TAM Media की टीवी रेटिंग कारोबार में वापसी की तैयारी, लाइसेंस के लिए किया आवेदन

TAM Media Research ने सरकार की नई टेलीविजन रेटिंग नीति 2026 के तहत टेलीविजन दर्शकों की माप करने के लिए लाइसेंस का आवेदन किया है।

Last Modified:
Friday, 11 September, 2026
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TAM Media Research ने सरकार की नई टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 के तहत टेलीविजन दर्शकों की माप करने के लिए लाइसेंस का आवेदन किया है। इसके साथ ही भारत में टेलीविजन रेटिंग कारोबार में TAM की दोबारा वापसी की संभावना बढ़ गई है। इस घटनाक्रम से परिचित लोगों ने इसकी जानकारी एक्सचेंज4मीडिया को दी है।

समझा जाता है कि TAM का प्रस्तावित मीजरमेंट मॉडल शुरुआत में रिटर्न-पाथ डेटा (RPD) पर आधारित होगा। इसके बाद कंपनी साझेदारियों के जरिए अलग-अलग स्क्रीन पर दर्शकों की माप का विस्तार कर सकती है। इसमें कनेक्टेड टीवी मीजरमेंट कंपनी VTION के साथ उसकी मौजूदा साझेदारी भी शामिल है। इससे संकेत मिलता है कि TAM केवल पुराने पैनल आधारित टीवी रेटिंग मॉडल को दोहराने के बजाय कई तरह के डेटा स्रोतों को मिलाकर अपना मीजरमेंट मॉडल तैयार करना चाहती है।

बदला TAM का रुख

यह आवेदन TAM के उस सार्वजनिक रुख से एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जो कंपनी ने मार्च में संशोधित पॉलिसी जारी होने के बाद अपनाया था। TAM ने पहले संकेत दिया था कि BARC India के साथ अपने संयुक्त उपक्रम के बाद, उद्योग की जरूरतों के आधार पर वह रेटिंग मीजरमेंट के अगले चरण में BARC को सहयोग देने के लिए तैयार है।

अब लाइसेंस के लिए आवेदन करने के फैसले से संकेत मिलता है कि TAM नई व्यवस्था के तहत रेटिंग इकोसिस्टम में अधिक सीधी भूमिका निभाना चाहती है। नई पॉलिसी के तहत एक से ज्यादा रेटिंग एजेंसियों को काम करने की अनुमति है।

RPD और CTV साझेदारी पर आधारित होगा मॉडल

TAM के प्रस्तावित मॉडल में शुरुआत में दर्शकों के डेटा के स्रोत के तौर पर RPD का इस्तेमाल किए जाने की उम्मीद है। इसके बाद साझेदारियों के जरिए अलग-अलग स्क्रीन पर दर्शकों की माप का विस्तार किया जा सकता है।

इस तरीके से TAM को बड़े पैमाने पर टेलीविजन देखने से जुड़े डेटा तक पहुंच मिल सकती है, जबकि विशेषज्ञ साझेदार कनेक्टेड टीवी और डिजिटल दर्शकों से जुड़ी अतिरिक्त क्षमताएं उपलब्ध करा सकते हैं।

जून में TAM Media Research ने VTION के साथ साझेदारी कर CTV Ad Pulse लॉन्च किया था। इसमें TAM की विज्ञापन निगरानी क्षमता और VTION की कनेक्टेड टीवी दर्शक मीजरमेंट क्षमता को जोड़ा गया है। यह समाधान कनेक्टेड टीवी पर विज्ञापन दिखने और दर्शकों के देखने के व्यवहार को जोड़ता है। इसका उद्देश्य अलग-अलग मार्केटों में दर्शकों की प्रोफाइल, पहुंच, विज्ञापन देखने की आवृत्ति और अभियान की पहुंच को मीजरमेंटा है।

VTION 1 लाख से ज्यादा स्मार्टफोन के पैनल के जरिए सहमति आधारित और बिना किसी अतिरिक्त हस्तक्षेप के दर्शक मीजरमेंट करता है। कंपनी ने इस चुने गए पैनल मॉडल को कनेक्टेड टेलीविजन तक भी बढ़ाया है। ऐसे में TAM और VTION की साझेदारी TAM को टेलीविजन और डिजिटल स्क्रीन पर दर्शकों के व्यवहार को जोड़ने का एक मौजूदा रास्ता दे सकती है, क्योंकि कंपनी अपने व्यापक मीजरमेंट मॉडल को विकसित कर रही है।

MIB कनेक्टेड टीवी मीजरमेंट की क्षमता को समझ रहा

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) यह देख रहा है कि बदलते दर्शक व्यवहार के बीच टेलीविजन मीजरमेंट को किस तरह बदला जा सकता है। इसमें पारंपरिक टीवी, स्मार्ट टीवी और कनेक्टेड डिवाइस पर होने वाली खपत शामिल है।

मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, मंत्रालय ने कनेक्टेड टीवी मीजरमेंट की क्षमताओं को समझने के लिए TAM और Chrome DM दोनों से संपर्क किया है।

Chrome DM बड़े पैमाने पर दर्शकों के देखने से जुड़ा डेटा जुटाने वाली स्वचालित कनेक्टेड टीवी मीजरमेंट प्रणाली संचालित करता है। कंपनी पहले कह चुकी है कि आने वाले समय में टेलीविजन मीजरमेंट के लिए कई तरह के डेटा स्रोतों को जोड़ना जरूरी होगा। इसमें जनगणना स्तर का डेटा और प्रतिनिधि पैनल डेटा शामिल हो सकता है, ताकि दर्शकों की जनसांख्यिकीय प्रोफाइल तैयार की जा सके।

नई पॉलिसी के तहत यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है। प्रतिनिधि पैनल दर्शकों की जनसांख्यिकीय जानकारी और एक समान टीवी रेटिंग माप के लिए जरूरी बने रहेंगे। वहीं, स्वचालित CTV और RPD सिस्टम बड़ी मात्रा में डिवाइस स्तर पर देखने से जुड़ा डेटा उपलब्ध करा सकते हैं।

सिर्फ तकनीक से नहीं चलेगा रेटिंग सिस्टम

उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि रेटिंग लाइसेंस हासिल करना किसी कंपनी के लिए एक भरोसेमंद रेटिंग सिस्टम तैयार करने की दिशा में सिर्फ पहला कदम है।

एक वरिष्ठ प्रसारण अधिकारी ने कहा कि रेटिंग एजेंसी का काम सिर्फ यह गिनना नहीं है कि कितनी टीवी स्क्रीन चल रही हैं। इसके लिए प्रतिनिधि पैनल, फील्ड ऑपरेशन, पीपल मीटर और दूसरी मीजरमेंट सुविधाओं के साथ डेटा प्रोसेसिंग, सांख्यिकीय मॉडलिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रशासनिक व्यवस्था और ऐसे सिस्टम की जरूरत होती है, जो प्रसारकों, विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों की जांच-पड़ताल का सामना कर सके।

संशोधित पॉलिसी में रेटिंग एजेंसियों के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की जरूरत 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई है। हालांकि, देशभर में रेटिंग मीजरमेंट का पूरा सिस्टम खड़ा करने की लागत इससे काफी ज्यादा हो सकती है।

उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, देशव्यापी रेटिंग ऑपरेशन स्थापित करने में 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश लग सकता है। इसमें पैनल का विस्तार, पीपल मीटर, फील्ड ऑपरेशन, तकनीक, डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियों से जुड़े खर्च शामिल हैं।

क्या रेटिंग मार्केट और ज्यादा बंटेगा?

TAM का लाइसेंस आवेदन इस चर्चा को और तेज कर सकता है कि भारत का भविष्य का टीवी रेटिंग इकोसिस्टम केवल पूरी सेवाएं देने वाली रेटिंग एजेंसियों तक सीमित रहेगा या मीजरमेंट व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों के लिए विशेषज्ञ कंपनियां भी भूमिका निभाएंगी।

एक संभावित मॉडल में प्रतिनिधि पैनल से दर्शकों की जनसांख्यिकीय माप, RPD और स्वचालित CTV सिस्टम से बड़े पैमाने पर दर्शक खपत का डेटा और फिर इन सभी स्रोतों को जोड़कर अंतिम रेटिंग तैयार करने वाली एजेंसी शामिल हो सकती है।

इस तरह की व्यवस्था से विज्ञापनदाताओं और प्रसारकों को दर्शकों को ज्यादा विस्तार से समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके साथ डेटा की पद्धति, अलग-अलग स्रोतों के डेटा को जोड़ने, डुप्लीकेट डेटा हटाने, ऑडिट और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े सवाल भी सामने आएंगे।

TAM के लिए लाइसेंस आवेदन और VTION के साथ उसकी साझेदारी से संकेत मिलता है कि मार्केट में उसकी संभावित वापसी पारंपरिक टीवी रेटिंग मॉडल को दोबारा खड़ा करने के बजाय अलग-अलग स्क्रीन पर दर्शकों के मीजरमेंट पर आधारित व्यापक मॉडल के साथ हो सकती है।

अब सबसे अहम सवाल यह है कि TAM का RPD आधारित प्रस्तावित मॉडल नए नियामकीय ढांचे में किस तरह फिट बैठता है। साथ ही यह भी देखना होगा कि उद्योग आगे चलकर कई पूरी सेवाएं देने वाली रेटिंग एजेंसियों का मॉडल अपनाता है या फिर ऐसा मॉड्यूलर सिस्टम विकसित होता है, जिसमें अलग-अलग विशेषज्ञ कंपनियां दर्शकों के डेटा की अलग-अलग परतों में योगदान देंगी। 

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TRAI की भूमिका पर MIB का रुख साफ, TV Ratings Policy में औपचारिक जगह देने से किया इनकार

टेलीविजन रेटिंग्स को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) और टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) के बीच खींचतान जारी है।

Last Modified:
Friday, 11 September, 2026
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इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

टेलीविजन रेटिंग्स को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) और टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) के बीच खींचतान जारी है। मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, MIB ने TRAI को बताया है कि उसने टेलीविजन रेटिंग्स के ढांचे को लेकर TRAI की कुछ सिफारिशों को स्वीकार किया है, लेकिन टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 में TRAI को औपचारिक भूमिका देने की उसकी मांग को स्वीकार नहीं किया है।

सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय का कहना है कि टेलीविजन रेटिंग्स के ढांचे में TRAI को औपचारिक भूमिका देना कोई स्थापित या सामान्य व्यवस्था नहीं है। इस तरह मंत्रालय ने नई रेटिंग्स पॉलिसी में संशोधन कर TRAI को औपचारिक रूप से शामिल करने के नियामक के अनुरोध को प्रभावी रूप से खारिज कर दिया है। हालांकि, मंत्रालय ने यह जरूर माना है कि रेटिंग्स से जुड़े मामले में TRAI की कुछ सिफारिशों पर विचार किया गया है।

TRAI ने की थी नई पॉलिसी की समीक्षा की मांग

यह जवाब TRAI की उस हालिया पहल के बाद आया है, जिसमें नियामक ने टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 की समीक्षा करने के लिए MIB को पत्र लिखा था। नई पॉलिसी में टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट के ढांचे से TRAI की भूमिका हटा दी गई है। इसके बाद TRAI ने मंत्रालय से पॉलिसी की समीक्षा करने और रेटिंग्स के ढांचे में अपनी भूमिका को लेकर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया था।

मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, MIB ने TRAI की सिफारिशों को तो स्वीकार किया, लेकिन पॉलिसी में बदलाव कर TRAI को टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट के ढांचे में औपचारिक भूमिका देने पर सहमति नहीं जताई।

रेटिंग्स पर MIB का नियंत्रण रहेगा

सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय का रुख यह है कि टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी में TRAI को औपचारिक प्राधिकरण के तौर पर शामिल करने की कोई स्थापित परंपरा नहीं रही है। अब तक ऑडियंस मीजरमेंट को लेकर कार्यकारी अधिकार मुख्य रूप से MIB के पास रहे हैं।

टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 के तहत रेटिंग एजेंसियों के रजिस्ट्रेशन, ऑडिट, नियमों के पालन और उन्हें लागू कराने से जुड़े अधिकार MIB को दिए गए हैं। इससे टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट का पूरा ढांचा मंत्रालय के दायरे में आ गया है।

TRAI ने अपनी चिट्ठी में उन प्रावधानों पर दोबारा विचार करने की मांग की थी, जिनके कारण रेटिंग्स के ढांचे से उसकी भूमिका हट गई है। नियामक का तर्क था कि ऑडियंस मीजरमेंट का मुद्दा ब्रॉडकास्टिंग और केबल सेवाओं को लेकर उसकी व्यापक नियामकीय जिम्मेदारियों से जुड़ा है।

TRAI की भूमिका पहले सिफारिशों तक रही

एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट एग्जिक्यूटिव के मुताबिक, MIB ने TRAI को बताया है कि रेटिंग्स पॉलिसी में TRAI को औपचारिक हितधारक के रूप में शामिल करना उस तरीके के अनुरूप नहीं है, जिसके तहत यह व्यवस्था पहले से संचालित होती रही है।

मंत्रालय का यह भी मानना है कि रेटिंग्स के क्षेत्र में TRAI की भूमिका ऐतिहासिक रूप से सिफारिश देने वाली रही है, जबकि अंतिम पॉलिसी बनाने और उसे लागू करने की जिम्मेदारी MIB के पास रही है।

पहले लागू 2014 के टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट फ्रेमवर्क के दौरान भी TRAI ने ब्रॉडकास्टिंग रेगुलेशन से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर कंसल्टेशन पेपर और सिफारिशें जारी की थीं। हालांकि, अंतिम पॉलिसी और उसे लागू करने की शक्तियां MIB के पास रही थीं।

मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा कि मंत्रालय ने TRAI की सिफारिशों को स्वीकार किया है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि रेटिंग्स पॉलिसी में TRAI को शामिल करना सामान्य व्यवस्था नहीं है।

एक अन्य सूत्र के मुताबिक, MIB का जवाब TRAI की उस मांग को नरम तरीके से खारिज करने के बराबर है, जिसमें उसने पॉलिसी में संशोधन कर अपनी औपचारिक भूमिका बहाल करने की मांग की थी।

सूत्र ने कहा कि MIB सिफारिशों को स्वीकार करने और TRAI को रेटिंग्स व्यवस्था में औपचारिक संस्थागत भूमिका देने के बीच अंतर कर रहा है। सिफारिशों को जगह दी गई है, लेकिन औपचारिक भूमिका देने की मांग को स्वीकार नहीं किया गया है।

रेटिंग्स पॉलिसी को लेकर विवाद जारी

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 को लेकर अलग-अलग हितधारकों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। खास तौर पर नई नियामकीय व्यवस्था और मंत्रालय को दिए गए अधिकारों को लेकर चर्चा हो रही है।

सरकार की ओर से अपनाई जा रही पॉलिसी को देखा जाए तो ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र में एकल नियामकीय ढांचे की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत मिलता है। टेलीविजन, डिजिटल मीडिया, टेलीकॉम और दूसरे वितरण प्लेटफॉर्म के बीच बढ़ते जुड़ाव के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि अलग-अलग क्षेत्रों की नियामकीय जिम्मेदारियां किस संस्था के पास होनी चाहिए।

इंडस्ट्री से जुड़े कुछ अधिकारियों का पहले भी कहना रहा है कि TRAI और MIB के अधिकार क्षेत्र में ओवरलैप खत्म होने से ब्रॉडकास्टर्स और रेटिंग एजेंसियों के लिए नियामकीय स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।

दूसरी ओर, रेटिंग्स व्यवस्था में अपनी भूमिका बनाए रखने की TRAI की कोशिश यह दिखाती है कि नियामक ब्रॉडकास्टिंग से जुड़े व्यापक मामलों में अपनी भागीदारी बनाए रखना चाहता है।

TV Ratings क्यों हैं महत्वपूर्ण?

टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट मीडिया इंडस्ट्री के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। रेटिंग्स का सीधा असर विज्ञापन से होने वाली कमाई, चैनलों की पोजिशनिंग, मीडिया प्लानिंग और ब्रॉडकास्टर्स व विज्ञापनदाताओं के बीच व्यावसायिक बातचीत पर पड़ता है।

ऐसे में MIB के ताजा रुख से रेटिंग्स व्यवस्था में TRAI की संस्थागत भूमिका को लेकर स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट हो सकती है। हालांकि, नई रेटिंग्स पॉलिसी को जमीन पर लागू करने से जुड़े कई व्यावहारिक सवाल अभी भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। फिलहाल MIB का रुख यही दिखाई देता है कि TRAI की सिफारिशों को पॉलिसी बनाने में ध्यान में रखा जा सकता है, लेकिन टेलीविजन रेटिंग्स पर औपचारिक अधिकार मंत्रालय के पास ही रहेंगे।

आने वाले समय में टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 के लागू होने के साथ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नया ढांचा किस तरह काम करता है और ब्रॉडकास्टर्स, रेटिंग एजेंसियों तथा दूसरे हितधारक इसे किस तरह देखते हैं।

 

 

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TRAI ने टीवी विज्ञापनों की 12 मिनट की सीमा हटाई, केंद्र के फैसले के अनुरूप बदले नियम

टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापनों को लेकर एक बड़ा नियामकीय बदलाव हुआ है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टीवी चैनलों पर विज्ञापनों की अवधि को लेकर 2012 में बनाए गए नियमों को रद्द कर दिया है।

Last Modified:
Thursday, 10 September, 2026
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टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापनों को लेकर एक बड़ा नियामकीय बदलाव हुआ है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टीवी चैनलों पर विज्ञापनों की अवधि को लेकर 2012 में बनाए गए नियमों को रद्द कर दिया है। इन नियमों के तहत एक कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान एक घंटे में अधिकतम 12 मिनट के विज्ञापन दिखाने की सीमा तय थी।

यह फैसला केंद्र सरकार की ओर से केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स, 1994 में किए गए बदलाव के बाद आया है। सरकार ने इन नियमों से वह प्रावधान हटा दिया था, जिसके जरिए टीवी चैनलों पर विज्ञापनों की अवधि की 12 मिनट की सीमा प्रभावी रूप से लागू होती थी।

TRAI ने गुरुवार को Standards of Quality of Service (Duration of Advertisements in Television Channels) (Repealing) Regulations, 2026 जारी किए। इसके साथ ही टीवी चैनलों पर विज्ञापनों की अवधि को नियंत्रित करने वाला यह नियामकीय ढांचा औपचारिक रूप से वापस ले लिया गया है।

हालांकि, इन नए Repealing Regulations का असर उसी दिन से होगा, जिस दिन इन्हें ऑफिशियल गैजेट में अधिसूचित किया जाएगा।

12 मिनट की विज्ञापन सीमा हुई खत्म

TRAI के 2012 के नियमों में प्रावधान था कि किसी कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान एक Clock Hour में अधिकतम 12 मिनट के विज्ञापन दिखाए जा सकते हैं। इन नियमों के तहत TRAI को सेवा प्रदाताओं को आदेश या निर्देश जारी करने का अधिकार भी दिया गया था। इसका उद्देश्य दर्शकों के हितों की सुरक्षा और विज्ञापन अवधि से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना था।

TRAI के मुताबिक, 2012 के ये नियम मुख्य रूप से Quality of Service के तौर पर बनाए गए थे। इनका मकसद केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स में दिए गए विज्ञापन अवधि संबंधी प्रावधान की निगरानी और उसे लागू करना था।लेकिन अब केंद्र सरकार ने केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स, 1994 से वह मूल प्रावधान ही हटा दिया है, जिसके आधार पर विज्ञापनों की 12 मिनट की सीमा लागू होती थी।

ऐसे में TRAI का कहना है कि उसी प्रावधान से जुड़े अपने नियमों को जारी रखना केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स के मौजूदा प्रावधानों के अनुरूप नहीं होगा।

सरकार ने क्यों हटाई विज्ञापन सीमा?

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने 21 अगस्त को केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स, 1994 में बदलाव से जुड़ी अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत Rule 7 के sub-rule (11) को हटा दिया गया। यही वह प्रावधान था, जिसके जरिए टीवी चैनलों पर विज्ञापनों की अवधि को लेकर 12 मिनट की सीमा प्रभावी रूप से लागू होती थी।

TRAI के अनुसार, सरकार का यह फैसला टेलीविजन प्रसारण क्षेत्र में आए बड़े बदलावों के बीच लिया गया है। इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और दर्शकों के पास मनोरंजन और कंटेंट के ज्यादा विकल्प उपलब्ध हुए हैं।

सरकार ने इस पाबंदी को हटाने का उद्देश्य टेलीविजन प्रसारण क्षेत्र में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और बिजनेस की प्रक्रिया को और आसान बनाना बताया है। इस बदलाव के बाद टीवी विज्ञापन अब 12 मिनट प्रति Clock Hour की तय सीमा वाले पुराने नियामकीय ढांचे के तहत नहीं रहेंगे। यानी 2012 से लागू यह खास वैधानिक सीमा अब हटा दी गई है।

TRAI ने केंद्र के फैसले के अनुरूप बदले नियम

TRAI ने कहा कि उसके नियमों को रद्द करना इसलिए जरूरी था ताकि उसके रेगुलेशंस और केंद्र सरकार की ओर से संशोधित केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स के बीच एकरूपता बनी रहे।

TRAI के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा विज्ञापन अवधि की सीमा हटाए जाने के बाद संबंधित TRAI प्रावधानों को जारी रखना केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल्स के रूल 7(11) के मौजूदा स्वरूप के अनुरूप नहीं होता।

इसी वजह से TRAI ने 2012 के Regulations को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही इन रेगुलेशंस के तहत पहले जारी किए गए सभी Orders और Directions को भी वापस ले लिया गया है। हालांकि, इन बदलावों को प्रभावी होने के लिए नए Repealing Regulations का Official Gazette में जारी होना जरूरी है। नियम उसी तारीख से प्रभावी होंगे, जिस दिन इन्हें ऑफिशियल गैजेट में अधिसूचित किया जाएगा।

टीवी विज्ञापन के नियमों में बड़ा बदलाव

TRAI का यह फैसला भारत में टेलीविजन विज्ञापनों के नियामकीय ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है। इसके साथ टीवी चैनलों पर विज्ञापनों की अवधि को लेकर करीब एक दशक से ज्यादा समय से लागू 12 मिनट की सीमा खत्म हो गई है।

यह सीमा 2012 में दर्शकों के लिए Quality of Service से जुड़े नियम के तौर पर लागू की गई थी। अब केंद्र सरकार द्वारा मूल प्रावधान हटाए जाने के बाद TRAI ने भी उससे जुड़े अपने नियमों को रद्द कर दिया है।

TRAI ने ये Repealing Regulations 10 सितंबर 2026 को जारी किए हैं।

 

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हैप्पी बर्थडे निशांत चतुर्वेदी: मेहनत और जज्बे के दम पर मीडिया में बनाई खास पहचान

पत्रकारिता में आने से पहले वह रेडियो जॉकी भी रह चुके हैं। खेलों में भी उनकी खास पकड़ रही है और वह 100 मीटर दौड़ में स्टेट चैंपियन रह चुके हैं।

Last Modified:
Saturday, 05 September, 2026
Nishant Chaturvedi Birthday

हिंदी टीवी पत्रकारिता के लोकप्रिय चेहरों में शुमार वरिष्ठ पत्रकार निशांत चतुर्वेदी का आज जन्मदिन है। वर्तमान में ‘टीवी9 भारतवर्ष’ (TV9 Bharatvarsh) में सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहे निशांत चतुर्वेदी को मीडिया जगत में ऐसे एंकर और पत्रकार के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने अपनी मेहनत और जुनून के दम पर दो दशकों से भी ज्यादा वक्त में खास पहचान बनाई है।

निशांत चतुर्वेदी ने मीडिया में अपना करियर जून 2000 में देश के पहले निजी न्यूज चैनल ‘जी न्यूज’ (Zee News) से बतौर एंकर/रिपोर्टर किया था। वह इस चैनल के साथ दो साल तक जुड़े रहे। जून 2002 में उन्होंने द्विभाषी एंकर/कॉरेस्पॉन्डेंट के रूप में पब्लिक ब्रॉडकास्टर ‘डीडी न्यूज’ (DD NEWS) जॉइन कर लिया। यहां उनका कार्यकाल एक साल से ज्यादा समय तक चला।   

इसके बाद दिसंबर 2003 में उन्होंने प्रिंसिपल करेसपॉन्डेंट और एंकर के रूप में ‘आजतक’ (AajTak) में अपनी पारी शुरू की। जनवरी 2005 में उन्होंने ‘आजतक’ में अपनी पारी को विराम दे दिया और स्पेशल करेसपॉन्डेंट और एंकर के तौर पर ‘सहारा न्यूज’ (Sahara News) जॉइन कर लिया। यहां वह तीन साल से अधिक समय तक कार्यरत रहे और फिर यहां से बाय बोलकर जुलाई 2008 में बतौर एडिटर (न्यूजरूम) और एंकर ‘वॉइस ऑफ इंडिया’ (Voice Of India) में शामिल हो गए।

इसके बाद अप्रैल 2009 से अप्रैल 2012 तक निशांत चतुर्वेदी एंकर/एग्जिक्यूटिव प्रड्यूसर के तौर पर ‘इंडिया टीवी’ (India TV) से जुड़े रहे। निशांत चतुर्वेदी ‘न्यूज24’ (News24) में भी अपनी पारी खेल चुके हैं। हालांकि, यहां उनका कार्यकाल छोटा ही रहा। इसके बाद निशांत चतुर्वेदी अगस्त 2012 से मार्च 2014 तक ‘न्यूज एक्सप्रेस’ (News Express) में चैनल हेड भी रहे हैं।  

मार्च 2014 में निशांत चतुर्वेदी ने दोबारा ‘आजतक’ जॉइन कर लिया। यहां बतौर एग्जिक्यूटिव एडिटर/एंकर पांच साल से अधिक समय तक उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई और फिर यहां से अलविदा कहकर नवंबर 2019 में सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर के रूप में ‘टीवी9 भारतवर्ष’ (TV9 Bharatvarsh) में शामिल हो गए और तब से यहां अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

यहां उन्होंने न सिर्फ प्राइम टाइम फ्लैगशिप शो ‘फिक्र आपकी’ को डिजाइन और लॉन्च किया, बल्कि शाम चार बजे आने वाले शो ‘फुल एंड फाइनल’ की कमान भी संभालते हैं।

निशांत चतुर्वेदी की स्कूली पढ़ाई जबलपुर के क्राइस्ट चर्च स्कूल और दिल्ली के द फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया। उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से कैपिटल मार्केट्स पर प्रोफेशनल कोर्स किया और ‘ऑल इंडिया रेडियो’ व बीबीसी के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से न्यूज प्रेजेंटेशन और रिपोर्टिंग की बारीकियां सीखीं।

पत्रकारिता में आने से पहले वह रेडियो जॉकी भी रह चुके हैं। खेलों में भी उनकी खास पकड़ रही है और वह 100 मीटर दौड़ में स्टेट चैंपियन रह चुके हैं।

