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अजीत अंजुम ने क्यों कहा, ‘...तो मैं देशद्रोही ही सही’
लॉकडाउन के बीच पलायन करते मजदूरों के कई विडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। इनमें से कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें देखकर आंखें नम हो जाएं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
लॉकडाउन के बीच पलायन करते मजदूरों के कई विडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। इनमें से कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें देखकर आंखें नम हो जाएं। मजदूरों के इस हाल को मीडिया ने प्रमुखता से उठाया और कई पत्रकारों ने उनकी व्यथा को शब्दों के जरिये लोगों के सामने रखने का प्रयास किया। इस ‘प्रयास’ में वरिष्ठ पत्रकार व ‘इंडिया टीवी’ के पूर्व मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम भी शामिल रहे। उन्होंने ट्विटर पर इस विषय में कई ट्वीट किये।
इसके अलावा, मीडिया के कुछ वॉट्सऐप ग्रुप पर उन्होंने मजदूरों का दर्द बयां करती एक कविता भी शेयर की, जिसे संजय कुंदन ने लिखा है और दिलीप गुप्ता ने आवाज दी है। इस कविता में जो विडियो इस्तेमाल किया गया है, उसे अजीत अंजुम ने शूट किया है। उन्हें उम्मीद थी कि लोग खासकर, पत्रकार मजदूरों के दर्द को समझने का प्रयास करेंगे, लेकिन हुआ इसके एकदम उलट।
एक वरिष्ठ पत्रकार, जो अजीत अंजुम के दोस्त भी हैं, उन्होंने कविता पर कड़ी आपत्ति जताई। इतना ही नहीं, उन्होंने पलायन की बात करने वालों को देशद्रोही भी करार दे डाला। इस मुद्दे को लेकर अंजुम और उनके दोस्त के बीच ग्रुप पर तीखी बहस भी हुई। अंजुम ने खुद इस बारे में अपने यूट्यूब चैनल पर बताया है। हालांकि, उन्होंने उन्हें देशद्रोही ठहराने वाले पत्रकार का नाम उजागर नहीं किया है। उन्होंने हैरानी भी जताई कि कैसे कोई पत्रकार इतने संवेदनशील मुद्दे पर आंखें मूंदे रह सकता है और दूसरों को देशद्रोही करार दे सकता है?
अपने विडियो में अजीत अंजुम ने यह भी साफ किया है कि क्यों उनके जैसे लोगों को बेवजह निशाना बनाया जाता है। उन्होंने कहा, ‘आजकल यह हो गया है कि जो प्रधानमंत्री मोदी के ऐलान या उनकी योजनाओं को थोड़ा भी डेंट करता हो या उनकी घोषणाओं की कमियों को उजागर करता हो, वह देशद्रोही हो जाता है। वहां तक तो ठीक है, लेकिन आज देशद्रोही इसलिए कहा गया कि मजदूरों की बात हो रही है। मजदूरों की बात हुई, तो सरकार की नाकामी की बात हुई। मोदी ने जो लॉकडाउन का ऐलान किया उसकी कुछ खामियां थीं, जिनकी वजह से मजदूर सड़कों पर आये या उन्हें रोकने की जो कोशिश सरकारों द्वारा होनी चाहिए थी वो नहीं हो सकी। अब इन सबका गुस्सा हम जैसे पत्रकारों पर निकाला जा रहा है।’
वैसे अजीत अंजुम ही अकेले नहीं हैं, जिन्होंने पलायन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कठघरे में खड़ा किया है। कई अन्य वरिष्ठ पत्रकारों का भी यही मानना है कि लॉकडाउन से पूर्व पर्याप्त तैयारी नहीं की गई। हालांकि, यह बात अलग है कि ज़्यादातर लोगों की सोच इसके विपरीत है। वे मानते हैं कि पलायन को बेवजह मुद्दा बनाया जा रहा है, ताकि लॉकडाउन को असफल करार दिया जा सके। यही वजह है कि जब कोई पलायन की बात करता है, तो उसे निशाना बनाना शुरू हो जाता है।
यहां सुनिए वो कविता-
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