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कवि अदम गोंडवी की इस चर्चित कविता को मिली नाट्यरूप की शक्ल

सामाजिक आलोचना के प्रखर कवि अदम गोंडवी की चर्चित कविताओं में से एक...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

सामाजिक आलोचना के प्रखर कवि अदम गोंडवी की चर्चित कविताओं में से एक ‘चमारों की गली’ को अभिनेता के.पी. मौर्य ने अपने निर्देशन में नाट्यरूप (सरजूपार की मोनालिसा) की शक्ल दी, जिसका आयोजन 15 नवंबर को दिल्ली के मंडी हाउस स्थित कमानी ऑडिटोरियम में किया गया।

बता दें कि कवि अदम गोंडवी की यह कविता एक दलित युवती कृष्णा की कहानी है जिसे सवर्णों के अत्याचार का शिकार होने के बाद भी हमारा सामाजिक ढांचा न्याय नहीं दिला पाता है। कविता में कवि ने सच्ची घटना का ऐसा फसाना पेश किया है जो हमारे समाज का एक विकृत चेहरा उघाड़ती है।  

नाट्य रूपांतरण में अदम गोंडवी की शायिरी की मौलिक फक्कड़ी से ‘चमारों की गली’ की अक्खड़ी को दो अभिनेताओं द्वारा मंच पर उकेरा गया। काली की भूमिका में खुद के.पी. मौर्य ने अभिनय किया, जबकि मोनालिसा के किरदार में दीक्षा ने अपने दमदार अभिनय का परिचय दिया। संगीत मृदुल और वासु ने दिया। इसकी प्रस्तुति विहान फाउंडेशन की ओर से की गई, तो  वहीं इस नाट्य रूपांतरण को दिल्ली सरकार की साहित्य कला परिषद का भी सहयोग मिला।


गौरतलब के.पी. मौर्य को रंगकर्म का संस्कार उन रंगकर्मियों से मिला, जो बिना किसी आडम्बर के गांव-कस्बों सब तरह के मंचों पर सहजता से सक्रिय रहते थे। विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश की कुछ जतिप्रधान नृत्य- नाट्य विधाएं, जैसे- अहिरउआ, चमरउआ, कहरउआ इत्यादि। लोक नाट्य शैली नौटंकी से के.पी. मौर्य में नाटक के प्रति रुझान और बढ़ा।

कालांतर में आखिरकार इसी आकर्षण ने इन्हें दिल्ली पहुंचा दिया। दिल्ली में सबसे पहले गंधर्व महाविद्यालय से संगीत (गायन) की शिक्षा ग्रहण करना शुरू किया, लेकिन अर्थाभाव के कारण वह क्रम कुछ ही महीनों में टूट गया। यह नब्बे के दशक के शुरुआती दौर की बात है। इसी दौरान कला-संस्कृति का केंद्र कहे जाने वाले मंडी हाउस का चक्कर शुरू हुआ। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक कई रंग चिंतकों, निर्देशकों से इसी दौरान संपर्क हुआ, नाटकों में अभिनय का सिलसिला शुरू हुआ, होली, बाणभट्ट की आत्मकथा, उत्तर रामचरितम, आधी रात के बाद आदि करीब दर्जनभर नाटकों में प्रमुख भूमिका निभाई, जिससे अभिनय और निर्देशन की बारीकियां सीखी।

1994 में उन्हें फिल्म और टेलिविजन के जाने-माने निर्माता-निर्देशक स्व. के. बिक्रम सिंह का सान्निध्य मिला, जिनसे उन्होंने टीवी/फिल्म के निर्माण-निर्देशन की सीख पाई।

1997 में प्रमुख टीवी चैनल नेटवर्क ‘जी न्यूज’ से जुड़े और लगातार कई वर्षों तक कला-संस्कृति के लिए सार्थक पत्रकारिता के साथ उत्तर भारत की लोक नाट्य विधाओं पर भारत सरकार के लिए दो डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्देशन किया। वे हिंदी अकादमी के लिए ‘कर्मनाशा की हार’  और ‘करतव बायस’ नाट्य निर्देशित कर चुके हैं।  


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