अपने लंबे करियर में निशांत कई दिग्गजों का इंटरव्यू कर चुके हैं। इनमें एरिक ट्रंप, डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक सलाहकार केलीनेन कॉनवे, अमेरिकी नेता सारा पॉलिन, शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, अक्षय कुमार और रणबीर कपूर जैसे नाम शामिल हैं।

समाचार4मीडिया की ओर से निशांत चतुर्वेदी को जन्मदिन की ढेरों बधाई औऱ शुभकामनाएं।

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Sun TV Network के COO सी. प्रवीण हुए रिटायर, 28 साल तक दिया योगदान

सन टीवी नेटवर्क (Sun TV Network) के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) सी. प्रवीण अपने पद से रिटायर हो गए हैं।

Vikas Saxena by
Published - Wednesday, 02 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 02 September, 2026
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सन टीवी नेटवर्क (Sun TV Network) के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) सी. प्रवीण अपने पद से रिटायर हो गए हैं। कंपनी ने बताया कि उनका रिटायरमेंट 31 अगस्त 2026 को कारोबारी समय खत्म होने के साथ प्रभावी हो गया है।

सी. प्रवीण लंबे समय से Sun TV Network से जुड़े हुए थे। वह 1998 से कंपनी के साथ काम कर रहे थे, यानी करीब 28 साल तक उन्होंने कंपनी में अपनी सेवाएं दीं। कंपनी ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान उनके विजन और नेतृत्व से Sun TV Network को काफी फायदा मिला।

Sun TV Network ने अपने खुलासे में सी. प्रवीण के लंबे जुड़ाव और योगदान की सराहना की है। कंपनी के मुताबिक, करीब तीन दशक के दौरान उनके विजन और नेतृत्व से कंपनी को फायदा मिला। 

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डॉ. सुभाष चंद्रा के आरोपों पर रिलायंस ने दी सफाई, कहा- बेबुनियाद हैं आरोप

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की ओर से रिलायंस ग्रुप और उसके मीडिया संस्थानों पर लगाए गए आरोपों के बाद अब रिलायंस ने इन आरोपों पर अपना जवाब दिया है।

Last Modified:
Friday, 28 August, 2026
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एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की ओर से रिलायंस ग्रुप और उसके मीडिया संस्थानों पर लगाए गए आरोपों के बाद अब रिलायंस ने इन आरोपों पर अपना जवाब दिया है। रिलायंस ग्रुप ने डॉ. सुभाष चंद्रा की टिप्पणियों को बेबुनियाद बताते हुए सभी आरोपों और इशारों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

रिलायंस की ओर से 28 अगस्त को जारी मीडिया बयान में कहा गया कि ग्रुप ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की टिप्पणियों पर निराशा जताई है।

‘आरोप और इशारे पूरी तरह खारिज’

रिलायंस ने अपने बयान में कहा कि रिलायंस ग्रुप का हिस्सा रहे मीडिया संस्थानों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप और इशारे पूरी तरह गलत हैं। ग्रुप ने साफ किया कि उसके मीडिया ब्रैंड्स का इस्तेमाल कभी किसी व्यक्ति पर हमला करने के लिए नहीं किया गया और न ही भविष्य में ऐसा किया जाएगा।

रिलायंस के प्रवक्ता ने कहा, “हमारे मीडिया ब्रैंड्स का इस्तेमाल कभी किसी को निशाना बनाने के लिए नहीं किया गया और न ही कभी किया जाएगा।” 

डॉ. सुभाष चंद्रा के लिए सम्मान भी जताया

हालांकि, आरोपों को खारिज करने के साथ ही रिलायंस ने डॉ. सुभाष चंद्रा के प्रति सम्मान भी जताया। कंपनी ने कहा कि वह सुभाष चंद्रा को एक कारोबारी और उद्यमी के तौर पर काफी सम्मान देती है। रिलायंस ने अपने बयान के अंत में डॉ. सुभाष चंद्रा के अच्छे भविष्य की कामना भी की।

NCLT कवरेज को लेकर शुरू हुआ विवाद

दरअसल, यह पूरा विवाद सुभाष चंद्रा की ओर से रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों की कथित रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए जाने के बाद सामने आया है। डॉ. सुभाष चंद्रा ने आरोप लगाया था कि उनके कर्ज और हालिया NCLT कार्यवाही को लेकर गलत नैरेटिव पेश किया गया। उन्होंने रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों पर उनके खिलाफ अभियान चलाने का आरोप भी लगाया था।

अब रिलायंस ने इन आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। दोनों पक्षों के बयानों के बाद यह मामला कारोबारी और मीडिया जगत में चर्चा का विषय बन गया है।

 

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NCLT मामले की कवरेज पर डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस के मीडिया संस्थानों पर उठाए सवाल

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

Last Modified:
Friday, 28 August, 2026
DrSubhashChandra5418

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके कर्ज और हाल में हुई एनसीएलटी (NCLT) की कार्यवाही को लेकर भ्रामक खबरें और गलत नैरेटिव फैलाया गया।

जी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में सुभाष चंद्रा ने सीधे तौर पर मुकेश अंबानी और टीवी18 नेटवर्क का नाम लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि नेटवर्क से जुड़े सीएनबीसी जैसे मीडिया संस्थानों ने यह गलत दावा चलाया कि उनके करीब ₹22,000 करोड़ के कर्ज का निपटारा एनसीएलटी के जरिए महज ₹6.5 करोड़ में हो गया।

मुकेश अंबानी से संपर्क की कोशिश का दावा

सुभाष चंद्रा ने कहा कि उन्होंने इस मामले को लेकर मुकेश अंबानी से संपर्क करने की कोशिश की थी। जब उन्हें कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने अंबानी को पत्र भी लिखा। चंद्रा ने अंबानी से अपील की कि उनके और उनके समूह के खिलाफ जिस तरह का कथित प्रचार चल रहा है, उसे रोका जाए।

उन्होंने रिलायंस के मीडिया नेटवर्क पर उनके खिलाफ एकतरफा अभियान चलाने का भी आरोप लगाया। डॉ. चंद्रा का कहना है कि मीडिया संस्थानों को किसी भी व्यक्ति या कारोबारी समूह के बारे में खबर दिखाते समय तथ्यों की सही जानकारी देनी चाहिए।

2019 की घटनाओं का भी किया जिक्र

सुभाष चंद्रा ने अपने आरोपों को सिर्फ हालिया घटनाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने 2019 की घटनाओं का भी जिक्र किया। चंद्रा ने आरोप लगाया कि उस समय मुकेश अंबानी से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका के कारण जी के शेयर भाव में तेज गिरावट आई थी।

उन्होंने आगे दावा किया कि इसके बाद निवेश कंपनी इनवेस्को के साथ मिलकर जी को अधिग्रहण करने की कोशिश भी हुई थी। हालांकि, डॉ. चंद्रा के मुताबिक यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका, क्योंकि उनके अनुसार यह अल्पांश शेयरधारकों यानी माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के हित में नहीं था।

बोले- अब मेरे पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं

इंटरव्यू के दौरान सुभाष चंद्रा ने अपने ऊपर पिछले कई वर्षों से चल रहे आर्थिक दबाव और संपत्तियों की बिक्री का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों के बाद उनके पास खोने के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं बचा है।

चंद्रा ने चेतावनी दी कि अगर उनके खिलाफ कथित हमले जारी रहे तो वह अपना बचाव करेंगे। उन्होंने रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों से भी अपील की कि वे तथ्यों के आधार पर खबरें दिखाएं और उनके खिलाफ किसी तरह की ‘विच हंट’ यानी लगातार निशाना बनाने वाली मुहिम न चलाएं।

रिलायंस ने आरोपों को बताया बेबुनियाद

सुभाष चंद्रा के आरोपों के सामने आने के बाद रिलायंस की ओर से भी प्रतिक्रिया दी गई। रिलायंस ने डॉ. चंद्रा के आरोपों और इशारों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

रिलायंस के प्रवक्ता ने कहा कि एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की टिप्पणियां बेबुनियाद हैं। प्रवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों का इस्तेमाल कभी किसी व्यक्ति को निशाना बनाने के लिए नहीं किया गया है और न ही भविष्य में ऐसा किया जाएगा।

रिलायंस ने अपने बयान में सुभाष चंद्रा को एक कारोबारी और उद्यमी के तौर पर सम्मान देने की बात भी कही और उनके अच्छे भविष्य की कामना की।

दो बड़े कारोबारी दिग्गजों के बीच खुली जुबानी जंग

सुभाष चंद्रा के आरोपों और रिलायंस की प्रतिक्रिया के बाद मामला काफी चर्चा में आ गया है। यह घटनाक्रम भारत के दो प्रमुख कारोबारी समूहों से जुड़े दो बड़े नामों के बीच बेहद सीधी सार्वजनिक टकराहट को दिखाता है।

खास बात यह है कि सुभाष चंद्रा ने अपने आरोपों में सिर्फ मुकेश अंबानी का नाम नहीं लिया, बल्कि रिलायंस ग्रुप के मीडिया कारोबार और उससे जुड़े संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। वहीं, रिलायंस ने इन सभी आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है।

 

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TRP का ‘लाइसेंस राज’: कागज पर आसान एंट्री, TV रेटिंग कारोबार में निवेश अब भी बड़ी चुनौती

भारतीय टेलीविजन रेटिंग कारोबार नए दौर में है। नियामकीय मंजूरी आसान हुई है, लेकिन टिकाऊ रेटिंग कारोबार खड़ा करना अब भी बड़ी चुनौती है।

Last Modified:
Thursday, 27 August, 2026
tv8540

इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत का टेलीविजन रेटिंग कारोबार अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। इसमें नियामकीय मंजूरी हासिल करना शायद थोड़ा आसान हो गया है, लेकिन व्यावसायिक रूप से टिकाऊ रेटिंग कारोबार खड़ा करना अब भी बड़ी चुनौती है। इसकी वजह यह है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने जहां नए खिलाड़ियों के लिए बाजार खोला है, वहीं ऑडियंस मापने वाली कंपनियां किस तरह काम करेंगी, इसे लेकर नियम और सख्त कर दिए हैं।

टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 के तहत रेटिंग एजेंसियों के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की जरूरत 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई है। साथ ही, इस क्षेत्र को औपचारिक रूप से एक से ज्यादा एजेंसियों के लिए खोल दिया गया है। लेकिन इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि नियामकीय स्तर पर प्रवेश की यह सीमा उस पूंजी का केवल एक छोटा हिस्सा है, जो देशभर में भरोसेमंद टीवी रेटिंग सिस्टम तैयार करने के लिए जरूरी होगी।

उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या कंपनियां ऐसे कारोबार में सैकड़ों या संभवतः हजारों करोड़ रुपये लगाने के लिए तैयार होंगी, जहां नियामकीय हस्तक्षेप यह तय कर सकता है कि मौजूदा रेटिंग सिस्टम को आंकड़े जारी करने की अनुमति मिलेगी या नहीं।

एक वरिष्ठ मीडिया अधिकारी ने कहा, “पॉलिसी ने औपचारिक प्रवेश की बाधा निश्चित रूप से कम की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निवेश की बाधा भी कम हो गई है। 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश पर विचार करने वाली कोई भी कंपनी पहले यह जानना चाहेगी कि अगले 10 साल तक नियामकीय माहौल कितना स्थिर और अनुमान के मुताबिक रहेगा।”

2026 में BARC India की टीवी रेटिंग लंबे समय तक बंद रहने के बाद यह चिंता और ज्यादा बढ़ गई है। BARC एक इंडस्ट्री-स्वामित्व वाली संस्था होने के बावजूद, उसे टेलीविजन ऑडियंस के आंकड़े जारी करना रोकने का निर्देश दिया गया था। इस दौरान नए ढांचे के तहत उसके रजिस्ट्रेशन की जांच की जा रही थी।

टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए इस पूरे घटनाक्रम ने रेटिंग सिस्टम में आए एक बुनियादी बदलाव को सामने रखा है। BARC रेटिंग मापने और सिस्टम चलाने वाली संस्था बनी रह सकती है, लेकिन एक मान्य टीवी रेटिंग करेंसी के रूप में काम करने की उसकी क्षमता अब सरकार के नियामकीय ढांचे का पालन करने पर निर्भर है।

इंडस्ट्री के सिस्टम से रेगुलेटेड इकोसिस्टम तक

BARC की स्थापना 2012 में हुई थी और उसने 2015 में एक इंडस्ट्री-आधारित टेलीविजन मापन संस्था के रूप में काम शुरू किया। इसे Indian Broadcasting & Digital Foundation (IBDF), Indian Society of Advertisers (ISA) और Advertising Agencies Association of India (AAAI) मिलकर 60:20:20 के ढांचे में प्रमोट करते हैं। इन तीनों हिस्सेदार समूहों में क्रमशः ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता और विज्ञापन एवं मीडिया एजेंसियां शामिल हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि टेलीविजन की रेटिंग करेंसी उसी विज्ञापन इकोसिस्टम के प्रमुख हिस्सेदारों द्वारा बनाई और संचालित की जाए। अब इस मॉडल के साथ सरकार की सीधी नियामकीय भूमिका भी जुड़ गई है।

टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 के तहत रेटिंग एजेंसियों को सरकार के साथ रजिस्टर कराना होगा। इसके साथ पैनल के आकार, गवर्नेंस, ऑडिट, मेथडोलॉजी, स्वतंत्रता, तकनीक और डेटा की विश्वसनीयता से जुड़ी शर्तों का पालन करना होगा। BARC समेत मौजूदा एजेंसियों को भी नए ढांचे के तहत आना होगा।

