अभी साहित्य से बहुत दूर हूं मैं...!

दोस्तो, कविता लिखना तो बस अपने अंदर के और आसपास के विश्व को देखना भर है...

Last Modified:
Tuesday, 24 July, 2018
kunwar cp singh

कुंवर सी.पी. सिंह

युवा पत्रकार ।।

दोस्तो, कविता लिखना तो बस अपने अंदर के और आसपास के विश्व को देखना भर है। कविता, प्रेम से लेकर खलिहान के जंग लगे दरवाजे तक, किसी भी चीज के संबंध में लिखी जा सकती है। कविता लिखने से आप अधिक भावपूर्ण हो सकते हैं और आपकी भाषा शैली भी सुधर जाएगी, परंतु यह समझ पाना कठिन होता है कि शुरुआत कहां से की जाए। हालांकि, कविता लेखन निश्चय ही एक ऐसा कौशल है जो अभ्यास से सुधरता है...!!

क्या मैंने लिखा है मन के समंदर को,

क्या मैंने लिखा है टूटते गहन अंदर को...

क्या देह की देहरी से इतर कुछ लिख सका हूं मैं,

क्या मन की खिड़की से कुछ कह सका हूं...

क्या स्त्री की उपेक्षा मैंने लिखी है,

क्या बेटी की पीड़ा हमको दिखी है...

क्या कृष्ण के कर्षण को मैंने नचा है,

क्या राम के आकर्षण को मैंने रचा है...

क्या शरद के रास में खुद को भिगोया है,

क्या फाग के रंग में खुद को डुबोया है...

क्या क्रांति के स्वर हमारी कानों में पड़े हैं,

सुना है सत्य के मुंह पर ताले पड़े हैं...

हर शख्स खामोशी से सहमा यहां है,

हर रात ओढ़े गहरी कालिमा यहां है...

क्या मैंने पीड़ितों की आहों को शब्दों में उकेरा है,

सुना है चांद पर आजकल जालिम का बसेरा है...

क्या गिद्ध की गंदी निगाहों को मैंने पढ़ा है,

सच के मुंह पर ये तमाचा किसने जड़ा है...

अगर ये सभी हमारी कविता में नहीं है...

सरोकारों से गर हमारी संवेदनाएं नहीं हैं...

भले ही जमाने में कितने भी मशहूर हूं मैं,

सच मानो अभी साहित्य से बहुत दूर हूं मैं...!

 

 

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