सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (SPNI) ने 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स के एक्सक्लूसिव मीडिया अधिकार हासिल कर लिए हैं। सीधा प्रसारण Sony Sports Network और Sony LIV पर होगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (Sony Pictures Networks India-SPNI) ने 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स (Commonwealth Games) के लिए भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के एक्सक्लूसिव मीडिया अधिकार (Exclusive Media Rights) हासिल कर लिए हैं।
इसके तहत 23 जुलाई से 2 अगस्त 2026 तक स्कॉटलैंड (Scotland) के ग्लासगो (Glasgow) में आयोजित होने वाले खेलों का सीधा प्रसारण सोनी स्पोर्ट्स नेटवर्क (Sony Sports Network) के चैनलों पर किया जाएगा, जबकि लाइव स्ट्रीमिंग सोनी लिव (Sony LIV) पर उपलब्ध होगी।
भारत इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन की उम्मीदों के साथ उतर रहा है। बर्मिंघम (Birmingham) में आयोजित 2022 के पिछले संस्करण में भारतीय दल ने 22 स्वर्ण सहित कुल 61 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया था। इस प्रदर्शन ने कॉमनवेल्थ खेलों में भारत की बढ़ती ताकत को और मजबूत किया था।
ग्लासगो 2026 (Glasgow 2026) का आयोजन इस बार अधिक कॉम्पैक्ट और एथलीट-केंद्रित प्रारूप में किया जाएगा। प्रतियोगिता में कॉमनवेल्थ देशों के खिलाड़ी 10 खेलों में हिस्सा लेंगे। साथ ही रिकॉर्ड 47 पदक स्पर्धाओं वाला एकीकृत पैरा स्पोर्ट्स (Integrated Para Sport) कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें छह खेल शामिल होंगे।
खेलों के कार्यक्रम में एथलेटिक्स (Athletics), स्विमिंग (Swimming), आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स (Artistic Gymnastics), ट्रैक साइक्लिंग (Track Cycling), नेटबॉल (Netball), वेटलिफ्टिंग (Weightlifting), बॉक्सिंग (Boxing), जूडो (Judo), बाउल्स (Bowls) और 3x3 बास्केटबॉल (3x3 Basketball) शामिल हैं।
सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (SPNI) ने कहा कि दर्शकों को प्रतियोगिता के हर अहम पल तक पहुंचाने के लिए विशेषज्ञ विश्लेषण, बहुभाषी कवरेज और व्यापक प्रोग्रामिंग की व्यवस्था की जाएगी। उद्घाटन समारोह से लेकर हर पदक जीतने वाले प्रदर्शन तक, नेटवर्क विश्वस्तरीय प्रसारण अनुभव उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा।
NDTV ने अपने रेवेन्यू और बिजनेस विस्तार को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
NDTV ने अपने रेवेन्यू और बिजनेस विस्तार को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने शताब्दी शर्मा पाठक को NDTV Good Times व स्ट्रैटजिक इनिशिएटिव्स का रेवेन्यू हेड बनाया है। वह इस भूमिका में राहुल शॉ को रिपोर्ट करेंगी।
शताब्दी पाठक करीब सात साल से ज्यादा समय तक Republic Media Network से जुड़ी रहीं। वहां वह नेशनल हेड और साउथ ब्रांच हेड के पद पर कार्यरत थीं। उनके जिम्मे Republic TV, Republic Bharat, Republic Kannada और Republic Bangla के लिए विज्ञापन और बिजनेस से जुड़ी रणनीतियां थीं। उन्होंने नेटवर्क के विज्ञापनदाताओं का दायरा बढ़ाने और ब्रांडेड कंटेंट बिजनेस को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई।
रिपब्लिक से पहले वह The Chernin Group, HISTORY TV18, Times Network, TV Today Network और Magna Publishing जैसी प्रमुख मीडिया कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुकी हैं।
अपने लंबे करियर में शताब्दी ने टीवी विज्ञापन बिक्री, इंटीग्रेटेड मार्केटिंग, ब्रांडेड कंटेंट, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग, स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और इवेंट मोनेटाइजेशन जैसे क्षेत्रों में मजबूत अनुभव हासिल किया है।
Times Network में उन्होंने Times Now और Mirror Now जैसे अंग्रेजी न्यूज चैनलों के रेवेन्यू की जिम्मेदारी संभाली थी। वहीं Magna Publishing में वह Stardust Awards, Society Achievers Awards और Savvy Women Achievers Awards जैसे बड़े आयोजनों के लिए पार्टनरशिप और बिजनेस डेवलपमेंट का काम देख चुकी हैं।
माना जा रहा है कि NDTV में उनकी नियुक्ति कंपनी के रेवेन्यू बढ़ाने, नए ब्रैंड सहयोग विकसित करने और NDTV Good Times जैसे लाइफस्टाइल ब्रैंड को और विस्तार देने की रणनीति का हिस्सा है। मीडिया इंडस्ट्री में इसे NDTV की बिजनेस टीम को मजबूत करने के तौर पर देखा जा रहा है।
देश के लोकप्रिय स्टार्टअप रियलिटी शो 'शार्क टैंक इंडिया' (Shark Tank India) का छठा सीजन (Season 6) जल्द आने वाला है। शो के लिए Sony LIV पर रजिस्ट्रेशन शुरू हो गए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश के लोकप्रिय स्टार्टअप रियलिटी शो 'शार्क टैंक इंडिया' (Shark Tank India) का छठा सीजन (Season 6) जल्द आने वाला है। शो के लिए Sony LIV पर रजिस्ट्रेशन शुरू हो गए हैं। इसके साथ ही मेकर्स ने नया कैंपेन 'Dreaming is Easy, Building is Hard' भी लॉन्च किया है।
इस कैंपेन का संदेश साफ है कि सिर्फ बड़े सपने देखना आसान है, लेकिन उन्हें सफल कारोबार में बदलने के लिए मेहनत, अनुशासन और लगातार प्रयास की जरूरत होती है।
सपने नहीं, मेहनत से बनती है सफलता
शो के नए प्रोमो में हल्के-फुल्के अंदाज में यह दिखाया गया है कि सिर्फ बिजनेस आइडिया होना काफी नहीं है। असली चुनौती उस आइडिया को जमीन पर उतारने, मुश्किलों का सामना करने और लगातार मेहनत करते हुए उसे सफल बनाने की होती है।
कैंपेन का उद्देश्य युवाओं और स्टार्टअप फाउंडर्स को यह संदेश देना है कि उद्यमिता केवल अच्छे आइडिया का नाम नहीं, बल्कि उसे सफल बनाने के लिए लगन और समर्पण भी उतना ही जरूरी है।
पांच सीजन में बना बड़ा स्टार्टअप प्लेटफॉर्म
पिछले पांच सीजन में 'Shark Tank India' सिर्फ एक टीवी शो नहीं रहा, बल्कि देश के सबसे बड़े स्टार्टअप प्लेटफॉर्म्स में से एक बन चुका है।
