को जारी TRAI की सिफारिशों को जल्द स्वीकार करे और अधिसूचित करे। साथ ही 2022 की अपलिंकिंग एवं डाउनलिंकिंग गाइडलाइंस में संशोधन कर सैटेलाइट आधारित डिलीवरी को अनिवार्य के बजाय वैकल्पिक (Optional) बनाया जाए। इससे मई 2024 में मंत्रालय द्वारा शुरू की गई सुधार प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
ओपन हाउस चर्चा में भी रखा था पक्ष
डॉ. रबिन्द्र नारायण ने बताया कि उन्होंने 20 दिसंबर 2024 को आयोजित TRAI की ओपन हाउस चर्चा में भी हिस्सा लिया था। उस दौरान उन्होंने कहा था कि ब्रॉडकास्टिंग राष्ट्रीय महत्व का विषय है, जिसका संबंध कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है। इसलिए इसका नियमन राष्ट्रीय स्तर पर किसी केंद्रीय संस्था के अधीन ही रहना चाहिए, न कि राज्यवार अलग-अलग व्यवस्था के तहत।
उन्होंने कहा कि TRAI की अंतिम सिफारिशों में इसी सोच को शामिल किया गया है। उनके अनुसार, मंत्रालय के सामने जो नियामकीय ढांचा मौजूद है, वह संतुलित, सुरक्षा के लिहाज से उपयुक्त और तुरंत लागू किए जाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
फेस्टिव सीजन से पहले टीवी ब्रॉडकास्टर्स ने सरकार से 10+2 विज्ञापन नियम (Ad Cap) में बदलाव की मांग फिर से तेज कर दी है।
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Samachar4media Bureau
फेस्टिव सीजन से पहले टीवी ब्रॉडकास्टर्स ने सरकार से 10+2 विज्ञापन नियम (Ad Cap) में बदलाव की मांग फिर से तेज कर दी है। इस मुद्दे पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने इंडस्ट्री से विस्तृत प्रस्ताव (Representation) मांगा है। मंत्रालय ने यह भी पूछा है कि मौजूदा व्यवस्था की जगह विज्ञापनों की कितनी सीमा व्यावहारिक और उपयुक्त हो सकती है।
जानकारी के मुताबिक, हाल ही में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF), न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) और कई बड़े टीवी नेटवर्क्स के वरिष्ठ अधिकारियों ने मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान 10+2 विज्ञापन नियम को लेकर इंडस्ट्री की चिंताओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
दिलचस्प बात यह है कि मंत्रालय न्यूज और गैर-न्यूज चैनलों के साथ अलग-अलग बैठकें कर रहा है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार भविष्य में अलग-अलग श्रेणी के चैनलों के लिए अलग विज्ञापन नियमों पर विचार कर सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी चिंता
यह बैठकें ऐसे समय में हुई हैं, जब हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने टीवी चैनलों पर प्रति घंटे अधिकतम 12 मिनट विज्ञापन सीमा लागू करने के नियम को बरकरार रखा है। इस फैसले के बाद ब्रॉडकास्टर्स की चिंता बढ़ गई है कि यदि नियमों को सख्ती से लागू किया गया तो उनकी कमाई पर असर पड़ सकता है।
सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय ने फिलहाल ब्रॉडकास्टर्स से कहा है कि उनकी बात सुनी जाएगी और इस मामले पर विचार पूरा होने तक तत्काल कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी।
बदल चुका है मीडिया का पूरा माहौल
टीवी इंडस्ट्री का कहना है कि 10+2 विज्ञापन नियम उस समय बनाए गए थे, जब टीवी विज्ञापन का सबसे बड़ा माध्यम था। लेकिन पिछले एक दशक में मीडिया इंडस्ट्री पूरी तरह बदल चुकी है।
