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शोधकर्ताओं-छात्रों के साथ आम पाठकों के लिए भी लाभप्रद होगा वाणी प्रकाशन का ये कोश
हिंदी साहित्य, दर्शन, इतिहास, आलोचना आदि विषयों को समाहित किये हुए सात खण्डों के कोश की प्रति राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को भेंट की गई
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
भारतीय भाषा परिषद और वाणी प्रकाशन के तत्वाधान में निर्मित 'हिंदी साहित्य ज्ञान कोश' 16 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को राष्ट्रपति निवास में भेंट किया गया। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी, निदेशक अदिति माहेश्वरी-गोयल और प्रधान संपादक शंभूनाथ के साथ कुसुम खेमानी ( अध्यक्ष भारतीय भाषा परिषद), विमला पोद्दार (मंत्री, भा.भा.प.) विवेक गुप्त (सन्मार्ग अखबार के मुख्य संपादक एवं पूर्व राज्यसभा सांसद) उपस्थित थे।
इसके उपरांत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ पर एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया जिसमें इस परियोजना के मुख्य संपादक शंभूनाथ एवं वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने पत्रकारों से कोश में लगे विशद शोध एवं इसकी निर्माण प्रक्रिया पर बातचीत की।
उन्होंने बताया कि वाणी प्रकाशन और भारतीय भाषा परिषद् के तत्वावधान में निर्मित सात खण्डों का ‘हिंदी साहित्य ज्ञान कोश’ अब हिंदी के पाठकों के लिए उपलब्ध है। हिंदी साहित्य, दर्शन, इतिहास, आलोचना आदि सभी विषयों को समाहित किये हुए यह सात खण्डों का महती ज्ञान कोश हिंदी साहित्य में पहला ऐसा प्रयास है जो शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों के अतिरिक्त आम पाठकों के लिए भी उतना ही लाभप्रद है।
शंभूनाथ ने बताया, ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ पूरे हिंदी संसार का एक सपना था। 1958 से 1965 के बीच धीरेन्द्र वर्मा द्वारा बना ‘हिंदी साहित्य कोश’ करीब पचास साल पुराना हो चुका था। इसके अलावा, आज साहित्य का अर्थ विस्तार हुआ है। साहित्य का ज्ञान अब एक व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य और दुनिया के बहुत से विचारों, सिद्धान्तों और अवधारणाओं को जाने बिना संभव नहीं है। साहित्य आज भी ज्ञान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानवीय रूप है। यह आम नागरिकों के लिए पानी और मोबाइल की तरह जरूरी है।’
वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने बताया कि हिंदी साहित्य ज्ञानकोश में 2660 प्रविष्टियां हैं। यह 7 खण्डों में 4560 पृष्ठों का है। इसमें हिंदी साहित्य से सम्बन्धित इतिहास, साहित्य सिद्धान्त आदि के अलावा समाज विज्ञान, धर्म, भारतीय संस्कृति, मानवाधिकार, पौराणिक चरित्र, पर्यावरण, पश्चिमी सिद्धान्तकार, अनुवाद सिद्धान्त, नवजागरण, वैश्वीकरण, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श आदि कुल 32 विषय हैं। हिंदी की प्रकृति और भूमिका अन्य भारतीय भाषाओं से विशिष्ट है। इसलिए ज्ञानकोश में हिंदी राज्यों के अलावा दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व और अन्य भारतीय क्षेत्रों की भाषाओं-संस्कृतियों से भी परिचय कराने की कोशिश है। इसमें हिंदी क्षेत्र की 48 लोक भाषाओं और कला-संस्कृति पर सामग्री है। देश भर के लगभग 275 लेखकों ने मेहनत से प्रविष्टियाँ लिखीं और उनके ऐतिहासिक सहयोग से ज्ञानकोश बना।
संपादक शंभुनाथ ने बताया, इस ज्ञानकोश के निर्माण में राधावल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रसाद सिंह और राजकिशोर जैसे ख्याति प्राप्त विद्वानों ने बहुत श्रम किया है। हमने कोलकाता में कार्यशालाएं कीं। इंटरनेट की सुविधाएं लीं और नयी पद्धतियों को अपनाया। हमारा लक्ष्य था कि एक बृहद, तथ्यपूर्ण, समावेशी और सारवान ज्ञानकोश बने। यह ज्ञान का एक विकासशील कोश है और एक राष्ट्रीय शुरुआत है। हमारा विश्वास है कि हिंदी की आने वाली पीढ़ियों द्वारा इसकी नींव पर ज्ञान की बहुमंजिला इमारत बनती रहेगी।’
हिंदी का पहला ‘हिंदी विश्वकोश’ नगेन्द्रनाथ बसु के सम्पादन में 1916 से 1931 के बीच तैयार किया था। यह उनके बांग्ला विश्वकोश की ही हिंदी छाया था। इसके पश्चात ‘हिंदी साहित्य कोश’ 1956 में आया था। नागरी प्रचारिणी सभा ने 1960 से 70 के बीच हिंदी विश्वकोश प्रकाशित किया था। अब इसके बाद भारतीय भाषा परिषद के ‘हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’ को हम एक बड़े हस्तक्षेप के रूप में देख सकते हैं। इसको ग्रन्थ रूप देने और वितरण व्यवस्था में वाणी प्रकाशन की ऐतिहासिक भूमिका है। कोलकाता के सन्मार्ग ने इसे मुद्रित किया है।
अरुण माहेश्वरी ने बताया कि यहां जुड़ा साहित्य शब्द अपने विशद अर्थ में है। इसके अंतर्गत दर्शन, राजनीति, इतिहास आदि सब समाहित है। यह विश्व कोश से कहीं आगे की बात है और साहित्य शब्द के जुड़ने से व्यापक विस्तार ले लेता है। प्रेस वार्ता में पत्रकारों की तरफ़ से आए इन सुझावों का उन्होंने स्वागत किया कि हर साल इसमें नए संशोधन जोड़ें जाएं और उनसे पाठकों को परिचित कराया जाये। साथ ही इसके डिजिटल संस्करण को भी शीघ्र लाने की बात कही गई।
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