Exclusive: वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल का बेबाक इंटरव्‍यू...

जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल इन दिनों पत्रकारिता के साथ समाजसेवा के कामों में जुटे हुए हैं...

Last Modified:
Monday, 30 July, 2018
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल इन दिनों पत्रकारिता के साथ समाजसेवा के कामों में जुटे हुए हैं। वे दिल्ली, आगरा, भोपाल समेत देश के कई भागों में कार्य कर रहे वरिष्ठ पत्रकारों के गुरु हैं।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी ब्रज खंडेलवाल आगरा में यमुना की सफाई से लेकर बढ़‍ते प्रदूषण के प्रति भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उनकी पहचान न सिर्फ पत्रकार, बल्कि एक शिक्षक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी है। इनके अलावा और भी कई विशेषताएं उनमें, हैं जो उनके कार्यों और आचरण में दिखाई देती हैं। ब्रज खंडेलवाल हिंदी और अंग्रेजी भाषा, दोनों में समान रूप से मजबूत पकड़ रखते हैं और उनकी धारदार कलम हर विषय पर चलती रहती है।

'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ब्रज खंडेलवाल से उनके परिवार से लेकर करियर के शुरुआती दिनों के अलावा विभिन्‍न विषयों पर बेबाकी से चर्चा की... 

न्‍यूज को लेकर ब्रज खंडेलवाल का मानना है कि आजकल तो ये हो गया है कि न्‍यूज खुद चलकर आपके पास आ रही है। आपको उसमें से छांटना है कि कौन सी न्‍यूज लेनी है अथवा कौन सी नहीं।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

आपने अपने करियर की शुरुआत दिल्‍ली में रिपोर्टिंग से की है और काफी समय तक वहां पत्रकारिता की। इसके बाद आप आगरा शिफ्ट हो गए। आमतौर पर तो लोग छोटे से बड़े शहर की ओर जाते हैं लेकिन आप बड़े से छोटे शहर की ओर आए हैं। क्‍या आपको इस पर कभी अफसोस होता है कि जो निर्णय लिया वो समय के हिसाब से सही था?

ब्रज खंडेलवाल: यह सवाल काफी लोग मुझसे पूछा करते हैं, क्‍योंकि ट्रेंड यही है कि छोटे शहर से बड़े की तरफ जाना। इसका जवाब यही है कि पत्रकारिता को मैंने एक प्रफेशन के रूप में कभी नहीं लिया है। शुरुआत में यह मेरे लिए लड़ाई का एक हथियार थी। समाज को सुधारना, बदलना, कुछ नया करना, समाजवाद लाना आदि काफी बड़े-बड़े सपने थे। उसमें पत्रकारिता को एक हथियार के रूप में इस्‍तेमाल किया। यह काम दिल्‍ली में बैठकर हो नहीं सकता था।

इसके लिए पूरे देश में, गांव में, छोटी जगह में घूमना और वहां के लोगों से बातचीत करना, पढ़ना-लिखना, कार्यक्रमों का हिस्‍सा बनना आदि करना होता था तो छोटा-बड़ा शहर आदि मेरे लिए कोई मुद्दा नहीं था। वैसे दिल्‍ली की लाइफ स्‍टाइल भी मेरे मुताबिक नहीं थी और न ही में वहां के कल्‍चर को आत्‍मसात कर पाया। इसलिए काफी महत्‍वाकांक्षाएं लेकर वापस आए और अपना अखबार शुरू किया। मुझे न तो इसमें कुछ गलत लगा और न ही शिकायत है। अपने जीवन का भरपूर आनंद उठाया है।

दिल्‍ली में आपका सफर कैसा रहा। आपने पत्रकारिता को क्‍यों चुना? दिल्‍ली में कितने साल रहे और क्‍या किया। दिल्‍ली में आपके शुरुआती दिन कैसे रहे, इस बारे में कुछ बताएं ?

ब्रज खंडेलवाल: मुझे स्‍कूल के दिनों से ही लिखने का शौक था। इसके बाद आगरा के सेंट जॉन्‍स कॉलेज में दाखिला लिया। यहां भी लिखते रहे और 'द विंक' (The Wink)  नाम से एक पत्रिका भी लॉन्‍च की, जो काफी लोकप्रिय रही। इसके बाद हमें लगा कि शायद यही हमारी मंजिल है। आज भी उस पत्रिका का प्रकाशन कर रहा हूं।

अभी आपने सेंट जॉन्‍स कॉलेज की पत्रिका 'द विंक' के बारे में बात की। इसके बारे में थोड़ा और विस्‍तार से बताएं ?

ब्रज खंडेलवाल: कॉलेज के दिनों से ही पत्रकारिता में रुचि जागृत हो चुकी थी। अखबार में लिखना, कार्यक्रम-रैलियों की कवरेज करना शुरू कर दिया था और उसके बाद 'द विंक' नाम से 1969-70 में पत्रिका निकाली जो शुरू से ही कैंपस में काफी लोकप्रिय रही। उसके बाद अंग्रेजी से एमए कर लिया। इसके बाद लोगों ने कहा कि पत्रकारिता की भी कुछ पढ़ाई कर लो। हालांकि उन दिनों पत्रकारिता का डिप्‍लोमा या कोर्स आदि कोई करता नहीं था। उस समय मान्‍यता थी कि साहित्‍यकार की तरह पत्रकार भी जन्‍मजात होते हैं और इसमें सीखने की कोई बात नहीं होती है।लेकिन मैंने सोचा कि इसकी पढ़ाई जरूर करनी चाहिए और इसकी गहराई में जाना चाहिए और पूरी तैयारी के साथ इस प्रफेशन में उतरना चाहिए। उन दिनों दिल्‍ली के आईआईएमसी में पढ़ाई करना काफी मुश्किल था क्‍योंकि ज्‍यादातर विदेशी छात्र ही वहां प्रवेश लेते थे। सिर्फ दो-तीन लोग ही हिन्‍दुस्‍तानी होते थे। शुक्र था कि वहां दाखिला मिल गया। साल भर वहां पढ़ाई-लिखाई की और कम्‍युनिकेशन वगैहरा समझा।

उन दिनों हमें 'यूएनआई' के हेड ट्रेवर ट्यूबक एडिटिंग पढ़ाते थे, जिन्‍होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहली बायोग्राफी लिखी थी। उनकी कॉ‍पी एडिटिंग काफी कमाल की थी। बड़े-बड़े लोगों की किताबें उन्‍होंने एडिट की थीं। उन्‍होंने हमारी भी काफी ग्रूमिंग की और एडिटिंग की काफी बारीकियां सिखाईं। सबसे बड़ी बात थी कि बड़ी बातें सरल शब्‍दों में कैसे लिखीं जाए। छोटे-छोटे वाक्‍य बनाए जाएं और उसमें कम्‍युनिकेशन एंगल रहना चाहिए ताकि लोगों को समझ आए। वो बहुत अच्‍छी ट्रेनिंग थी। इसके बाद फिर 1972 में एशिया कप हुआ। उस दौरान एक दैनिक अखबार निकलता था, वहां से काम शुरू किया। उसके बाद तो यूएनआई समेत काफी लंबी लिस्‍ट है एजेंसी-अखबारों की। जब देश में आपातकाल लग गया तो उस समय भी कई अखबारों में काम करते रहे। उस समय अंडरग्राउंड रहकर उदयन शर्मा के साथ काफी लिखा। उसे बांटने के लिए काफी भागदौड़ करते थे। कभी वॉरंट निकल गए तो कभी इधर-उधर भागते रहे। कह सकते हैं कि काफी एडवेंचर था उस समय। आपातकाल जब समाप्‍त हुआ तो राजनारायण का वीकली 'जनसाप्‍ताहिक' के नाम से निकला, जिसके प्रॉडक्‍शन का काम मैंने लिया था। ढाई-तीन साल वह चला। एडिटिंग और छपाई आदि मेरे जिम्‍मे ही थी। वह काफी बेहतरीन व उपयोगी अनुभव था। एक तो हिंदी पत्रकारिता के तौर पर हिंदी को समझने के लिए और डॉक्‍टर लोहिया के विचारों को कायदे से पढ़कर जानने-समझने के लिए बहुत उपयोगी रहा। इसके बाद तो इधर से उधर और उधर से इधर आने-जाने का क्रम चलता रहा। कभी 'पॉय‍नियर', कभी 'दैनिक भास्‍कर', 'स्‍वतंत्र भारत', 'इंडिया टुडे' कभी हिंदी तो कभी अंग्रेजी। कहने का मतलब बहुत लंबी लिस्‍ट है। इतना सफर तय करने के बाद लगा कि वापस अपने शहर में चलना चाहिए। तब तक शादी भी हो गई थी। इसके बाद हमने सोचा कि आगरा वापस चलते हैं और अपना अखबार शुरू करेंगे। इसके बाद अपना प्रिंटिंग प्रेस लगाया। हम दोनों मिलकर रात में छपाई करते थे और सुबह बांटने जाते थे। करीब ढाई-तीन साल तक ऐसा ही चलता रहा। पहले यह 'समीक्षा भारती' नाम से हिंदी में था, फिर इसे अंग्रेजी में किया। इसके बाद अंग्रेजी के साप्ताहिक अखबार 'न्यूजप्रेस' (NewsPress) का प्रकाशन किया, जो अच्छा खासा चला हालांकि बाद में बंद हो गया।

आप अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ बताएं, जैसे आपने दक्षिण भारतीय परिवार में शादी की। इसके बाद आप पत्नी को दिल्‍ली से आगरा ले आए, कैसा रहा ये सफर? 

ब्रज खंडेलवाल: मैं और मेरी पत्नी पद्मिनी हम दोनों एक ही एजेंसी 'नेशनल प्रेस एजेंसी' (NPA) में काम करते थे। उन दिनों भारद्वाज जी उसके मालिक थे। वह 'पीआईबी' से रिटायर हुए थे। वह इंदिरा गांधी के काफी करीब थे। वहां लंबे समय तक काम किया। उस समय दो ही बड़ी एजेंसी 'इन्‍फा' और 'एनपीए' चला करती थीं। एनपीए में काफी बड़े-बड़े लोग जैसे कुलदीप नायर आदि लिखा करते थे। इनके लिखे हुए आर्टिकल्‍स वगैरह की एडिटिंग हम ही किया करते थे। इसके बाद कॉमनवेल्‍थ लंदन की 'जेमिनी न्‍यूज सर्विस' (Gemini news service) के साथ मैं काफी समय तक जुड़ा रहा। मैं उनके लिए फीचर्स आदि लिखा करता था और वह मुझे पूरे भारत में घुमाते रहते थे।


आईआईएमसी को लेकर दिल्‍ली में आपका सफर कितने साल रहा, उसके बाद आप आगरा कब आए?

ब्रज खंडेलवाल : करीब 12-14 साल हम दिल्‍ली में रहे। इसके बाद आगरा आए और फिर दिल्‍ली चले गए और फिर आगरा आ गए। ऐसा काफी समय तक चलता रहा। इसके बाद फाइनली 1990 के आसपास आगरा आ गए। 

आगरा लौटने के बाद किस तरह पत्रकारिता की शुरुआत की?

