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वाकई आंखें खोलने वाले हैं डॉ. प्रणॉय रॉय की किताब THE VERDICT में शामिल ये आंकड़े

चुनावी माहौल में आई डॉ. प्रणॉय रॉय और दोराबजी सोपारीवाला की किताब 'द वर्डिक्ट' में शामिल...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

अमिताभ श्रीवास्तव

चुनावी माहौल में आई डॉ. प्रणॉय रॉय और दोराबजी सोपारीवाला की किताब 'द वर्डिक्ट' में शामिल एक आंकड़े के मुताबिक, इस लोकसभा चुनाव में दो करोड़ से ज़्यादा महिलाएं वोटर नहीं डाल पाएंगी, क्योंकि उनके नाम बतौर वोटर दर्ज ही नहीं हैं। किताब के मुताबिक मतदाता, सूचियों से इन 2.1 करोड़ महिलाओं के गायब होने का मतलब है कि इस बार हर चुनाव क्षेत्र से करीब 39 हज़ार महिलाओं की चुनावी भागीदारी पर सीधी रोक।

मतदाता सूचियों से गायब इन 2.1 करोड़ महिलाओं में सबसे ज़्यादा 70 लाख महिलाएं अकेले उत्तर प्रदेश से हैं। यानी उत्तर प्रदेश के हर चुनाव क्षेत्र से 87 हज़ार महिलाएं वोटर डालने के अपने बुनियादी संवैधानिक अधिकार से वंचित हैं।

राज्य और जिला प्रशासन, चुनाव आयोग ओर राजनैतिक दलों को इसका तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। विपक्ष को तो चुनाव आयोग पर इस बात के लिए भरसक दबाव बनाना चाहिए कि वह यह सुनिश्चित करे कि इन 2.1 करोड़ महिलाओं को वोट देने का मौका मिले।

किताब के मुताबिक, यह पहली बार नहीं हुआ है। 2014 में मतदाता सूचियों से गायब महिलाओं का आंकड़ा 2.5 करोड़ था। यानी एक लिहाज से देखें तो इस बार उन 2.5 करोड़ में से 40 लाख महिलाओं को मतदाता सूचियों में जगह मिल गई है। सुधार के बावजूद वोटर लिस्ट से बाहर महिलाओं की संख्या अब भी बहुत अधिक है।

विपक्षी दलों के लिए इस मुद्दे पर ध्यान देना और भी ज़रूरी है, क्योंकि डॉ. प्रणॉय रॉय और दोराब सोपारीवाला के मुताबिक, पारंपरिक रूप से बीजेपी के समर्थकों और मतदाताओं में महिलाओं की गिनती पुरुषों के मुकाबले कम रहती चली आई है।

2014 के चुनाव में एनडीए को पुरुष मतदाताओं के मामले में यूपीए पर 19 प्रतिशत की बढ़त मिली थी, जबकि महिलाओं के मामले में यह अंतर 9 फीसदी था। अगर सिर्फ पुरुषों ने वोट दिया होता तो 2014 में एनडीए को 376 सीटें मिली होतीं, अब के आंकड़े से 40 ज़्यादा। लेकिन अगर सिर्फ महिलाओं ने वोट दिया होता तो एनडीए 265 पर सिमट जाता, बहुमत के आंकड़े से भी 7 सीट कम।

इस बार चुनाव में गांवों के मतदाताओं, उनमें भी ख़ासतौर पर महिला मतदाताओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है। किताब के मुताबिक यह चुनाव एक तरह से ग्रामीण महिला मतदाताओं की क्रांतिकारी भागीदारी वाला चुनाव साबित हो सकता है। बीजेपी और नरेंद्र मोदी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। उज्ज्वला योजना के ज़रिए महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश इसी का संकेत है।

बीजेपी और सरकार तो सारे दांव चल रही है। उसके मुकाबले विपक्ष महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें अपने पाले में लाने के लिए कितना गंभीर है, यह देखना होगा।

(वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से)


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