एक ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “सबसे बड़ा बदलाव यह है कि रेटिंग अब सिर्फ इंडस्ट्री की सेवा नहीं रह गई है। अब रेगुलेटर की भूमिका काफी सीधी हो गई है और वह यह तय कर सकता है कि रेटिंग सिस्टम किन शर्तों के तहत काम करेगा। यह कुछ-कुछ लाइसेंस राज जैसा है, जो अब इसमें लागू है।” इससे एक अलग तरह की व्यवस्था बन गई है- स्वामित्व इंडस्ट्री का, संचालन निजी स्तर पर और काम करने की नियामकीय वैधता सरकार के नियंत्रण में।

ब्लैकआउट ने इंडस्ट्री के निवेश जोखिम को बदल दिया

BARC का ब्लैकआउट संभावित नए खिलाड़ियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इससे यह पता चला है कि नया नियामकीय ढांचा वास्तविक स्थिति में किस तरह काम कर सकता है। मुख्य सवाल केवल यह नहीं था कि BARC ऑडियंस को माप सकता है या नहीं। असली सवाल यह था कि नई पॉलिसी के तहत उसके रजिस्ट्रेशन और नियमों के पालन की प्रक्रिया पूरी होने तक क्या उसे आंकड़े जारी करने की अनुमति रहेगी।

यह अंतर काफी महत्वपूर्ण है। किसी नई रेटिंग कंपनी को प्रतिनिधित्व करने वाला पैनल तैयार करने, मीटर लगाने, एस्टेब्लिशमेंट सर्वे करने, सांख्यिकीय मॉडल बनाने और इंडस्ट्री का भरोसा हासिल करने में कई साल लग सकते हैं।

एक वरिष्ठ टेलीविजन इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “ब्लैकआउट सिर्फ BARC की समस्या नहीं है। इस कारोबार में आने के बारे में सोचने वाली हर कंपनी इस पूरे मामले को बहुत ध्यान से देखेगी। अगर पहले से मजबूत पैनल और इंडस्ट्री संबंध रखने वाली कंपनी को भी रुकावट का सामना करना पड़ सकता है, तो नई कंपनी अपने निवेश के फैसले में इस नियामकीय जोखिम को जरूर शामिल करेगी।”

रेटिंग कारोबार का निवेश चक्र काफी लंबा होता है। डिजिटल मापन वाले किसी प्रोडक्ट को अपेक्षाकृत कम समय में तैयार और बड़ा किया जा सकता है, लेकिन देशभर में टीवी रेटिंग का पूरा सिस्टम तैयार करने के लिए शुरुआत में ही काफी पैसा लगाना पड़ता है, जबकि उससे मिलने वाली व्यावसायिक रेटिंग करेंसी को स्वीकार किए जाने में समय लगता है।

5 करोड़ रुपये की सीमा बनाम 1,000 करोड़ रुपये की हकीकत

MIB ने रेटिंग एजेंसियों के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की जरूरत 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी है। इससे संभावित रूप से ज्यादा कंपनियां रजिस्ट्रेशन के लिए योग्य हो सकती हैं। हालांकि, इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ नियामकीय ढांचे में प्रवेश के लिए जरूरी वित्तीय योग्यता को आसान करता है।

एक भरोसेमंद और देशव्यापी रेटिंग सिस्टम के लिए अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और जनसांख्यिकीय समूहों के प्रतिनिधि परिवारों का पैनल, फील्ड टीमें, मीटर लगाना और उनका रखरखाव, सैंपल में बदलाव, क्वालिटी कंट्रोल, एस्टेब्लिशमेंट सर्वे, डेटा सुरक्षा, सांख्यिकीय मॉडलिंग और लगातार ऑडिट की जरूरत होगी।

इंडस्ट्री के अधिकारियों के हवाले से सामने आए अनुमानों के मुताबिक, ऐसा पूरा सिस्टम तैयार करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करना पड़ सकता है।

एक अन्य इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “5 करोड़ रुपये की संख्या देखकर पॉलिसी काफी आसान लग सकती है। लेकिन यह मूल रूप से सिर्फ नियामकीय पात्रता की संख्या है। असल कारोबार में पर्याप्त पैमाना और विश्वसनीयता हासिल करके मुकाबला करने के लिए कंपनी को कई सौ करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।”

व्यावसायिक चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि नई एजेंसी को ऐसे बाजार में उतरना होगा जहां BARC के पास पहले से मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के साथ स्थापित संबंध हैं।

'सिर्फ टेक्नोलॉजी काफी नहीं'

Chrome DM और TAM पहले ही BARC या अन्य इंडस्ट्री हिस्सेदारों के साथ काम करने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं। लेकिन सिर्फ CTV यानी Connected TV की माप से प्रतिनिधित्व करने वाला टीवी रेटिंग पैनल तैयार करने की समस्या हल नहीं होती।

एक पूरी रेटिंग एजेंसी को पारंपरिक यानी लीनियर टेलीविजन के साथ-साथ डिजिटल स्क्रीन को भी मापना होगा। इसके लिए घरों को फिजिकल तरीके से पैनल में शामिल करना, मीटर लगाना, उनका रखरखाव करना, फील्ड वेरिफिकेशन, सैंपल मैनेजमेंट और आंकड़ों की सांख्यिकीय जांच जैसी कई प्रक्रियाएं जरूरी होंगी।

एक मीडिया मापन अधिकारी ने कहा, “कनेक्टेड टीवी किसी कंपनी को मजबूत टेक्नोलॉजी लेयर दे सकता है, लेकिन टीवी रेटिंग कारोबार सिर्फ टेक्नोलॉजी का कारोबार नहीं है। सबसे मुश्किल काम ऐसा सांख्यिकीय रूप से प्रतिनिधित्व करने वाला पैनल बनाना है, जिस पर पूरी इंडस्ट्री भरोसा करे और यह माने कि इससे मिलने वाले आंकड़े को रेटिंग करेंसी के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”

इस वजह से टेक्नोलॉजी आधारित कंपनियों के लिए तुरंत अपना पूरी तरह स्वतंत्र रेटिंग सिस्टम खड़ा करने की बजाय पार्टनरशिप के जरिए इस कारोबार में प्रवेश करना ज्यादा व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।

TAM के पास अनुभव, लेकिन अनुभव की भी कीमत है

दूसरी ओर, TAM के पास टेलीविजन ऑडियंस मापन का पुराना अनुभव है। इससे उसे उन कंपनियों के मुकाबले फायदा मिल सकता है, जो किसी दूसरे टेक्नोलॉजी क्षेत्र से इस कारोबार में प्रवेश कर रही हैं। लेकिन इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि पुराना अनुभव 2026 की पॉलिसी के तहत जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस की जरूरतों को खत्म नहीं करता।

नई कंपनी को अभी भी जरूरी पैनल आकार, फील्ड ऑपरेशन, डेटा सुरक्षा, गवर्नेंस सिस्टम, ऑडिट और मेथडोलॉजी तैयार करनी होगी। साथ ही, उसे ऐसे टेलीविजन बाजार में उतरने के लिए नए सिरे से निवेश का तर्क देना होगा, जिसकी अर्थव्यवस्था डिजिटल वीडियो, कनेक्टेड टीवी और OTT की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण दबाव में है। 

सोर्स मटेरियल के अनुसार, TAM के CEO L.V. Krishnan ने इन घटनाक्रमों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

एक इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “TAM जैसी कंपनी के लिए सवाल यह नहीं है कि उसे टेलीविजन मापना आता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारतीय बाजार का आकार और उसकी अर्थव्यवस्था उस इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करने और नए नियमों के तहत जरूरी पूंजी लगाने को सही ठहराती है।”

टीवी बाजार का सिकुड़ता कारोबार बढ़ा रहा है जोखिम

निवेश से जुड़ा सवाल इसलिए और मुश्किल हो रहा है क्योंकि टेलीविजन बाजार खुद भी संरचनात्मक दबाव का सामना कर रहा है। टेलीविजन अब भी विज्ञापन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन विज्ञापनदाता अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल वीडियो, कनेक्टेड टीवी और दूसरे प्लेटफॉर्मों पर भी खर्च कर रहे हैं। इसका मतलब है कि नई रेटिंग कंपनी को ऐसे उद्योग में भारी निवेश करना होगा, जिसकी पारंपरिक विज्ञापन अर्थव्यवस्था पहले के वर्षों की तरह तेजी से नहीं बढ़ रही है।

2026 की पॉलिसी में टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल मापन की भी जरूरत रखी गई है, जिसमें कनेक्टेड-टीवी व्यूइंग को शामिल किया गया है। इससे नए मापन मॉडल के लिए अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन एक व्यापक रेटिंग करेंसी तैयार करना और जटिल हो जाता है।

एक इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “निवेशक सिर्फ यह नहीं देख रहा कि सरकार बाजार में प्रवेश की अनुमति देगी या नहीं। वह यह भी देख रहा है कि संभावित बाजार कितना बड़ा है, टेलीविजन विज्ञापन किस दिशा में जाएगा और क्या इतनी बड़ी शुरुआती लागत को वापस निकालने के लिए पर्याप्त आमदनी होगी।”

गवर्नेंस भी बन सकती है एक और बड़ी बाधा

पॉलिसी में स्वतंत्रता यानी इंडिपेंडेंस पर भी काफी जोर दिया गया है। शुरुआती ढांचे में रेटिंग एजेंसी के बोर्ड में कम से कम आधे सदस्य स्वतंत्र निदेशक होने जरूरी थे। बाद में MIB ने इस शर्त को बदलकर कम से कम 33% कर दिया। साथ ही यह भी तय किया गया कि स्वतंत्र निदेशकों का ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं या विज्ञापन एजेंसियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं होना चाहिए। ढांचे में क्रॉस-होल्डिंग, हितों के टकराव, सिक्योरिटी क्लियरेंस और ऑपरेशनल स्वतंत्रता से जुड़ी शर्तें भी शामिल हैं।

एक अन्य इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “रेटिंग व्यावसायिक नजरिए से पूरी तरह तटस्थ डेटा नहीं है। रेटिंग में बदलाव विज्ञापन दरों, चैनल की आमदनी और प्रोग्रामिंग से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए रेगुलेटर संरचनात्मक स्वतंत्रता चाहता है, लेकिन इससे नए खिलाड़ियों के लिए स्वामित्व और गवर्नेंस का मॉडल भी ज्यादा जटिल हो जाता है।”

रजिस्ट्रेशन शायद सिर्फ शुरुआत है

रजिस्ट्रेशन मिलने के बाद भी रेटिंग एजेंसियों को मेथडोलॉजी, पैनल चयन, पैनल में बदलाव, भौगोलिक कवरेज, ऑडिट और डेटा गवर्नेंस से जुड़े नियमों का लगातार पालन करना होगा। नई कंपनी के लिए इसका मतलब है कि यह सिर्फ एक बार आने वाली नियामकीय लागत नहीं होगी, बल्कि लगातार होने वाला खर्च होगा।

कंपनी को अपनी रेटिंग मेथडोलॉजी के हर बड़े हिस्से को समझाना होगा और अगर ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता या एजेंसियां उसके आंकड़ों पर सवाल उठाती हैं तो उन्हें सही साबित करने के लिए मजबूत आधार देना होगा। BARC के मामले में इनमें से कई सिस्टम पहले से मौजूद हैं। लेकिन नए खिलाड़ी को ये सभी सिस्टम उस समय तैयार करने होंगे, जब वह बाजार को अपनी रेटिंग करेंसी अपनाने के लिए भी मनाने की कोशिश कर रहा होगा।

एक वरिष्ठ एजेंसी अधिकारी ने कहा, “BARC की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी टेक्नोलॉजी नहीं है। उसका असली मजबूत पक्ष पूरा इकोसिस्टम है। उसका डेटा पहले से मीडिया प्लानिंग, विज्ञापन सौदों और ब्रॉडकास्टर्स के फैसलों का हिस्सा है। किसी प्रतियोगी को सिस्टम और बाजार- दोनों एक साथ बनाने होंगे।”

क्या भारत में एक से ज्यादा टीवी रेटिंग करेंसी टिक पाएंगी?

पॉलिसी का घोषित उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और एक ही रेटिंग प्रदाता पर निर्भरता कम करना है। लेकिन आगे चलकर इंडस्ट्री के सामने एक और सवाल खड़ा हो सकता है- क्या विज्ञापनदाता और एजेंसियां एक से ज्यादा रेटिंग करेंसी पर कारोबार करने के लिए तैयार होंगी?

अगर अलग-अलग रेटिंग एजेंसियां अलग-अलग ऑडियंस आंकड़े देती हैं, तो ब्रॉडकास्टर्स किसी एक मेथडोलॉजी को प्राथमिकता दे सकते हैं, जबकि विज्ञापनदाता किसी दूसरी को पसंद कर सकते हैं। इससे बाजार BARC, दूसरी रेटिंग एजेंसियों, CTV डेटा, DTH और केबल डेटा और प्लेटफॉर्म द्वारा जारी OTT ऑडियंस आंकड़ों के बीच बंट सकता है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि ज्यादा प्रतिस्पर्धा से ज्यादा विश्वसनीयता पैदा हो, न कि टेलीविजन की हकीकत के कई अलग-अलग आंकड़े सामने आने लगें।

बड़ा सवाल: क्या कोई इतनी बड़ी रकम निवेश करेगा?