इस मंच के जरिए सैकड़ों उद्यमियों को अपने बिजनेस आइडिया निवेशकों के सामने पेश करने का मौका मिला। कई स्टार्टअप्स को निवेश, पहचान और कारोबार बढ़ाने का अवसर भी मिला।
शो ने देश में स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने और युवाओं को अपना कारोबार शुरू करने के लिए प्रेरित करने में भी अहम भूमिका निभाई है।
नए और अनुभवी दोनों उद्यमी कर सकेंगे आवेदन
Shark Tank India Season 6 में पहली बार बिजनेस शुरू करने वाले उद्यमियों के साथ-साथ ऐसे कारोबारी भी आवेदन कर सकते हैं, जो अपने कारोबार को अगले स्तर तक ले जाना चाहते हैं।
मेकर्स का कहना है कि वे ऐसे फाउंडर्स की तलाश में हैं जिनके पास मजबूत बिजनेस आइडिया, बेहतर योजना और बड़े स्तर पर कारोबार बढ़ाने का विजन हो।
कई बड़े ब्रांड जुड़े
इस बार शो के को-पावर्ड पार्टनर के रूप में Lahori Zeera और L'Oréal Paris जुड़े हैं। वहीं White Gold और Lal Sweets शो के पार्टनर ब्रांड होंगे।
Sony LIV पर शुरू हुए रजिस्ट्रेशन
जो उद्यमी Shark Tank India Season 6 में हिस्सा लेना चाहते हैं, वे Sony LIV के जरिए अपना रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं।
मेकर्स का कहना है कि अब मंच तैयार है, शार्क्स निवेश के लिए तैयार हैं और बारी उन उद्यमियों की है जो अपने सपनों को हकीकत में बदलने का साहस रखते हैं।
BARC इंडिया की टीवी रेटिंग प्रणाली पर कोर्ट में दी गई नई दलीलों ने ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री में नई बहस छेड़ दी है। इंडस्ट्री के मुताबिक, 2020 में किया गया BARC का दावा अब उसी के खिलाफ जाता दिख रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
BARC इंडिया की टीवी रेटिंग प्रणाली को लेकर कोर्ट में दी गई नई दलीलों ने ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री में एक नई बहस छेड़ दी है। ब्रॉडकास्टर्स और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि BARC ने 2020 में जो दावा किया था, अब वही उसके खिलाफ जाता दिखाई दे रहा है।
9 जुलाई को केरल हाई कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 का समर्थन किया। BARC ने कोर्ट से अनुरोध किया कि क्लॉज 5.4.1 पर लगी अंतरिम रोक हटाई जाए। इसी क्लॉज में यह प्रावधान है कि लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्यूअरशिप को टीवी रेटिंग (TRP) में शामिल नहीं किया जाएगा।
BARC ने अपने हलफनामे में कहा कि इस रोक के बने रहने से जनहित में बनाई गई नीति का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है और लैंडिंग पेज पर मिलने वाली व्यूअरशिप को दर्शकों की वास्तविक पसंद नहीं माना जा सकता।
हालांकि, इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि BARC पहली बार यह तर्क नहीं दे रहा है और यही सबसे बड़ा सवाल है।
exchange4media ने सोमवार को भी खबर प्रकाशित की थी कि BARC ने केरल हाई कोर्ट में MIB की TRP रेटिंग पॉलिसी 2026 के समर्थन में जवाबी हलफनामा दाखिल किया है।
2020 में किया था बड़ा दावा
सितंबर 2020 में BARC ने दावा किया था कि उसने लैंडिंग पेज की समस्या का समाधान खोज लिया है। उस समय "Data Validation Quality Initiative" की घोषणा करते हुए BARC ने कहा था कि वह एक नया एल्गोरिदम लागू कर रहा है, जिससे सभी तरह के चैनलों की व्यूअरशिप पर लैंडिंग पेज का असर कम किया जा सकेगा।
तब BARC के Chief of Measurement Science & Business Analytics रहे डॉ. डेरिक ग्रे ने कहा था कि नया सिस्टम पुराने तरीके की बजाय "Inferential Statistics" का इस्तेमाल करेगा और इससे लैंडिंग पेज की वजह से आने वाली गड़बड़ियों को दूर कर दर्शकों की वास्तविक पसंद दिखाई जाएगी।
वहीं, उस समय के CEO सुनील लुल्ला ने इसे ऐसा कदम बताया था, जिससे रेटिंग सिस्टम और मजबूत होगा तथा छोटे और बड़े सभी ब्रॉडकास्टर्स को समान अवसर मिलेगा।
अब खुद BARC के दावे पर उठे सवाल
करीब पांच साल बाद BARC ने केरल हाई कोर्ट में अपने हलफनामे में माना है कि 2020 में लागू किया गया एल्गोरिदम होने के बावजूद लैंडिंग पेज से रेटिंग प्रभावित होती रही। इसी वजह से अब नई नीति में लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को पूरी तरह बाहर करने की जरूरत बताई गई है।
इंडस्ट्री के कई अधिकारियों का कहना है कि इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर 2020 का एल्गोरिदम सही तरीके से काम कर रहा था, तो अब पूरी तरह से लैंडिंग पेज को हटाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
एक वरिष्ठ मीडिया बाइंग अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "2020 में BARC ने बाजार से कहा था कि लैंडिंग पेज की समस्या खत्म हो चुकी है। तब से लेकर अब तक होने वाली हर विज्ञापन डील और मीडिया प्लान इसी भरोसे पर बने। अब अगर BARC खुद कोर्ट में कह रहा है कि लैंडिंग पेज रेटिंग बढ़ा रहे थे, तो इसका मतलब है कि पिछले कई वर्षों से ब्रॉडकास्टर्स और विज्ञापनदाता उसी डेटा के आधार पर फैसले लेते रहे, जिसे अब खुद BARC सवालों के घेरे में बता रहा है।"
न्यूज चैनलों ने जताई चिंता
खासकर न्यूज चैनलों का कहना है कि इस पूरे मामले ने रेटिंग सिस्टम पर भरोसा कमजोर किया है।
एक बड़े न्यूज नेटवर्क के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "छोटे और क्षेत्रीय न्यूज चैनलों का मूल्यांकन वर्षों तक उन आंकड़ों के आधार पर हुआ, जिन्हें BARC का एल्गोरिदम ठीक करने का दावा करता था। अगर वह एल्गोरिदम पर्याप्त नहीं था और आखिरकार कोर्ट के सहारे पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की जरूरत पड़ी, तो जाहिर है कि विज्ञापनदाता ऐसे डेटा के आधार पर फैसले लेते रहे, जिस पर खुद BARC को पूरा भरोसा नहीं था।"
एक अन्य वरिष्ठ उद्योग विशेषज्ञ ने कहा कि इससे BARC की वैज्ञानिक और निष्पक्ष संस्था होने की छवि पर भी असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि BARC हमेशा खुद को "What India Watches" का निष्पक्ष मापदंड बताता रहा है, लेकिन जब उसकी अपनी 2020 की व्यवस्था भी सफल नहीं मानी जा रही, तो यह केवल तकनीकी नहीं बल्कि भरोसे का भी सवाल है।
BARC ने क्या कहा?
