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एसपी को टेलिविजन के खाके में रखकर आज भी बेचा जा सकता है: पुण्य प्रसून
27 जून को को एसपी सिंह को याद किया गया। एसपी की मृत्यु 21 बरस पहले हुई...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
'एसपी सिंह ने तो कभी अपने 20 मिनट के बुलेटिन में विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद साढ़े चार मिनट से ज्यादा जगह नहीं दी। दस सेकेंड के विज्ञापन की दर को बढ़ाते बढ़ाते नब्बे हजार तक जरूर कर दिया। लेकिन अब तो उल्टा चलन है। विज्ञापन बटोरने की होड़ में 10 सेकेंड का विज्ञापन घटते घटते 10 हजार या उससे कम तक आ चुका है।' 2012 में ऐसा अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने लिखा था। उन्होंने उसी साल एसपी की याद में आयोजित एक कार्यक्रम के बाद जिस तरह महसूस किया, उस पर भी अपनी कलम चलाई। उनका ये पुराना ब्लॉग कई मायनों में आज भी पत्रकारिता की असलियत बयां कर रहा है। आप उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
एसपी की पत्रकारिता क्यों पीछे छूट गई एसपी को याद करते हुए
27 जून को को एसपी सिंह को याद किया गया। एसपी की मृत्यु 21 बरस पहले हुई। लेकिन एसपी को टेलिविजन के खाके में रखकर आज भी बेचा जा सकता है, यह अहसास पहली बार एसपी सिंह को याद किए गए कार्यक्रम को देखकर लगा। नोएडा के फिल्म सिटी के मारवाह स्टूडियो में हुए इस कार्यक्रम के निमंत्रण कार्ड ने प्रायोजक और पत्रकारो की लकीर को मिटाया। वरिष्ठ पत्रकारों की लाइन में ही बिल्डरों का नाम छपा देखकर लगा हर वह शख्स मुख्य अतिथि बनने की काबिलियत रखता है, जो बाजार के नाम पर कुछ आयोजकों को दे सकता है। एक जाने माने पत्रकार की याद में अब के नायक बने पत्रकारों के जरिए मीडिया के मौजूदा रूप को देखने के लिए एक मीडिया वेबसाइट की पहल वाकई अच्छी होगी। लेकिन बाजार के ओहदेदार लंपट लोगों की कतार मुख्य अतिथि बन जाए। पैसा देकर कार्ड में अपना नाम छपा ले। और बाजार-बाजार का ढिंढोरा पीटते पत्रकारों को भी यह लगे कि यह तो आधुनिक चलन है, तो क्या कहेंगे?
दरअसल, बाजार शब्द की परिभाषा पत्रकारिता करते हुए हो क्या यह तमीज चेहरे के ऊपर जा नहीं पा रही है। चेहरा लिए घूमते पत्रकारों को सिल्वर स्क्रीन के कलाकारों से लेकर मॉडलिंग करने वालों की कतार में रखने का नया नजरिया ही खबर है। अब के नायक पत्रकारों को देखकर भविष्य में न्यूज चैनलों से जुड़ने वाले साथ में खड़े होकर तस्वीर खींचने या ऑटोग्राफ लेकर एक-दूसरे को ग्लैमर की जमीन पर खड़ा करने से नहीं हिचकते और खबरों को पेश करने के पीछे बाजार में बिकने की परिभाषा में खुद को ढालने से नहीं हिचकते। लेकिन एसपी सिंह ने तो कभी अपने 20 मिनट के बुलेटिन में विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद साढ़े चार मिनट से ज्यादा जगह नहीं दी। दस सेकेंड के विज्ञापन की दर को बढ़ाते बढ़ाते नब्बे हजार तक जरूर कर दिया। लेकिन अब तो उल्टा चलन है। विज्ञापन बटोरने की होड़ में 10 सेकेंड का विज्ञापन घटते घटते 10 हजार या उससे कम तक आ चुका है।