फिलहाल इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि सबसे पहली प्राथमिकता एक काम करने वाली साझा रेटिंग करेंसी को वापस लाना है। उनके मुताबिक पहले मौजूदा रेटिंग सिस्टम को नए नियामकीय ढांचे के तहत वापस लाया जाना चाहिए। इसके बाद नए खिलाड़ियों के लिए एक स्थिर और अनुमान के मुताबिक काम करने वाला माहौल बनाया जाए। टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों को पार्टनरशिप के जरिए इस क्षेत्र में भाग लेने का मौका मिले और फिर ऐसी कंपनियों के बीच वास्तविक प्रतिस्पर्धा विकसित हो, जो देशव्यापी रेटिंग सिस्टम की सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों।

एक वरिष्ठ टेलीविजन अधिकारी ने कहा, “प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य गलत नहीं है। लेकिन प्रतिस्पर्धा के लिए निवेश चाहिए, निवेश के लिए भरोसा चाहिए और भरोसा आखिरकार नियामकीय स्थिरता से आता है।” यही टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 की सबसे बड़ी परीक्षा हो सकती है।

 MIB ने औपचारिक वित्तीय बाधा कम कर दी है, एक से ज्यादा रेटिंग एजेंसियों के लिए रास्ता खोला है और टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल ढांचा पेश किया है। लेकिन BARC के मामले ने साथ ही यह भी दिखा दिया है कि रेटिंग कारोबार के आसपास बने नियामकीय ढांचे की ताकत कितनी ज्यादा है। TAM और Chrome DM जैसे संभावित नए खिलाड़ियों के लिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि वे भारत के पूरी तरह विकसित टेलीविजन रेटिंग बाजार में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं।

सवाल यह है कि क्या उन्हें यह बाजार इतना स्थिर, बड़ा और अनुमान के मुताबिक काम करने वाला लगता है कि यहां प्रतिस्पर्धी रेटिंग करेंसी बनाने के लिए जरूरी भारी निवेश किया जा सके। भारत ने कागज पर टेलीविजन रेटिंग कारोबार में प्रवेश करना आसान जरूर किया है। लेकिन इसमें निवेश करना अभी भी आसान नहीं बनाया है।

 

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B.A.G. Films की 33वीं AGM 17 सितंबर को, शेयरधारकों को कंपनी ने दी अहम जानकारी

मीडिया कंपनी B.A.G. Films and Media Limited ने अपने शेयरधारकों के लिए वित्त वर्ष 2025-26 की Annual Report और 33वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) को लेकर जरूरी जानकारी जारी की है।

Last Modified:
Thursday, 27 August, 2026
BAG523

मीडिया कंपनी B.A.G. Films and Media Limited ने अपने शेयरधारकों के लिए वित्त वर्ष 2025-26 की Annual Report और 33वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) को लेकर जरूरी जानकारी जारी की है। कंपनी ने बताया कि उसकी 33वीं AGM 17 सितंबर 2026 को शाम 4 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) या अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यम (OAVM) के जरिए होगी।

कंपनी के मुताबिक, AGM में 13 अगस्त 2026 को जारी नोटिस में बताए गए कारोबार और प्रस्तावों पर चर्चा की जाएगी।

ईमेल नहीं है तो वेबसाइट से मिलेंगे AGM Notice और Annual Report

कंपनी ने बताया कि जिन शेयरधारकों की ईमेल आईडी कंपनी, रजिस्ट्रार एवं शेयर ट्रांसफर एजेंट (RTA) Alankit Assignments Limited या Depository Participant के पास रजिस्टर्ड है, उन्हें 33वीं AGM का नोटिस और वित्त वर्ष 2025-26 की Annual Report इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजी गई है।

जिन शेयरधारकों की ईमेल आईडी रजिस्टर्ड नहीं है, उनके लिए कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर AGM Notice और Annual Report तक पहुंचने के लिए वेब लिंक और नेविगेशन पाथ उपलब्ध कराया है।

कंपनी की वेबसाइट पर Financial > Annual Reports > Annual Report 2025-26 सेक्शन में जाकर भी Annual Report देखी और डाउनलोड की जा सकती है।

फिजिकल शेयर रखने वालों को PAN और KYC अपडेट करना होगा

B.A.G. Films and Media ने फिजिकल रूप में शेयर रखने वाले शेयरधारकों से अपने PAN, KYC और Nomination Details अपडेट करने की अपील की है। 

कंपनी के मुताबिक, शेयरधारकों को अपने फोलियो में डाक का पता, ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर, सैंपल सिग्नेचर, बैंक अकाउंट डिटेल्स और नॉमिनेशन की जानकारी अपडेट करनी होगी। यह प्रक्रिया SEBI के 6 फरवरी 2026 को जारी मास्टर सर्कुलर के तहत की जा रही है।

कौन से फॉर्म जमा करने होंगे?

KYC और अन्य जानकारी अपडेट करने के लिए शेयरधारकों को जरूरी दस्तावेजों के साथ संबंधित फॉर्म जमा करने होंगे। Form ISR-1 के जरिए PAN और KYC से जुड़ी जानकारी अपडेट करनी होगी। इसके साथ जरूरी दस्तावेजों की सेल्फ-अटेस्टेड कॉपी देनी होगी।

Form ISR-2 के साथ बैंक से सत्यापित सिग्नेचर और शेयरधारक के नाम वाला ओरिजिनल कैंसिल चेक या बैंक पासबुक/स्टेटमेंट की सेल्फ-अटेस्टेड कॉपी देनी होगी। वहीं, नॉमिनेशन अपडेट करने के लिए Form SH-13 और नॉमिनेशन से बाहर रहने का विकल्प चुनने के लिए Form ISR-3 का इस्तेमाल किया जा सकता है।

दस्तावेज जमा करने के तीन तरीके

शेयरधारक KYC से जुड़े दस्तावेज RTA को तीन तरीकों से जमा कर सकते हैं। पहला तरीका हार्ड कॉपी के जरिए है, जिसमें दस्तावेज सेल्फ-अटेस्टेड और दिनांक के साथ होने चाहिए।

दूसरा तरीका इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। इसके लिए दस्तावेज उस ईमेल आईडी से भेजने होंगे जो RTA के रिकॉर्ड में रजिस्टर्ड है। दस्तावेजों पर शेयरधारक के इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल सिग्नेचर होने चाहिए। जॉइंट होल्डिंग के मामले में पहले जॉइंट होल्डर के सिग्नेचर जरूरी होंगे।

तीसरा तरीका कंपनी के RTA Alankit Assignments के वेब पोर्टल के जरिए ऑनलाइन KYC अपडेट करना है।

RTA को भेज सकते हैं दस्तावेज

कंपनी ने फिजिकल शेयरधारकों के लिए KYC दस्तावेज जमा करने का पता भी बताया है। दस्तावेज Alankit Assignments Limited, Unit: B.A.G. Films and Media Limited, 205-208, Anarkali Complex, Jhandewalan Extension, New Delhi-110055 पर भेजे जा सकते हैं।

शेयरधारक KYC से जुड़ी जानकारी के लिए kycupdate@alankit.com पर ईमेल या 011-42541234/23541234 पर संपर्क कर सकते हैं।

डिमैट शेयरधारक अपने DP से करें संपर्क

कंपनी ने साफ किया है कि जिन निवेशकों के शेयर डिमैट रूप में हैं, वे जरूरी दस्तावेज अपने Depository Participant (DP) के पास जमा करें। वहीं, फिजिकल शेयर रखने वाले निवेशक कंपनी के RTA के जरिए यह प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

कंपनी ने शेयरधारकों से जल्द से जल्द PAN, KYC और नॉमिनेशन की जानकारी अपडेट करने को कहा है, ताकि उनके शेयर फोलियो से जुड़ी सेवाएं आसानी से जारी रह सकें। अगर किसी शेयरधारक ने पहले ही अपनी जानकारी कंपनी या RTA के रिकॉर्ड में अपडेट कर दी है, तो उसे इस पत्र पर दोबारा कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है।

 

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जी एंटरटेनमेंट ने जारी की BRSR रिपोर्ट, इन छह बड़े मुद्दों को माना अहम

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR) जारी कर दी है।

Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
ZeeEntertainment6589

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR) जारी कर दी है। कंपनी ने यह रिपोर्ट 25 अगस्त 2026 को शेयर बाजारों के सामने दाखिल की। यह रिपोर्ट कंपनी की वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट का हिस्सा है। रिपोर्ट के साथ तीसरी पक्ष की संस्था TÜV SÜD South Asia Pvt. Ltd. की स्वतंत्र उचित आश्वासन रिपोर्ट भी दी गई है। कंपनी की ओर से यह दस्तावेज नियामकीय नियमों के तहत दाखिल किया गया है। 

इस रिपोर्ट में कंपनी ने अपने कारोबार, एम्प्लॉयीज, ग्राहकों, मानवाधिकार, सामाजिक जिम्मेदारी, पर्यावरण, ऊर्जा और पानी की खपत, कार्बन उत्सर्जन, कचरा प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, कंटेंट की चोरी रोकने और सामाजिक योजनाओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी है।

1982 में शुरू हुई कंपनी, 190 से ज्यादा देशों तक पहुंच

रिपोर्ट के मुताबिक जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज की स्थापना साल 1982 में हुई थी। कंपनी का पंजीकृत और कॉरपोरेट कार्यालय मुंबई के लोअर परेल में है। कंपनी के शेयर बीएसई और एनएसई दोनों पर सूचीबद्ध हैं। कंपनी ने बताया कि उसके कारोबार का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कंटेंट और प्रसारण कारोबार से आता है। इसमें सैटेलाइट टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों का प्रसारण, दूसरे टीवी चैनलों के लिए विज्ञापन और प्रसारण स्थान की बिक्री, कार्यक्रमों, फिल्मों, संगीत और दूसरे मीडिया अधिकारों की बिक्री तथा फिल्मों का निर्माण और वितरण शामिल है।

31 मार्च 2026 तक कंपनी की भारत में 1 संयंत्र और 14 कार्यालय समेत कुल 15 जगहों पर मौजूदगी थी। विदेशों में 8 कार्यालय थे। कंपनी के मुताबिक उसका कारोबार भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा 190 से ज्यादा देशों तक पहुंचता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कंपनी के कुल कारोबार में निर्यात की हिस्सेदारी 8 फीसदी रही।

कंपनी में 3,007 एम्प्लॉयी, महिलाओं की हिस्सेदारी 18.7 फीसदी

31 मार्च 2026 तक ZEE में कुल 3,007 एम्प्लॉयी थे। इनमें:

  • 2,159 स्थायी एम्प्लॉयी
  • 848 गैर-स्थायी एम्प्लॉयी शामिल थे।

कुल एम्प्लॉयीज में 2,446 पुरुष और 561 महिलाएं थीं। इस तरह कंपनी के कुल एम्प्लॉयीज में महिलाओं की हिस्सेदारी 18.7 फीसदी रही। कंपनी के निदेशक मंडल में कुल 7 सदस्य हैं, जिनमें 2 महिलाएं, यानी 28.6 फीसदी महिलाएं हैं। वहीं प्रमुख प्रबंधकीय एम्प्लॉयीज के 3 सदस्यों में कोई महिला नहीं है। कंपनी ने 6 दिव्यांग स्थायी एम्प्लॉयीज की जानकारी भी दी है।

एम्प्लॉयीज को स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा का 100 फीसदी कवरेज

रिपोर्ट के मुताबिक स्थायी और गैर-स्थायी दोनों तरह के एम्प्लॉयीज को स्वास्थ्य बीमा और दुर्घटना बीमा का 100 फीसदी कवरेज मिला हुआ है। स्थायी महिला एम्प्लॉयीज के लिए मातृत्व लाभ की कवरेज 100 फीसदी है। स्थायी पुरुष एम्प्लॉयीज के लिए पितृत्व लाभ की कवरेज भी 100 फीसदी बताई गई है।

कंपनी के अनुसार सभी पात्र एम्प्लॉयीज को भविष्य निधि और ग्रेच्युटी का लाभ दिया गया और संबंधित राशि जमा की गई। राष्ट्रीय पेंशन योजना की कवरेज वित्त वर्ष 2025-26 में एम्प्लॉयीज की 9.3 फीसदी रही, जो वित्त वर्ष 2024-25 में 8 फीसदी थी।

करीब 98.6 फीसदी एम्प्लॉयीज का प्रदर्शन और करियर मूल्यांकन

कंपनी ने बताया कि 31 मार्च 2026 तक पात्र एम्प्लॉयीज में से 98.6 फीसदी का प्रदर्शन और करियर विकास मूल्यांकन किया गया। पुरुष एम्प्लॉयीज के मामले में यह आंकड़ा 98.9 फीसदी और महिला एम्प्लॉयीज के मामले में 97.4 फीसदी रहा।

मानवाधिकार से जुड़े प्रशिक्षण की बात करें तो कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में अपने 3,007 यानी 100 फीसदी एम्प्लॉयीज को इस तरह की ट्रेनिंग दी।

साइबर सुरक्षा और निजी जानकारी की सुरक्षा को बड़ा जोखिम माना

ZEE ने आंकड़ों की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा को अपने छह प्रमुख महत्वपूर्ण कारोबारी मुद्दों में शामिल किया है। कंपनी के मुताबिक उसका Z5 डिजिटल मंच कई भौगोलिक क्षेत्रों में उपलब्ध है। ऐसे में अलग-अलग देशों और क्षेत्रों के निजी जानकारी से जुड़े नियमों का पालन महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी संरक्षण कानून और दूसरे क्षेत्रीय गोपनीयता कानूनों से जुड़े संभावित जोखिमों का उल्लेख किया गया है। 

