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अधिकांश फीमेल एंकर्स का पूरा ध्यान एंकरिंग के दौरान एक्टिंग पर रहता है: साक्षी जोशी

‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित एक समारोह में दिए गए। इनबा के 11वें एडिशन के तहत आयोजित इस समारोह में कई पैनल डिस्कशन भी किए गए। इन पैनल डिस्कशन के द्वारा लोगों को देश के जाने-माने पत्रकारों के विचारों से रूबरू होने का मौका भी मिला।

कार्यक्रम में ऐसे ही एक पैनल डिस्कशन का टॉपिक ‘Anchoring is it an art or a science or is it just energy’ रखा गया था। इसमें ‘आजतक’ के एडिटर निशांत चतुर्वेदी, ‘इंडिया न्यूज़’ के डिप्टी एडिटर सुशांत सिन्हा, ‘न्यूज एक्स’ की सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर प्रिया सहगल और ‘न्यूज24’ की सीनियर एंकर साक्षी जोशी ने शामिल होकर अपने विचार लोगों के सामने रखे। ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) में एडिटोरियल लीड के तौर पर कार्यरत रुहैल अमीन ने बतौर सेशन चेयर इस सेशन को मॉडरेट किया।

इस दौरान एक सवाल के जवाब में साक्षी जोशी का कहना था, ‘जैसा कि कार्यक्रम में सुशांत सिन्हा ने तीन ‘सी’ के बारे में कहा, मुझे लगता है कि वर्तमान में जिस तरह की एंकरिंग हो रही है, उसे देखते हुए इन ‘सी’ को ‘चीख, चिल्लाहट और चिंताजनक’ एंकरिंग के रूप में देखा जाना चाहिए। मुझे लगता है कि लोग हमारे बारे में क्या सोचें, उससे पहले हमें खुद सोचने की जरूरत है। क्योंकि लोग हमारे बारे में वही सोच रहे हैं, जो हम उन्हें सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं और मुझे लगता है कि इसके लिए हम ही सबसे ज्यादा दोषी हैं। आप ये सोचिए कि 30 मिनट का आपका शो है और उसमें 12 विंडो हैं। इसमें भी एंकर का पांच मिनट का सवाल शामिल होता है। ऐसे में आखिर गेस्ट को कितना समय मिलता है अपनी बात रखने के लिए। आखिर शो में लोगों को उनका ओपिनियन जानने के विए बुलाया जाता है, न कि उन लोगों का तिरस्कार करने के लिए और न ही आलोचना करने के लिए बुलाया जाता है। टीवी एंकर का काम सभी पक्षों का ओपिनियन जानना होता है न कि किसी को बुलाकर शो पर लताड़ना। मुझे एंकरिंग के दौरान जहां पर लगता है कि फैक्ट की जांच करनी चाहिए, वहां पर मैं फैक्ट चेक करूंगी। यदि मुझे लगता है कि कोई शख्स सही बात कह रहा है तो भले ही वो मेरे ओपिनियन का न हो, उससे मैं अपने डिस्कशन को आगे बढ़ाउंगी।’

साक्षी जोशी का कहना था, ‘पांच मिनट लंबा सवाल पूछकर एंकर चिल्ला-चिल्लाकर गेस्ट से सवाल पूछता है और जवाब देने के लिए उसे पांच सेकेंड भी नहीं दिए जाते हैं। पांच सेकेंड बाद ही उसे रोककर पांच मिनट लंबा एक और सवाल पूछ लिया जाता है और जब तक गेस्ट जवाब देता है, एंकर दूसरी विंडो पर चला जाता है। हमारा ये काम नहीं है। रही बात एनर्जी की तो मुझे लगता है कि एनर्जी तो किसी भी प्रोफेशन के लिए जरूरी है, लेकिन वो पॉजिटिव एनर्जी होनी चाहिए। निगेटिव एनर्जी जरूरी नहीं है।’

उन्होंने कहा, ‘आज पैनल डिस्कशन में एंकरिंग को लेकर आर्ट और साइंस की बात हो रही है, लेकिन मैंने कभी इस एंगल से नहीं सोचा कि हम आर्ट कर रहे हैं अथवा साइंस। हम तो सिर्फ एंकरिंग करके चले जाते हैं। लेकिन इस टॉपिक में हमारी एंकरिंग को आर्ट और साइंस का रूप दिया गया, वह काफी अच्छा लगा। हालांकि आप इसे आर्ट कह सकते हैं, लेकिन आर्ट अपनी जगह है और जर्नलिज्म अपनी जगह है। क्योंकि पत्रकारिता कर रहे सभी लोग एंकर नहीं हो सकते हैं, इसका मतलब एक एंकर बनने के लिए कुछ तो स्किल होता है। क्योंकि एंकर को भी पत्रकारिता करनी है, इसलिए मुझे लगता है कि एंकर के लिए कुछ न कुछ खास आर्ट की जरूरत है। मुझे लगता है कि साइंस की इसमें कोई बात नहीं है। यह बस इस बात पर निर्भर करती है कि आप क्या देखते हैं और क्या दिखाते हैं। मैं कहूंगी कि टीवी एंकर को न्यूट्रल रहना चाहिए और सभी पक्षों की बात सुननी चाहिए।’