BARC ने कोर्ट में कहा कि उसका चैनलों की प्लेसमेंट से कोई व्यावसायिक हित नहीं है। उसका मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि टीवी रेटिंग दर्शकों की वास्तविक पसंद को दिखाए।
BARC का कहना है कि एल्गोरिदम की बजाय लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को पूरी तरह हटाना ज्यादा पारदर्शी, भरोसेमंद और ऑडिट के लिहाज से बेहतर तरीका है।
BARC ने यह भी कहा कि यह मामला TRAI के अधिकार क्षेत्र से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के अलग केस से अलग है। उसके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट वाला मामला चैनलों की प्लेसमेंट से जुड़ा है, जबकि केरल हाई कोर्ट में विवाद केवल ऑडियंस मापन की पद्धति को लेकर है।
अब BARC के नेतृत्व पर भी उठ रहे सवाल
केरल हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे के बाद अब इंडस्ट्री के कुछ वर्ग BARC के प्रबंधन में बदलाव की भी मांग कर रहे हैं।
उनका कहना है कि अगर 2020 में किए गए सुधार के बावजूद समस्या बनी रही, तो यह दिखाता है कि BARC ने सुधारों की बात तो की, लेकिन उन्हें पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।
इंडस्ट्री के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) भी लंबे समय से BARC की धीमी कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है। मंत्रालय की चिंता केवल लैंडिंग पेज तक सीमित नहीं है, बल्कि Connected TV (CTV) मापन जैसे कई महत्वपूर्ण सुधार भी लंबे समय से लंबित हैं।
एक वरिष्ठ न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अधिकारी ने कहा, "कई बैठकों और सलाह के बावजूद BARC जरूरी सुधार लागू करने में विफल रहा है।"
विशेषज्ञों की राय
Thoth Advisors के मैनेजिंग पार्टनर और BARC इंडिया के पूर्व CEO पार्थो दासगुप्ता का कहना है कि पूरी जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर डालना सही नहीं होगा। उनके मुताबिक, यह कई वर्षों से चला आ रहा सामूहिक असफलता का मामला है।
उन्होंने कहा कि 2018 के बाद Establishment Survey अपडेट नहीं हुआ, वहीं टीवी सैंपल का आकार भी इतना बड़ा नहीं है कि क्षेत्रीय और छोटे चैनलों की सही तस्वीर सामने आ सके।
दासगुप्ता का मानना है कि इसी वजह से MIB ने पहले मार्च 2026 में रेटिंग नियमों में बदलाव किए और अब आगे भी सुधार की दिशा में कदम उठा रहा है। उन्होंने कहा कि मंत्रालय की चिंता केवल CEO तक सीमित नहीं, बल्कि BARC के बोर्ड की संरचना को लेकर भी है।
Chrome Data Analytics के संस्थापक पंकज कृष्णा का कहना है कि समस्या किसी एक अधिकारी की नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की है। उनके अनुसार इंडस्ट्री को ऐसा डिजिटल और छेड़छाड़ से सुरक्षित मापन तंत्र चाहिए, जो टीवी, CTV, OTT, YouTube और मोबाइल सहित सभी प्लेटफॉर्म की व्यूअरशिप को सही तरीके से माप सके। उनका कहना है कि अभी सबसे बड़ी जरूरत रेटिंग प्रकाशित करने से ज्यादा भरोसा बहाल करने की है।
वहीं Sales Strategist LLP के संस्थापक और Connected TV विशेषज्ञ विशाल खन्ना का कहना है कि असली समस्या BARC की मालिकाना संरचना है। उन्होंने बताया कि BARC में IBDF, ISA और AAAI की क्रमशः 60:20:20 हिस्सेदारी है।
खन्ना के मुताबिक, जिन ब्रॉडकास्टर्स के चैनलों की रेटिंग होती है, वही संस्था के मालिक भी हैं। उन्होंने इसे ऐसी व्यवस्था बताया, "जहां परीक्षा देने वाले छात्र ही प्रश्नपत्र तैयार करते हैं, जांचते हैं और पूरी व्यवस्था के मालिक भी होते हैं।"
उनका कहना है कि यह केवल प्रबंधन का नहीं बल्कि पूरे भरोसे के ढांचे (Trust Architecture) का संकट है। दुनिया के कई देशों में ऑडियंस मापन इंडस्ट्री खुद करती है और वहां सरकार का इतना हस्तक्षेप नहीं होता।
विज्ञापनदाता भी चाहते हैं जवाब
कानूनी लड़ाई जारी रहने के बीच विज्ञापन जगत के कई लोगों का मानना है कि सबसे बड़ा नुकसान BARC की विश्वसनीयता को हुआ है।
एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी के मीडिया प्लानिंग प्रमुख ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "हर बार जब BARC किसी नए सुधार की घोषणा करता है, बाजार उस पर भरोसा कर आगे बढ़ जाता है। लेकिन इस बार वही सुधार कोर्ट में सवालों के घेरे में है। असली सवाल यह है कि पिछले पांच वर्षों में कितने विज्ञापन ऐसे TRP डेटा के आधार पर खरीदे और बेचे गए, जिन्हें अब खुद BARC बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए आंकड़े मान रहा है।"
फिलहाल सभी की नजरें केरल हाई कोर्ट पर हैं, जहां इस मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी।
हालांकि अब यह विवाद सिर्फ कोर्ट तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ MIB सुधारों में हो रही देरी से नाराज बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इंडस्ट्री का बड़ा वर्ग BARC के नेतृत्व और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है।
अब यह देखना अहम होगा कि क्या कोर्ट BARC की इस दलील को स्वीकार करता है कि लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को पूरी तरह हटाना ही सबसे भरोसेमंद समाधान है, या फिर यह मामला टीवी रेटिंग सिस्टम और BARC की विश्वसनीयता पर और बड़े बदलाव की शुरुआत बनेगा।
केरल हाई कोर्ट ने सोमवार को ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन और DEN Networks की उस याचिका पर सुनवाई 21 जुलाई तक के लिए टाल दी, जिसमें केंद्र सरकार की टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 को चुनौती दी गई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
केरल हाई कोर्ट ने सोमवार को ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) और DEN Networks की उस याचिका पर सुनवाई 21 जुलाई तक के लिए टाल दी, जिसमें केंद्र सरकार की टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने टीवी रेटिंग (TRP) से "लैंडिंग पेज" की व्युअरशिप को बाहर करके वह काम अप्रत्यक्ष रूप से करने की कोशिश की है, जिसे ट्राई (TRAI) को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के दौरान सीधे तौर पर लागू करने से रोका गया था।
मामले की सुनवाई जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की अदालत में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की संशोधित टेलीविजन रेटिंग व्यवस्था मनमानी है, इसमें ट्राई की वैधानिक भूमिका को नजरअंदाज किया गया है और इसका केबल टीवी वितरण उद्योग पर दूरगामी असर पड़ेगा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई तय की।
यह सुनवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि हाल ही में केंद्र सरकार ने अदालत में अपना हलफनामा दाखिल कर टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 का बचाव किया है। साथ ही सरकार ने उस अंतरिम रोक को हटाने की भी मांग की है, जो हाईकोर्ट ने लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्युअरशिप को टीवी रेटिंग में शामिल न करने वाले प्रावधान पर लगाई थी।
याचिकाकर्ताओं का आरोप- केंद्र वही कर रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रोका था
सुनवाई के दौरान AIDCF की ओर से कहा गया कि केरल हाईकोर्ट में उठाया गया यह मुद्दा सीधे तौर पर उस मामले से जुड़ा है, जो कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और जिसमें ट्राई द्वारा लैंडिंग पेज को नियंत्रित करने की कोशिश को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि 2014 में ट्राई ने व्यापक चर्चा के बाद एक नीति बनाई थी। उस समय भी मुद्दा यही था कि लैंडिंग पेज टीवी रेटिंग को प्रभावित करते हैं। आज अदालत के सामने भी यही सवाल है।
उन्होंने कहा कि भले ही इस बार नीति ट्राई की जगह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बनाई हो, लेकिन उसका प्रभाव लगभग वही है।
वकील ने अदालत से सवाल किया, "क्या जो काम सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे अप्रत्यक्ष तरीके से किया जा सकता है?" उनका कहना था कि केंद्र सरकार उन प्रतिबंधों को फिर से लागू करने की कोशिश कर रही है, जो कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक जांच के दायरे में हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मंत्रालय ने यह नीति बनाते समय ट्राई से कोई सलाह नहीं ली, जबकि ऑडियंस मेजरमेंट और टीवी वितरण सीधे तौर पर ट्राई एक्ट के तहत आने वाले विषय हैं।
उनका यह भी कहना था कि नई नीति वास्तव में टीवी वितरण प्लेटफॉर्म को नियंत्रित करती है, लेकिन इसके लिए ट्राई से अनिवार्य सलाह-मशविरा नहीं किया गया।
BARC की मौजूदा व्यवस्था को नजरअंदाज किया गया
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की मौजूदा व्यवस्था क्यों पर्याप्त नहीं थी।
उन्होंने अदालत को बताया कि BARC के पास पहले से ही Landing Page Algorithm (LPA) मौजूद है, जिसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि दर्शक वास्तव में चैनल देख रहा है या सिर्फ लैंडिंग पेज के कारण चैनल स्क्रीन पर आया है।
वकील ने पूछा, "सरकार ने कहीं भी यह नहीं बताया कि यह व्यवस्था क्यों पर्याप्त नहीं थी?"