अब डिजिटल प्लेटफॉर्म, ओटीटी और ग्लोबल टेक कंपनियों की वजह से दर्शकों की देखने की आदतें बदल गई हैं। विज्ञापनदाता भी तेजी से डिजिटल की ओर जा रहे हैं। ऐसे में पुराने नियम आज की परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रह गए हैं।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टिंग अधिकारी ने कहा कि सरकार को मौजूदा मीडिया माहौल को ध्यान में रखते हुए संतुलित फैसला लेना चाहिए, ताकि टीवी उद्योग की प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से कड़ी टक्कर
ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि आज उन्हें यूट्यूब, ओटीटी और अन्य वैश्विक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मुकाबला करना पड़ रहा है। इन प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापनों की कोई तय सीमा नहीं है, जबकि टीवी चैनलों पर सख्त नियम लागू हैं।
इंडस्ट्री का मानना है कि यदि टीवी चैनलों पर जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगाई गईं तो उनकी विज्ञापन आय और घटेगी, जबकि कंटेंट और स्पोर्ट्स राइट्स की लागत लगातार बढ़ रही है।
दर्शकों का भी रखना होगा ध्यान
इंडस्ट्री के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि कोई भी चैनल जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाकर अपने दर्शकों को खोना नहीं चाहता। अगर विज्ञापन बहुत बढ़ेंगे तो दर्शक खुद ही डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर चले जाएंगे। इसलिए बाजार खुद ही एक संतुलन बनाए रखता है।
क्या हो सकता है समाधान?
सूत्रों के मुताबिक, सरकार के सामने कई विकल्पों पर चर्चा हो रही है। इनमें न्यूज और मनोरंजन चैनलों के लिए अलग-अलग विज्ञापन सीमा तय करना, मौजूदा सीमा में बदलाव करना या फिर अधिक लचीला नियम लागू करना शामिल है।
मीडिया विशेषज्ञों का भी मानना है कि 10 साल पहले बने नियमों की आज के डिजिटल दौर में दोबारा समीक्षा की जानी चाहिए। उनका कहना है कि दर्शकों के हितों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन साथ ही टीवी उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इंडस्ट्री को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही ऐसा समाधान निकालेगी, जिससे दर्शकों के हित भी सुरक्षित रहें और टीवी ब्रॉडकास्टर्स को भी कारोबार चलाने के लिए पर्याप्त अवसर मिल सकें।
ब्रॉडकास्टर JioStar की शिकायत पर ओडिशा पुलिस ने कथित केबल पाइरेसी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है।
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ब्रॉडकास्टर JioStar की शिकायत पर ओडिशा पुलिस ने कथित केबल पाइरेसी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने मामला दर्ज कर छापेमारी की, जिसमें टीवी चैनलों के अवैध प्रसारण में इस्तेमाल होने वाले कई उपकरण जब्त किए गए। इस मामले में एक केबल ऑपरेटर को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
जानकारी के मुताबिक, 14 जुलाई को जाजपुर जिले के कोरेई पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 303(2) और कॉपीराइट एक्ट, 1957 की धाराओं 37, 51, 63 और 65 के तहत दर्ज किया गया है। JioStar ने आरोप लगाया कि एक स्थानीय केबल नेटवर्क उसकी अनुमति के बिना उसके टीवी चैनलों का प्रसारण कर रहा था।