ब्रज खंडेलवाल: आगरा लौटकर हमने 'समीक्षा भारती' के नाम से जो अखबार लॉन्‍च किया था, वह तो फेल हो गया। कंपोजीटर्स ने हड़ताल कर दी, उस समय पैसे थे नहीं और ये प्रयोग फेल हो गया। अंग्रेजी अखबार शुरू करने का वह समय भी नहीं था और उसका मार्केट भी नहीं था। पहले वह अखबार हिंदी में था लेकिन बाद में उसी नाम से अखबार को अंग्रेजी में कर दिया गया था। हिंदी अखबार साप्‍ताहिक कर दिया था और अंग्रेजी में इसे दैनिक कर दिया था। अब इसे उस समय की मूर्खता कहें या एडवेंचर कि रोजाना चार पेज का अंग्रेजी का अखबार निकालना शुरू किया। उस समय अंग्रेजी का इतना पाठक वर्ग भी यहां नहीं था। हमें लगा था कि अपने शहर में कुछ नया करेंगे। हमें लगा था कि टूरिज्‍म इंडस्‍ट्री इसे सपोर्ट करेगी। हालांकि उन्‍होंने सपोर्ट भी किया। काफी कॉपी खरीदी भी जाती थीं। हर होटल कॉपी खरीदता था क्‍योंकि उसमें डेली इवेंट्स की कवरेज होती थी। उस समय ऑफसेट मशीन गिनती की थीं और यह अखबार लेटरप्रेस पर छपता था। छोटी मशीन थी, उसी पर छापा करते थे कंपोज कराके। दिन भर कंपोजिंग चलती थी। 10-12 लोग रखे गए थे कंपोजिंग के लिए। हालां‍कि नुकसान तो हुआ लेकिन उसका अपना मजा था। इसके बाद 'पॉयनियर' अखबार जॉइन कर लिया। कुछ दिन डेस्‍क पर काम किया फिर लखनऊ से अटैच्‍ड हो गए और वहां चले गए। फिर आगरा आकर ब्‍यूरो संभाला। पहले यह जयपुरिया समूह का था, फिर थापर्स ने खरीद लिया। उस समय विनोद मेहता एडिटर हुआ करते थे। फिर ए.के.भट्टाचार्य आए और उसके बाद चंदन मित्रा ने उसे खरीद लिया। इसके बाद हम दैनिक भास्‍कर में काम करते रहे। फिर तीन-चार साल यहां से 'हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स' में काम किया। इस तरह कभी ये और कभी वो का क्रम लगातार चलता रहा। 1995 में यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू कर दिया था। उसी साल अंग्रेजी वीकली 'न्‍यूजप्रेस' जो उस समय काफी लोकप्रिय था, में जुड़ गए। हालांकि अखबार काफी छोटा था लेकिन टीम बहुत एक्टिव थी।

उस अखबार पर आरोप था कि वह शहर की ब‍ड़ी-बड़ी शख्सियतों का काफी मजाक उड़ाया करता था?

ब्रज खंडेलवाल: वह अखबार टैब्‍लॉयड रूप में था और टैब्‍लॉयड का जो स्‍वरूप होता है, वो उसी स्टाइल में होता था। उसमें काफी खोजपरक रिपोर्ट्स रहती थीं। उस अखबार ने अपनी रिपोर्ट्स से कई लोगों को मुश्किल में भी डाल दिया था। आगरा के बड़े पत्रकार जैसे रामकुमार शर्मा, जमशेद खान व प्रवीण तालान वगैरह जो आज काफी बड़ा नाम हो गए हैं, सब उसी में काम करते थे। हालांकि उस अखबार में मिलता कुछ नहीं था पर पैशन था सभी में। मैं तो उसमें मुफ्त काम करता था। वह अखबार लगभग पांच-छह साल चला और काफी अच्‍छा चला। फिर कुछ गलतफहमी हो गईं और अखबार बंद ही हो गया। हालांकि उसे दोबारा शुरू करने की कोशिश भी की गई लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। लेकिन वह काफी मजेदार और कामयाब प्रयोग था। 'डीएवीपी' से उसे मान्‍यता भी मिल गई थी और विज्ञापन आदि भी मिलने शुरू हो गए थे। उस समय अखबार का सर्कुलेशन दस हजार था। यह 1995 की बात है। यह अखबार मथुरा से छपकर आता था क्‍योंकि वहां की प्रिंटिंग सस्‍ती और अच्‍छी थी। उस दौरान ऑफसेट की ज्‍यादातर मशीनें मथुरा में ही थीं। मथुरा प्रिंटिंग की बहुत बड़ी मंडी है। इस बीच 2002 और 2003 के बीच में देश की बड़ी न्यूज एजेंसी 'आईएएनएस' (IANS) के लिए काम करने लगा। हालांकि आईएएनएस से मैं इमरजेंसी के दिनों से ही जुड़ा हुआ था। उन दिनों गोपाल राजू का साप्‍ताहिक अखबार 'इंडिया एब्रोड' न्‍यूयॉर्क से निकलता था, बाद में उन्‍होंने इसे 'रेडिफ' को बेच दिया। उसके बाद किसी और ने ले लिया। इसके बाद 'इंडिया एब्रोड न्‍यूज सर्विस' बदलकर 'इंडो-एशियन न्‍यूज सर्विस' हो गई। तब से मैं आईएएनएस से जुड़कर पश्चिमी यूपी को कवर करता हूं।

आज यदि आप देखते हैं कि क्‍या खोया और क्‍या पाया। हालांकि लोग कहते हैं कि आपने क्‍या खोया और क्‍या पाया ये समझना मुश्किल है क्‍योंकि न आपने अपना मकान बनाया और न गाड़ी खरीदी। हालांकि ये सही बात है कि आपने सम्‍मान बहुत पाया है लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखें तो उतनी कामयाबी नहीं मिली। आने वाली पीढ़ी यदि आपको देखे तो वह तो कंफ्यूज रहती है कि सम्‍मान तो ठीक है लेकिन पैसा भी बहुत जरूरी है क्‍योंकि संत जीवन जीना बहुत मुश्किल होता है, इस बारे में क्‍या कहेंगे ?

ब्रज खंडेलवाल: मैंने कभी यह सोचकर काम ही नहीं किया कि क्‍या खोना है और क्‍या पाना है। मैं तो बस इसमें खुश रहता हूं कि चलो एक अच्‍छी स्‍टोरी हो गई। बस मेरे लिए बहुत है और यही मेरा पुरस्‍कार है। क्‍या होगा और क्‍या नहीं होगा, मैं इस बारे में ज्‍यादा नहीं सोचता क्‍योंकि मैंने पत्रकारिता को इस रूप में कभी देखा ही नहीं है कि पैसा कमाना है या गलत काम करना है। मैंने जैसा शुरू में कहा था कि यह तो लड़ाई का हथियार है। एक अच्‍छी स्‍टोरी करना समाज को बदलने के यज्ञ में आहुति देने जैसा है। इस यज्ञ में हम जो कर सकते हैं, वह यह है कि अच्‍छे विचार फेंकें। अच्‍छे लोगों से मिलें अैर उन्‍हें हाईलाइट करें। जो चीजें हाईलाइट करने के लिए जरूरी हैं, उन्‍हें उठाएं। इस हिसाब से देखें तो काफी संतोष है और इतना तो मिल ही जाता है, जिससे दाल-रोटी चल रही है। बिना बात के क्‍यों अपने सिद्धांतों से समझौता करें।   


आपने पिछले पांच दशकों से सक्रिय पत्रकारिता की है और देखी है। वर्तमान में पत्रकारिता के सामने क्रेडिबिलिटी की समस्या है, हालांकि यह हर बार रहता है लेकिन पिछले पांच-सात साल से इस पर सवाल ज्‍यादा उठ रहे हैं और तो और सोशल मीडिया को आए हुए अभी कुछ ही समय हुआ है लेकिन उसकी क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में एक पत्रकार के रूप में मीडिया की क्रेडिबिलिटी को आप किस रूप में देखते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल: पहली बात तो यह है कि प्रकृति को बदलाव चाहिए। चीजें अपनी जगह रुकी नहीं रहेंगी। समय और परि‍स्थिति बदलती रहती हैं। लोगों की पसंद-नापसंद बदलती है, उनका नजरिया बदलता है। हमें यह स्‍वीकार करना पड़ेगा। बदलाव हमेशा पॉजीटिव हो, ये भी जरूरी नहीं है। टेक्‍नोलॉजी के कारण पत्रकारिता में तमाम तरह के तत्‍व घुस आए हैं, जिनके संस्‍कार नहीं थे पत्रकारिता के, जिनकी पृष्‍ठभूमि पत्रकारिता की नहीं थी और जिनकी पढ़ाई-लिखाई पत्रकारिता की नहीं हुई, वे भी इसमें आ गए। जिन्‍हें सिर्फ कैमरा पकड़ना आता है, वे भी मैदान में कूद गए। ऐसे लोगों के अंदर पत्रकारिता की बुनियादी बातें भी नहीं हैं। पुराने जमाने में होता था कि पत्रकारिता के लिए कम से कम लिखना तो आना चाहिए लेकिन आज के समय में ये जरूरी नहीं है कि आपको लिखना आता है या नहीं। आजकल कई सारे फ्री प्‍लेटफॉर्म उपलब्‍ध हैं। बस कैमरा घुमाइए और कोई भी चीज हाईलाइट कर लीजिए। यदि आपका आइडिया हिट हो गया तो आपको पहचान मिलेगी और यदि फेल हो गया तो आप उसे दूसरे तरीके से इस्‍तेमाल कर सकते हैं। यदि आजकल की और पुराने समय की पत्रकारिता में बुनियादी अंतर की बात करें तो खास बात ये है कि आजकल के लोग रीडिंग नहीं कर रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई नहीं कर रहे हैं। हमें याद है कि हम काफी पढ़ते थे। काफी साहित्‍य और राजनीति विज्ञान पढ़ते थे। तमाम तरह की किताबें पढ़ते थे और फिर पत्रकारिता की भाषा में कहें कि अखबार को चाटते यानी गहराई से पढ़ते ही थे।

क्‍या आपको लगता है कि आज में समय में कोई ऐसा अखबार बचा है कि जिसे इतनी गहराई से पढ़ा जा सके ?

ब्रज खंडेलवाल : आजकल सभी तरह के अखबार हैं। ऐसा भी नहीं हैं कि सारे अखबार खराब ही हैं। बहुत अच्‍छे अखबार भी हैं। आजकल के दैनिक अखबारों की बात करें तो ज्‍यादातर अच्‍छे ही हैं। प्रजेंटेशन भले ही अलग और आधुनिक हो लेकिन कंटेंट तो ठीक है। संपादकीय पेज भी सभी के बढ़िया ही हैं। भाषा भी अच्‍छी है। दैनिक 'हिन्‍दुस्‍तान' भी काफी अच्‍छे एडिटोरियल दे रहा है। पिछले दिनों नदियों पर उनके संपादक शशि शेखर ने बहुत अच्छा लिखा था। मुझे नहीं लगता कि अखबारों की इतनी गिरावट हुई है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में फर्क दिखाई दे सकता है क्‍योंकि वो शायद बाजार से जुड़ा हुआ है। वो टेक्‍नोलॉजी अलग तरह की है। ये भी कह सकते हैं कि वो मेनस्‍ट्रीम मीडिया का हिस्‍सा माना जाए या न भी माना जाए क्‍योंकि वे सामान्‍यत: एजेंडा आधारित सिद्धांत पर चलते हैं। सुबह ही एक मुद्दा पकड़ लिया और दिन भर उसे खींचते रहो। अब वो समय आ गया है जब प्रिंट का कैरेक्‍टर अलग है, इलेक्‍ट्रॉनिक का अलग है। दोनों में कोई समानता ही नहीं दिखाई दे रही है।  

आप वर्तमान के अखबारों की चर्चा कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ा इश्‍यू भी है कि पहले अखबारों के मुखपृष्‍ठ को काफी महत्‍वपूर्ण माना जाता था। पहली हेडलाइन भी बहुत खास मानी जाती थी। कहा जाता था कि उसे देखकर अखबार भी बिकता था। लेकिन अब जैकेट का कल्‍चर आ गया है। इसमें न तो पहला पेज और न ही हेडलाइन का पता चलता है। कई बार तीन पेज के  जैकेट विज्ञापन होते हैं और उसके बाद चौथा पेज पहला पेज होता है। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

ब्रज खंडेलवाल : ये एक इश्‍यू तो है लेकिन इस ट्रेंड को सही साबित करने के लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका तर्क है कि पहले के पत्रकारों को आखिर मिलता ही क्‍या था। आजकल के पत्रकारों को अच्‍छे अखबारों में अच्‍छी सैलरी समेत कई सुविधाएं मिलती हैं। यानी पहले की तुलना में पत्रकारों के लिए चीजें काफी बेहतर हुई हैं। पहले तनख्‍वाह वगैरह तो कुछ मिलती नहीं थी। ज्‍यादातर लोग तो पैशन के लिए मुफ्त में काम करते थे। उनका हुलिया देखकर ही लग जाता था कि बिल्‍कुल फटेहाल हैं। आज का पत्रकार टेक्‍नोलॉजी में भी काफी आगे है। उसके कपड़े और रहन-सहन भी पहले से बेहतर है। ऐसे में अर्थशास्‍त्र के हिसाब से उसकी जरूरतें कुछ अलग हो गई हैं। इन्‍हीं सब को पूरा करने के लिए इस तरह करना पड़ता है। 

ऐसे में यह सवाल जरूर उठता है कि ये सब करते-करते पाठकों के साथ तो अन्‍याय नहीं हो जाता है, जब चौथा पन्‍ना पहला पेज बन जाता है ?