उनका कहना था कि सरकार ने बिना कोई ठोस सबूत दिए लैंडिंग पेज से मिलने वाली पूरी व्युअरशिप को रेटिंग से बाहर कर दिया।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि केवल किसी फैसले को "नीति" कह देने से वह अदालत की समीक्षा से बाहर नहीं हो जाता। हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हर सरकारी निर्णय संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना चाहिए और मनमाना नहीं हो सकता।
वकील ने कहा, "हर फैसले के पीछे ठोस वजह होनी चाहिए।"
केबल उद्योग ने जताई गंभीर कारोबारी चिंता
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि इस नीति का केबल टीवी उद्योग पर गंभीर आर्थिक असर पड़ेगा।
लैंडिंग पेज वह चैनल होता है, जो दर्शक के सेट-टॉप बॉक्स चालू करते ही सबसे पहले दिखाई देता है। लंबे समय से यह ब्रॉडकास्टर्स और मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (MSOs) के बीच व्यावसायिक समझौतों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि लैंडिंग पेज की व्युअरशिप को आधिकारिक टीवी रेटिंग में नहीं गिना जाएगा तो उसकी व्यावसायिक अहमियत लगभग खत्म हो जाएगी। इससे पहले से OTT प्लेटफॉर्म और डिजिटल मीडिया की चुनौती झेल रहे केबल उद्योग की आमदनी पर बड़ा असर पड़ेगा।
वकील ने कहा कि यदि लैंडिंग पेज से मिलने वाला राजस्व खत्म हो गया तो टीवी वितरण क्षेत्र में निवेश कम होगा और नए चैनलों के लिए बाजार में टिकना मुश्किल हो जाएगा।
उन्होंने अदालत में कहा, "इसका हम पर बहुत दूरगामी असर पड़ेगा। नए चैनल कैसे आएंगे? यदि आय का यह स्रोत खत्म हो गया तो पूरा उद्योग प्रभावित होगा।"
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(g) के तहत मिले उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है क्योंकि इससे वैध व्यावसायिक गतिविधियों पर अनुचित असर पड़ता है।
केंद्र सरकार ने किया नीति का बचाव
केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 का संबंध सुप्रीम कोर्ट में लंबित ट्राई वाले मामले से अलग है। सरकार का कहना है कि नई नीति लैंडिंग पेज पर रोक नहीं लगाती और न ही उसे नियंत्रित करती है। यह केवल इतना कहती है कि लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्युअरशिप को टीवी ऑडियंस मेजरमेंट में शामिल नहीं किया जाएगा।
सरकार ने यह भी कहा कि यह नीति ब्रॉडकास्टिंग उद्योग के सभी हितधारकों से व्यापक चर्चा के बाद बनाई गई है और इसका उद्देश्य टीवी रेटिंग व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी बनाना है।
मंत्रालय लगातार यह कहता रहा है कि लैंडिंग पेज दर्शकों की वास्तविक पसंद नहीं बल्कि केवल Passive Exposure पैदा करते हैं। इसलिए ऐसी व्युअरशिप को हटाने से टीवी रेटिंग अधिक सटीक होगी। सुनवाई के दौरान मंत्रालय की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह मामला चैनलों की प्लेसमेंट को नियंत्रित करने का नहीं, बल्कि ऑडियंस मेजरमेंट की पद्धति का है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले पर भी हुई बहस
सोमवार की सुनवाई का बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित रहा कि क्या नई नीति का संबंध सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले से है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि दोनों मामलों का मूल प्रश्न एक ही है- लैंडिंग पेज का टीवी रेटिंग पर असर।
उन्होंने बताया कि ट्राई ने पहले लैंडिंग पेज पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, जिन्हें टेलीकॉम डिस्प्यूट्स सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्रिब्यूनल (TDSAT) ने 2019 में रद्द कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने TDSAT के फैसले पर रोक लगा दी थी, लेकिन ट्राई को विवादित प्रतिबंध लागू करने की अनुमति नहीं दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सीधे प्रतिबंध लगाने के बजाय ऑडियंस मेजरमेंट के जरिए वही व्यावसायिक परिणाम हासिल करने की कोशिश की है। हालांकि केंद्र सरकार ने इस दलील से असहमति जताते हुए कहा कि दोनों मामलों के कानूनी मुद्दे अलग-अलग हैं।
21 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने जल्द सुनवाई की मांग की। उनका कहना था कि मामला केवल एक प्रावधान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई संवैधानिक, वैधानिक और नियामकीय सवाल जुड़े हुए हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि सरकार का जवाब हाल ही में दाखिल हुआ है, इसलिए उन्हें उसका जवाब देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई तय कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
AIDCF और DEN Networks ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा 27 मार्च को जारी टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 की धारा 5.4.1 के एक प्रावधान को चुनौती दी है। इस प्रावधान में कहा गया है कि लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्युअरशिप को टीवी ऑडियंस मेजरमेंट में शामिल नहीं किया जाएगा, हालांकि लैंडिंग पेज को मार्केटिंग टूल के रूप में जारी रखा जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान असंवैधानिक, मनमाना और व्यावसायिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाला है, क्योंकि इससे लैंडिंग पेज की आर्थिक उपयोगिता खत्म हो जाती है और केबल टीवी वितरण प्लेटफॉर्म का कारोबारी मॉडल कमजोर पड़ता है।
इससे पहले केरल हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए टीवी रेटिंग में लैंडिंग पेज की व्युअरशिप को बाहर रखने वाले प्रावधान के अमल पर रोक लगा दी थी। हालांकि टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 के बाकी सभी प्रावधान लागू रहेंगे।
इस मामले में आने वाला अंतिम फैसला ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं, केबल वितरण कंपनियों और भारत में भविष्य की टीवी ऑडियंस मेजरमेंट व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है।
श्रीलंका की प्रमुख टी20 क्रिकेट लीग Lanka Premier League (LPL) का छठा सीजन 17 जुलाई से 8 अगस्त तक खेला जाएगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
श्रीलंका की प्रमुख टी20 क्रिकेट लीग Lanka Premier League (LPL) का छठा सीजन 17 जुलाई से 8 अगस्त तक खेला जाएगा। भारतीय दर्शक इस टूर्नामेंट के सभी मुकाबलों का सीधा प्रसारण Star Sports पर देख सकेंगे।
श्रीलंका क्रिकेट (Sri Lanka Cricket) की ओर से आयोजित और Innovative Production Group FZ (IPG) द्वारा प्रबंधित इस सीजन में कुल 94 खिलाड़ी हिस्सा लेंगे। इनमें 62 श्रीलंकाई और 32 विदेशी खिलाड़ी शामिल हैं। आयोजकों का कहना है कि इससे लीग की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
आयोजकों के अनुसार, इस बार टूर्नामेंट के लिए 21 देशों के 650 से अधिक खिलाड़ियों ने पंजीकरण कराया, जो अब तक के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय रिस्पॉन्स में से एक है।
