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अमेरिकी कोर्ट में Google की करारी हार से क्या भारत के ऐप इकोसिस्टम का खुलेगा दरवाजा?

ऊपरी तौर पर यह एक आम टेक कानूनी लड़ाई लग सकती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह फैसला मोबाइल ऐप इकोसिस्टम के स्ट्रक्चर और कमाई के तरीके में बदलाव का संकेत देता है- खासतौर पर भारत जैसे देश में

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago

शांतनु डेविड, स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ।।

टेक कंपनी गूगल को अमेरिका में एक बड़ा झटका लगा है, क्योंकि वह एक महत्वपूर्ण एंटीट्रस्ट (प्रतिस्पर्धा-विरोधी) मुकदमा हार गया है और यह फैसला भारत जैसे बाजारों में शायद और भी गंभीर असर डाल सकता है। 30 जुलाई को अमेरिका की एक फेडरल अपीलीय अदालत ने 2023 में आए Epic Games बनाम गूगल केस में जूरी के फैसले को लगभग पूरी तरह बरकरार रखा।

इस फैसले का मूल निष्कर्ष यह था कि गूगल का Android ऐप इकोसिस्टम पर नियंत्रण, कानूनी रूप से प्रतिस्पर्धा-विरोधी (anti-competitive) है। इस निर्णय के बाद टेक दिग्गज कंपनी को अब तीसरे पक्ष की बिलिंग सुविधाओं को अनुमति देनी होगी, Play Store के भीतर वैकल्पिक ऐप स्टोर की सुविधा देनी होगी और इन-ऐप पेमेंट पर अपनी एकाधिकार नीति को ढील देनी होगी। यह सब उस बाजार में हो रहा है जहां गूगल ने लंबे समय से डेवलपर्स से ऐप बिक्री और इन-ऐप खरीद पर 30% तक का कमीशन वसूला है।

सिर्फ तकनीकी कानूनी लड़ाई नहीं

ऊपरी तौर पर यह एक आम टेक कानूनी लड़ाई लग सकती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह फैसला मोबाइल ऐप इकोसिस्टम के स्ट्रक्चर और कमाई के तरीके में बदलाव का संकेत देता है- खासतौर पर भारत जैसे देश में, जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा Android यूजरबेस और एक मोबाइल-प्रथम डिजिटल अर्थव्यवस्था है।

भारत में 80 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर हैं, जिनमें भारी बहुमत Android उपयोग करता है। यहां गूगल का नियंत्रण केवल ऐप वितरण (Play Store) तक सीमित नहीं है, वह मॉनेटाइजेशन (Play Billing) और खोज एवं खोजयोग्यता (Search, YouTube और अब Pixel Ecosystem) पर भी मजबूत पकड़ बनाए हुए है।

पिछले एक दशक से ऐप डेवलपर्स, पब्लिशर्स और मार्केटर्स इसी बंद घेरे में काम करते आ रहे हैं। लेकिन अब, इस कोर्ट के फैसले ने उस घेरे का दरवाजा थोड़ा खोल दिया है।

मुद्दा क्या है?

मूल समस्या गूगल के "tying behavior" से जुड़ी है, यानी अपने Android वर्चस्व का इस्तेमाल करते हुए डेवलपर्स को जबरन गूगल Play Billing का उपयोग करने के लिए मजबूर करना और वैकल्पिक ऐप स्टोर्स की प्रतिस्पर्धा को रोकना।

यह प्रैक्टिस नई नहीं है, लेकिन अब एक अमेरिकी अदालत ने इसे अवैध ठहराया है और इसके परिणाम अब लागू किए जा सकते हैं।

इसका सीधा असर क्या होगा?

अब डेवलपर्स को यह विकल्प मिलेगा कि वे Android पर अपने खुद के इन-ऐप पेमेंट सिस्टम दे सकें और ऐप वितरण के लिए वैकल्पिक ऐप स्टोर का उपयोग कर सकें, वो भी Play Store के भीतर ही। सबसे अहम बात- गूगल को अपने ऐप कैटलॉग तक प्रतिद्वंद्वियों को इंटरऑपरेबिलिटी के लिए एक्सेस देना होगा।

अब Android का 'gatekeeper' सिर्फ दरवाजा नहीं संभालेगा, कुंजी भी साझा करनी होगी।

अब बात भारत की

भारत में गूगल पहले ही एंटीट्रस्ट जांच के घेरे में है। 2022 में, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने Android बाजार में वर्चस्व के दुरुपयोग के आरोप में गूगल पर ₹1,337 करोड़ का जुर्माना लगाया था। इसमें एक बड़ा निर्देश था- यूजर्स को प्रीलोडेड ऐप हटाने की अनुमति मिले और वैकल्पिक ऐप स्टोर्स को इस्तेमाल करने की आजादी हो।