ब्रज खंडेलवाल : अब इसका कोई कानून तो है नहीं। ये एक परंपरा है। परंपराएं टूट भी सकती हैं, बदल भी सकती हैं और मॉडीफाई भी हो सकती हैं। अभी हमें अटपटा लग रहा है, कुछ दिनों में शायद आदत पड़ जाएगी। दूसरी वजह यह है कि अखबार वालों को भी पता है कि मुखपृष्‍ठ पर जो छप रहा है, वह पहले से ही बासी यानी पुराना हो चुका है और पाठक उस पर निर्भर नहीं है। 


कुल मिलाकर क्या अखबारों से निराश हैंखासकर उनके कंटेंट से। क्‍योंकि अमूमन एक धारणा भी लोगों के बीच बनी हुई है कि अखबार में जो  कुछ अब छप रहा है, वह टीवी सेट करता है या अखबार अब टीवी को फॉलो करते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : मैं निराश नहीं हूं, बस इस बदलाव को स्‍वीकार कर रहा हूं। ये तो ट्रेंड है जो बदलते रहते हैं और समय के साथ बदलना ही चाहिए। पुरानी मान्‍यताएं टूटती या बदलती हैं तो कुछ मिनट झटका लग सकता है लेकिन हमें इन्‍हें स्‍वीकार कर आगे बढ़ना होगा। आप कैसे इस बात को नजरअंदाज कर सकते हैं कि आज का पत्रकार कितने पैसे कमा रहा है। हिंदी अखबारों में काम कर रहे पत्रकारों की सैलरी देख लीजिए, पुराने वालों से तुलना कर लीजिए। मेरे ख्‍याल से इसका तो हमें स्‍वागत करना चाहिए। पहले एक स्‍टोरी का क्‍या मिलता था, महज पांच रुपए। पहले पांच-दस रुपए का मनीऑर्डर आता था, जिस पर हम हंसते थे। मेरा जो विदेशी मीडिया हाउस से पेमेंट आता था वह सामान्‍यत: 50 पाउंड का होता था, जो हजार-1500 रुपए होते थे एक आर्टिकल के, लोग चौंकते थे कि यार हमारी तो एक महीने की सैलरी के बराबर तेरे एक आर्टिकल से ही कमाई हो गई।

हमारे देश में हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में अंतर रहा है। इकनॉमिक्स के मामले में अंग्रेजी हमेशा हिंदी से बेहतर मानी गई है। आप भी कह रहे हैं कि अंग्रेजी अच्‍छे पैसे भी देती थी। क्‍या आपको लग रहा है कि समय के साथ बदलाव आया है या आज भी अंग्रेजी पत्रकारिता ही देश की पॉलिसी तय करती है और अंग्रेजी में ही पत्रकारिता करने वाले इस देश के बड़े पत्रकार माने जाते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : हां, ये एक कड़वी सच्‍चाई है कि हम दोहरी मानसिकता से जूझ रहे हैं। हम हिंदी के गुणगान गाते हैं लेकिन इंडस्‍ट्री की भाषा और कॉमर्स की भाषा, जहां से पैसा आता है, वह अंग्रेजी ही है। आईटी के आने के बाद तो अंग्रेजी और तेजी से बढ़ी है। हालांकि अब ट्रांसलेशन वगैरह मौजूद हैं, लेकिन मानसिकता तो अंग्रेजी की ही बनी हुई है। एक इंडिया है और एक भारत है। इसमें पत्रकारिता ही क्या करे, यह तो पूरे समाज की समस्‍या है। आजकल कौन अपने बच्‍चों को हिंदी स्‍कूल में पढ़ाना चाहता है। हिंदी के पत्रकार हों अथवा संपादक, उनके बच्‍चे भी अंग्रेजी स्‍कूलों के ही पढ़े हुए हैं और पढ़ते भी हैं।

इंडस्‍ट्री इस देश में सबसे ज्‍यादा पैसा देती है, टैक्‍स देती है। बॉलिवुड इंडस्‍ट्री पूरी हिंदी में चलती है लेकिन जब स्क्रिप्‍ट पढ़ते हैं तो अंग्रेजी में पढ़ते हैं। टीवी इंडस्‍ट्री भी पूरी हिंदी बेस है लेकिन इंटरव्‍यू वगैरह सब अंग्रेजी में देते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

ब्रज खंडेलवाल : हमारे लिए तो न अंग्रेजी विदेशी भाषा है और न हिंदी। हमारे लिए दोनों भाषाएं बराबर हैं। हिंदी ही कौन सी ज्‍यादा पुरानी भाषा है। आज के समय में दोनों भाषाओं का ज्ञान होना बहुत जरूरी है और हर पढ़े-लिखे व्‍यक्ति को द्विभाषी होना ही चाहिए। जितनी ज्‍यादा भाषाएं सीखेंगे, उतना अच्‍छा है। कभी लगता है कि हमें तमिल आदि भाषाएं भी सीख लेनी चाहिए थीं। हालांकि इसकी जरूरत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि यदि सीख जाते तो अच्‍छा लगता।


आप वर्तमान में एक पत्रकार भी हैं, आंदोलनकारी भी हैं, समाजशास्त्री भी हैं और पर्यावरणविद् भी हैं। राजनीति में भी आपका दखल रहता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि जब एक पत्रकार ये सब बन जाता है तो वह निष्‍पक्ष नहीं रह पाता है ?  

ब्रज खंडेलवाल : निष्‍पक्षता की बात तो यह है कि जिसके लिए हम काम करते हैं वह अपनी शर्तें रखता है। जो हमें सैलरी देता है वह हमारी स्‍वतंत्रता की सीमाएं तय करता है। हमें कितनी आजादी मिलेगी, हमारी कलम को कितनी आजादी मिलेगी, यह वो तय करेगा जो पैसा देता है। हमारा इसमें व्‍यक्तिगत कुछ नहीं होता है क्‍योंकि न तो हम कॉलम लिखते हैं और न ही एडिटोरियल लिखते हैं। हम तो सिर्फ रिपोर्टर हैं। जीरो ग्राउंड से रिपोर्ट करते हैं और जो आंखों देखा हाल है, वह लिखते हैं। लेकिन यह आपके ऊपर है कि आप किस चीज को हाईलाइट करते हैं। ये भी हो सकता है कि आप रीडर्स के हिसाब से काम करें, क्‍योंकि हिंदी के रीडर्स अलग हैं और अंग्रेजी के अलग, तो उस हिसाब से भी स्‍टोरी हो जाती है।          

जब कोई पत्रकार पत्रकारिता के साथ अन्‍य तमाम चीजें करता है तो कहीं न कहीं उसकी विचारधारा उस तरह की हो जाती है। फिर चाहे वह राजनीति में ही क्यों न हो, कहीं न कहीं उसका प्रभाव पत्रकार की खबरों पर दिखता है। क्‍या एक पत्रकार को ये सब करना चाहिए या सिर्फ पत्रकारिता करनी चाहिए ?

ब्रज खंडेलवाल : यह तो पत्रकार की पसंद की बात है और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। जिस तरह से एक पत्रकार को निचोड़कर रख दिया जाता है, उसके बाद न तो उसमें शक्ति बचती है और न इतना दिमाग बचता है कि वह कुछ और कर पाए। वो अपने घर का ही ख्‍याल रख ले, यही बहुत है। पहली बात तो यह है कि हम इस मामले में इसलिए भाग्‍यशाली हैं कि हमारे पास समय ज्‍यादा है। दूसरी बात ये है कि हम शुरू से ही अन्‍य गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि मेरे एजेंडे में पत्रकारिता एक हथियार है अपने विचारों को फैलाने का। मेरे आदर्श, मेरे सपने आदि जो भी हैं, उनको प्रचारित करने के लिए यह मेरा एक हथियार है। तो मैं इस तरह की बातों का बचाव नहीं करता और पत्रकारिता में अपनी बात कहने का मुझे जो भी अवसर मिलेगा, फिर चाहे वह यमुना का मामला हो, पर्यावरण का हो अथवा अत्‍याचार का हो, मैं पत्रकारिता का पूरा इस्‍तेमाल करता हूं। यानी जब भी इंसानियत के खिलाफ कुछ गलत होगा, मैं उसे नमक-मिर्च लगाकर पूरा बवाल खड़ा करूंगा। यानी यूं कह सकते हैं कि पूरा मसाला बनाकर पेश करूंगा। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता है, क्‍योंकि मैं एक पेशेवर पत्रकार नहीं हूं, इसलिए मुझे इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह मेरा पैशन है और इसके लिए कई विकल्‍पों का त्‍याग भी किया है कि मुझे गलत काम नहीं करना है या इस पर स्‍टोरी नहीं करनी है। मुझे कोई आदेशित नहीं कर पाया कि इसे हाईलाइट करना है, जबकि बाकियों के साथ ऐसा नहीं है। इस बात से मुझे नुकसान भी हुआ और मैंने झेल लिया। ऐसी परिस्थितियों में मैं चुपचाप रहा और बीच का रास्‍ता निकाल लिया लेकिन अपने मन के विपरीत जाकर नहीं किया। ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार होता है।

 देश के कई बड़े संपादकों और पत्रकारों का कहना है कि सोशल मीडिया ही ऐसा मीडिया है जिसका प्रिंट और टेलिविजन मीडिया पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है। कहा जाता है कि यह उसी तरह से है जिस तरह से बंदर के हाथ में उस्‍तरा है, जिसकी कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है। ऐसे में यह स्‍थापित मीडिया संस्‍थानों के लिए कोई चुनौती भी नहीं हैं। लेकिन आप एक ऐसे पत्रकार हैं जो लगातार सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं। कहा जाता है कि सोशल मीडिया पर हर आदमी संपादक और पत्रकार है। ऐसे में सोशल मीडिया और इसकी क्रेडिबिलिटी के बारे में आपका क्‍या कहना है ? 