इस सीजन में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी मैदान पर नजर आएंगे। इनमें मोईन अली, जिमी नीशम, शाकिब अल हसन, तस्कीन अहमद, वानिंदु हसरंगा, एंजेलो मैथ्यूज, कुसल मेंडिस और दासुन शनाका जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, भारतीय ऑलराउंडर विजय शंकर पहली बार LPL में खेलते दिखाई देंगे।
आयोजकों का कहना है कि Lanka Premier League का उद्देश्य सिर्फ रोमांचक टी20 मुकाबले कराना नहीं है, बल्कि श्रीलंका के युवा खिलाड़ियों को दुनिया के अनुभवी खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका देना भी है, ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव मिल सके।
IPG Group के फाउंडर व सीईओ अनिल मोहन संखधर ने कहा कि इस बार विदेशी खिलाड़ियों की रिकॉर्ड भागीदारी से साफ है कि LPL की पहचान वैश्विक क्रिकेट कैलेंडर में लगातार मजबूत हो रही है। उन्होंने कहा कि लीग का लक्ष्य श्रीलंका क्रिकेट को नई प्रतिभाएं देना और प्रशंसकों को विश्वस्तरीय क्रिकेट का अनुभव उपलब्ध कराना है।
वहीं, Lanka Premier League के टूर्नामेंट निदेशक समंथा दोडनवेला ने कहा कि छठा सीजन लीग के विकास में एक और महत्वपूर्ण कदम है। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय खिलाड़ियों का यह मिश्रण इस बार भी दर्शकों को रोमांचक मुकाबले देखने का मौका देगा।
मजबूत विदेशी खिलाड़ियों की मौजूदगी, व्यस्त मुकाबलों के कार्यक्रम और भारत में Star Sports पर प्रसारण के साथ LPL का छठा सीजन क्रिकेट प्रशंसकों के लिए खास होने की उम्मीद है।
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) ने अपने अगले विकास चरण की घोषणा करते हुए डिजिटल-फर्स्ट रणनीति पेश की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) ने अपने अगले विकास चरण की घोषणा करते हुए डिजिटल-फर्स्ट रणनीति पेश की है। कंपनी अपने कारोबार के विस्तार और नई तकनीकों में निवेश के लिए प्रमोटर ग्रुप की कंपनी सनब्राइट मॉरीशस इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड (Sunbright Mauritius Investments Ltd.) को प्रेफरेंशियल आधार पर वारंट जारी कर 3,143.5 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए कंपनी ने शेयरधारकों से मंजूरी मांगी है।
कंपनी के मुताबिक, इस फंड का इस्तेमाल बैलेंस शीट को मजबूत करने और डिजिटल एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ब्रॉडबैंड, एक्सपीरिएंशियल बिजनेस और अन्य उभरते क्षेत्रों में निवेश के लिए किया जाएगा।
जी ने कहा कि यह पूंजी निवेश कंपनी की लंबे समय की रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य ग्राहकों पर केंद्रित मनोरंजन इकोसिस्टम तैयार करना और डिजिटल क्षमताओं का तेजी से विस्तार करना है। कंपनी का कहना है कि यह फंड उसे मजबूत वित्तीय आधार देने के साथ-साथ तेजी से बढ़ने वाले कारोबारों में निवेश करने में मदद करेगा।
कंपनी की यह योजना 31 जुलाई को होने वाली असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों के सामने मंजूरी के लिए रखी जाएगी।
डिजिटल कारोबार में तेजी
जी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) उसके डिजिटल कारोबार के लिए अहम साबित हुआ। कंपनी का डिजिटल बिजनेस पहली बार EBITDA स्तर पर मुनाफे में पहुंच गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष में इस कारोबार में 548 करोड़ रुपये का EBITDA घाटा हुआ था।
इसी दौरान कंपनी की डिजिटल आय में 53 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर 1,488.8 करोड़ रुपये हो गई।
कंपनी ने अपने स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म का भी विस्तार किया। इस दौरान सात नए भाषा पैक लॉन्च किए गए और प्रीमियम कंटेंट की संख्या बढ़ाकर 127 ओरिजिनल शो और फिल्मों तक पहुंचा दी गई, ताकि क्षेत्रीय दर्शकों को बेहतर कंटेंट उपलब्ध कराया जा सके।
AI और नए कंटेंट फॉर्मेट पर फोकस
जी अब AI आधारित तकनीकों और नए कंटेंट फॉर्मेट पर भी तेजी से निवेश कर रही है। कंपनी ने मोबाइल दर्शकों के लिए 'बुलेट' (Bullet) नाम से एक वर्टिकल माइक्रो-ड्रामा प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है।
इसके अलावा 'त्रिनेत्र AI' (Trinetra AI) भी पेश किया गया है, जिसे कंपनी ने भारत के शुरुआती AI-संचालित फिल्म निर्माण और कंटेंट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म में से एक बताया है। कंपनी का कहना है कि इससे कंटेंट निर्माण की लागत और समय दोनों कम होंगे तथा युवाओं के लिए नए तरह का कंटेंट तैयार किया जा सकेगा।
स्पोर्ट्स कारोबार का भी विस्तार
जी ने स्पोर्ट्स को भी अपनी भविष्य की विकास रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है। स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग में वापसी के बाद कंपनी ने ILT20 क्रिकेट, बंगाल सुपर लीग, UP कबड्डी, पिकलबॉल लीग और प्रो गोविंदा जैसे टूर्नामेंटों के प्रसारण अधिकार हासिल किए हैं।
इसके साथ ही कंपनी ने Unite8 ब्रैंड के तहत चार नए स्पोर्ट्स चैनल भी लॉन्च किए हैं।
जी ने वर्ष 2034 तक होने वाले 39 FIFA टूर्नामेंटों के प्रसारण अधिकार भी हासिल कर लिए हैं। इनमें FIFA वर्ल्ड कप 2026, FIFA वर्ल्ड कप 2030, FIFA महिला विश्व कप 2027, युवा विश्व कप, फुटसल प्रतियोगिताएं और इंटरकॉन्टिनेंटल कप शामिल हैं।
कंपनी का कहना है कि वह आगे भी प्रीमियम स्पोर्ट्स राइट्स, प्रोडक्शन क्षमता और ब्रॉडकास्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश जारी रखेगी, ताकि युवा दर्शकों को आकर्षित किया जा सके, सब्सक्रिप्शन बढ़े और विज्ञापन से होने वाली आय में इजाफा हो।
लाइव इवेंट्स, बच्चों के कंटेंट और ब्रॉडबैंड पर भी जोर
कंपनी ने लाइव इवेंट्स के कारोबार में भी कदम रखा है, क्योंकि इस क्षेत्र में तेजी से मांग बढ़ रही है। इसके अलावा Z5 पर KidZ on Z5 नाम से 6 से 16 वर्ष के बच्चों के लिए विशेष मनोरंजन और शैक्षणिक कंटेंट भी शुरू किया गया है।
जी ने ब्रॉडबैंड और कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में भी विस्तार किया है, ताकि पारंपरिक टीवी प्रसारण से आगे बढ़कर सीधे उपभोक्ताओं तक अपनी पहुंच मजबूत की जा सके।
टीवी कारोबार में भी सुधार
कंपनी ने बताया कि उसके पारंपरिक टीवी कारोबार में भी सुधार देखने को मिला है। विभिन्न भाषाओं में फिक्शन और नॉन-फिक्शन कार्यक्रमों में निवेश के चलते उसके नेटवर्क की बाजार हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
24.95 करोड़ वारंट जारी करेगी कंपनी
इन सभी योजनाओं के लिए जी 24.95 करोड़ पूरी तरह परिवर्तनीय (Fully Convertible) वारंट 126 रुपये प्रति वारंट के भाव पर सनब्राइट मॉरीशस इन्वेस्टमेंट्स को जारी करना चाहती है। इससे कंपनी 3,143.5 करोड़ रुपये तक जुटाएगी।