गूगल ने उस समय सीमित तौर पर इस पर अमल किया था, लेकिन अब अमेरिकी कोर्ट का यह वैश्विक उदाहरण भारतीय रेगुलेटर्स और स्टार्टअप्स को पहले से कहीं ज्यादा अधिकार और आत्मविश्वास देगा।

बदलाव अब कल्पना नहीं, हकीकत है

भारतीय विकल्प जैसे PhonePe का Indus Appstore पहले से तैयार हैं। Xiaomi, Samsung, Vivo और Oppo जैसे ब्रैंड्स के OEM ऐप स्टोर्स भी मौजूद हैं, लेकिन डेवलपर ट्रस्ट या स्केल की कमी थी। अब, यदि डेवलपर्स को वैकल्पिक वितरण के लिए दंड नहीं मिलेगा, तो ये सारे विकल्प अचानक व्यवहार्य बन सकते हैं।

यह भारतीय इनोवेशन को भी बढ़ावा देगा

जो भारतीय आंत्रप्रेन्योर और मार्केटर्स अब तक गूगल और Apple की दोहरी पकड़ में थे, उनके लिए यह नए अवसरों का संकेत है। Apple अब भी iOS को पूरी तरह नियंत्रित करता है और Epic v. Apple केस में Apple को ज्यादातर राहत मिली, इसलिए iOS मॉनेटाइजेशन में बदलाव की उम्मीद नहीं है। लेकिन Android के मामले में यह एक नई शुरुआत है- एक ऐसा इंटरनेट जैसा युग, जहां चीजें शायद थोड़ा अव्यवस्थित हों, लेकिन अधिक खुली और प्रयोगधर्मी हों।

मार्केटर्स के लिए मतलब

अब गूगल के दायरे से बाहर नई विज्ञापन इन्वेंटरी संभव है। यदि ऐप डेवलपर्स गूगल का हिस्सा बचा पाते हैं, तो वे वो पैसा मार्केटिंग में लगा सकते हैं- इससे पहली पार्टी डेटा बढ़ेगा, विज्ञापन विकल्प अधिक होंगे और CPM यानी विज्ञापन लागत में भी गिरावट संभव है (कम से कम तब तक, जब तक नया संतुलन न बने)।

एक ओर, विखंडित ऐप इकोनॉमी का मतलब है तकनीकी एकीकरण में अधिक मेहनत, लेकिन दूसरी ओर, यह डेवलपर्स के साथ सीधे संबंध और वैकल्पिक मोनेटाइजेशन मॉडल को जन्म दे सकता है।

कुछ शर्तें अब भी लागू हैं

सिर्फ कोर्ट के कहने से बदलाव नहीं होता, यूजर व्यवहार में जड़ता होती है। लोग Play Store और Play Billing को आदत, सुविधा और सुरक्षा के चलते चुनते रहेंगे। गूगल इस बात को जानता है और UX डिजाइन व फ्रिक्शन लेयर के जरिए बदलाव को धीमा कर सकता है, जब तक कि और सख्त रेगुलेशन न हों।

Apple का मुद्दा बरकरार है

Apple अभी भी iOS का पूरा कंट्रोल रखता है और इस फैसले से Apple पर कोई असर नहीं पड़ा है। यदि आपकी ऐप रणनीति iOS पर आधारित है, तो अभी कोई बड़ा बदलाव नहीं है। लेकिन भारत में, जहां Android का बोलबाला है, यह फैसला बड़ी राहत है, सिर्फ डेवलपर्स के लिए नहीं, पूरे डिजिटल वितरण मॉडल के लिए।

चाहे बात इन-ऐप सब्सक्रिप्शन की हो, फ्रीमियम गेम्स की या डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर कॉमर्स की, गूगल का टैक्स हटाने की संभावना खुद में एक बड़ा मौका है।

बड़ी तस्वीर

गूगल का ऐप स्टोर वर्चस्व अब सिर्फ भारत में नहीं, दक्षिण कोरिया, यूरोप और अमेरिका जैसे बाजारों में भी चुनौती के घेरे में है। अब भारत के पास मजबूत कानूनी उदाहरण भी है और विशाल बाजार का दबाव भी, जिससे वह गूगल से असल अनुपालन की मांग कर सकता है।

अब यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन इस मौके को पहचानता है और इसे अवसर में बदलता है या अराजकता में खो देता है। 


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