कंपनी ने बताया कि उसने आईएसओ 27701 मानक और यूरोपीय सामान्य डेटा संरक्षण नियमों के आधार पर निजी जानकारी की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था लागू की है। इसके तहत नियमित रूप से गोपनीयता प्रभाव आकलन, गोपनीयता को ध्यान में रखकर व्यवस्था तैयार करना और किसी भी गोपनीयता संबंधी घटना से निपटने की व्यवस्था की जाती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल पर भी सावधानी

कंपनी ने बताया कि कार्यालयी कामकाज में जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी जनरेटिव एआई के इस्तेमाल से भी कुछ जोखिम पैदा हो सकते हैं। इनमें गलत जानकारी, पक्षपात, गलत व्याख्या, जानबूझकर गलत इस्तेमाल और कानूनी या नैतिक समस्याएं शामिल हैं।

इसी वजह से एम्प्लॉयीज को एआई उपकरणों के जिम्मेदार और सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया जा रहा है। कंपनी ने बिना अनुमति वाले एआई उपकरणों और वेबसाइटों की पहचान तथा उन्हें रोकने के उपाय भी किए हैं।

साइबर सुरक्षा के लिए आईएसओ प्रमाणन बरकरार

ZEE के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में कंपनी ने ISO/IEC 27001:2022 सूचना सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली प्रमाणन का नवीनीकरण कराया। कंपनी एम्प्लॉयीज को फर्जी ई-मेल और धोखाधड़ी वाले संदेशों की पहचान करने के लिए समय-समय पर अभ्यास भी कराती है।

रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने सूचना सुरक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें संभावित खतरे की पहचान, सुरक्षा, निगरानी, जवाब और व्यवस्था बहाल करने की प्रक्रिया शामिल है।

कंटेंट की चोरी से कारोबार को नुकसान का खतरा

मीडिया और मनोरंजन कारोबार में फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों, संगीत, पटकथाओं और प्रसारण अधिकारों की अहम भूमिका होती है। ZEE ने बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और कंटेंट की चोरी रोकना भी अपने महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल किया है।

कंपनी के मुताबिक गैरकानूनी तरीके से कंटेंट की नकल और प्रसारण से फिल्मों, डिजिटल कार्यक्रमों, सदस्यता, विज्ञापन और कंटेंट अधिकारों से होने वाली कमाई प्रभावित हो सकती है। इससे निपटने के लिए कंपनी ने डिजिटल अधिकार प्रबंधन प्रणाली और वॉटरमार्किंग तकनीक का इस्तेमाल किया है।

कंपनी के अनुसार उसने प्रसारण और Z5 डिजिटल मंच के लिए कंटेंट चोरी से जुड़ी शिकायतों और गैरकानूनी कंटेंट हटाने के काम के लिए दो सर्विस पार्टनर भी जोड़े हैं। कंपनी ने कंटेंट की चोरी रोकने के लिए क्षेत्र के हिसाब से पहुंच सीमित करने, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने और चोरी की गई कंटेंट को हटाने के लिए कानूनी कार्रवाई जैसे कदमों की भी जानकारी दी है।

ग्राहकों का अनुभव भी कंपनी की प्राथमिकता

ZEE ने ग्राहक अनुभव और जिम्मेदार कंटेंट को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है। कंपनी के मुताबिक अगर दर्शकों को खराब अनुभव मिलता है तो इससे देखने का समय कम हो सकता है, ग्राहक कंपनी से दूर हो सकते हैं और कंपनी की छवि पर भी असर पड़ सकता है। इसके लिए कंपनी दर्शकों की प्रतिक्रिया, सामाजिक माध्यमों पर लोगों की प्रतिक्रिया और दूसरे तरीकों से दर्शकों की पसंद समझने की कोशिश करती है।

कंपनी ने बताया कि टीवी और डिजिटल मंचों पर प्रसारित होने वाली कंटेंट की जांच मानक और व्यवहार संबंधी टीम करती है। संवेदनशील कंटेंट के मामले में कानूनी और नियामकीय पहलुओं की भी जांच की जाती है।

दर्शकों की शिकायतों का जवाब 48 घंटे में देने की व्यवस्था

कंपनी के अनुसार दर्शक अपने सवाल, सुझाव और शिकायतें ई-मेल तथा ऑनलाइन माध्यमों से दर्ज करा सकते हैं। कंपनी ने बताया कि दर्शकों की प्रतिक्रियाओं का जवाब 48 घंटे के भीतर देने की व्यवस्था है। कंटेंट से जुड़ी शिकायतों के लिए कंपनी की वेबसाइट पर अलग शिकायत दर्ज करने की सुविधा भी उपलब्ध है।

वित्त वर्ष 2025-26 में कंटेंट से जुड़ी शिकायतों समेत अन्य श्रेणी में 4,159 शिकायतें मिलीं। रिपोर्ट के अनुसार साल के अंत में इनमें कोई शिकायत लंबित नहीं थी। वहीं निजी जानकारी, विज्ञापन, साइबर सुरक्षा, जरूरी सेवाओं की आपूर्ति, प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार और अनुचित व्यापार व्यवहार से जुड़ी उपभोक्ता शिकायतों की संख्या रिपोर्ट में शून्य बताई गई है।

वित्त वर्ष में कोई आंकड़ा चोरी होने की घटना नहीं

ZEE ने रिपोर्ट में बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में आंकड़ों की चोरी या बड़ी जानकारी के उल्लंघन की कोई घटना नहीं हुई। कंपनी ने ग्राहकों की निजी पहचान वाली जानकारी से जुड़े किसी आंकड़ा उल्लंघन का मामला भी रिपोर्ट नहीं किया।

कंपनी ने जलवायु परिवर्तन को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना

ZEE ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता को अपने छह प्रमुख महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल किया है। कंपनी के मुताबिक उसने जलवायु परिवर्तन की रणनीति और कार्बन उत्सर्जन कम करने की योजना तैयार की है। कंपनी ने यह काम विज्ञान आधारित लक्ष्य पहल के वैश्विक मानकों के अनुरूप करने की बात कही है। इसके अलावा जलवायु जोखिम का आकलन भी शुरू किया गया है।

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने देशभर में अपने संचालन स्थलों पर ऊर्जा जांच कराई। कंपनी वित्त वर्ष 2026-27 में अपनी एक जगह पर नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल की संभावना का भी आकलन कर रही है।

कुल कार्बन उत्सर्जन 71,799.71 टन

रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन यानी स्कोप-1 उत्सर्जन 6,724.21 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 6,065.1 टन था। वहीं बिजली आदि के इस्तेमाल से जुड़ा स्कोप-2 उत्सर्जन 7,890.79 टन रहा। पिछले वित्त वर्ष में यह 8,340.66 टन था। इस तरह स्कोप-1 और स्कोप-2 को मिलाकर कुल उत्सर्जन 14,615 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा।

दूसरी अप्रत्यक्ष गतिविधियों से जुड़ा स्कोप-3 उत्सर्जन 57,184.71 टन रहा। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 55,102.88 टन था। तीनों को मिलाकर कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 71,799.71 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा। इन आंकड़ों की स्वतंत्र जांच TÜV SÜD South Asia Pvt. Ltd. ने की है।

ऊर्जा की खपत बढ़कर 1,39,448.9 गीगाजूल हुई

कंपनी के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कुल ऊर्जा खपत 1,39,448.9 गीगाजूल रही। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 1,36,024.8 गीगाजूल थी। रिपोर्ट में नवीकरणीय स्रोतों से ऊर्जा खपत शून्य बताई गई है।

कंपनी ने ऊर्जा बचाने के लिए ऊर्जा जांच, ऊर्जा दक्ष उपकरणों का इस्तेमाल और कार्बन उत्सर्जन घटाने की रणनीति तैयार करने जैसे कदमों की जानकारी दी है।

पानी की खपत 1,59,713.9 किलोलीटर

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने कुल 1,59,713.9 किलोलीटर पानी लिया और इस्तेमाल किया।

इसमें:

  • 99,243.6 किलोलीटर भूजल
  • 60,470.3 किलोलीटर तीसरे पक्ष से प्राप्त पानी शामिल था।

वित्त वर्ष 2024-25 में कुल पानी की खपत 1,46,855.2 किलोलीटर थी। कंपनी ने बताया कि उसके चार कार्यालय पानी की कमी वाले क्षेत्रों में आते हैं। इनमें बेंगलुरु शहर के 2, जयपुर शहरी क्षेत्र का 1 और चेन्नई के गिंडी का 1 कार्यालय शामिल है। इन चार स्थानों पर वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 12,756 किलोलीटर पानी की खपत हुई।

कुल कचरा 97.1 टन

कंपनी के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 97.1 टन कचरा पैदा हुआ। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 90.6 टन था।

वित्त वर्ष 2025-26 में:

  • प्लास्टिक कचरा – 1.8 टन
  • इलेक्ट्रॉनिक कचरा – 2.43 टन
  • बैटरी कचरा – 6.91 टन
  • अन्य गैर-खतरनाक कचरा – 87.8 टन रहा।

कंपनी ने कुल 66.7 टन कचरे को दोबारा इस्तेमाल या पुनर्चक्रण के लिए भेजा। 30.4 टन कचरे को दूसरे निपटान तरीकों से हटाया गया। कंपनी के अनुसार कचरे को शुरुआत में ही अलग-अलग किया जाता है और इलेक्ट्रॉनिक कचरे, बैटरी तथा दूसरे खतरनाक कचरे को अधिकृत पुनर्चक्रणकर्ताओं और सेवा प्रदाताओं के जरिए संभाला जाता है।

एम्प्लॉयीज की सुरक्षा पर भी रिपोर्ट में जानकारी

कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में उसके 63.6 फीसदी संयंत्रों और कार्यालयों में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा तथा काम करने की परिस्थितियों का आकलन किया गया।

एम्प्लॉयीज के लिए काम के दौरान चोट लगने की दर यानी एलटीआईएफआर 1.5 रही, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 1.1 थी।

रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एम्प्लॉयीज के बीच 8 काम से जुड़ी दर्ज चोटों की जानकारी दी गई है।

किसी एम्प्लॉयी की काम के दौरान मौत और गंभीर श्रेणी की काम से जुड़ी चोट के मामले में आंकड़ा शून्य बताया गया है।

कंपनी ने नियमित सुरक्षा जांच, जोखिम आकलन, सुरक्षा प्रशिक्षण और जरूरत के मुताबिक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की जानकारी दी है।

रिश्वत और भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता

ZEE ने कारोबारी नैतिकता को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है।

कंपनी ने बताया कि रिश्वत और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी शून्य सहनशीलता की नीति है। एम्प्लॉयीज के लिए आचार संहिता का पालन जरूरी है।

वित्त वर्ष 2025-26 में निदेशकों, प्रमुख प्रबंधकीय एम्प्लॉयीज, एम्प्लॉयीज या कामगारों के खिलाफ रिश्वत या भ्रष्टाचार के मामले में किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई।

नियामक संस्थाओं या अदालतों की ओर से जुर्माना, दंड, समझौता राशि, सजा या अन्य कार्रवाई के मामले में भी रिपोर्ट में कोई राशि या मामला नहीं बताया गया है।

कंपनी के सामाजिक कामों में महिलाओं और कमजोर वर्गों पर जोर

ZEE ने सामाजिक जिम्मेदारी के तहत महिलाओं को सशक्त बनाने, कला-संस्कृति और राष्ट्रीय विरासत के संरक्षण, आपदा राहत, ग्रामीण विकास और रोजगार से जुड़े कई कार्यक्रम चलाए। कंपनी ने झारखंड के आकांक्षी जिलों में अत्यधिक गरीबी कम करने के लिए महिलाओं के नेतृत्व वाले परिवारों के लिए भी कार्यक्रम चलाया। इसमें बोकारो, पूर्वी सिंहभूम, गोड्डा, गुमला, खूंटी, लातेहार, लोहरदगा, पाकुड़, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम शामिल थे।

कंपनी के मुताबिक इन परिवारों को बिना ब्याज के कर्ज, खेती और पशुपालन की जानकारी, स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने और सरकारी योजनाओं तक पहुंच दिलाने जैसी सहायता दी गई।

कई सामाजिक योजनाओं से हजारों लोगों को लाभ

रिपोर्ट में कंपनी ने कई सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों का विवरण दिया है।

-  सक्षम योजना के तहत गौतम बुद्ध नगर में 155 लोगों को लाभ मिला। यह योजना कई तरह की दिव्यांगता और दृष्टिबाधित बच्चों तथा युवाओं के लिए थी।

-  मैजिक बस इंडिया फाउंडेशन की आजीविका योजना से 1,841 युवाओं को लाभ मिला।

-  बाल रक्षा भारत की युवा कौशल और रोजगार योजना से 678 युवाओं को लाभ मिला।

-  स्नेहाबिल्डिंग ब्रिजेज योजना के तहत 18,966 लोगों को लाभ मिलने की जानकारी दी गई है।

-  ऑस्कर फाउंडेशन की फुटबॉल और जीवन कौशल योजना से 411 बच्चों को लाभ मिला।

-  पब्लिक कंसर्न इंटरनेशनलउद्यमिता कार्यक्रम के तहत 351 महिला उद्यमियों को सहायता मिली।

-  पब्लिक कंसर्न इंटरनेशनलसार्वजनिक खरीद कार्यक्रम के तहत 2,380 लोगों को लाभ मिला।

-  वहीं नज इंस्टीट्यूटएंड अल्ट्रा पॉवर्टी योजना के तहत झारखंड में 5,400 महिलाओं के नेतृत्व वाले परिवारों को सहायता देने का लक्ष्य रखा गया।

