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सुप्रीम कोर्ट से वरिष्ठ पत्रकार आशीष दवे के खिलाफ दर्ज FIR रद्द, पुलिस को फटकार
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने आशीष दवे के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करते हुए कहा कि जांच अधिकारी को शिकायत दर्ज करने से पहले आरोपों की प्राथमिक जांच करनी चाहिए थी।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 2 hours ago
सुप्रीम कोर्ट ने ‘जी राजस्थान’ के पूर्व रीजनल हेड आशीष दवे के खिलाफ दर्ज ब्लैकमेलिंग और जबरन वसूली के मामले में राजस्थान पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। शुक्रवार (27 फरवरी) को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जिस तरीके से प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, वह चौंकाने वाला है और यह कानून की बुनियादी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने आशीष दवे के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करते हुए कहा कि जांच अधिकारी को शिकायत दर्ज करने से पहले आरोपों की प्राथमिक जांच करनी चाहिए थी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एफआईआर और शिकायत में जबरन वसूली या पद के दुरुपयोग से जुड़ा कोई ठोस और स्पष्ट आरोप नहीं दिखता, जिसके आधार पर तुरंत मामला दर्ज किया जाना जरूरी हो।
सुनवाई के दौरान जस्टिस मेहता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “जिस तरह से प्राथमिकी दर्ज की गई, उससे हम स्तब्ध हैं। इसमें कोई विशिष्ट आरोप ही नहीं है। यह सब मनगढ़ंत कहानी लगती है।” कोर्ट ने व्यंग्य करते हुए यह भी कहा, “इस FIR से बेहतर तो इंस्टाग्राम की स्टोरीज हैं… क्या यह जेम्स बॉन्ड की मूवी है? पहले गोली चलाओ, बाद में सोचो?”
कोर्ट ने राजस्थान पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि केवल इसलिए एफआईआर दर्ज की गई क्योंकि शिकायतकर्ता एक प्रभावशाली मीडिया कंपनी है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर कोई आम नागरिक इसी तरह की शिकायत लेकर थाने पहुंचता, तो क्या पुलिस इतनी ही तत्परता से प्राथमिकी दर्ज करती? न्यायाधीशों ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है और प्रभावशाली होने के आधार पर अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।
पीठ ने यहां तक कहा कि यदि आवश्यक हुआ तो राजस्थान पुलिस के आचरण पर गंभीर टिप्पणी दर्ज की जाएगी। कोर्ट के अनुसार, यह मामला दिखाता है कि पुलिस को निष्पक्षता और विवेक से काम लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
यह प्राथमिकी ‘जी मीडिया’ कंपनी की शिकायत पर जयपुर के अशोक नगर थाने में दर्ज की गई थी। चैनल प्रबंधन ने अपने तत्कालीन रीजनल हेड आशीष दवे और अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक कदाचार के आरोप लगाए थे। आशीष दवे ने पहले जिला एवं सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत की याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट का रुख किया।
हालांकि राजस्थान हाई कोर्ट ने प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा था कि मीडिया प्रोफेशनल्स से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी को धमकी या जबरन वसूली के जरिए अनुचित नुकसान न पहुंचाएं। साथ ही हाई कोर्ट ने जयपुर पुलिस को छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर साक्ष्य पेश करने का निर्देश दिया था।
हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दवे ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च कोर्ट ने न केवल एफआईआर रद्द कर दी, बल्कि पुलिस की भूमिका पर भी सख्त टिप्पणी की। इस फैसले को पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही और कानून के समान अनुप्रयोग के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
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