शिकायत मिलने के बाद ओडिशा पुलिस ने कोरेई स्थित आरोपी केबल ऑपरेटर के ठिकाने पर छापा मारा। इस दौरान पुलिस ने 9 मॉड्यूलेटर, 20 डीटीएच सेट-टॉप बॉक्स, एक ऑप्टिकल नोड और एक मिक्सर जब्त किया। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इन उपकरणों का इस्तेमाल टीवी चैनलों के अवैध प्रसारण के लिए किया जा रहा था।
JioStar का कहना है कि आरोपी उपभोक्ताओं के लिए जारी किए गए डीटीएच सेट-टॉप बॉक्स के जरिए उसके चैनलों का सिग्नल लेकर उन्हें केबल नेटवर्क के माध्यम से व्यावसायिक रूप से दोबारा प्रसारित कर रहा था। कंपनी के अनुसार, ऐसे सेट-टॉप बॉक्स केवल घरेलू उपयोग के लिए होते हैं और उनका व्यावसायिक इस्तेमाल नियमों के खिलाफ है।
ब्रॉडकास्टर ने अपनी शिकायत के साथ इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी पुलिस को सौंपे हैं, जिनमें कथित तौर पर चैनलों के अवैध प्रसारण का रिकॉर्ड शामिल है। कंपनी का दावा है कि इन सबूतों से आरोपी की भूमिका स्पष्ट होती है।
JioStar के मुताबिक, पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाके में उसके चैनलों का अवैध प्रसारण पूरी तरह बंद हो गया है। कंपनी की ओर से की गई निगरानी में छापेमारी के बाद पाइरेसी का कोई नया मामला सामने नहीं आया।
यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब ब्रॉडकास्टर्स और कंटेंट कंपनियां केबल पाइरेसी पर सख्ती से रोक लगाने की मांग कर रही हैं। इंडस्ट्री का मानना है कि अवैध री-ट्रांसमिशन से न सिर्फ कॉपीराइट का उल्लंघन होता है, बल्कि अधिकृत डिस्ट्रीब्यूटर्स और सब्सक्रिप्शन से होने वाली आय पर भी असर पड़ता है, खासकर प्रीमियम मनोरंजन और स्पोर्ट्स चैनलों के मामले में।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और जांच के नतीजों के आधार पर आगे भी कार्रवाई की जा सकती है।
रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने अपने ग्राहकों के लिए नया JioTV Pro ऐड-ऑन प्लान लॉन्च किया है।
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रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने अपने ग्राहकों के लिए नया JioTV Pro ऐड-ऑन प्लान लॉन्च किया है। 55 रुपये की कीमत वाले इस प्लान के जरिए प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों तरह के यूजर्स 30 दिनों तक 1,000 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल अपने स्मार्टफोन पर देख सकेंगे।
कंपनी के मुताबिक, यह प्लान MyJio ऐप के जरिए उपलब्ध है। रिचार्ज करने के बाद यूजर्स को कई ऐसे प्रीमियम HD टीवी चैनल भी देखने को मिलेंगे, जो JioTV के मुफ्त वर्जन में उपलब्ध नहीं हैं।
इस प्लान में JioStar, Sony, Sun TV Network और Warner Bros. Discovery जैसे प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स के चैनल शामिल हैं। यूजर्स 16 से अधिक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में कंटेंट का आनंद ले सकेंगे।
हालांकि, इस प्लान में एक बड़ी सीमा भी है। इसके तहत JioStar और Sony के प्रीमियम लाइव स्पोर्ट्स चैनलों का एक्सेस नहीं मिलेगा। यानी क्रिकेट या अन्य बड़े खेल आयोजनों की लाइव स्ट्रीमिंग देखने के लिए ग्राहकों को अलग सब्सक्रिप्शन या महंगे प्लान लेने होंगे।
जियो ने इस प्लान के साथ 10MB मोबाइल डेटा भी दिया है। हालांकि, यह डेटा नियमित इंटरनेट इस्तेमाल के लिए काफी नहीं है, लेकिन मुख्य डेटा पैक खत्म होने पर आपात स्थिति में काम आ सकता है।
