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AI पर नियंत्रण को लेकर अमेरिकी सीनेट का बड़ा फैसला: राज्यों का अधिकार बरकरार

अमेरिकी सीनेट ने 1 जुलाई को एक बहुत अहम फैसला लिया है। सीनेट ने साफ कर दिया कि इनोवेशन के नाम पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की निगरानी को 10 साल तक रोक कर नहीं रखा जा सकता।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago

अमेरिकी सीनेट ने 1 जुलाई को एक बहुत अहम फैसला लिया है। उन्होंने लगभग सर्वसम्मति से एक ऐसे प्रस्ताव को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि अगले 10 साल तक अमेरिका के किसी भी राज्य को AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से जुड़े नियम बनाने की इजाजत न दी जाए। इस प्रस्ताव का मतलब यह था कि राज्य सरकारें AI को रेगुलेट नहीं कर सकेंगी, और टेक कंपनियां बिना किसी रोक-टोक के अपना काम करती रहेंगी, इसे "नवाचार" यानी इनोवेशन कहकर जायज ठहराने की कोशिश की जा रही थी।

सीनेट ने साफ कर दिया कि इनोवेशन के नाम पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की निगरानी को 10 साल तक रोक कर नहीं रखा जा सकता। यह फैसला बड़ी टेक कंपनियों (Big Tech) और उनके प्रभाव के खिलाफ एक मजबूत संकेत माना जा रहा है, क्योंकि वो चाहती थीं कि उन्हें ज्यादा छूट मिले और अलग-अलग राज्यों के नियमों का पालन न करना पड़े। अब इस फैसले के बाद, अमेरिका के हर राज्य को अधिकार रहेगा कि वो AI से जुड़े अपने नियम बना सके।

बता दें कि 1 जुलाई को सीनेट में 99-1 (99 वोट पक्ष में, 1 विरोध में) के भारी बहुमत से इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। यह प्रस्ताव अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पेश “One Big Beautiful Bill” नामक व्यापक विधेयक में चुपचाप शामिल कर दिया गया था। इसका सीधा मकसद था- सिलिकॉन वैली और टेक कंपनियों को रेगुलेशन से छूट देकर, उन्हें लगभग पूरी आजादी देना।

लेकिन इस बार अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था ने बिग टेक की लॉबिंग के आगे झुकने से इनकार कर दिया। तकनीकी कंपनियों का तर्क था कि यदि हर राज्य AI के लिए अपने-अपने नियम बनाएगा, तो इससे एक जटिल ‘कॉम्प्लायंस’ का जाल बन जाएगा और अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता (खासकर चीन के मुकाबले) कमजोर होगी, लेकिन सांसदों ने इसे खारिज कर दिया।

नियंत्रण का विरोध करने वालों का कहना था कि इस प्रस्ताव से उपभोक्ता सुरक्षा कमजोर होती, बायोमेट्रिक डेटा की प्राइवेसी को खतरा पहुंचता और डीपफेक जैसी टेक्नोलॉजी बेकाबू हो सकती थी। सीनेट ने टेक दिग्गजों को शक्ति देने की बजाय राज्यों को अधिकार देने का रास्ता चुना।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ये फैसला?

अब सवाल यह उठता है कि अमेरिका के इस ‘स्थानीय लेकिन निर्णायक’ फैसले से भारत जैसे देश को क्या फर्क पड़ता है? क्योंकि AI अब केवल अमेरिका या यूरोप की बहस नहीं र, यह वैश्विक मानकों का मुद्दा बन चुका है। भारत में फिलहाल AI को लेकर जो भी रणनीति है, वह अभी ड्राफ्ट और रणनीतिक दस्तावेजों तक सीमित है। लेकिन यह बात किसी से छुपी नहीं है कि भारत खुद को ग्लोबल AI हब बनाना चाहता है।

भारत की कई स्टार्टअप्स और IT कंपनियां अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों को AI-आधारित समाधान निर्यात करती हैं। ऐसे में यदि अमेरिका में हर राज्य अपनी-अपनी अलग शर्तें लागू करेगा, तो भारतीय कंपनियों को हर बार अलग-अलग नियमों का पालन करना पड़ेगा। कैलिफोर्निया कुछ मांगेगा, न्यूयॉर्क कुछ और, टेक्सस बिल्कुल अलग।

भारत में राज्य स्तरीय सोच को मिलेगी प्रेरणा?

हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है—सीनेट का यह फैसला भारत के डिजिटल-फर्स्ट राज्यों जैसे कर्नाटक और तेलंगाना को AI रेगुलेशन पर अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए प्रेरित कर सकता है। हो सकता है वे दिल्ली के किसी केंद्रीय निर्देश का इंतजार न करें और अपनी नीतियां बनाने की दिशा में सोचें।

ऐसे में अगर भारत को अपने उद्यमियों और टेक कंपनियों के लिए ‘कॉम्प्लायंस की जटिलता’ से बचाना है, तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर AI के लिए एक स्पष्ट और एकीकृत नीति जल्द से जल्द लागू करनी होगी, वरना यह बहस भी स्थानीय राजनीति की खींचतान में उलझ जाएगी।

जनता की ताकत बनाम लॉबी का दबाव

अमेरिकी सीनेट का यह निर्णय यह भी दिखाता है कि जनता की आवाज और सामान्य समझदारी आज भी अरबों-डॉलर की लॉबिंग पर भारी पड़ सकती है। आज जब AI खुदरा विज्ञापन से लेकर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं तक हर क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है, तब भारत के पास यह मौका है कि वह नीति निर्धारण में स्पष्टता दिखाए, बजाय इसके कि वह दुनिया की दौड़ में हमेशा पीछे-पीछे चलता रहे।

सीनेट के इस वोट ने याद दिलाया है कि AI का भविष्य केवल बोर्डरूम्स में नहीं तय होगा—बल्कि ऐसे सार्वजनिक मंचों पर तय होगा जहां जवाबदेही अब भी मायने रखती है।


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