इन योजनाओं में रिपोर्ट के अनुसार लाभार्थियों में 100 फीसदी हिस्सा कमजोर और वंचित वर्गों का था।

छोटे और मध्यम कारोबार से खरीद में बढ़ोतरी

कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में उसके इनपुट की 21 फीसदी खरीद सीधे छोटे और मध्यम कारोबारों या छोटे उत्पादकों से हुई। वित्त वर्ष 2024-25 में यह हिस्सा 8 फीसदी था। भारत के भीतर से सीधे खरीदे गए इनपुट का हिस्सा 98 फीसदी रहा, जो पिछले वित्त वर्ष में 97 फीसदी था।

छह बड़े मुद्दों को कंपनी ने माना अहम

ZEE ने अपनी दोहरी महत्वपूर्णता जांच के आधार पर छह प्रमुख मुद्दों की पहचान की है। ये हैं:

  1. कारोबारी नैतिकता
  2. आंकड़ों की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा
  3. बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और कंटेंट की चोरी रोकना
  4. ग्राहक अनुभव और जिम्मेदार कंटेंट
  5. प्रतिभा को आकर्षित करना और एम्प्लॉयीज को बनाए रखना
  6. जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता

कंपनी ने बताया कि इन मुद्दों की पहचान कारोबार और हितधारकों पर इनके संभावित प्रभाव, जोखिम, अवसर और आर्थिक असर को ध्यान में रखते हुए की गई है।

एम्प्लॉयीज को बनाए रखना भी चुनौती

कंपनी ने एम्प्लॉयीज के नौकरी छोड़ने की दर को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है। रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2024-25 की स्वैच्छिक एम्प्लॉयी नौकरी छोड़ने की दर 17.5 फीसदी बताई गई है, जबकि कंपनी ने बाजार का औसत 17.2 फीसदी बताया।

कंपनी के मुताबिक मीडिया व एंटरटेनमेंट सेक्टर में प्रतिभाशाली एम्प्लॉयीज की भूमिका काफी अहम है। एम्प्लॉयीज के जाने से नई भर्ती, प्रशिक्षण, काम की गति, परियोजनाओं और पुराने अनुभव का नुकसान हो सकता है। इसी वजह से कंपनी आंतरिक नौकरी के अवसर, करियर विकास, कौशल बढ़ाने, मार्गदर्शन, एम्प्लॉयी कल्याण और कंपनी की बेहतर कार्य संस्कृति जैसे उपायों पर काम कर रही है।

कंपनी के साथ शेयरधारकों और दूसरे हितधारकों की लगातार बातचीत

कंपनी ने शेयरधारकों, निवेशकों, ग्राहकों, आपूर्तिकर्ताओं, एम्प्लॉयीज, सरकारी और नियामकीय संस्थाओं, समुदायों, कारोबार पार्टनर्स और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोगों को प्रमुख हितधारक बताया है। इनके साथ ई-मेल, मीटिंग, फोन, व्यक्तिगत बातचीत, एम्प्लॉयी मीटिंग, सर्वेक्षण और वेबसाइट समेत कई माध्यमों से संपर्क किया जाता है।

कंपनी के मुताबिक पर्यावरण, सामाजिक और शासन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की निगरानी विभिन्न बोर्ड समितियां करती हैं। इनमें लेखा परीक्षा समिति, सामाजिक जिम्मेदारी समिति, नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति, हितधारक संबंध समिति और जोखिम प्रबंधन समिति शामिल हैं। 

TÜV SÜD ने की स्वतंत्र जांच

ZEE की रिपोर्ट के साथ TÜV SÜD South Asia Pvt. Ltd. की स्वतंत्र उचित आश्वासन रिपोर्ट भी दी गई है। TÜV SÜD ने BRSR के 9 मुख्य मानकों से जुड़ी जानकारी की उचित स्तर पर जांच की। जांच के दौरान कंपनी के अलग-अलग कार्यालयों और स्थानों से जुड़े आंकड़ों, प्रक्रियाओं और नियंत्रण व्यवस्था को देखा गया।

TÜV SÜD ने अपने निष्कर्ष में कहा कि किए गए आकलन और उपलब्ध कराए गए प्रमाणों के आधार पर ऐसा कुछ सामने नहीं आया जिससे यह माना जाए कि वित्त वर्ष 2025-26 के 9 मुख्य मानकों से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण स्तर पर रिपोर्टिंग आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार नहीं की गई है। कंपनी के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जुड़े आंकड़ों की भी TÜV SÜD ने अलग से उचित स्तर पर जांच की। इसमें स्कोप-1, स्कोप-2 और स्कोप-3 उत्सर्जन शामिल रहे।

ZEE Entertainment की वित्त वर्ष 2025-26 की रिपोर्ट में कंपनी ने कारोबार के साथ-साथ एम्प्लॉयीज, ग्राहकों, सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण से जुड़े कई पहलुओं की जानकारी दी है। कंपनी ने साइबर सुरक्षा, ग्राहकों की निजी जानकारी की सुरक्षा, कंटेंट की चोरी, एम्प्लॉयीज को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन को अपने कारोबार के लिए महत्वपूर्ण जोखिम और अवसर के तौर पर पहचाना है। वहीं एम्प्लॉयीज के लिए बीमा, मानवाधिकार प्रशिक्षण, सामाजिक योजनाओं, कंटेंट सुरक्षा, ऊर्जा जांच, कचरा पुनर्चक्रण और कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में उठाए गए कदमों की भी जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में दिए गए प्रमुख आंकड़ों की स्वतंत्र जांच TÜV SÜD की ओर से की गई है। कंपनी ने कहा है कि इन प्रयासों का उद्देश्य जिम्मेदार कारोबारी व्यवस्था को मजबूत करना और लंबे समय के लिए टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ना है।

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दूसरा BARC या नया इकोसिस्टम? MIB ने TAM और Chrome DM से CTV मीजरमेंट पर साधा संपर्क

भारत का टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम सिर्फ सरकार की संशोधित Television Ratings Policy, 2026 के तहत रेटिंग्स की वापसी तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसमें इससे कहीं बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
TV5412

इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत का टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम सिर्फ सरकार की संशोधित Television Ratings Policy, 2026 के तहत रेटिंग्स की वापसी तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसमें इससे कहीं बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।जानकारों के मुताबिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने टेलीविजन मीजरमेंट कंपनियों TAM और Chrome DM से Connected TV (CTV) मीजरमेंट को लेकर उनके सहयोग और तकनीकी क्षमताओं के बारे में संपर्क किया है।

इस कदम के बाद एक बड़ा सवाल सामने आया है कि क्या सरकार BARC India के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा तैयार करना चाहती है या फिर ऐसा व्यापक मीजरमेंट सिस्टम बनाना चाहती है, जिसमें विशेषज्ञ टेक्नोलॉजी कंपनियां मौजूदा रेटिंग्स सिस्टम के साथ जुड़कर काम कर सकें?

Chrome DM पहले से ही एक ऑटोमेटेड CTV मीजरमेंट सिस्टम संचालित करता है। वहीं, TAM के CEO एलवी कृष्णन ने इससे पहले एक्सचेंज4मीडिया से कहा था, “BARC India के साथ JV के जरिए TAM, इंडस्ट्री की जरूरतों के आधार पर मीजरमेंट के अगले चरण में BARC की मदद करने के लिए तैयार है।”

TAM को डिजिटल और टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट का लंबे समय से अनुभव है। Chrome DM ने भी संकेत दिया है कि अगर उसकी टेक्नोलॉजी, डेटा या विशेषज्ञता किसी व्यापक इंडस्ट्री मीजरमेंट सिस्टम में योगदान दे सकती है, तो वह BARC या इंडस्ट्री के अन्य संबंधित पक्षों के साथ काम करने के लिए तैयार है।

मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने कहा कि MIB की ओर से किया गया यह संपर्क सरकार की उस बड़ी कोशिश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें टेलीविजन मीजरमेंट को ज्यादा टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल बनाया जाए और Linear Television, Smart TVs और Connected Devices पर बंट चुके व्यूइंग को भी मापा जा सके। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इंडस्ट्री संशोधित पॉलिसी के तहत टेलीविजन रेटिंग्स के पूरी तरह दोबारा शुरू होने का इंतजार कर रही है।

सिर्फ टेक्नोलॉजी से रेटिंग एजेंसी नहीं बनती

सरकार ने टेलीविजन रेटिंग्स मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा खुला बनाया है। संशोधित पॉलिसी के तहत तय नियमों को पूरा करने वाली कई रेटिंग एजेंसियां काम कर सकती हैं। वहीं, न्यूनतम नेट-वर्थ की जरूरत को 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया है। कागज पर देखें तो इससे नई कंपनियों के लिए बाजार में प्रवेश की बाधा काफी कम हुई है।

लेकिन असल में इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इस बिजनेस की लागत अभी भी बहुत ज्यादा है। एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टिंग एग्जिक्यूटिव ने कहा, “रेटिंग एजेंसी सिर्फ ऐसी कंपनी नहीं है जो टेलीविजन स्क्रीन की गिनती कर सके। इसके लिए एक प्रतिनिधि पैनल, फील्ड ऑपरेशंस, पीपल मीटर्स और दूसरी मीजरमेंट सुविधाएं, डेटा प्रोसेसिंग, स्टैटिस्टिकल मॉडलिंग, क्वालिटी कंट्रोल, गवर्नेंस सिस्टम और ब्रॉडकास्टर्स, एडवर्टाइजर्स और एजेंसियों की जांच का सामना करने की क्षमता चाहिए।”

इसका मतलब है कि अत्याधुनिक CTV मीजरमेंट टेक्नोलॉजी रखने वाली कंपनी महत्वपूर्ण डेटा या टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर बन सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह खुद रेटिंग्स करेंसी प्रोवाइडर भी बन जाए।

एक इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव ने कहा कि यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़े स्तर पर टीवी खपत को मीजरमेंटे की क्षमता अपने आप में स्वतंत्र रूप से ऑडिट की गई और देशभर के लिए प्रतिनिधि टेलीविजन करेंसी तैयार करने की क्षमता नहीं बन जाती।

एग्जिक्यूटिव ने कहा, “टेलीविजन की खपत को मीजरमेंटे की टेक्नोलॉजी होना एक बात है। राष्ट्रीय स्तर पर रेटिंग्स करेंसी चलाना बिल्कुल अलग बिजनेस है। पैनल, मेथडोलॉजी, गवर्नेंस, ऑडिटेबिलिटी और इंडस्ट्री की स्वीकार्यता आखिर में सबसे ज्यादा मायने रखती है।” इससे यह संकेत मिलता है कि सीधे मुकाबले की जगह सहयोग करना फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।

TAM, Chrome DM: CTV के लिए अहम बिल्डिंग ब्लॉक बन सकते हैं

TAM और Chrome DM को इस उभरते बाजार में एक खास फायदा हो सकता है, क्योंकि उन्हें CTV मीजरमेंट और मल्टी-स्क्रीन डिजिटल ऑडियंस मीजरमेंट सर्विस को बिल्कुल शुरुआत से तैयार नहीं करना पड़ेगा।

Chrome DM के पंकज कृष्णा ने कहा कि कंपनी ने बड़े स्तर पर ऑटोमेटेड CTV मीजरमेंट सिस्टम तैयार किया है, जो रियल टाइम में व्यूइंग को कैप्चर कर सकता है। कंपनी के मुताबिक, उसके डेटा का इस्तेमाल ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स कंटेंट और एडवर्टाइजिंग ऑप्टिमाइजेशन के लिए पहले से कर रहे हैं।

Chrome DM का कहना है कि टेलीविजन मीजरमेंट का भविष्य केवल एक मीजरमेंट स्रोत पर निर्भर नहीं रह सकता। कंपनी ने कहा, “रेटिंग्स का भविष्य किसी एक मीजरमेंट स्रोत पर निर्भर नहीं हो सकता। एक मजबूत सिस्टम में डेमोग्राफिक प्रोफाइलिंग के लिए प्रतिनिधि पैनल डेटा के साथ कई स्रोतों से मिले Census-level data को जोड़ा जाना चाहिए।”

टेलीविजन व्यूइंग के लगातार अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंटने के साथ यह प्रस्ताव और भी महत्वपूर्ण हो सकता है। 

Linear Television के लिए डेमोग्राफिक्स को समझने और एक कॉमन करेंसी तैयार करने के लिए प्रतिनिधि पैनल की जरूरत बनी रहेगी। वहीं, CTV बड़े स्तर पर डिवाइस-लेवल कंजम्पशन डेटा तैयार करता है, जिससे कहीं ज्यादा बारीकी से जानकारी मिल सकती है। दोनों तरह के मीजरमेंट अलग-अलग समस्याओं को हल करते हैं। पैनल इंडस्ट्री को बता सकता है कि कौन देख रहा है। ऑटोमेटेड CTV डेटा संभावित रूप से यह बता सकता है कि क्या देखा जा रहा है, कब देखा जा रहा है, कहां देखा जा रहा है और कितने बड़े स्तर पर देखा जा रहा है। रणनीतिक सवाल यह है कि क्या इन दोनों डेटा सेट को इस तरह जोड़ा जा सकता है कि रेटिंग्स करेंसी की विश्वसनीयता पर असर न पड़े।

पंकज कृष्णा ने कहा कि अगर Chrome DM की टेक्नोलॉजी, डेटा या विशेषज्ञता एक मजबूत इंडस्ट्री-वाइड मीजरमेंट सिस्टम तैयार करने में योगदान दे सकती है, तो कंपनी BARC या किसी अन्य संबंधित इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है।

इससे संकेत मिलता है कि Chrome DM फिलहाल किसी नए BARC को बिल्कुल शुरुआत से तैयार करने के बजाय एक ऐसे सिस्टम में विशेषज्ञ मीजरमेंट टेक्नोलॉजी की भूमिका निभाने को ज्यादा महत्वपूर्ण अवसर मानता है, जिसमें अलग-अलग कंपनियां इस पूरी व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में योगदान दें।

लेकिन क्या Chrome DM रेटिंग एजेंसी बन सकती है?