ब्रज खंडेलवाल : मैंने अपने विचारों के लिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्‍तेमाल किया है। आजकल तो प्रत्‍येक मीडिया की क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया के आने से बहुत सी चीजें बदली हैं। पहले नियंत्रण मालिकों के हाथ में रहता था। वनवे ट्रैफिक रहता था। एक एडिटर ने जो परोस दिया वह आपको स्‍वीकार करना है। रीडर को न कोई सुविधा थी और न अधिकार कि वह उस पर प्रतिक्रिया दे लेकिन अब सब एक ही मैदान में है। सामने से कुछ आता है तो हम भी अपनी तरह से शुरू हो जाते हैं, यानी चीजें बराबर कर देते हैं। किसी ने गलत खबर लिख दी है तो उसे बैलेंस करने का यह अच्‍छा तरीका है। सोशल मीडिया पर स्‍टोरी भी ब्रेक हो रही हैं। अब सारा नियंत्रण पाठकों के हाथों में है। ऐसे में जो एकाधिकार बना हुआ था और मठाधीशी थी, वह खत्‍म हो रही है, जो मेरी नजर में अच्‍छी बात है यह जरूरी भी था।

वामपंथी होने के बावजूद आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी करते हैं?

ब्रज खंडेलवाल : ऐसा नहीं हैं। मै मोदी की तारीफ नहीं बल्कि नीतियों की तारीफ करता हूं और देशहित में नीतियों की तारीफ करनी भी चाहिए। कभी-कभी इन नीतियों का लाभ किसी व्‍यक्ति को भी मिल जाता है, इसलिए मोदी को इनका लाभ मिलता है। जहां पर जरूरी है तो मैं मोदी की खिंचाई भी करता हूं।

सुना है एक बार आप चुनाव भी लड़े हैं?

ब्रज खंडेलवाल : यह सही बात है। वर्ष 1993 में मैंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा था। हालंकि मैं उसमें हार गया था, मुझे सिर्फ तीन-चार सौ वोट मिले थे। 

क्‍या आपको लग रहा था कि यदि आप चुनाव जीत जाते हैं तो राजनेता हो जाएंगे?

ब्रज खंडेलवाल : ऐसी बात नहीं है। दरअसल मुझे एक प्रोजेक्‍ट करना था भारतीय निर्वाचन प्रणाली के बारे में। मैंने सोचा कि जगह-जगह जाकर पूछूं कि क्‍या होता है और कैसे होता है, इससे अच्‍छा तो यह है कि खुद ही चुनाव लड़ लो। पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कि कागजात कैसे तैयार होते हैं और जमा होते हैं। कैसे शपथ ली जाती है आदि के बारे में जानने के लिए ही मैंने चुनाव लड़ा और काफी अच्‍छी समझ हो गई।

आपने काफी सहजता से स्‍वीकार किया है कि आप वामपंथी हैं लेकिन आप देख रहे हैं कि देश में वामपंथ खत्‍म होता जा रहा है। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि ऐसा क्‍यों होता जा रहा है?

ब्रज खंडेलवाल : लेफ्ट यानी वामपंथ काफी व्‍यापक है। लोगों के दिमाग में सिर्फ कम्‍युनिस्‍टों के बारे में सोच है। पार्टी अथवा संगठन भले ही खत्‍म हो जाएं लेकिन विचारधारा के स्‍तर पर वैचारिक स्‍वतंत्रता और समानता की जो मूल भावना है, वह बुनियादी है। यानी कोई बड़ा-छोटा नहीं है, कोई अमीर-गरीब नहीं है और सब बराबर हैं। ये सब मुद्दे खत्‍म होने वाले नहीं हैं।  

आप जिन मुद्दों की बात कर रहे हैं, वे तो दक्षिणपंथी भी उठाते हैं?

ब्रज खंडेलवाल : मेरी नजर में दक्षिणपंथी (राइट) का मतलब पूंजीवादी प्रक्रिया है। वे बोलते क्‍या हैं, ये सब छोड़ो। वे लोग यथास्थितिवादी के पुजारी हैं। वे बदलाव के विरोधी हैं और किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते हैं। वे तो जातिवाद के भी हिमायती हैं, भले ही वे कुछ भी बोल लें। उनमें सामंतवाद विचारधारा भी है, भेदभाव भी है और छुआछूत भी है। लेकिन हम इन सबके खिलाफ हैं। शायद यही कारण रहा कि मैंने अपनी जाति बिरादरी में शादी भी नहीं की। वामपंथ से प्रभावित होने के कारण हमने समाज में फैली कई रुढि़वादियों का विरोध किया। 

प्रिंट मीडिया की बात करें तो कई वर्षों से सिर्फ आठ या दस बड़े अखबार ही हैं और वे ही चलते हैं। अब हर एक-दो साल में अखबार शुरू होते हैं और थोड़े समय बाद ही बंद हो जाते हैं। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि देश में यही गिने चुने आठ-दस अखबार ही हैं और बाकियों के लिए कोई स्‍कोप नहीं?   

ब्रज खंडेलवाल : सिर्फ अपने देश की बात ही नहीं है, यह तो पश्चिमी देशों में भी हुआ है। तमाम पत्रिकाएं बंद हो गईं और अखबारों का सर्कुलेशन कम हो गया। अखबारों का सर्कुलेशन कम हो जाए या बंद हो जाए, यह कोई चिंता की बात नहीं है।

कहने का मतलब यह है कि हमारे यहां प्रतिष्ठित अखबार बंद नहीं होते बल्कि जो नया वेंचर आता है, वह थोड़े समय में बंद हो जाता है। पिछले दस साल की बात करें तो शहर में आठ-दस नए वेंचर शुरू हुए लेकिन सब बंद हो गए। इसके बारे में आपका क्‍या सोचते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : यह तो एक प्रक्रिया है कि अखबार खुलते हैं और बंद होते हैं। पांच-छह अखबारों से ज्‍यादा की जरूरत ही क्‍या है।  

ऐसे में सवाल उठता है कि जब पांच-छह अखबारों से ज्‍यादा की जरूरत नहीं है तो आजकल प्रदेश में 400 से ज्‍यादा जर्नलिज्‍म इंस्‍टीट्यूट खुल गए हैं, जिनसे पढ़कर हजारों छात्र-छात्राएं बाहर निकलते हैं तो फिर वे कहां जाएंगे और उन्‍हें कहां नौकरी मिलेगी?

ब्रज खंडेलवाल : बाकी मीडिया को आप क्‍यों भूल जाते हैं, जो काफी आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम चैनल भी तो हैं।  

लेकिन इतने चैनल भी कहां हैं। दस साल पहले मुख्‍य तौर पर जो चैनल थे, वही आठ-दस चैनल आज भी सही चल रहे हैं जबकि बाकी खुलते हैं और कुछ समय बाद ही बंद हो जाते हैं। बाकी जो चल भी रहे हैं, उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहतर नहीं है। वहां पता ही नहीं रहता है कि सैलरी मिलेगी भी अथवा नहीं। जबकि आईटी और मैनेजमेंट के साथ ऐसा नहीं हैं। इनकी हजारों कंपनियां हैं, जिनमें पता है कि नए छात्र-छात्राएं पढ़ाई पूरी कर खप जाएंगे। आप तो मीडिया को काफी समय से देख रहे हैं। इस दौरान मीडिया उस तेजी से आगे नहीं बढ़ा है, जितना बढ़ना चाहिए था? 

ब्रज खंडेलवाल : ऐसी बात नहीं है। इतने वर्षों में मीडिया काफी बढ़ा है। कई नए प्‍लेटफॉर्म्‍स आ गए हैं। सूचना का प्रवाह भी काफी बढ़ा है। आजकल स्‍मार्टफोन के रूप में मीडिया में एक बड़ा हथियार आ गया है। न्‍यूज का इस्‍तेमाल ओर उसका प्रवाह काफी तेजी से बढ़ा है। रही बात छात्रों की संख्‍या और रोजगार के अवसरों की तो इसमें पढ़ाई-लिखाई करना काफी आसान है। आप साधारण तरीके से एक डिप्‍लोमा या डिग्री पूरी कर लेते हैं और अखबार में लग जाते हैं जबकि अन्‍य कोर्सों जैसे वकालत की ही बात करें तो वहां कितनी ज्‍यादा पढ़ाई करनी होती है। डॉक्‍टर की ही बात करें तो पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप में भी कितनी कड़ी मेहनत लगती है लेकिन अखबारों में तो इस तरह का कुछ होता नहीं है। करेसपॉडेंस कोर्स करके भी आप इसमें आ सकते हैं। इसमें सबसे ज्‍यादा मुश्किल पढ़ाई लिखाई यानी सेल्‍फ स्‍टडी बहुत मायने रखती है, जो आजकल अधिकार छात्र-छात्राएं करते नहीं हैं। जो इस प्रफेशन के प्रति बहुत ज्‍यादा गंभीर होते हैं, वे वास्‍तव में पढ़ाई-लिखाई बहुत करते हैं। उनका सामान्‍य ज्ञान भी बहुत बेहतर होता है। इन लोगों की भाषा भी काफी अच्‍छी होती है। हालांकि ऐसे लोग चुनिंदा होते हैं और देर-सवेर वे कहीं न कहीं नौकरी पा ही जाते हैं। बाकी जो भीड़ बचती है, वह कैमरा लेकर घूम रही है। आजकल तो काफी यूट्यूब चैनल खुल गए हैं। पहले जिस तरह ग‍ली-मोहल्‍लों में कुकरमुत्‍तों की तरह अखबार खुले होते थे, आज उनकी जगह यूट्यूब चैनल खुल गए हैं। ऐसे कई लोग खुद को पत्रकार कहते तो हैं, लेकिन इनमें पत्रकारिता के कितने गुण हैं, यह देखने की बात है।  

आजकल डिजिटल मीडिया का दौर है और इस नई सरकार में डिजिटल मीडिया पर काफी कुछ हुआ है लेकिन हम डिजिटल मीडिया के रेगुलेशन की बात करें तो कई नई वेबसाइट खुलीं लेकिन तमाम बंद हो रहीं हैं क्‍योंकि इसमें रेवेन्‍यू का कोई मॉडल तय नहीं है। आज भी उस हिसाब से पैसा नहीं आ रहा है, जिस हिसाब से आना चाहिए। 'एनडीटीवी' को छोड़ दें तो कोई भी बड़ा ऑर्गनाइजेशन डिजिटल से उतना रेवेन्‍यू नहीं जुटा पाता है, जितना जुटना चाहिए। हालांकि एनडीटीवी का प्रॉफिट टीवी के मुकाबले डिजिटल से ज्‍यादा रहता है क्‍योंकि उसका टीवी नुकसान में रहता है। ऐसे में आपको क्‍या दिखता है यह बुलबुला टाइप है जो एक दिन फूट जाएगा। क्‍योंकि अभी इसमें सिर्फ इंवेस्‍टर है, जबकि इसमें आ क्‍या रहा है यह अभी तय नहीं है। आखिर इंडस्‍ट्री में रेवेन्‍यू मॉडल तो होना ही चाहिए। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ? 

ब्रज खंडेलवाल : यदि बुलबुले फूट जाएंगे तो फूट जाएं, इसमें आखिर मुश्किल क्‍या है। दरअसल, टेक्‍नोलॉजी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इस बारे में बहुत ज्‍यादा अनुमान लगाना मुश्किल है कि कल क्‍या होगा।  

कहने का मतलब है कि आपने प्रिंट, टीवी और रेडियो इंडस्‍ट्री देखी है। वहां एक रेवेन्‍यू मॉडल है। वहां पैसे का टर्नओवर होता है और पैसा आता भी है। आपका इस बारे में क्‍या कहना है कि क्‍या डिजिटल ऐसा हो पाएगा ? 