कंपनी के अनुसार, यह इश्यू प्राइस सेबी के नियमों के तहत तय कीमत से 11.86 प्रतिशत अधिक है। यह बोर्ड की मंजूरी वाले दिन के बाजार बंद भाव से 16.33 प्रतिशत और एनएसई के पिछले 90 दिनों के वॉल्यूम-वेटेड औसत मूल्य से 28.61 प्रतिशत ज्यादा है।
इन वारंटों को 18 महीने के भीतर इक्विटी शेयरों में बदला जा सकेगा। निवेशक को पहले 25 प्रतिशत राशि जमा करनी होगी, जबकि बाकी रकम वारंट को शेयर में बदलते समय देनी होगी।
कंपनी का कहना है कि यह निवेश प्रमोटर समूह की जी के भविष्य और उसकी डिजिटल बदलाव (Digital Transformation) की रणनीति के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कंसेंट कल्चर रिपोर्ट में महिलाओं के अनुभवों के आधार पर सहमति, सुरक्षा, समानता, डिजिटल निजता, कार्यस्थल और पारिवारिक दबाव से जुड़े महत्वपूर्ण सामाजिक पहलुओं का विश्लेषण किया गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इंडिया टुडे (India Today) ने ड्यूरेक्स द बर्ड्स एंड बीज़ टॉक (Durex The Birds and Bees Talk) के साथ साझेदारी में ‘कंसेंट कल्चर सर्वे’ पर आधारित विशेष अंक जारी किया है। इस अंक में ‘इंडिया टुडे-ड्यूरेक्स द बर्ड्स एंड बीज़ टॉक कंसेंट कल्चर रिपोर्ट: अवेयरनेस, इक्विटी, इंक्लूजन एंड प्रोटेक्शन’ के निष्कर्ष प्रकाशित किए गए हैं।
प्रतिष्ठित शोध संस्था सी-वोटर (CVoter) द्वारा किए गए इस राष्ट्रीय सर्वे में केवल महिलाओं की राय शामिल की गई है। रिपोर्ट का उद्देश्य यह समझना है कि भारतीय समाज में सहमति (Consent) को किस तरह समझा, स्वीकार किया और व्यवहार में लागू किया जाता है।
रिपोर्ट बताती है कि आज भारतीय महिलाएं सहमति के महत्व को पहले की तुलना में बेहतर समझती हैं, लेकिन इसे अपने जीवन में लागू करने के दौरान उन्हें सामाजिक, पारिवारिक, भावनात्मक और संस्थागत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सर्वे में सहमति को केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित न रखकर आत्मनिर्णय, गरिमा, सुरक्षा, पारिवारिक दबाव, कार्यस्थल की संस्कृति, सार्वजनिक स्थानों, डिजिटल दुनिया और निजी रिश्तों जैसे विभिन्न पहलुओं से जोड़ा गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, सिद्धांत और व्यवहार के बीच बड़ा अंतर मौजूद है। कई महिलाओं के लिए ‘ना’ कहना आसान नहीं होता, क्योंकि इसके सामाजिक और भावनात्मक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। परिवार की अपेक्षाएं, कार्यस्थल पर वरिष्ठता का दबाव, सार्वजनिक स्थानों की असुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तस्वीरों, संदेशों तथा निजी जानकारी के दुरुपयोग जैसी समस्याएं महिलाओं की स्वतंत्र सहमति को प्रभावित करती हैं।
विशेष अंक में सहमति से जुड़ी शिक्षा पर भी जोर दिया गया है। सर्वे में बड़ी संख्या में लोगों ने बचपन से ही आयु-उपयुक्त तरीके से सीमाओं, सम्मान, सुरक्षा, व्यक्तिगत अधिकारों और ‘ना’ कहने के अधिकार पर औपचारिक शिक्षा देने का समर्थन किया है।
यह पहल ड्यूरेक्स द बर्ड्स एंड बीज़ टॉक के उस उद्देश्य से भी जुड़ी है, जिसके तहत किशोरों के बीच स्वस्थ संबंधों, जीवन कौशल, सुरक्षा, समानता और सहमति को लेकर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
इंडिया टुडे ग्रुप (India Today Group) के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी (Aroon Purie) ने कहा कि सहमति व्यक्ति की गरिमा और सम्मान का मूल आधार है, लेकिन भारत में इसे सिद्धांत रूप में तो स्वीकार किया जाता है, जबकि व्यवहार में इसकी समझ और पालन समान रूप से नहीं हो पाता।
वहीं रेकिट (Reckitt) के साउथ एशिया के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट गौरव जैन (Gaurav Jain) ने कहा कि भारत में सहमति पर चर्चा लंबे समय तक चुप्पी, गलत धारणाओं और सामाजिक सोच से प्रभावित रही है। उनका मानना है कि यह रिपोर्ट वास्तविक आंकड़ों और महिलाओं के अनुभवों के आधार पर इस विषय पर सार्थक राष्ट्रीय संवाद को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
इस विशेष अंक में विशेषज्ञों के विश्लेषण, सर्वे के विस्तृत निष्कर्ष और सार्वजनिक, पारिवारिक, वैवाहिक, कार्यस्थल तथा डिजिटल जीवन में सहमति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा की गई है। रिपोर्ट का उद्देश्य भारतीय समाज में सम्मान, समानता, सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वायत्तता पर आधारित संस्कृति को मजबूत करने के लिए तथ्यपरक और रचनात्मक विमर्श को बढ़ावा देना है।
टीवी पत्रकारिता की जानी-मानी पत्रकार मनोज्ञा लोईवाल को NDTV में बड़ी जिम्मेदारी मिली है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
टीवी पत्रकारिता की जानी-मानी पत्रकार मनोज्ञा लोईवाल को NDTV में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। उन्हें एग्जिक्यूटिव एडिटर व एंकर के पद पर पदोन्नत किया गया है। इससे पहले वह चैनल में सीनियर एडिटर व एंकर के तौर पर कार्यरत थीं।
मनोज्ञा लोईवाल देश की उन चुनिंदा पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने दो दशक से अधिक समय में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। उन्होंने राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय मामलों और सामाजिक मुद्दों पर व्यापक रिपोर्टिंग की है।
NDTV से पहले वह ABP News में एंकर व एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट) के रूप में कार्य कर चुकी हैं। इससे पहले उन्होंने India Today Group और Aaj Tak में पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के साथ-साथ बांग्लादेश की रिपोर्टिंग की। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने Dainik Jagran से की थी। इसके अलावा वह नेटवर्क18 और NewsX के साथ भी काम कर चुकी हैं।
वर्ष 2023 में उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट (Honorary Doctorate) से सम्मानित किया गया। वह Indian School of Business की फेलो भी हैं और सात से अधिक भाषाओं का ज्ञान रखती हैं।
अपने पत्रकारिता करियर में मनोज्ञा लोईवाल ने नरेंद्र मोदी, अमिताभ बच्चन, अमित शाह और ममता बनर्जी सहित कई प्रमुख हस्तियों के इंटरव्यू किए हैं।
उन्हें चीन के वुहान से रिपोर्टिंग करने वाली एशिया की पहली पत्रकार माना जाता है। इसके अलावा उन्होंने कोविड-19 महामारी, चक्रवात अम्फान, बालासोर ट्रेन हादसा, लोकसभा चुनाव, डोकलाम, रोहिंग्या संकट, नेपाल भूकंप और भारत-चीन सीमा से जुड़ी कई अहम घटनाओं की ग्राउंड रिपोर्टिंग की है।
मनोज्ञा लोईवाल को पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इनमें रामनाथ गोयनका अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म, ENBA Award, NT Award, डॉ. सरोजिनी नायडू इंटरनेशनल अवॉर्ड, भारत निर्माण अवॉर्ड और India Today Group Chairman’s Award शामिल हैं। वह रक्षा मंत्रालय से प्रमाणित डिफेंस कॉरेस्पॉन्डेंट, गूगल सर्टिफाइड फैक्ट चेकर और BBC World Service Trust से फीचर राइटिंग में प्रमाणित पत्रकार भी हैं।