कंपनी के अनुसार, इस प्लान को एक्टिवेट करने के लिए यूजर्स को MyJio ऐप में जाकर Recharge सेक्शन के Entertainment Plans में 55 रुपये का JioTV Pro प्लान चुनना होगा। रिचार्ज पूरा होने के बाद ग्राहक अपने जियो मोबाइल नंबर से JioTV ऐप में लॉग इन कर लाइव टीवी देख सकते हैं।
लाइव टीवी के अलावा JioTV ऐप पर Sony LIV, ZEE5 और MX Player जैसे प्लेटफॉर्म का कुछ ऑन-डिमांड कंटेंट भी उपलब्ध है, जिससे यूजर्स एक ही ऐप में लाइव टीवी और चुनिंदा डिजिटल कंटेंट का आनंद ले सकते हैं।
जियो का यह नया प्लान ऐसे ग्राहकों को ध्यान में रखकर लाया गया है, जो कम कीमत में समाचार, मनोरंजन, फिल्में और क्षेत्रीय चैनलों का आनंद लेना चाहते हैं। कंपनी का मानना है कि मोबाइल पर टीवी देखने की बढ़ती मांग को देखते हुए यह प्लान यूजर्स के लिए किफायती विकल्प साबित होगा।
न्यूज24 (News24) ने अपनी नेतृत्व टीम को मजबूत करते हुए निखिल कौशिक (Nikhil Kaushik) को Creative Head और हरे कृष्ण प्रकाश (Hare Krishna Prakash) को Executive Producer नियुक्त किया है।
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न्यूज24 (News24) ने अपने संपादकीय और क्रिएटिव नेतृत्व को मजबूत करने के उद्देश्य से दो वरिष्ठ नियुक्तियों की घोषणा की है। चैनल ने निखिल कौशिक (Nikhil Kaushik) को क्रिएटिव हेड (Creative Head) और हरे कृष्ण प्रकाश (Hare Krishna Prakash) को एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर (Executive Producer) नियुक्त किया है।
निखिल कौशिक (Nikhil Kaushik) के पास मोशन ग्राफिक्स (Motion Graphics) और ब्रॉडकास्ट डिजाइन (Broadcast Design) के क्षेत्र में 19 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वह इससे पहले एबीपी न्यूज नेटवर्क (ABP News Network) के साथ कार्यरत थे। अपने करियर के दौरान उन्हें एआर/वीआर (AR/VR) ग्राफिक्स में उत्कृष्ट कार्य के लिए कई NT Gold और ENBA Awards से सम्मानित किया जा चुका है।
वहीं हरे कृष्ण प्रकाश (Hare Krishna Prakash) 24 वर्षों से अधिक समय से टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। इससे पहले वह आजतक (Aajtak), इंडिया टीवी (India TV) और भारत एक्सप्रेस न्यूज (Bharat Express News) जैसे प्रमुख समाचार संस्थानों में कार्य कर चुके हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव और आम बजट जैसे कई बड़े राष्ट्रीय आयोजनों की कवरेज का नेतृत्व किया है। इसके अलावा अपने करियर में उन्होंने कई प्राइम टाइम कार्यक्रमों की शुरुआत और निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
न्यूज24 ब्रॉडकास्ट (News24 Broadcast) के मैनेजिंग एडिटर (Managing Editor) मानक गुप्ता (Manak Gupta) ने दोनों नियुक्तियों का स्वागत करते हुए कहा कि निखिल और हरे कृष्ण का अनुभव चैनल की विजुअल प्रस्तुति और संपादकीय गुणवत्ता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि दोनों की विशेषज्ञता न्यूज24 की स्क्रीन प्रेजेंटेशन और स्टोरीटेलिंग को और प्रभावशाली बनाएगी।