यह राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज चैनलो का ही सच है। और अगर अब के नायक चेहरे एसपी सिंह को याद करते करते बाजार का रोना या हंसना ही देखकर खबरों की बात करने लगे तो सुनने वालो के जेहन में जाएगा क्या। और ऐसी बहसों को सुन-देख कर जो ब्लॉग-फेसबुक या कहें सोशल मीडिया में लिखा जाएगा, वह भी इसी तरह सतही होगा। इसलिए जरा पलट कर सोचें 27 जून के कार्यक्रम के बारे में सोशल मीडिया में जो लिखा गया, उससे पढ़ने वालो को क्या लगा। एक कार्यक्रम और हो गया। अब के दौर के नायक चेहरों का ग्लैमर आसमान छू रहा है। पहली बार कई चेहरे एक साथ एक मंच पर जमा हुए तो आयोजन सफल हो गया। हो सकता है। लेकिन पत्रकारिता की साख कभी भी लोकप्रिय अंदाज, बाजार के ग्लैमर, बिकने-दिखने या फिर एसपी सरीखे पत्रकारिता के गुणगान से नहीं बढ़ सकती।
मौजूदा दौर की पत्रकारिता को कठघड़े में खड़ाकर जायज सवालों को उठाकर उस पर बहस कराने से कुछ आग जरूर फैल सकती है। असल में मैं सोचता रहा कि एसपी सिंह को याद करने वाले कार्यक्रम के बार में रिपोर्टिंग करते सोशल मीडिया में कहीं भी वह सवाल क्यों नहीं उठे, जिसे पहली बार मैंने उठते हुए देखा। सवाल चेहरों के भाषण का नहीं है। सवाल सुनने वालों के जेहन में उठते सवालों का है। मैंने तो पहली बार नायक चेहरों को धारदार सवालों के सामने पस्त होते देखा। क्या यह सच नहीं है कि अगर वाकई हर मीडिया संस्थान में भर्ती को लेकर कोई मापदंड बन जाए तो लायक छात्र पत्रकारिता करने की दिशा में सफल होंगे। क्या यह सच नहीं है कि इंटर्नशिप को लेकर हर संस्थान अगर गंभीर हो जाए तो इंटर्न छात्र-छात्रा अपनी उपयोगिता को साबित भी करेगा और जो बैक-डोर एन्ट्री किए हुए संस्थान के भीतर पत्रकार बने बैठे हैं, उन्हें भी अहसास होगा कि काम तो करना होगा। न्यूज चैनलो में जा कर पत्रकारिता करने का माद्दा रखने वालों को क्या बाजार के ग्लैमर में खुद को बेवकूफ बनाकर पेश होने की मजबूरी आ गई है। क्योंकि पत्रकारिता बिकती नहीं। या फिर जो बिके वही पत्रकारिता है। है ना कमाल।
एसपी सिंह को याद करते हुए सुनने वाले छात्रों के सवाल ही अगर एसपी सिंह की याद दिला दें तो सच की जमीन भी नायक चेहरों के जरिए नहीं बल्कि अपने आसरे बनाने होगी। किसी भी पत्रकार के साथ तस्वीर या ऑटोग्राफ का ग्लैमर खत्म करना होगा। खबरों की फेहरिस्त हमेशा नायक चेहरों को थमानी होगी, जिसे कवर करने का दवाब ऐसे ही कार्यक्रम में सार्वजनिक तौर पर बनाना होगा। सवाल-जवाब के लिए हर नायक चेहरे से वक्त तय कर ठोस मुद्दों का जवाब मांगना चाहिये। जिससे मौजूदा पत्रकारिता का विश्लेषण हो सके। और तस्वीर और चेहरों की रिपोर्टिंग से बचते हुए जो मुश्किल मौजूदा पत्राकरिता को लेकर उभरे, उसके लिए रास्ता निकालने की दिशा में सोशल मीडिया से जुडे लेखकों को बहस चलानी चाहिए और कार्यक्रम कमाई का जरिया हो तो बॉयकॉट करने की तमीज भी आनी चाहिए।
(साभार: prasunbajpai.itzmyblog.com)
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