मीडिया व ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री का एक वर्ग मानता है कि टीवी रेटिंग की मौजूदा चुनौतियों का समाधान पैनल बढ़ाने में नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से सीधे फर्स्ट-पार्टी व्युअरशिप डेटा हासिल करने में है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
मीडिया और ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री के एक बढ़ते वर्ग का मानना है कि टीवी रेटिंग सिस्टम की मौजूदा चुनौतियों का समाधान टीवी पैनल का आकार बढ़ाने में नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से सीधे फर्स्ट-पार्टी व्युअरशिप डेटा हासिल करने में है।
इंडस्ट्री में चर्चा में चल रहे एक प्रस्ताव में कहा गया है कि समाधान बड़ा पैनल नहीं, बल्कि API (एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) एक्सेस है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, हर OTT प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी (CTV) सर्विस और डिजिटल वीडियो डिस्ट्रीब्यूटर को मान्यता प्राप्त ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसियों को वास्तविक समय (रियल-टाइम) में गुमनाम (अनॉनिमाइज्ड) व्युअरशिप डेटा तक API के जरिए पहुंच देनी चाहिए। साथ ही, हर कंटेंट पर एक समान वॉटरमार्क होना चाहिए, ताकि टेलीविजन, स्ट्रीमिंग और कनेक्टेड डिवाइसेज पर एक ही "Content Rating Point (CRP)" लागू किया जा सके।
यह प्रस्ताव काफी आकर्षक लगता है। इससे सैंपल बायस खत्म हो सकता है, पीपल मीटर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, घरों की भर्ती (हाउसहोल्ड रिक्रूटमेंट) नहीं करनी होगी और कुछ हजार घरों के पैनल की जगह करोड़ों दर्शकों के डेटा के आधार पर ऑडियंस मेजरमेंट किया जा सकेगा।
लेकिन इंडस्ट्री के वरिष्ठ अधिकारियों, मीडिया एजेंसियों और ऑडियंस मेजरमेंट विशेषज्ञों ने 'एक्सचेंज4मीडिया' को बताया कि इस प्रस्ताव में सबसे बड़ी चुनौती को नजरअंदाज किया गया है। उनका कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के पास अपना डेटा किसी स्वतंत्र थर्ड-पार्टी मेजरमेंट कंपनी के साथ साझा करने का न तो व्यावसायिक कारण है और न ही कोई नियामकीय बाध्यता।
एक वैश्विक मीडिया कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "लोग मान लेते हैं कि API पहले से तैयार हैं और बस उन्हें जोड़ने की जरूरत है। लेकिन प्लेटफॉर्म बिजनेस ऐसे काम नहीं करते। सवाल यह नहीं है कि तकनीक मौजूद है या नहीं। असली सवाल यह है कि Google, Amazon, Netflix या Meta जैसी कंपनियां अपना डेटा साझा करने के लिए तैयार हैं या नहीं।"
बंद इकोसिस्टम, खुला मेजरमेंट नहीं
जहां पारंपरिक टेलीविजन में ब्रॉडकास्टर्स ने मिलकर Broadcast Audience Research Council (BARC) के जरिए एक निष्पक्ष इंडस्ट्री करंसी बनाई और उसे फंड किया, वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अपने-अपने स्वतंत्र इकोसिस्टम के रूप में काम करते हैं।
Google (जिसके पास YouTube है), Amazon (जिसके पास MX Player और Prime Video हैं), Netflix और Meta जैसी वैश्विक टेक कंपनियां हमेशा से अपने ऑडियंस डेटा पर सख्त नियंत्रण रखती आई हैं। वे ऐडवर्टाइजिंगदाताओं को मुख्य रूप से अपने ही इकोसिस्टम के भीतर प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराती हैं।
हालांकि ये कंपनियां कुछ चुनिंदा API और क्लीन-रूम एनवायरमेंट के जरिए मेजरमेंट पार्टनरशिप का समर्थन करती हैं, लेकिन वे अपने मूल व्युअरशिप डेटा तक किसी भी थर्ड-पार्टी को बिना रोक-टोक पहुंच नहीं देतीं।
इसी वजह से स्वतंत्र मेजरमेंट कंपनियां प्लेटफॉर्म के वास्तविक डेटा की बजाय मॉडलिंग, पब्लिशर इंटीग्रेशन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट किट (SDK), सेंसस टैग और पैनल कैलिब्रेशन जैसे तरीकों का इस्तेमाल करती हैं।
एक OTT प्लेटफॉर्म के अधिकारी ने कहा, "यह मान लेना कि हर प्लेटफॉर्म आसानी से करोड़ों दर्शकों का डेटा किसी इंडस्ट्री बॉडी को सौंप देगा, व्यावसायिक वास्तविकता को नजरअंदाज करना है। ये खरबों डॉलर की कंपनियां हैं और ऑडियंस डेटा उनकी सबसे मूल्यवान रणनीतिक संपत्तियों में से एक है।"
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में भी Nielsen, Comscore और VideoAmp जैसी कंपनियों के वर्षों के निवेश के बावजूद क्रॉस-प्लेटफॉर्म मेजरमेंट अभी भी पूरी तरह एकीकृत नहीं हो पाया है।
आज दुनिया का कोई भी बाजार ऐसा नहीं है, जहां टेलीविजन, YouTube, Meta, Netflix, Amazon Prime Video और सभी Connected TV प्लेटफॉर्म्स को एक समान API के जरिए एक ही प्लेटफॉर्म-न्यूट्रल मेजरमेंट सिस्टम में जोड़ा गया हो।
सिर्फ API से नहीं सुलझेगा भरोसे का सवाल
इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि अगर पीपल मीटर की जगह API का इस्तेमाल किया जाए, तो भरोसे की समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाएगा।
BARC के एक पूर्व बोर्ड सदस्य ने सवाल उठाया, "अगर मेजरमेंट एजेंसी को डेटा प्लेटफॉर्म्स से मिलेगा, तो उन प्लेटफॉर्म्स का ऑडिट कौन करेगा? आज पैनलों का ऑडिट होता है, उनकी जांच होती है और सांख्यिकीय रूप से उन्हें प्रमाणित किया जाता है। लेकिन अगर कल सारे आंकड़े प्लेटफॉर्म API से आएंगे, तो इंडस्ट्री को खुद प्लेटफॉर्म द्वारा दिए गए आंकड़ों पर भरोसा करना पड़ेगा।"
कई अधिकारियों ने यह भी कहा कि API समय के साथ बदलते रहते हैं।
टेक कंपनियां समय-समय पर अपने API में बदलाव करती हैं, एंगेजमेंट की परिभाषाएं बदलती हैं और नई प्राइवेसी पाबंदियां लागू करती हैं। कई बार ये बदलाव इंडस्ट्री से सलाह किए बिना ही कर दिए जाते हैं।
एक अधिकारी ने कहा, "इंडस्ट्री की करंसी इस बात पर निर्भर नहीं हो सकती कि अगले तीन महीने में कोई प्लेटफॉर्म अपनी डेवलपर पॉलिसी बदल दे।"
सिर्फ व्यू गिनना ही मेजरमेंट नहीं है
विशेषज्ञों का कहना है कि ऑडियंस मेजरमेंट केवल व्यू या इम्प्रेशन गिनने का काम नहीं है।
टेलीविजन रेटिंग सिस्टम यह भी बताता है कि एक कार्यक्रम कितने लोगों ने साथ बैठकर देखा, दर्शकों की उम्र और वर्ग क्या था, घर की विशेषताएं क्या थीं और अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर कितने दर्शक समान थे। यह जानकारी सिर्फ सर्वर के डेटा से पूरी तरह नहीं मिल पाती।
ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री के एक अधिकारी ने कहा, "यह जानना कि किसी डिवाइस पर कोई कार्यक्रम चला, और यह जानना कि उसे वास्तव में किसने देखा, दोनों अलग-अलग बातें हैं। ऐडवर्टाइजिंगदाता डिवाइस नहीं खरीदते, वे दर्शक खरीदते हैं।"
भारत जैसे देश में यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि यहां अक्सर एक ही टीवी कई लोग मिलकर देखते हैं और Connected TV भी पूरे परिवार द्वारा साझा किया जाता है।
वॉटरमार्क लागू करना भी आसान नहीं
यह प्रस्ताव यह भी मानकर चलता है कि सभी ब्रॉडकास्टर्स और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स एक समान वॉटरमार्क तकनीक अपनाएंगे।