अपनी नई भूमिका पर निखिल कौशिक (Nikhil Kaushik) ने कहा कि वह न्यूज24 के लिए नई विजुअल पहचान विकसित करने और दर्शकों के अनुभव को बेहतर बनाने को लेकर उत्साहित हैं। वहीं हरे कृष्ण प्रकाश (Hare Krishna Prakash) ने कहा कि वह चैनल के विकास के इस महत्वपूर्ण दौर में टीम का हिस्सा बनकर उच्च गुणवत्ता वाले कार्यक्रमों का निर्माण करने और दर्शकों के लिए महत्वपूर्ण खबरों की प्रभावी प्रस्तुति पर काम करने के लिए उत्सुक हैं।
सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (SPNI) ने 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स के एक्सक्लूसिव मीडिया अधिकार हासिल कर लिए हैं। सीधा प्रसारण Sony Sports Network और Sony LIV पर होगा।
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सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (Sony Pictures Networks India-SPNI) ने 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स (Commonwealth Games) के लिए भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के एक्सक्लूसिव मीडिया अधिकार (Exclusive Media Rights) हासिल कर लिए हैं।
इसके तहत 23 जुलाई से 2 अगस्त 2026 तक स्कॉटलैंड (Scotland) के ग्लासगो (Glasgow) में आयोजित होने वाले खेलों का सीधा प्रसारण सोनी स्पोर्ट्स नेटवर्क (Sony Sports Network) के चैनलों पर किया जाएगा, जबकि लाइव स्ट्रीमिंग सोनी लिव (Sony LIV) पर उपलब्ध होगी।
भारत इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन की उम्मीदों के साथ उतर रहा है। बर्मिंघम (Birmingham) में आयोजित 2022 के पिछले संस्करण में भारतीय दल ने 22 स्वर्ण सहित कुल 61 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया था। इस प्रदर्शन ने कॉमनवेल्थ खेलों में भारत की बढ़ती ताकत को और मजबूत किया था।
ग्लासगो 2026 (Glasgow 2026) का आयोजन इस बार अधिक कॉम्पैक्ट और एथलीट-केंद्रित प्रारूप में किया जाएगा। प्रतियोगिता में कॉमनवेल्थ देशों के खिलाड़ी 10 खेलों में हिस्सा लेंगे। साथ ही रिकॉर्ड 47 पदक स्पर्धाओं वाला एकीकृत पैरा स्पोर्ट्स (Integrated Para Sport) कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें छह खेल शामिल होंगे।
खेलों के कार्यक्रम में एथलेटिक्स (Athletics), स्विमिंग (Swimming), आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स (Artistic Gymnastics), ट्रैक साइक्लिंग (Track Cycling), नेटबॉल (Netball), वेटलिफ्टिंग (Weightlifting), बॉक्सिंग (Boxing), जूडो (Judo), बाउल्स (Bowls) और 3x3 बास्केटबॉल (3x3 Basketball) शामिल हैं।
सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (SPNI) ने कहा कि दर्शकों को प्रतियोगिता के हर अहम पल तक पहुंचाने के लिए विशेषज्ञ विश्लेषण, बहुभाषी कवरेज और व्यापक प्रोग्रामिंग की व्यवस्था की जाएगी। उद्घाटन समारोह से लेकर हर पदक जीतने वाले प्रदर्शन तक, नेटवर्क विश्वस्तरीय प्रसारण अनुभव उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा।
NDTV ने अपने रेवेन्यू और बिजनेस विस्तार को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
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NDTV ने अपने रेवेन्यू और बिजनेस विस्तार को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने शताब्दी शर्मा पाठक को NDTV Good Times व स्ट्रैटजिक इनिशिएटिव्स का रेवेन्यू हेड बनाया है। वह इस भूमिका में राहुल शॉ को रिपोर्ट करेंगी।