अगर कंपनी खुद एक रेटिंग एजेंसी बनना चाहती है, तो उसे लागू रेगुलेटरी नियमों को पूरा करना होगा और ऐसा ऑपरेटिंग मॉडल तैयार करना होगा, जो स्वतंत्र और प्रतिनिधि टेलीविजन करेंसी देने में सक्षम हो। इसके मुकाबले BARC के साथ टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप करने पर Chrome DM एक विशेषज्ञ मीजरमेंट प्रोवाइडर के रूप में काम कर सकती है।

यह अंतर आगे चलकर MIB के सामने एक अहम सवाल खड़ा कर सकता है, जिसका मौजूदा टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल फ्रेमवर्क पूरी तरह जवाब नहीं देता: क्या किसी कंपनी को रेटिंग एजेंसी बनने के लिए पूरे मीजरमेंट सिस्टम का मालिक होना जरूरी है? अगर इसका जवाब हां है, तो विशेषज्ञ CTV कंपनियों पर जरूरत से ज्यादा बोझ पड़ सकता है।

उन्हें Linear Television को मीजरमेंटे के लिए जरूरी पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर फिर से तैयार करना पड़ेगा, सिर्फ इसलिए कि वे ऐसे रेटिंग्स सिस्टम में शामिल हो सकें, जहां उनकी मौजूदा CTV क्षमताएं पहले से ही काफी उपयोगी हो सकती हैं।

अगर जवाब नहीं है, तो इंडस्ट्री ज्यादा मॉड्यूलर मॉडल की तरफ बढ़ सकती है। ऐसे सिस्टम में एक प्रतिनिधि पैनल ऑपरेटर डेमोग्राफिक मीजरमेंट उपलब्ध करा सकता है, एक ऑटोमेटेड CTV कंपनी Census-level viewing data दे सकती है, कोई अन्य टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर Return-path या Set-top-box data दे सकता है और एक स्वतंत्र रेटिंग्स संस्था इन सभी डेटा सेट को मिलाकर अंतिम करेंसी तैयार कर सकती है। यह सिर्फ एक और रेटिंग एजेंसी जोड़ने से कहीं बड़ा बदलाव होगा।

TAM का सवाल

TAM का भारत में टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट के साथ लंबा जुड़ाव रहा है। इसके कारण उसके पास ऐसी संस्थागत जानकारी और पुराना अनुभव है, जो किसी नए खिलाड़ी के पास जरूरी नहीं होगा। हालांकि, फिलहाल TAM की ओर से इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि वह नई पॉलिसी के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने या एक पूरी रेटिंग एजेंसी के रूप में बाजार में लौटने की योजना बना रही है। TAM के CEO L.V. Krishnan ने इन घटनाक्रमों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

फिर भी TAM के लिए दोबारा बाजार में आने पर वही मूल चुनौती होगी, जो दूसरे संभावित प्रतिस्पर्धियों के सामने है: सिर्फ विशेषज्ञता पर्याप्त नहीं है। एक भरोसेमंद राष्ट्रीय रेटिंग्स ऑपरेशन के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, मेथडोलॉजी, पैनल मैनेजमेंट, गवर्नेंस, वित्तीय संसाधन और लंबे समय तक इंडस्ट्री का भरोसा जरूरी है। इसलिए MIB का TAM से बात करना महत्वपूर्ण है, भले ही इसका अंतिम नतीजा कोई नई रेटिंग्स सर्विस शुरू होने के रूप में सामने न आए। इससे संकेत मिलता है कि सरकार शायद अब सिर्फ BARC बनाम किसी नई रेटिंग कंपनी के पुराने मॉडल से आगे सोच रही है।

क्या MIB दो-स्तरीय मीजरमेंट सिस्टम बना सकता है?

एक संभावित नतीजा ऐसा रेगुलेटरी या इंडस्ट्री फ्रेमवर्क हो सकता है, जिसमें विशेषज्ञ मीजरमेंट प्रोवाइडर्स और फुल-सर्विस रेटिंग एजेंसियों के बीच अंतर किया जाए।

संशोधित पॉलिसी टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल तरीका अपनाती है और बदलते टेलीविजन कंजम्पशन पैटर्न, जिसमें Connected Television भी शामिल है, को जगह देने की कोशिश करती है। लेकिन बाजार में ज्यादा फंक्शनल अंतर की जरूरत हो सकती है।

एक रेटिंग एजेंसी के एग्जिक्यूटिव ने कहा, “एक विशेषज्ञ CTV मीजरमेंट कंपनी को देशभर का Linear-TV पैनल तैयार करने की जरूरत के बिना CTV कंजम्पशन डेटा उपलब्ध कराने के लिए मान्यता दी जा सकती है।”

एग्जिक्यूटिव ने कहा, “वहीं, एक Full-service ratings agency प्रतिनिधि राष्ट्रीय टेलीविजन करेंसी तैयार करने की जिम्मेदारी संभाल सकती है। इस तरह की व्यवस्था इनोवेशन की व्यावहारिक बाधाओं को कम कर सकती है।”

इससे मीजरमेंट सिस्टम में ज्यादा कंपनियों के आने का रास्ता भी खुल सकता है, बिना इस मजबूरी के कि हर कंपनी उस इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करने में बड़ी रकम खर्च करे, जो किसी दूसरी कंपनी के पास पहले से मौजूद है।

लेकिन गवर्नेंस से जुड़े सवाल काफी मुश्किल होंगे।

सवाल बने हुए हैं:

CTV डेटा को पैनल डेटा के मुकाबले किस तरह वेटेज दिया जाएगा?

मेथडोलॉजी कौन तय करेगा?

तैयार होने वाले आंकड़ों का ऑडिट कौन करेगा?

Connected TVs, Linear Television और कई स्क्रीन के बीच होने वाली डुप्लीकेशन को किस तरह दूर किया जाएगा?

डिवाइस-लेवल कंजम्पशन के साथ डेमोग्राफिक जानकारी कैसे जोड़ी जाएगी?

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, विज्ञापन बाजार जिस अंतिम आंकड़े के आधार पर लेन-देन करता है, उसका मालिक कौन होगा?

संशोधित पॉलिसी में मेथडोलॉजी, ट्रांसपेरेंसी, इंडिपेंडेंस और ऑडिटिंग पर जोर दिया गया है। इसलिए किसी भी हाइब्रिड मीजरमेंट सिस्टम में जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से तय करना होगा।

BARC को शायद एक और प्रतिद्वंद्वी नहीं, ज्यादा डेटा की जरूरत हो

इसलिए सबसे बड़ा बदलाव ऐसा सिस्टम हो सकता है जिसमें BARC को हटाने के बजाय उसे एक बहुत बड़े मीजरमेंट सिस्टम का हिस्सा बना दिया जाए।

BARC के पास प्रतिनिधि पैनल और इंडस्ट्री के साथ स्थापित रिश्ते हैं। वहीं TAM और Chrome DM के पास डिजिटल मीजरमेंट क्षमताएं हैं। हर कंपनी को पूरा रेटिंग्स सिस्टम तैयार करने के लिए मजबूर करने के बजाय इंडस्ट्री अलग-अलग कंपनियों की विशेषज्ञ क्षमताओं को जोड़ सकती है।

एडवर्टाइजर्स के लिए इससे भविष्य में टेलीविजन कंजम्पशन की ज्यादा व्यापक तस्वीर सामने आ सकती है। ब्रॉडकास्टर्स के लिए ऑडियंस और विज्ञापन एक्सपोजर का ज्यादा बारीक डेटा उपलब्ध हो सकता है।

सरकार के लिए इससे प्रतिस्पर्धा और टेक्नोलॉजिकल मजबूती बढ़ सकती है, बिना इस जरूरत के कि हर नई कंपनी पूरे राष्ट्रीय मीजरमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करे।

1,000 करोड़ रुपये का सवाल

यहीं पर निवेश की अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।

इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, एक भरोसेमंद राष्ट्रीय टेलीविजन मीजरमेंट ऑपरेशन तैयार करने में 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश लग सकता है। इसमें पैनल का विस्तार, पीपल मीटर्स, फील्ड ऑपरेशंस, टेक्नोलॉजी, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियों की लागत शामिल है।

इतने बड़े कैपिटल एक्सपेंडिचर से प्रतिस्पर्धा का पूरा सवाल बदल जाता है।

सरकार ने औपचारिक नेट-वर्थ की सीमा 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी है, लेकिन रेगुलेटरी न्यूनतम सीमा और एक भरोसेमंद रेटिंग्स ऑपरेशन तैयार करने के लिए जरूरी कमर्शियल कैपिटल एक ही चीज नहीं है।

एक इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव ने इसे सीधे शब्दों में कहा, “अगर आप किसी मीजरमेंट कंपनी को बनाने में 1,000 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं, तो आप इस बात पर करीब से नजर रखेंगे कि मौजूदा कंपनी के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। निवेशकों के लिए सबसे बड़े कारकों में से एक नियमों की स्थिरता है।”

एक अन्य एग्जिक्यूटिव ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ मौजूदा रेटिंग्स संकट तक सीमित नहीं है।

उन्होंने कहा, “चिंता सिर्फ आज की रेटिंग्स ब्लैकआउट को लेकर नहीं है। चिंता इस बात को लेकर है कि क्या आगे भी इस तरह के हस्तक्षेप ऑपरेटिंग एनवायरनमेंट का हिस्सा बन सकते हैं।”

संभावित नई कंपनियों के लिए यह शायद सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि सरकार ने बाजार को औपचारिक रूप से खोल दिया है या नहीं। सवाल यह है कि क्या निवेशकों को भरोसा है कि नियम इतने लंबे समय तक स्थिर रहेंगे कि नई रेटिंग्स कंपनी अपने बड़े शुरुआती निवेश को वापस हासिल कर सके।

सिर्फ लाइसेंस देने से प्रतिस्पर्धा नहीं आएगी

सरकार ने कई रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देकर एक बड़ी बाधा जरूर हटा दी है। लेकिन सिर्फ लाइसेंस देने से प्रतिस्पर्धा पैदा नहीं होगी। नई कंपनी को एक मजबूत बिजनेस मॉडल, पर्याप्त पूंजी, इंडस्ट्री की स्वीकार्यता और इस भरोसे की जरूरत होगी कि उसकी मेथडोलॉजी के साथ निष्पक्ष व्यवहार किया जाएगा।

इसलिए TAM और Chrome DM जैसे विशेषज्ञ खिलाड़ियों के लिए कमर्शियल रूप से ज्यादा तर्कसंगत रास्ता शायद CTV मीजरमेंट के जरिए बाजार में प्रवेश करना हो सकता है, बजाय इसके कि वे तुरंत BARC के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करने की कोशिश करें।

TAM के लिए अवसर अलग होगा, अगर वह इसे आगे बढ़ाने का फैसला करता है। वह अपनी ऐतिहासिक विशेषज्ञता का इस्तेमाल करते हुए 2026 के फ्रेमवर्क के तहत जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार कर सकता है या किसी अन्य कंपनी के साथ साझेदारी कर सकता है।

वहीं BARC के लिए प्रतिस्पर्धी खतरा जरूरी नहीं कि ऐसी कंपनी से आए जो उसे सीधे बदलने की कोशिश कर रही हो। यह नई पीढ़ी की मीजरमेंट कंपनियों से भी आ सकता है, जो Single-source television currency के मॉडल को धीरे-धीरे बनाए रखना मुश्किल बना दें।

यही वजह है कि MIB का TAM और Chrome DM दोनों से संपर्क करना पहली नजर में जितना सामान्य लग सकता है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। मंत्रालय शायद यह समझने की कोशिश कर रहा है कि भविष्य का रेटिंग्स सिस्टम आखिर कैसा होना चाहिए।

सरकार के सामने मूल रूप से दो विकल्प हैं- एक और BARC तैयार करना या फिर ऐसा इकोसिस्टम बनाना जिसमें किसी एक कंपनी को पूरी तरह BARC बनने की जरूरत ही न हो। दूसरा मॉडल टेलीविजन के भविष्य के लिहाज से टेक्नोलॉजी के स्तर पर ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है। हालांकि, इसे रेगुलेट करना भी काफी ज्यादा मुश्किल हो सकता है।

ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स के लिए दांव काफी बड़ा है। ज्यादा प्रतिस्पर्धी रेटिंग्स मार्केट से किसी एक मीजरमेंट प्रोवाइडर पर निर्भरता कम हो सकती है और ऑडियंस डेटा की बारीकी में सुधार हो सकता है। लेकिन अगर कई डेटा सोर्स सामने आते हैं और उनके बीच कोई कॉमन करेंसी नहीं होती, तो इंडस्ट्री को इसका उल्टा नतीजा भी मिल सकता है- ज्यादा डेटा, ज्यादा मीजरमेंट कंपनियां और इस बात को लेकर कम निश्चितता कि आखिर आंकड़ों का मतलब क्या है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या MIB का TAM और Chrome DM के साथ जुड़ाव वास्तव में एक प्रतिस्पर्धी रेटिंग्स मार्केट की शुरुआत है, या फिर यह भारतीय टेलीविजन ऑडियंस को मीजरमेंटे के बिल्कुल अलग मॉडल की दिशा में पहला कदम है।

 

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