ब्रज खंडेलवाल : मुझे इसकी ज्यादा जानकारी नहीं है। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि इंफॉर्मेशन के लिए जबरदस्‍त भूख है और इसे तैयार करने की ग्रोथ हजारों गुना हुई है। जब इंफॉर्मेशन तैयार हो रही है तो उसके लिए नेटवर्क भी होगा और सप्‍लायर्स भी होंगे यानी सब चीजें होंगी। पत्रकारिता के लिए यह महत्वपूर्ण है कि लोगों में जानने की इच्‍छा है या नहीं है। वो इंफॉर्मेशन चाहते हैं अथवा नहीं। अब कौन आएगा, कौन जाएगा और कितना कमाएगा, यह सब बहुत कारणों पर निर्भर करता है।    

बतौर शिक्षक आप 'केएमआई' में पढ़ाते थे, अब केंद्रीय हिंदी संस्‍थान में पढ़ाते हैं। ऐसे में एक शिक्षक के तौर पर आप पत्रकारिता के उन नए छात्रों के बारे में क्‍या देखते हैं कि वे क्‍यों आ रहे हैं, किस पृष्‍ठभूमि से आ रहे हैं। हमें लगता है कि इसमें तमाम लोग वे भी आ जाते हैं जिन्‍हें पत्रकार नहीं भी बनना होता है, बस उन्हें डिग्री चाहिए होती है। दूसरा सवाल ये है कि जब वे पढ़ाई पूरी कर जाते हैं तो उनकी नियुक्ति किस प्रकार होती है। इसमें कितना प्रतिशत होता है और तीसरा ये कि जब आपके पुराने शिष्‍य आपको मिलते हैं तो आप कैसा महसूस करते हैं ? 

ब्रज खंडेलवाल : पहली बात तो यह है कि हम जो डिप्‍लोमा आदि करा रहे हैं, उसका सीमि‍त उद्देश्‍य नहीं है कि वह सिर्फ मीडिया में जाएं। वे अच्‍छे इंसान बनें, उनके कम्‍युनिकेशन स्किल्‍स अच्‍छे हों। आजकल बहुत सारे लोग आ रहे हैं, जो पहले से ही कहीं काम कर रहे हैं। ऐसे लोग सिर्फ अपने कम्‍युनिकेशन में धार देने के लिए जर्नलिज्‍म का डिप्‍लोमा कर रहे हैं। पब्लिक रिलेशन में उनके लिए काफी संभावनाएं हैं और वे लोग हो भी रहे हैं। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो कंप्‍टीशन की तैयारी में लगे हुए हैं। उन्‍होंने बताया है कि यह डिप्‍लोमा करने के बाद उनकी लेखन शैली बहुत अच्‍छी हुई है। इंटरव्‍यू का सामना करने में भी आसानी हुई है। तो इसे सिर्फ मीडिया में रोजगार से ही जोड़कर नहीं देख सकते हैं। ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद है कि जब मैंने अपनी एक छात्रा से पूछा कि तुम्‍हारी तो शादी हो जाएगी तुम इस डिप्‍लोमा का क्‍या करोगी तो उसका खुलकर कहना था कि हम तो इसे फ्रेम करके लगाएंगे, सास इससे ही बहुत डर जाएगी। एक और लड़की का कहना है कि हमारे ससुराल वाले तो बहुत डरे रहते हैं कि उनकी बहू पत्रकार बनकर आ रही है, पता नहीं क्‍या करेगी। यह पुराने जमाने में होता था जब मैं केएमआई में था कि हर किसी को मीडिया में ही जाना है लेकिन अब यह फोकस बिल्‍कुल बदल गया है। केंद्रीय हिंदी संस्‍थान का तो बिल्‍कुल ही बदला हुआ है। वहां कई सारे शिक्षक हैं, शिक्षामित्र हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले भी हैं। हर तरह के छात्र-छात्राएं हैं। कई तो शुरू में ही बता देते हैं कि हमें मीडिया में नहीं जाना है। सिर्फ दो-चार ही होते हैं जो कैमरा लेकर इधर-उधर घूमने के लिए तैयार हैं। नौकरी न लगे तो कुछ दिन करने के बाद वे भी खिसक जाते हैं। कहने का मतलब है कि यह अब सामान्‍य तौर पर वैल्‍यू एडिशन वाला कोर्स बन चुका है। किसी और कोर्स जैसे एमबीए आदि के साथ यह कोर्स कर लिया तो आपको आगे तरक्‍की में काफी संभावनाएं हो जाती हैं।    

आजकल एक नया कॉन्‍सेप्‍ट ईवेंट जर्नलिज्‍म का चल रहा है। इसमें तमाम पत्रकार पब्लिक रिलेशन कर रहे हैं। ईवेंट कर रहे हैं। उस पर तीखे कमेंट भी होते हैं। आपको क्‍या लगता है कि ईवेंट जर्नलिज्‍म ठीक नहीं है या पत्रकार अगर नौकरी छोड़कर पीआर बन रहा है तो आपको क्‍या आपत्ति है। क्‍या आपका मानना है कि ईवेंट जर्नलिज्‍म की वजह से जर्नलिज्‍म को खास नुकसान नहीं हो रहा है ? 

ब्रज खंडेलवाल : यह तो उसकी स्‍वतंत्रता है कि वह जो मन में आए, करे। ईवेंट्स अब मीडिया का हिस्‍सा बन चुके हैं। ऐसे में यदि वह नहीं करेगा तो कोई और करेगा। यह पीआर, प्रमोशन और बिजनेस स्‍ट्रेटजी का हिस्‍सा है। इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती है। अगर यह सार्वजनिक रूप से हो रहा है तो कोई दिक्‍कत नहीं है। यह पारदर्शी होना चाहिए, इसमें कुछ छिपा नहीं होना चाहिए। सभी लोग कोई भी काम करने के लिए स्‍वतंत्र हैं।  

इसमें एक समस्‍या यह होती है कि तमाम ईवेंट्स में जो मंचासीन लोग होते हैं, इनमें से कर्इ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं पर भी मंच पर बैठने लायक नहीं होते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? 

ब्रज खंडेलवाल : यह मीडिया का प्रॉब्‍लम नहीं है, यह तो समाज का प्रॉब्लम है। समाज में घटिया लोग भी होते हैं।  

हमारा मानना है कि मीडिया बहुत स्‍ट्रॉंग है, वह इन सब चीजों को चेक करेगा। मीडिया छापता भी है और मीडिया के लोग पीआर बनकर वह ईवेंट भी करते हैं। इस बारे में कुछ बताएं? 

ब्रज खंडेलवाल : चूंकि इस तरह के लोग फाइनेंस करते हैं तो एक तरह से वह उस मीडिया में स्‍पेस खरीद लेते हैं। आखिर पीआर क्‍या होता है, अनपेड पब्लिसिटी। आमतौर पर होता यही है कि यदि सीधे विज्ञापन के पैसे नहीं दे रहे हो तो घुमाकर दे दो इस तरह प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करके।

पिछले दो दशक से आप पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। क्‍या आपके छात्र किसी जगह पर पहुंचे हैं या आगरा से बाहर सेट हो गए हैं। आज जब आपको अपने पुराने छात्र मिलते हैं तो आपको कैसा लगता है कि आपने शिक्षक के तौर पर जो यह शुरुआत की है, उसमें भी आपने कामयाबी पाई है? 

ब्रज खंडेलवाल : मुझे ऐसे बहुत सारे लोग मिलते रहते हैं। इनमें जो पत्रकार बन गए, वे अच्‍छा कर रहे हैं। जो पत्रकार नहीं बन पाए, वे जिस फील्‍ड में भी हैं अच्‍छा कर रहे हैं। इनमें से कई डॉक्‍टर्स भी हैं, जिन्‍होंने पत्रकारिता भी की है और अब अच्‍छे डॉक्‍टर के रूप में काम कर रहे हैं। इनमें एक पुलकित है, दूसरा राजकुमार है। ये दोनों नाम तो मुझे याद हैं। एक लेखपाल बन गया है जौनपुर में कहीं पर। कहने का मतलब है कि हम सिर्फ मीडिया टेक्‍निक ही नहीं सिखाते हैं, बल्कि छात्र के सर्वांगीण विकास पर ध्‍यान देते हैं। 

सुना है कि आपके एक पुराने स्‍टूडेंट पत्रकारिता के बाद रेलवे में चले गए लेकिन सरकारी नौकरी छोड़कर फिर वे पत्रकारिता में आ गए। जबकि आजकल ज्‍यादातर पत्रकार पीआरओ बनना चाहते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? 

ब्रज खंडेलवाल : यह बात सही है। दरअसल, उसे लगा कि रेलवे की नौकरी में उसे वह संतुष्टि नहीं मिलेगी। हालांकि मैंने उसे समझाया भी था कि यहां तनाव और अनिश्चितता रहेगी लेकिन उसका कहना था कि मैं ये सब झेल लूंगा। इसके बाद फिर मैंने कहा कि यदि तुम यही चाहते हो तो ठीक है, आ जाओ। 

 

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

हालात सामान्य होने तक समाज की बेहतरी की दिशा में जारी रहेगी हमारी ये पहल: मार्कंड अधिकारी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ एक बातचीत के दौरान 'सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने तमाम मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 20 June, 2020
Markand Adhikari

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) ने हमारे जीने के तरीके को बदलकर रख दिया है। इस महामारी ने समाज के लगभग सभी वर्गों को प्रभावित किया है, लेकिन प्रवासी श्रमिकों (migrant workers) पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है। ऐसे में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में जाना-माना नाम ‘श्री ’ (Sri Adhikari Brothers) ने एक सराहनीय पहल शुरू की है, ताकि टैलेंटेड श्रमिकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले और इसके जरिये वे कमाई भी कर सकें।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने इस पहल के बारे में बताने के साथ ही यह भी बताया कि कोविड-19 से ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव आए हैं। इसके अलावा उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ग्रोथ समेत तमाम मुद्दों पर भी अपनी बात रखी, प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

पिछले 30 वर्षों से आप ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री का जाना-माना नाम हैं, कोविड-19 के बाद इस आप सेक्टर में किस तरह के मूलभूत बदलाव होते हुए देख रहे हैं?

