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DNPA कॉन्क्लेव 2026: AI के दौर में प्रामाणिकता, नजरिया और नैतिकता पर प्रसून जोशी का जोर

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के चेयरमैन व मशहूर गीतकार प्रसून जोशी ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) कॉन्क्लेव 2026 में खुलकर बातचीत की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 20 hours ago

सेंसर बोर्ड यानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के चेयरमैन व मशहूर गीतकार प्रसून जोशी ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) कॉन्क्लेव 2026 में खुलकर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपने गीतों, अपनी सोच और सेंसर बोर्ड में अपनी जिम्मेदारियों के बारे में बेबाक अंदाज में बात रखी।

सबसे पहले जब उनसे पूछा गया कि क्या जो बातें वे अपने गीतों में लिखते हैं, उन्हें खुद जीना जरूरी होता है? इस पर प्रसून जोशी ने कहा कि हर अनुभव को खुद जीना जरूरी नहीं, लेकिन उसे गहराई से महसूस करना जरूरी है। उन्होंने अपने बचपन की एक याद साझा की। उनकी मां, जो एक टीचर थीं, एक बार ट्रेनिंग के लिए घर से बाहर गईं। उस समय उन्हें डर और खालीपन महसूस हुआ, लेकिन उन्होंने उस भावना को जाहिर नहीं किया। वही अनकहा एहसास बाद में उनकी रचनात्मकता की ताकत बना। उनके मुताबिक, सच्ची कहानी वही होती है जो दिल से निकले। हर देखी हुई चीज लिख देना रचनात्मकता नहीं है, बल्कि जो भावनात्मक रूप से सच्चा लगे, उसे चुनना ही असली लेखन है।

उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा भी बताया। शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने उनसे कहा था कि वे मंच पर गाते समय पूरी भीड़ को नहीं, बल्कि एक व्यक्ति को ध्यान में रखकर गाते हैं। प्रसून जोशी भी यही तरीका अपनाते हैं। वे किसी काल्पनिक “कंज्यूमर” के लिए नहीं लिखते, बल्कि किसी एक असली इंसान को सोचकर लिखते हैं। उनका मानना है कि अगर आप एक व्यक्ति से ईमानदारी से बात करते हैं, तो आपकी बात सब तक पहुंचती है।

CBFC के चेयरमैन के तौर पर अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने माना कि यह जिम्मेदारी आसान नहीं है। खासकर आज के सोशल मीडिया दौर में, जब कोई फिल्म रिलीज होते ही मिनटों में उसकी तारीफ और आलोचना दोनों शुरू हो जाती हैं। हर किसी के हाथ में मोबाइल है और हर कोई तुरंत अपनी राय दे देता है। पहले ऐसा नहीं था। अब दुनिया बहुत ज्यादा जुड़ी हुई है और एक जगह की बात दूसरी जगह तक तुरंत पहुंच जाती है। ऐसे में फैसले लेना और संतुलन बनाए रखना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है।

उन्होंने कहा कि उनका तरीका हमेशा “विवाद की जगह संवाद” का रहा है। ज्यादातर फिल्मकार जानबूझकर किसी की भावना आहत नहीं करना चाहते। कई बार विवाद नजरिये के फर्क से पैदा होते हैं। इसे समझाने के लिए उन्होंने नदी की मिसाल दी- जो व्यक्ति धारा के खिलाफ तैर रहा है, उसे नदी खतरनाक लगेगी, जबकि किनारे पर खड़े व्यक्ति को वही नदी शांत दिखेगी। नदी वही है, फर्क देखने के नजरिये का है। उनका काम इन अलग-अलग नजरियों को आमने-सामने बैठाकर बातचीत कराना रहा।

AI पर बात करते हुए प्रसून जोशी ने साफ कहा कि टेक्नोलॉजी रचनात्मकता को फैलाने में मदद कर सकती है, लेकिन उसे जन्म देने वाली इंसानी संवेदना की जगह नहीं ले सकती। उनके मुताबिक, AI पूरी तरह “आर्टिफिशियल” भी नहीं है, क्योंकि वह इंसानों के ही अनुभव और डेटा से सीखता है। वह पहले से मौजूद चीजों को जोड़कर नया रूप दे सकता है, लेकिन जो अब तक कहा ही नहीं गया, जो अनकहा और अनछुआ है, वहां तक पहुंचना अभी भी इंसान की ताकत है।

उन्होंने कहा कि अगर रचनात्मकता सिर्फ शब्दों के जोड़-तोड़ तक सीमित हो, तो AI उसे दोहरा सकता है। लेकिन अगर वह गहरे एहसास और अंतर्ज्ञान से आती है, तो वह पूरी तरह इंसानी है। यही वजह है कि वे AI से डरते नहीं, लेकिन उसके असर को नजरअंदाज भी नहीं करते। आज AI गाने बना सकता है, फिल्में बना सकता है और पत्रकारिता से लेकर विज्ञापन तक हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। यह बदलाव बड़ा और गंभीर है।

ध्यान देने की घटती क्षमता पर उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह सही नहीं है। भले ही आज छोटे वीडियो और रील्स ज्यादा देखी जा रही हों, लेकिन लंबी फिल्में, पॉडकास्ट और गहरी कहानियां भी अपना दर्शक ढूंढ लेती हैं। फॉर्मेट बदलते रहते हैं, लेकिन इंसान की कहानी सुनने और समझने की जरूरत नहीं बदलती।

प्रसून जोशी का मानना है कि AI अक्सर वही कंटेंट बनाता है जो पहले से लोकप्रिय और स्वीकार्य हो, यानी सुरक्षित और आम रास्ता। लेकिन असली रचनात्मकता ढांचे को तोड़ती है और नया रास्ता बनाती है। इंसान सिर्फ सोचने वाली मशीन नहीं है। उसके अंदर भावनाएं हैं- प्यार, भरोसा, ईमानदारी, जिन्हें सिर्फ डेटा में नहीं बदला जा सकता।

आखिर में उन्होंने कहा कि असली सवाल टेक्नोलॉजी का नहीं, मूल्यों का है। AI काम करेगा, फैसले लेगा, लेकिन दिशा इंसान तय करेगा। अगर नैतिकता और मूल्य मजबूत होंगे तो टेक्नोलॉजी लोगों को सशक्त बनाएगी, वरना गलत दिशा भी दे सकती है। उन्होंने रूसी लेखक Anton Chekhov का जिक्र करते हुए कहा कि आखिरकार जीत भरोसे और नैतिकता की होती है, सिर्फ तर्क या चालाकी की नहीं।

DNPA कॉन्क्लेव 2026 में पॉलिसी मेकर्स, मीडिया जगत के लीडर्स और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने हिस्सा लिया। यहां खबरों, गवर्नेंस और डिजिटल इनोवेशन के तेजी से बदलते दौर पर चर्चा हुई। अलग-अलग सत्रों में इस बात पर मंथन हुआ कि AI कैसे न्यूज रूम के काम करने के तरीके, कंटेंट बनाने और उसे लोगों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को बदल रहा है।

इसके साथ ही यह भी चर्चा हुई कि डिजिटल दौर में भरोसेमंद जानकारी कहां से मिले, लोगों का विश्वास कैसे जीता जाए और बदलते मीडिया माहौल में नियम-कानून किस तरह संतुलन बनाए रखें। कुल मिलाकर, कॉन्क्लेव में इस बात पर जोर दिया गया कि टेक्नोलॉजी और आजादी के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।


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