शताब्दी पाठक करीब सात साल से ज्यादा समय तक Republic Media Network से जुड़ी रहीं। वहां वह नेशनल हेड और साउथ ब्रांच हेड के पद पर कार्यरत थीं। उनके जिम्मे Republic TV, Republic Bharat, Republic Kannada और Republic Bangla के लिए विज्ञापन और बिजनेस से जुड़ी रणनीतियां थीं। उन्होंने नेटवर्क के विज्ञापनदाताओं का दायरा बढ़ाने और ब्रांडेड कंटेंट बिजनेस को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई।
रिपब्लिक से पहले वह The Chernin Group, HISTORY TV18, Times Network, TV Today Network और Magna Publishing जैसी प्रमुख मीडिया कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुकी हैं।
अपने लंबे करियर में शताब्दी ने टीवी विज्ञापन बिक्री, इंटीग्रेटेड मार्केटिंग, ब्रांडेड कंटेंट, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग, स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और इवेंट मोनेटाइजेशन जैसे क्षेत्रों में मजबूत अनुभव हासिल किया है।
Times Network में उन्होंने Times Now और Mirror Now जैसे अंग्रेजी न्यूज चैनलों के रेवेन्यू की जिम्मेदारी संभाली थी। वहीं Magna Publishing में वह Stardust Awards, Society Achievers Awards और Savvy Women Achievers Awards जैसे बड़े आयोजनों के लिए पार्टनरशिप और बिजनेस डेवलपमेंट का काम देख चुकी हैं।
माना जा रहा है कि NDTV में उनकी नियुक्ति कंपनी के रेवेन्यू बढ़ाने, नए ब्रैंड सहयोग विकसित करने और NDTV Good Times जैसे लाइफस्टाइल ब्रैंड को और विस्तार देने की रणनीति का हिस्सा है। मीडिया इंडस्ट्री में इसे NDTV की बिजनेस टीम को मजबूत करने के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत को एक समान ऑडियंस मेजरमेंट करेंसी की जरूरत क्यों है, मार्केटर्स को ही क्यों मिलनी चाहिए इसकी कमान? डॉ. अनुराग बत्रा ने इन मुद्दों पर रखी अपनी बेबाक राय
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डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
BARC रेटिंग्स पर रोक लगने के बाद टेलीविजन और मीडिया इंडस्ट्री में चिंता का माहौल है। टीवी चैनल परेशान हैं, विज्ञापन एजेंसियां असमंजस में हैं, मीडिया प्लानर नए विकल्प तलाश रहे हैं और विज्ञापनदाता यह सोच रहे हैं कि टीवी विज्ञापनों पर लगाए गए सैकड़ों करोड़ रुपये के निवेश को कैसे सही ठहराया जाए। लेकिन असली और असहज सच यह है कि अगर केवल एक रेटिंग सिस्टम के रुकने से पूरी टेलीविजन और मीडिया इंडस्ट्री हिल जाती है, तो समस्या केवल BARC के रुकने की नहीं है। असली समस्या उस व्यवस्था की है, जिस पर पूरी इंडस्ट्री टिकी हुई थी।
आज जरूरत इस बात की है कि घबराने के बजाय समाधान खोजे जाएं और आगे बढ़ने के लिए एक स्पष्ट रास्ता तय किया जाए।
पिछले कई वर्षों से हमने रेटिंग्स को ही हकीकत मान लिया। हर हफ्ते आने वाले एक आंकड़े के आधार पर कार्यक्रम तय किए गए, विज्ञापन दरें निर्धारित हुईं, निवेश के फैसले लिए गए, लोगों का करियर प्रभावित हुआ और कई चैनलों का भविष्य भी उसी पर निर्भर हो गया।
आज जब वह एक आंकड़ा हमारे सामने नहीं है, तब एहसास हो रहा है कि हमने अरबों रुपये के इस इंडस्ट्री को केवल एक ऐसी व्यवस्था पर खड़ा कर दिया था, जिसके रुकते ही पूरा सिस्टम डगमगा गया। यह स्थिति सभी के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। असली सवाल यह नहीं है कि BARC कब वापस आएगा। असली सवाल यह है कि क्या उसे उसी पुराने स्वरूप में वापस आना भी चाहिए?