हालांकि वॉटरमार्किंग तकनीक पहले से मौजूद है, लेकिन इसे पूरे इंडस्ट्री में लागू करने के लिए ब्रॉडकास्टर्स, OTT प्लेटफॉर्म्स, स्मार्ट टीवी निर्माता और टेक कंपनियों को एक समान तकनीकी मानकों पर सहमत होना होगा।
इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और नीतिगत चुनौती भी है।
ब्रॉडकास्ट टेक्नोलॉजी क्षेत्र के एक अधिकारी ने कहा, "मानकीकरण सुनने में आसान लगता है, लेकिन जब प्रतिस्पर्धी कंपनियों से एक जैसे प्रोटोकॉल अपनाने को कहा जाता है, तब असली चुनौती सामने आती है।"
नीति तकनीक को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन सहयोग को नहीं
API आधारित मेजरमेंट के समर्थक अक्सर Television Rating Agencies Policy, 2026 का हवाला देते हैं। इस नीति में तकनीक-न्यूट्रल मेजरमेंट फ्रेमवर्क की बात कही गई है और नई पद्धतियों के लिए जगह छोड़ी गई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नीति नए प्रयोगों के लिए लचीलापन देती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निजी कंपनियों को अपना डेटा साझा करना ही होगा।
एक अधिकारी ने कहा, "यह नीति कई तरह की तकनीकों को अपनाने की अनुमति देती है, लेकिन यह किसी निजी कंपनी को अपना स्वामित्व वाला ऑडियंस डेटा सार्वजनिक करने के लिए मजबूर नहीं करती।"
उनका कहना है कि जब तक सरकार हस्तक्षेप नहीं करती या कंपनियां स्वेच्छा से सहमत नहीं होतीं, तब तक स्वतंत्र मेजरमेंट एजेंसियों को वही चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी जो आज मौजूद हैं।
हाइब्रिड मॉडल बन सकता है बेहतर विकल्प
BARC रेटिंग्स पर फिलहाल लगी रोक के बाद पैनल आधारित मेजरमेंट सिस्टम पर सवाल और तेज हो गए हैं। खासकर पैनल से छेड़छाड़ और छोटे सैंपल साइज को लेकर पहले भी कई विवाद सामने आ चुके हैं।
इसके बावजूद कई इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि पैनल सिस्टम को पूरी तरह खत्म करना समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि नई मुश्किलें पैदा करेगा।
दुनिया के कई बाजारों में अब हाइब्रिड मेजरमेंट मॉडल अपनाया जा रहा है, जिसमें करोड़ों डिजिटल सिग्नल्स और सांख्यिकीय रूप से संतुलित पैनल- दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे दर्शकों की प्रोफाइल, साथ बैठकर देखने की आदत और अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर एक ही दर्शक की मौजूदगी का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।
इस मॉडल में जो प्लेटफॉर्म डेटा साझा करना चाहते हैं, वे सेंसस स्तर की जानकारी दे सकते हैं, जबकि स्वतंत्र रूप से ऑडिट किए गए पैनल को कैलिब्रेशन लेयर के रूप में बनाए रखा जाता है।
एक समान करंसी की तलाश जारी
ऐडवर्टाइजिंगदाता लंबे समय से ऐसी एक समान ऑडियंस करंसी चाहते हैं, जिससे टेलीविजन, Connected TV, स्ट्रीमिंग और मोबाइल वीडियो- सभी का आकलन एक ही पैमाने पर किया जा सके। "एक कार्यक्रम, एक आंकड़ा, हर स्क्रीन" का विचार आज भी आकर्षक माना जाता है।
लेकिन इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इस लक्ष्य तक पहुंचने में सबसे बड़ी भूमिका तकनीक की नहीं, बल्कि गवर्नेंस, व्यावसायिक हितों और बाजार की संरचना की होगी।
एक वरिष्ठ मीडिया बायर ने कहा, "तकनीक सबसे आसान हिस्सा है। सबसे मुश्किल काम यह है कि प्रतिस्पर्धी कंपनियां, खासकर वैश्विक प्लेटफॉर्म्स, उस डेटा पर अपना नियंत्रण छोड़ें, जिस पर उनका पूरा ऐडवर्टाइजिंग कारोबार टिका हुआ है।"
फिलहाल भारत में टीवी और डिजिटल ऑडियंस मेजरमेंट पर चल रही बहस का फोकस पैनल सिस्टम को पूरी तरह हटाने पर नहीं, बल्कि ऐसा हाइब्रिड मॉडल बनाने पर है जो दोनों प्रणालियों की खूबियों को साथ लेकर चले। क्योंकि डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग की दुनिया में डेटा तक पहुंच आखिरकार तकनीक नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उस प्लेटफॉर्म का मालिक कौन है।
दूरदर्शन ने अपने ब्रॉडकास्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण के तहत 14.5 करोड़ रुपये की लागत से एंड-टू-एंड 4K UHD फाइल-बेस्ड प्रोडक्शन वर्कफ्लो स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
दूरदर्शन (Doordarshan) ने अपने ब्रॉडकास्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए 4K अल्ट्रा हाई डेफिनिशन (Ultra High Definition-UHD) प्रोडक्शन इकोसिस्टम विकसित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत सार्वजनिक प्रसारक ने लगभग 14.5 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली परियोजना शुरू की है, जिसका उद्देश्य पूरी तरह डिजिटल और फाइल-बेस्ड 4K प्रोडक्शन वर्कफ्लो तैयार करना है।
इस परियोजना के तहत केवल नए उपकरण खरीदने के बजाय दूरदर्शन (Doordarshan) नेटवर्क के लिए एकीकृत एंड-टू-एंड UHD फाइल-बेस्ड वर्कफ्लो (End-to-End UHD File-Based Workflow) विकसित किया जाएगा। इस प्रणाली के जरिए कंटेंट विभिन्न विभागों के बीच पूरी तरह डिजिटल तरीके से स्थानांतरित होगा, जिससे प्रोडक्शन प्रक्रिया अधिक तेज, प्रभावी और 4K कंटेंट निर्माण के अनुकूल बन सकेगी।
प्रसार भारती (Prasar Bharati) के महानिदेशालय, दूरदर्शन (Directorate General, Doordarshan) ने "डीडी नेटवर्क (DD Network) के लिए एंड-टू-एंड UHD फाइल-बेस्ड वर्कफ्लो सुविधा" की सप्लाई, इंस्टॉलेशन, टेस्टिंग और कमीशनिंग (Supply, Installation, Testing and Commissioning-SITC) के लिए टेंडर जारी किया है।
करीब 14.5 करोड़ रुपये की इस परियोजना को छह महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे संकेत मिलता है कि दूरदर्शन (Doordarshan) पूरे नेटवर्क में एक आधुनिक 4K प्रोडक्शन बैकबोन तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। नई प्रणाली के तहत फुटेज सीधे केंद्रीय स्टोरेज (Central Storage) में अपलोड किया जा सकेगा। संपादक (Editors) एक ही मीडिया फाइल पर एक साथ काम कर सकेंगे, क्वालिटी कंट्रोल (Quality Control) को स्वचालित किया जा सकेगा, डिजिटल आर्काइव (Digital Archive) का बेहतर प्रबंधन होगा और कंटेंट को प्रसारण के लिए अधिक सहज तरीके से तैयार किया जा सकेगा।
टेंडर पहले 17 जुलाई को खोला जाना था, लेकिन प्रशासनिक कारणों से दूरदर्शन (Doordarshan) ने बोली जमा करने की अंतिम तिथि बढ़ा दी है। अब निविदाएं 21 जुलाई 2026 को खोली जाएंगी, जबकि अन्य सभी शर्तें पहले जैसी ही रहेंगी।
इसी दिन जारी एक अन्य टेंडर में दूरदर्शन (Doordarshan) ने रोबोटिक कैमरे (Robotic Cameras), रोबोटिक हेड्स (Robotic Heads), ट्रैक डॉली विद एलिवेशन कॉलम (Track Dollies with Elevation Columns) और मिररलेस फुल-फ्रेम कैमरों (Mirrorless Full-frame Cameras) की खरीद के लिए भी निविदाएं आमंत्रित की हैं। इससे स्पष्ट है कि प्रसारक केवल स्टूडियो उपकरण ही नहीं, बल्कि संपूर्ण डिजिटल ब्रॉडकास्ट वर्कफ्लो को भी आधुनिक बनाने पर निवेश कर रहा है।