कोविड के बाद लाइफ पूरी तरह से बदल गई है। सबसे पहले तो इसका सीधा प्रभाव ब्रॉडकास्टर्स के रेवेन्यू पर पड़ा है, जो काफी कम हो गया है। हालांकि, यह महीनावार (month-wise) बढ़ रहा है, लेकिन भगवान ही जानते हैं कि कोविड-19 से पहले वाली स्थिति कब आएगी। दूसरी तरफ, नए कार्यक्रम नहीं बन रहे हैं। ऐसे में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के लिए भारी झटका है और जीआरपी (Gross rating point) में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही शूटिंग के लिए जो नई गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उनमें फ्रेश कंटेंट तैयार करना काफी मुश्किल है। इमर्जेंसी अथवा पैचवर्क में ही इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह काफी अजीब स्थिति है कि चैनल बिजनेस उपयोगिता के रूप में चल रहे हैं, व्युअर्स भी इनका उपभोग (consuming) कर रहे हैं, लेकिन जिन्हें बिलों का भुगतान करना है, वे गायब हैं। यह तो ऐसा हो गया है कि लोग फाइव स्टार होटल आ रहे हैं, लंच और डिनर कर रहे हैं और बिना बिल दिए चले जा रहे हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि ब्रॉडकास्टर्स के बिलों का भुगतान हमेशा एडवर्टाइजर्स के द्वारा किया जाता है, बेशक यह रेटिंग पर निर्भर करता है।      

इस दौरान डिजिटल/वेब प्लेटफॉर्म काफी तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि वे सबस्क्रिप्शन पर ज्यादा निर्भर होते हैं। वे मुश्किल से ही एडवर्टाइजर्स पर निर्भर होते हैं। नए फिल्में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज जो रही हैं। हमारी नई पीढ़ी ने कोविड-19 से पहले दो मार्च को ‘डिज्नी हॉटस्टार’ पर अपनी फिल्म ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) के साथ यह प्रयोग किया है, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह एक ट्रेंड बन जाएगा।  

डिजिटल अब और ज्यादा महत्वपूर्ण किस तरह होता जा रहा है?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि डिजिटल सबस्क्राइबर्स पर ज्यादा और एडवर्टाइजर्स पर मुश्किल से ही निर्भर होता है। यह समय उनका है, लेकिन नए कंटेंट को लगातार तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि आखिर में व्युअर्स को फ्रेश कंटेंट ही चाहिए होता है।  

आप हमेशा समाज के भले के लिए तत्पर रहते हैं। हाल ही में श्री अधिकारी ब्रदर्स समूह द्वारा नई पहल (Sri Adhikari Brothers initiative 2.0) शुरू की गई है। आपने प्रवासी श्रमिकों को जीवन में आशा और आजीविका प्रदान करने के लिए यह सराहनीय पहल शुरू की है। इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसके प्रोमो पर किस तरह की प्रतिक्रिया आई और कितने लोगों ने इसमें अपना कंटेंट भेजा है?

मेरा मानना है कि एक बिजनेसमैन/मीडिया कंपनी मालिक के रूप में समाज के लिए कुछ करना हमारी पहली जिम्मेदारी है। जैसा कि मैंने अपनी पहली पहल (1.0) में कहा था कि समाज के पांच से 10 प्रतिशत उच्च वर्ग के लोगों को आगे आकर उन लोगों के लिए मदद का हाथ बढ़ाना होगा, जो तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ‘BAPS Swaminarayan’ के साथ मिलकर हमने 1000 परिवारों की जिम्मेदारी ली है और उन्हें मासिक आधार पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहे हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि डोनेशन इसका पूरा हल नहीं है, हमें रोजगार के अवसर भी तैयार करने होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर’ के आह्वान पर हमने उन प्रवासी श्रमिकों के बेरोजगारी के मुद्दे की दिशा में काम करने का फैसला लिया है जो महामारी की वजह से अपना काम-धंधा छोड़कर अपने घरों पर वापस लौट गए हैं। चूंकि हम टैलेंट और परफॉर्मिंग आर्ट के बिजनेस में हैं, ऐसे में मैंने उन्हें एक अवसर प्रदान करने का निर्णय लिया और उनसे कहा है कि वे अपनी कला का कोई वीडियो अपने पते और बैंक अकाउंट नंबर के साथ भेजें। हम हर महीने ऐसी 1000 प्रतिभाओं को चुनेंगे। हम न सिर्फ उनके टैलेंट को अपने ग्रुप के चैनल्स पर दिखाएंगे, बल्कि उनके खाते में पैसे भी ट्रांसफर करेंगे। उससे उन्हें अपने ‘हुनर’ से कमाई का मौका मिलेगा और उन्हें गर्व का अनुभव होगा। मुझे लगता है कि समाज के लिए हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि हम आज जो भी हैं वह हमें समाज द्वारा दिया गया है और अब समाज के लिए कुछ करने का समय है। इस पहल का ग्रुप के चैनल्स (Mastiii, Dabangg और Maiboli) पर प्रसारण शुरू कर दिया गया है और शुरुआती स्तर पर हमें इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली है और हम आपको कुछ दिनों के बाद वास्तविक आंकड़ों के साथ अपडेट करेंगे।

यह पहल कब तक चालू रहेगी?

जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, यह चलती रहेगी। इस पहल में भागीदारी केवल टीयर III (Tier III) शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों और उन लोगों के लिए खुली है जो बेरोजगारी से पीड़ित हैं। भागीदारी के लिए यही हमारी मूल शर्त है। वर्तमान के हालात को देखते हुए कोई भी इस समय समय सीमा के बारे में भविष्यवाणी नहीं कर सकता है, लेकिन हम अपने वादे पर तब तक टिके रहेंगे, जब तक कि हमें आशा की किरण दिखाई नहीं देती।

आपने इसके लिए कितना पैसा आवंटित किया है?

परोपकार के रूप में आप जो खर्च कर रहे हैं, उस राशि के बारे में उल्लेख करना सही नहीं है, लेकिन मैं एक बात कह सकता हूं कि समाज के वंचित व जरूरतमंद लोगों के सहयोग के लिए अपनी पहली पहल (1.0) और अब दूसरी पहल (2.0) के लिए हमने अपने परिवार से पर्याप्त धन हासिल किया है।   

आप न्यूज काफी देखते हैं, न्यूज चैनल्स के बारे में आपका क्या कहना है? पहले आपके पास भी तो एक न्यूज चैनल था।

मुझे लगता है कि व्युअर्स अब टीवी से डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। इसमें वर्तमान चैनल्स के ऐप्स भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा बदलाव हम यह देखते हैं कि सोशल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। लोग सिर्फ न्यूज चैनल्स पर ही भरोसा नहीं जता रहे हैं, बल्कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की ओर भी झुक रहे हैं। बेशक, हमारे पास पहले एक न्यूज चैनल था, लेकिन वर्तमान में हमारे ग्रुप के पास ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो पहले प्रिंट रूप में भी था। ‘गवर्नेंस नाउ’ करीब दस साल से है और सरकार से संबंधित मुद्दों पर एक बहुत ही जिम्मेदार और गंभीर प्लेटफॉर्म माना जाता है।

आपकी अगली पीढ़ी कैसे अपनी भूमिका निभा रही है और आपको नई चीजों से रूबरू होना सिखा रही है?

बेशक, हमारी नई पीढ़ी डिजिटल की दुनिया के साथ ज्यादा पली-बढ़ी है। उनकी पहली क्रिएशन ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) थी जो दो मार्च 2020 को डिज्नी हॉटस्टार प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई थी। इसके बाद से यह डिजिटल फिल्मों के लिए यह एक ट्रेंड बन गया है। वे लॉकडाउन में भी कई डिजिटल वेब सीरीज और फिल्मों पर काम कर रहे हैं। रवि और कैलाश नई स्क्रिप्ट्स और सब्जेक्ट्स पर काफी मेहनत कर रहे हैं। उनके पास लगभग 10 प्रोजेक्ट तैयार हैं। बेशक, वे उभरते हुए मीडिया में हैं और मैं अपनी पूरी जिंदगी अपनी अगली पीढ़ी का स्टूडेंट बनना पसंद करूंगा।  

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Enterr10 के COO दीप द्रोण ने बताया, दंगल टीवी की सफलता का 'राज'

Enterr10 टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2020
Dangal TV

‘एंटर10’ (Enterr10) टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ (Dangal TV) ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है। यह चैनल शहरी और ग्रामीण (U+R) मार्केट में अपनी वीकली लीडरशिप एवरेज रेटिंग से आगे की ओर देख रहा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत के दौरान ‘b’ टेलिविजन के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर दीप द्रोण (Deep Drona) ने बताया कि दंगल टीवी ने वर्तमान में कारोबारी माहौल को किस तरह अपने अनुकूल बनाए रखा है और चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स के ‘फ्री टू एयर’ (FTA) स्पेस में वापस आने के बाद भी अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए चैनल की क्या स्ट्रैटेजी है? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

पिछले साल अप्रैल से ही दंगल टीवी की रेटिंग का हिंदी के जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर में वर्चस्व रहा है। चैनल की इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण रहे हैं?

निश्चित रूप से दो प्लेयर्स के एक हो जाने से व्युअरशिप के आधार पर दंगल टीवी को मदद मिली है। कई प्लेयर्स ने ‘फ्री टू एयर’ (Free-to-Air) स्पेस से निकलने का फैसला लिया, जबकि हमने अधिकतर इसी पर फोकस किया। हमने उन फ्री टू एयर ऑडियंस को ध्यान में रखा जो एंटरटेनमेंट और क्वालिटी प्रोग्रामिंग से वंचित थे। इसने हमें बड़े अंतर से शहरी और ग्रामीण मार्केट में लीडर बनाया है। हमने अपने ऑडियंस के लिए सिर्फ क्वालिटी लाइब्रेरी शो ही नहीं दिखाए, बल्कि उसमें बहुत सारी ओरिजिनल प्रोग्रामिंग भी शामिल की, जिसे दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया।

व्युअरशिप के मामले में आपके सबसे बड़े मार्केट्स कौन से हैं?

राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी बाजार हमारे गढ़ हैं। पश्चिम के मार्केट में हम प्रतिस्पर्धा में हैं और वहां हमने यूनिक ऑडियंस भी जोड़े हैं। उत्तरी और पश्चिमी बाजार सभी मीडिया योजनाओं के प्रमुख बाजार हैं, जो हिंदी भाषी मार्केट के दर्शकों को देखते हैं। चूंकि हम शहरी व्युअर्स को भी आकर्षित करते हैं, इससे भी दंगल टीवी को मदद मिलती है।  

दंगल टीवी और नेटवर्क पर लॉकडाउन का क्या प्रभाव पड़ा है?

यदि हम रेवेन्यू की बात करें तो दूसरे प्लेयर्स के मुकाबले हम ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। हमारी रिकवरी भी बहुत सकारात्मक रही है और यदि आप हमारे एडवर्टाइजर्स की लिस्ट देखें तो उससे यह स्पष्ट हो जाता है। हमने स्थिति को देखते हुए अपने गेम प्लान को काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। हमारे बड़े पार्टनर्स ने हमारे साथ बड़ा निवेश करना जारी रखा और हमने वर्तमान स्थिति में काफी अच्छा किया। वास्तव में, हमारी परफॉर्मेंस’सामान्य महीनों’ के हिसाब से 75-80 प्रतिशत के करीब रही है। व्युअरशिप की बात करें तो एक पे चैनल को छोड़कर हम ही एकमात्र चैनल हैं, जिसे दर्शक संख्या का जरा भी नुकसान नहीं हुआ। कई हफ्तों में तो शहरी और ग्रामीण मार्केट में हमारी वीकली नॉर्मल लीडरशिप रेटिंग्स की तुलना में काफी अच्छी ग्रोथ रही है। लॉकडाउन में दूरदर्शन की रेटिंग भी काफी बढ़ी। इस अप्रत्याशित समय में दंगल टीवी को भी काफई फायदा हुआ और हमारे नेटवर्क चैनल्स का प्रदर्शन कुछ प्रमुख पे चैन्स की तुलना में काफी ज्यादा था। लॉकडाउन के दौरान भी नेटवर्क ने अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा।

चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स की फ्री टू एयर स्पेस में वापसी के साथ दंगल टीवी ने अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए क्या स्ट्रैटेजी बनाई है?