साक्षी जोशी का यह भी कहना था, ‘किसी विषय में मेरे अपने निजी ओपिनियन भी हो सकता है, लेकिन शो में जब मैं बतौर एंकर सीट पर बैठी हुई हूं तो मेरा ओपिनियन मेरे ऊपर हावी नहीं होना चाहिए। आज के समय में हमें लोगों को यह बताने की भी जरूरत है कि वे सही आवाज उठा रहे हैं अथवा नहीं। मुझे लगता है कि ये पहले के जमाने में ज्यादा सही था कि हमें लोगों की आवाज यानी वॉयस ऑफ पीपल बनना चाहिए, एक उदारहण के जरिए मैं ये स्पष्ट करती हूं, मसलन आजकल अधिसंख्य हिंदू चाहते हैं कि राममंदिर बन जाए, क्या हमें उन्हीं के अनुसार बात करनी चाहिए?  मुझे लगता है कि हमें लोगों को यह भी बताने की जरूरत है कि उन्हें किस मुद्दे पर बात करनी चाहिए और पिछले कुछ समय में हमारे लिए यह बताना थोड़ा चैलेंजिंग हो गया है।’

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘रोजाना मैं अपने आप से बेहतर करने की कोशिश करती हूं। मेरा किसी से कोई कंप्टीशन नहीं है और न ही मैंने यह करने की कोशिश की है। मेरा अपना स्टाइल है और दूसरे एंकर्स का अपना अलग स्टाइल है। मेरी हमेशा यही कोशिश होती है कि मैं जैसे अभी बात कर रही हूं, एंकरिंग भी उसी तरह से करूं और ऐसे ही दिखूं। मुझे लगता है कि इस तरह लोगों से बेहतर तरीके से कनेक्ट किया जा सकता है। आजकल मैं कई एंकर्स को देखती हूं, खासकर फीमेल एंकर्स को तो उनमें से कई का पूरा ध्यान एंकरिंग के दौरान एक्टिंग पर रहता है। ऐसे में मुझे लगता है कि एंकर जब अपने ऊपर उतना ध्यान दे रहा है तो वह सामने वाले पर पर क्या ध्यान दे पाएगा और कैसे उनकी बात सुन पाएगा। मुझे लगता है कि इस वक्त एक्टिंग का दौर कुछ ज्यादा है और इस वजह से एंकर शायद लोगों से कनेक्ट नहीं कर रहे हैं। दूसरी बात ये कि यह  अपने आप को पूरी तरह अपने चैनल से, अपनी खबर से ज्यादा बड़ा बनाने की कोशिश है। कोई भी खबर हो, जब मैं कुछ बता रही हूं अथवा अपने रिपोर्टर से पूछने की कोशिश कर रही हूं तो मेरे मुंह से ये कभी नहीं निकला कि मैंने आपको इसलिए बुलाया है, बल्कि कहती हूं कि हमने बुलाया है। मुझे समझ में नहीं आता कि ये 'हम' शब्द कब 'मैं' में बदल गया है। आजकल तो एंकर को देखकर लगने लगा है कि यही व्यक्ति पूरे चैनल को चला रहा है। कहने का मतलब है कि जब कोई एंकर अपनी न्यूज से बड़ा बनने की कोशिश करने लगता है तो वहां पर व्युअर्स से वह कनेक्ट नहीं कर पाता है।’

साक्षी जोशी को अनुसार, ‘आप जितनी ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं, एंकरिंग के दौरान उसकी झलक आपके अंदर आनी चाहिए। एंकरिंग कोई बहुत बड़ी आर्ट इसलिए नहीं है कि मान लीजिए कहीं आग लग गई और वो खबर ऐसी होती है, जिसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है कि आग कितनी तीव्रता की लगी है, कितने लोग घायल हैं, फायर ब्रिगेड की कितनी गाड़ियां हैं, आदि। तो जब तक ये सभी जानकारी नहीं होती हैं तो उस बारे में बताने में कुछ दिक्कत जरूर होती है, जबकि किसी भी तरह के पॉलिटिकल डेवलपमेंट के बारे में बताने में ज्यादा दिक्कत इसलिए भी नहीं होती है कि ज्यादातर बैकग्राउंड पता होता है। लेकिन यदि मैंने ग्राउंड रिपोर्टिंग की है तो मुझे पता है कि कभी भी सबसे पहले रिपोर्टर से यह नहीं पूछा जा सकता है कि आग लगने के क्या कारण थे। वो उस वक्त पता चल ही नहीं सकता है। जब तक आग बुझ नहीं जाएगी और जांच पूरी नहीं हो जाएगी, इस बारे में बताना मुश्किल है। ऐसे में जब एंकर एक पत्रकार की तरह नहीं, सिर्फ एंकर की तरह व्यवहार करेगा तो सबसे पहले वो रिपोर्टर से आग लगने के कारणों के बारे में पूछेगा, जिससे रिपोर्टर असहज हो जाएगा।’

साक्षी के अनुसार, ‘जब एंकर को जानकारी होगी और अनुभव होगा, तभी वह सही सवाल पूछ पाएगा/पाएगी। एंकर्स के साथ कभी-कभी ये हो जाता है कि उन्हें लगने लगता है कि वे रिपोर्टर से ज्यादा जानते हैं। हो सकता है पता हो, लेकिन उस वक्त एंकर्स को कोशिश करनी चाहिए कि रिपोर्टर से ज्यादा से ज्यादा जानकारी निकालें और अपना ज्ञान ज्यादा न बखारें। अपने ज्ञान की वजह से आप जो सही सवाल पूछ सकते हैं, वह पूछने की कोशिश कीजिए, ताकि सही चीज निकलकर सामने आए।’

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-

 


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