भारत को एक ही भरोसेमंद मापदंड चाहिए, कई अलग-अलग सच नहीं
हर सफल अर्थव्यवस्था में केवल एक ही मान्य मुद्रा होती है। कल्पना कीजिए कि अगर हर बैंक अपनी अलग-अलग मुद्रा जारी करने लगे, या हर स्टॉक एक्सचेंज अपना अलग-अलग सेंसेक्स बना ले। ऐसी स्थिति में पूरी व्यवस्था में अराजकता फैल जाएगी।
लेकिन मीडिया मीजरमेंट के मामले में आज कुछ लोग ठीक यही व्यवस्था चाहते दिखाई दे रहे हैं। जैसे ही BARC रुका, अलग-अलग डेटा, निजी आंकड़ों और अलग-अलग मीजरमेंट सिस्टम्स की बातें शुरू हो गईं। यह बिल्कुल गलत सोच है।
मीडिया अलग-अलग सच्चाइयों के आधार पर नहीं चल सकता। भारत को एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जिस पर विज्ञापनदाता भरोसा करें, एजेंसियां उसे स्वीकार करें और ब्रॉडकास्टर उसका सम्मान करें।
एक नहीं, दो नहीं, पांच नहीं, बल्कि केवल एक भरोसेमंद मापदंड होना चाहिए। क्योंकि जिस दिन हर विक्रेता अपना-अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर बैठेगा, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान खरीदार का होगा।
ब्रॉडकास्टर अब भी एग्जामिनेशन कमेटी में क्यों बैठे हैं?
यही सबसे बड़ा सवाल है। आज भी ब्रॉडकास्टर्स उस व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव रखते हैं, जो उनके अपने प्रदर्शन को मापती है। सोचिए, क्या छात्रों को अपनी परीक्षा का सिस्टम खुद बनाने की अनुमति दी जा सकती है? क्या कोई कंपनी अपनी बैलेंस शीट का ऑडिट खुद कर सकती है? क्या कोई नेता अपने चुनावी वोट खुद गिन सकता है?
बिल्कुल नहीं।
अब यह सिर्फ मीडिया इंडस्ट्री का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। विज्ञापन उपभोक्ताओं की खरीदारी को बढ़ावा देते हैं और उपभोक्ताओं की बढ़ती खपत से आर्थिक विकास होता है। वहीं विज्ञापन उद्योग की नींव ऑडियंस मीजरमेंट पर टिकी होती है। इसलिए सरकार अब सिर्फ मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती।
सरकार का काम खुद टीवी रेटिंग्स चलाना या तय करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता अनिवार्य हो। चाहे टेलीविजन हो, डिजिटल प्लेटफॉर्म हो या स्ट्रीमिंग सेवाएं, हर बड़े विज्ञापन मंच पर स्वतंत्र और समान मानकों के तहत ऑडिट होना चाहिए।
अगर विज्ञापन का पैसा ऑडियंस मीजरमेंट के आधार पर खर्च किया जाता है, तो उस मीजरमेंट की स्वतंत्र रूप से जांच और सत्यापन किया जा सकना चाहिए। इससे कम कोई भी व्यवस्था स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।
BARC को सेवानिवृत्ति वाली नियुक्तियां नहीं, बल्कि स्वतंत्र नेतृत्व चाहिए
संस्थाएं केवल नई तकनीक के दम पर अपनी विश्वसनीयता नहीं बनातीं, बल्कि मजबूत और निष्पक्ष नेतृत्व से विश्वास अर्जित करती हैं। इसलिए BARC का अगला सीईओ ऐसा व्यक्ति नहीं होना चाहिए जिसे केवल रिटायरमेंट के बाद एक आरामदायक पद मिल गया हो। उद्योग को ऐसे नेता की जरूरत है, जिसकी पहचान उसकी स्वतंत्र सोच, बौद्धिक विश्वसनीयता और कठिन फैसले लेने के साहस से हो।
आज जब मीडिया उद्योग में सबसे बड़ी कमी भरोसे की है, तब पद या पदवी से ज्यादा महत्व विश्वसनीयता का है। इसलिए BARC की नई शुरुआत ऐसे लोगों के हाथों में होनी चाहिए, जिन्होंने वास्तव में इस उद्योग को खड़ा किया है।