छह-सात तिमाही तक सभी चैनल्स, जिनमें प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स भी शामिल हैं, साथ-साथ थे। वर्तमान हालात में सभी नए-पुराने चैनल्स एफटीए जॉनर में जुड़ने के लिए साथ आएंगे। वास्तव में, इस जॉनर को स्वयं ग्राहकों या एजेंसियों से बहुत अधिक ध्यान आकर्षित करना होगा और टीवी पर मीडिया के खर्च के संदर्भ में अपने वास्तविक और उचित मूल्य के लिए लड़ना होगा। क्लाइंट्स के लिए मार्केट परिपक्व (matured) हो गया है और शहरी क्षेत्रों से आगे बढ़ रहा है, क्योंकि वास्तविक ग्रोथ शहरी क्षेत्रों से परे सेंटर्स से आ रही है। पहले दंगल टीवी पैक का हिस्सा था और पिछले एक साल से चैनल लीडर रहा है। हमें पूरा विश्वास है कि व्युअरशिप के मामले में पूरा मार्केट आगे बढ़ेगा। हमारा प्रयास और फोकस मार्केट शेयर पर टिके रहना और प्रतिस्पर्धा की नई जरूरतों पर प्रतिक्रिया देना होगा।

दंगल टीवी के लिए आपकी कंटेंट स्ट्रैटेजी क्या होगी?

हम एक संपूर्ण एंटरटेनमेंट चैनल हैं जिसमें डेली सोप और नाटक से लेकर तमाम वैरायटी के शो शामिल हैं। यह सब पूर्व में हमें अच्छी तरह से परोसा गया है। प्लेयर्स इस जॉनर में अपने लाइब्रेरी कंटेंट के साथ दोबारा से आएंगे। हमारे पास ओरिजिनल से लाइब्रेरी तक 40:60 प्रतिशत की कंटेंट स्ट्रैटेजी है। हम यह देखेंगे कि चीजें कैसे आकार लेती हैं और फिर क्षेत्र में अग्रणी प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी होने के लिए हम सभी जरूरी कदम उठाएंगे।

कुछ समय से विज्ञापन की कीमतों को लेकर काफी दबाव बना हुआ है। लेकिन अपनी पहुंच को देखते हुए आप विज्ञापन की दरों को कैसे कम कर रहे हैं? प्रतिबंधों में ढील के साथ कौन सी श्रेणियां रुचि दिखा रही हैं?

यदि हम हिंदी भाषी मार्केट चैनल्स की तुलना क्रिकेट में बैटिंग के क्रम से करें तो एफटीए चैनल्स अब मिडिल ऑर्डर (मध्य क्रम) में हैं, जबकि पे चैनल्स लीड पर हैं। मध्य क्रम अधिकांश क्लाइंट्स के लिए मीडिया प्लान्स में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। एडवर्टाइजर्स की ओर देखें तो ‘फास्ट मूविंग कंज्यूमर्स गुड्स’ (FMCG) आगे बने रहेंगे और इसके बाद बेवरेज, फूड्स और सीमेंट्स रहेंगे। हमें बैंकिंग और बीमा क्षेत्र से भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है।

तमाम चैनल्स और नेटवर्क्स अपने बिजनेस मॉडल्स का पुनर्मूल्यांकन (re-evaluating) कर रहे हैं। इस दिशा में Enterr10 का क्या प्लान है?

ब्रॉडकास्टर्स द्वारा उठाया गया यह कदम पहले की योजनाओं की वापसी है, जो उन्होंने पहले बनाई थी। ट्राई (TRAI) के नए टैरिफ ऑर्डर ने अधिकांश प्लेयर्स को यह क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर किया। हालांकि, मौजूदा बाजार परिदृश्य में, राजस्व की हानि बनाम चल रहे बिजनेस प्लान ने उन्हें वापसी के लिए प्रेरित किया। यह मार्केट अब आगे बढ़ेगा और परिपक्व होगा। हम प्रतिस्पर्धा में बने रहने और लीडरशिप के लिए ओरिजिनल प्रोग्रामिंग और ओवरऑल बिजनेस में निवेश करना जारी रखेंगे।

Enterr10 नेटवर्क में छह चैनल्स हैं। आप नेटवर्क के प्रदर्शन का आकलन कैसे करेंगे?

दंगल टीवी, भोजपुरी सिनेमा, फक्त मराठी और अन्य चैनल्स के साथ नेटवर्क ने पिछले वर्षों की तुलना में मजबूती से प्रदर्शन किया है।

Enterr10 के लिए आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं? क्या आप और लॉन्चिंग करना चाहते हैं? यदि हां तो वह किस भाषा और जॉनर्स में होंगीं?  

हमने कुछ और लॉन्चिंग की योजना बनाई थी, लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए उन्हें फिलहाल होल्ड पर रखा है। एक बार मार्केट के स्थिर होने पर हम तेजी से उन योजनाओं को धरातल पर ले आएंगे।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

शीरीन भान ने बताया, लॉकडाउन ने कैसे ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को किया प्रभावित

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचें4मीडिया’ के साथ CNBC-TV18 की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2020
Shereen Bhan

‘सीएनबीसी-टीवी18’ (CNBC-TV18) स्टार्टअप्स के लिए समर्पित देश के पहले शो ‘यंग तुर्क’ की वर्षगांठ का जश्न मना रहा है। सबसे पहले यह शो वर्ष 2002 में प्रसारित किया गया था और अब 17 जून को यह 18 साल का हो गया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में ‘सीएनबीसी-टीवी18’ की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने बताया कि करीब दो दशक के दौरान इस शो में लगभग 5000 स्टार्टअप्स और देश में स्टार्टअप्स की बढ़ती कहानी को दिखाया गया है। इस दौरान भान ने महामारी के दौरान न्यूज रूम के बदलते रूप के साथ ही इस बारे में भी चर्चा की कि इस मुश्किल समय में भी इस ब्रैंड ने कैसे व्युअर्स के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखा है। प्रस्तुत हैं शीरीन भान के साथ इस बातचीत के प्रमुख अंश:

हमें सबसे पहले ‘यंग तुर्क’ के बारे में थोड़ा बताएं। आपको क्या लगता है कि इन 18 वर्षों में देश में स्टार्टअप्स का परिदृश्य किस तरह और कितना बदल गया है?

’यंग तुर्क’ को युवा एंटरप्रिन्योर्स, नए आइडिया और उभरते भारतीय ब्रैंड्स पर फोकस करने के लिए बतौर एक प्रयोग शुरू किया गया था। हमने सोचा था कि यह एक सीरीज होगी जो 13 हफ्ते में खत्म हो जाएगी, लेकिन इसने अपना सफर खुद जारी रखा। आज यह न सिर्फ स्टार्टअप्स को समर्पित देश का पहला शो है, बल्कि शायद स्टार्टअप्स और एंटरप्रिन्योरशिप पर दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला शो है। इस शो के दौरान, हमने स्टार्टअप की अर्थव्यवस्था को विकसित होते हुए देखा है। 18 वर्ष पहले की तुलना में पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) ज्यादा विविध हो गया है। युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स के पास आज के समय में टेक्नोलॉजी की पावर भी है। स्टार्टअप्स ने न सिर्फ नई कैटेगरीज और मार्केट तैयार किए हैं, बल्कि उन्होंने इस सेक्टर को एक व्यवस्थित सेक्टर के रूप में स्थापित करने में भी मदद की है, जो पहले काफी बिखरा हुआ था। इस ईकोसिस्टम की ग्रोथ के साथ ही ‘यंग तुर्क’ ने एक डेली शो ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ (Startup Street) शुरू करने का फैसला लिया, जो इस क्षेत्र के समाचारों पर केंद्रित है। ‘यंग तुर्क’ ने जहां 18 साल पूरे कर लिए हैं, वहीं ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ को अभी एक साल ही हुआ है और हम स्टार्टअप इंडिया की कहानी का एक अभिन्न हिस्सा होने पर बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं।   

इस शो पर अब तक कितने स्टार्ट अप्स दिखाए गए हैं? हमें इस शो की विकास यात्रा के बारे में कुछ बताएं और 18 वर्षगांठ के लिए आपने किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग की योजना बनाई है?

इन तमाम वर्षों में हमने देश के करीब 5000 एंटरप्रिन्योर्स को दिखाया है और हमने इस शो को ग्लोबल लेवल पर भी पहुंचाया है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से स्टार्टअप के साथ हमारे गहरे संबंध हैं और इस शो को हम लंदन, सिंगापुर, इजराइल ले गए हैं और एक ग्लोबल नेटवर्क तैयार किया है। शो के 18 साल पूरे होने पर हमने एक घंटे का स्पेशल शो तैयार किया है, जिसमें देश के प्रमुख स्टार्टअप्स और इन्वेस्टर्स ‘CNBC-TV18’ पर हमारे साथ जुड़ेंगे। इसमें जाने-माने निवेशक और फाउंडर्स जैसे-‘ Nexus Venture Partners’ के को-फाउंडर और एमडी नरेन गुप्ता, ‘Lightspeed India Partners’ के पार्टनर देव खरे, ‘Indian Angel Network’ की को-फाउंडर पद्मजा रूपारेल, ‘Pine Labs’ के सीईओ अमरीश राव, ‘Rivigo’ की को-फाउंडर गजल कालरा, ‘Meesho’ के फाउंडर और सीईओ विदित आत्रे और ‘Vedantu’ के सीईओ और को-फाउंडर वामसी कृष्णा जैसे नाम शामिल हैं।  

वर्तमान दौर की बात करें तो आप कैसे बहुत कम कार्यबल (Workforce) के साथ काम कर रही हैं और लॉकडाउन ने किस प्रकार ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को प्रभावित किया है?  

इस महामारी ने निश्चित रूप से हमारे आसपास बहुत कुछ बदलकर रख दिया है। कम कार्यबल और लॉकडाउन ने हमें ज्यादा कुशल और इनोवेटिव (innovative) बनाया है। कोविड-19 महामारी हमारे समय की सबसे बड़ी स्टोरी है और CNBC-TV18 ने इसे कवर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कोविड-19 से जुड़ी स्टोरी और अपडेट्स देने के लिए हमारी एडिटोरियल टीम लगातार काम कर रही है। हम व्यापार निरंतरता योजना (business continuity plan) को अपनाने वाले पहले लोगों में से थे, जिसने हमें न सिर्फ संचालन को निर्बाध रूप से बनाए रखने बल्कि सभी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायता प्रदान की है। ‘CNBC TV-18’ नेटवर्क में एंकर्स, पत्रकार, प्रॉडक्शन टीम और न्यूजरूम से जुड़े सभी लोगों ने नए नियमों को अपनाया और उनका पूरी तरह पालन कर रहे हैं। हमारा पूरा प्रयास ऑडियंस को फ्रेश और डायनामिक कंटेंट प्रदान करने का रहा है।

पिछले तीन महीनों के दौरान न्यूज की व्युअरशिप अब तक सबसे ज्यादा रही है। लोगों ने इस दौरान मार्केट और बिजनेस न्यूज में काफी रुचि दिखाई है। क्या CNBC-TV18 की ग्रोथ में भी इस तरह की बढ़ोतरी हुई है? इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए आपका क्या प्लान है?