BARC का नया स्वरूप बंद कमरों में बैठकर तैयार नहीं किया जाना चाहिए। इसे ऐसे लोगों के नेतृत्व में बनाया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने करियर में ब्रैंड खड़े किए हैं, न कि केवल अपने हितों की रक्षा की है। लेखक उदाहरण के तौर पर संजीव पुरी, भारत पटेल, संजीव मेहता, शशि सिन्हा, विक्रम सखुजा, एल. वी. कृष्णन, अनुप्रिया आचार्य, सुनील कटारिया, प्रिया नायर, निर्विक सिंह और मारुति के पार्थो बनर्जी जैसे अनुभवी उद्योग जगत के नेताओं का नाम लेते हैं। उनका कहना है कि ये केवल संकेतात्मक नाम हैं। अंतिम फैसला हितधारक करें, लेकिन ऐसे लोगों को चुना जाए जिनमें संवेदनशीलता, ईमानदारी, अनुभव, ज्ञान और उद्योग की सेवा करने का जज्बा हो।
ऐसे लोग जिन्होंने वर्षों तक कंपनियां, ब्रैंड और टीमें बनाई हों, विज्ञापन बजट का प्रबंधन किया हो, उपभोक्ताओं की जरूरतों को समझा हो और हमेशा जवाबदेही की मांग की हो, न कि केवल संस्थागत हितों की रक्षा की हो।
अगर भारत ऐसा ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम चाहता है जो अगले 20 वर्षों तक टिकाऊ और भरोसेमंद रहे, तो उसे लॉबिंग नहीं, बल्कि अनुभव और दूरदर्शिता की जरूरत होगी। अब यह केवल टीआरपी या रेटिंग्स का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि भरोसे का सवाल बन चुका है।
BARC की रेटिंग्स पर लगी रोक को केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरे सिस्टम की परीक्षा थी और लेखक के अनुसार उद्योग इस परीक्षा में सफल नहीं हो सका।
इस रोक ने यह भी उजागर कर दिया कि भारतीय टीवी उद्योग किस तरह एक ही रेटिंग सिस्टम, एक ही संस्था और एक ऐसे इकोसिस्टम पर अत्यधिक निर्भर हो गया था, जिसकी गवर्नेंस में लंबे समय से सुधार की जरूरत महसूस की जा रही थी। यदि बिना गवर्नेंस में मूलभूत बदलाव किए BARC को फिर से शुरू कर दिया जाता है, तो यह सबसे आसान रास्ता जरूर होगा, लेकिन लेखक के अनुसार यह सबसे बड़ी गलती भी साबित होगी।
लेखक का कहना है कि भारत को पुराने BARC की वापसी नहीं चाहिए, बल्कि मीडिया मीजरमेंट के लिए एक नई व्यवस्था और नए भरोसे की जरूरत है।
इसके लिए एक समान मीजरमेंट करेंसी हो, गवर्नेंस की कमान विज्ञापनदाताओं के हाथ में हो, ब्रॉडकास्टर्स निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त दूरी पर रहें, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए अनिवार्य पारदर्शिता हो, स्वतंत्र नेतृत्व हो और हर माध्यम पर एक जैसे मानक लागू हों। लेखक का मानना है कि इन मूलभूत बदलावों के बिना बाकी सभी सुधार केवल दिखावटी होंगे।
लेखक के अनुसार टीवी उद्योग के पास कई वर्षों में पहली बार ऐसा अवसर आया है, जब वह लोगों का भरोसा दोबारा जीत सकता है। लेकिन अगर उसने साहस दिखाने के बजाय आसान और सुविधाजनक रास्ता चुना, तो भविष्य में फिर वही स्थिति आएगी, जहां उद्योग विश्वसनीयता बनाने के बजाय केवल टीआरपी और रेटिंग्स पर बहस करता रह जाएगा।
और तब तक संभव है कि दर्शक उद्योग के बदलने का इंतजार किए बिना आगे बढ़ चुके हों।