जब से लॉकडाउन लागू हुआ था, तब से लोग अपने घर पर बहुत समय बिता रहे हैं। इस दौरान टीवी की व्युअरशिप भी काफी बढ़ी है। दूसरे जॉनर्स की तुलना में बिजनेस न्यूज की खपत (consumption) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, क्योंकि कोविड-19 महामारी का अर्थव्यवस्था और बाजारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। यहां तक कि जब हमने घर से काम (work from home) करने के लिए अपने ऑपरेशंस का काफी महत्वपूर्ण हिस्सा शिफ्ट किया, उस दौरान भी हमने प्रभावशाली लोगों को एक साथ लाने के लिए अपनी प्रोग्रामिंग पर नवाचार (innovation) करना जारी रखा। केंद्रीय बैंकर्स, केंद्रीय मंत्रियों, वित्त राज्य मंत्रियों और व्यापार जगत के नेताओं से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवा नेताओं और फंड मैनेजरों के द्वारा हमने अपने दर्शकों को समस्या और संभावित समाधानों पर पूरी जानकारी देने की कोशिश की है। एक जिम्मेदारी न्यूज प्लेटफॉर्म होने और बिजनेस न्यूज के क्षेत्र में अग्रणी होने के नाते CNBC-TV18 की व्युअरशिप में भी बहुत ज्यादा इजाफा देखने को मिला है, जो हाल में स्थिर हुआ है। अंग्रेजी बिजनेस न्यूज जॉनर में हमने लगातार 70 प्रतिशत से अधिक मार्केट शेयर हासिल किया है। CNBC-TV18 ने बेजोड़ कवरेज और गहन विश्लेषण के कारण बेहतर प्रदर्शन जारी रखा है।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

ABP न्यूज नेटवर्क के CEO ने बताया, कैसे ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा यह चैनल

‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2020
Avinash Pandey

'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया की रेटिंग में लगातार सात हफ्ते तक नंबर वन रहने के बाद ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ABP News Network) के बंगाली न्यूज चैनल ‘एबीपी आनंद’ (ABP Ananda) ने इस संख्या को लगातार न सिर्फ बनाए रखने बल्कि आगे बढ़ाने की योजना भी बनाई है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने बताया कि कैसे पश्चिमी बंगाल न सिर्फ व्युअर्स और न्यूज के इस्तेमाल (consumption) में हमेशा से आगे रहा है, बल्कि एडवर्टाइजर्स के लिए एक मार्केट के रूप में उभरा है। इस दौरान अविनाश पांडे ने एक मार्केट के रूप में बंगाल की स्थिति, एबीपी आनंद की ग्रोथ स्टोरी और जमीनी स्तर पर शुरू की गईं पहल समेत तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके रेटिंग के आंकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘Vocal for Local’ विजन को लेकर तालमेल बैठा रहे हैं। बढ़ती हुई रेटिंग के बारे में थोड़ा बताएं। क्या सिर्फ ‘स्टे एट होम’ (stay-at-home) ट्रैफिक की वजह से आंकड़ों में यह बढ़ोतरी हो रही है?

पिछले कुछ सालों में ‘एबीपी आनंद’ ने पश्चिम बंगाल के मार्केट में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है और खासकर रीजनल न्यूज ब्रॉडकास्ट की बात करें तो यह काफी मजबूती से उभरा है। हम ‘एबीपी आनंद’ की 15वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और एक और महत्वपूर्ण वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, हम टीवी न्यूज को लेकर बड़े कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

कोरोनावायरस के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर रहने के लिए मजबूर हैं, जिससे इंटरनेट और टीवी का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं है कि व्युअरशिप बढ़ाने में लॉकडाउन की काफी अहम भूमिका है। वहीं, हमारा बेहतरीन और इनोविटव कंटेंट भी इस चुनौतीपूर्ण समय में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में समान रूप से प्रासंगिक रहा है। लगातार सात हफ्तों तक विभिन्न जॉनर्स में हम नंबर वन रहे हैं और हमारे व प्रतिद्वंद्वियों के बीच का अंतर और बढ़ा है। यह खुद अपने आप में हमारी ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा है।

अन्य क्षेत्रों के मुकाबले बंगाल में न्यूज खपत (news consumption) का मार्केट कैसा रहा है, क्या आप इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं? क्यों?

व्युअरशिप और न्यूज खपत के मामले में बंगाल हमेशा से बढ़ोतरी की स्थिति में रहा है। ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दोनों के लिए यह एक पसंदीदा बाजारों में से एक रहा है। इसके अलावा, हाइपर लोकल न्यूज ईकोसिस्टम भी कोविड-19 के दौरान बढ़ रहा है, क्योंकि व्युअर्स अपने जिले, कस्बे आदि से जुड़े न्यूज अपडेट्स को हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में ‘एबीपी आनंद’ बंगाल में लोगों की पसंद बना हुआ है।  

इस महामारी के दौरान न्यूज चैनल्स न्यूज के अलावा इंफोटेनमेंट (infotainment) कार्यक्रम भी दिखा रहे हैं। इस दिशा में ‘एबीपी आनंद’ क्या कर रहा है?

लॉकडाउन के दौरान पहले से तनाव में रह रहे लोगों के लिए कोरोनावायरस की लगातार न्यूज कवरेज काफी निराशाजनक रह सकती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए हमें अपने कंटेंट में विविधता की जरूरत है। एबीपी आनंद के द्वारा हम कई जानकारीपरक और शैक्षिक प्रोग्राम्स पर फोकस कर रहे हैं। इससे पहले हमने कक्षा नौ और 12वीं के लिए वर्चुअल क्लासेज का प्रसारण किया, जिसे व्युअर्स की ओर से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिला। हमने सामाजिक शिक्षा प्रदान करने वाले नए फॉर्मेट्स को लेकर भी प्रयोग किया है। ‘Ghanta Khanek Sange Suman’ के द्वारा सुमन डे घर से लाइव शो होस्ट कर रहे हैं, जिसे लोगों ने काफी सराहा है।

लॉकडाउन के दौरान न्यूज कैटेगरी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी रही है। आप इन आंकड़ों को बनाए रखने के लिए क्या कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि लॉकडाउन पूरी तरह समाप्त होने के बाद भी इन आंकड़ों को बनाए रखना संभव होगा?  

वर्तमान में जिस तरह की अनिश्चतता है, उसे देखकर अनुमान लगाना काफी कठिन है। हालांकि, लॉकडाउन के बाद व्युअरशिप में कुछ हद तक कमी आएगी, लेकिन पिछली तिमाहियों के मुकाबले यह ज्यादा बनी रहेगी। कोविड-19 को लेकर लोगों में डर लगातार बना रहेगी और व्युअर्स लेटेस्ट न्यूज अपडेट्स हासिल करना जारी रखेंगे। हमारा फोकस अपने व्युअर्स के लिए कंटेंट उपलब्ध कराने और नए नए इनोवेशन पर है, इसलिए हमें सकारात्मक वृद्धि की उम्मीद है।

राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और यह सोशल डिस्टेंसिंग का दौर है। क्या आपको लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया में बंगाल में न्यूज चैनल्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और डिबेट्स के रूप में कंटेंट को परोसेंगे, जैसा कि हम पश्चिम देशों में देखते हैं?

इस महामारी से सभी प्रमुख इंडस्ट्रीज काफी प्रभावित हुई हैं। ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। सोशल डिस्टेंसिंग के परिणामस्वरूप, न्यूज जॉनर में इवेंट वर्चुअल अब सामान्य बात हो चुकी है। वर्चुअल इवेंट और लाइव होम बुलेटिंस के जरिये हमारे न्यूज चैनल्स को जीवन की एक नई चीज भी मिली है। हाल ही में ‘एबीपी आनंद’ ने राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के साथ-साथ आईसीएसई (ICSE) और आइएससी (ISC) के नौवीं और 12वीं कक्षाओं के छात्रों के लिए वर्चुअल कक्षाएं प्रसारित की हैं। इसके अलावा भी हमारी ओर से कई और पहल की गई हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि चुनावों को जिस तरह इस महामारी से पहले प्रभावी रूप से कवर किया जाता रहा है, उसी तरीके से कवर किया जाए। हालांकि, सोशल डिस्टेंसिंग एक चुनौती है, लेकिन महामारी के दौरान कई नई पहल भी सामने आई हैं, जो हमारे लॉन्ग टर्म फोकस को बनाए रखेंगी।

कंटेंट की खपत (content consumption) में काफी बदलाव देखा गया है। तमाम व्युअर्स कंटेंट के लिए डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चैनल किस तरह का प्रदर्शन कर रहा है?

इस समय, डिजिटल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को नकारा नहीं जा सकता है। कंज्यूमर्स के व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। ऐसे में अपने व्युअर्स की नब्ज को पहचानते हुए हमने नया कंटेंट तैयार किया है। ऐसे में हमारे सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काफी परिवर्तन देखने को मिला है। ‘एबीपी आनंद’ के यूट्यूब चैनल को 20 मई 2020 को 6.2 मिलियन व्यूज (source: YouTube Analytics) मिले हैं। यह दर्शाता है कि बंगाली दर्शकों पर हमारा कितना गहरा प्रभाव पड़ा है।  

चैनल की ओर से किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग अथवा ऑनग्राउंड पहल शुरू की गई हैं?

एबीपी आनंद के रूप में हमारा फोकस हमेशा से अपने कंटेंट में तमाम सांस्कृतिक तत्वों को शामिल करने पर रहा है, ताकि हम बंगाली व्युअर्स के साथ एक मजबूत रिश्ता स्थापित कर सकें। हमारे कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों में ‘खैबर पास फूड फेस्टिवल’ (Khaibar Pass Food Festival) शामिल है। यह कोलकाता के सबसे बड़े ऑनग्राउंड फूड फेस्टिवल्स में शामिल है जो बंगाल के फूड कल्चर को दर्शाता है। इसकी सफलता ने नॉर्थ बंगाल, साउथ बंगाल और नॉर्थ 24 परगनाओं में तीन अन्य खैबर पास कार्यक्रम (Khaibar Pass Events) का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अलावा बंगाल की जानी-मानी हस्तियों को सम्मानित करने के लिए एक अवॉर्ड शो सेरा बंगाली (Sera Bangali) और विभिन्न विषयों पर लोगों को गहराई से जानकारी देने के लिए एक डिबेट शो ‘जुक्ती टोको’ (Jukti-Tokko) भी हमारी पेशकश में शामिल है। हमारी सभी स्पेशल प्रोग्रामिंग का उद्देश्य यही है कि हम लोगों की आवाज को उठाने के साथ ही उनसे जुड़े मुद्दों को सामने ला सकें।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

चार साल पहले उठाया गया बिजनेस स्टैंडर्ड का यह कदम भविष्य को देगा बल: शिवेंद्र गुप्ता

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल व इसे लागू करने में आईं चुनौतियों पर चर्चा की

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2020
Shivendra Gupta

तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जाने का मुद्दा इन दिनों चर्चाओं में है। अंग्रेजी अखबार बिजेनस स्टैंडर्ड (Business Standard) उन मीडिया ऑर्गनाइजेशंस की लिस्ट में शामिल है, जिन्होंने अपनी न्यूज वेबसाइट के लिए काफी पहले पेवॉल मॉडल को अपनाया था। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल, इसे लागू करने में आईं चुनौतियों और इसके भविष्य के बारे में बताया। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने ऑनलाइन कंटेंट को पेवॉल के पीछे रखा हुआ है। इसे लेकर अब तक का अनुभव कैसा रहा है और कंपनी को इस स्ट्रीम से किस तरह का रेवेन्यू मिलता है?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपनी वेबसाइट के एक हिस्से को करीब चार साल पहले पेवॉल के पीछे रखा था। इस स्ट्रैटेजी को लेकर हमारा अनुभव काफी उत्साहजनक रहा है। पिछले चार साल में हमें अपने आंकड़ों में लगातार ग्रोथ देखने को मिली है। हालांकि, हम इसकी सटीक डिटेल शेयर नहीं कर पाएंगे, लेकिन यह कहना सही होगा कि डिजिटल सबस्क्रिप्शन ने हमारे कुल डिजिटल रेवेन्यू में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

शुरुआत में जब आपने रीडर्स से ऑनलाइन कंटेंट के लिए भुगतान करने के लिए कहा तो आपकी किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा? अभी आपके सामने किस तरह की चुनौतियां आ रही हैं?

सबसे बड़ी चुनौती (जो अभी भी बनी हुई है) तब आती है, जब लोगों से भुगतान करने के लिए कहा जाता है। खासकर तब, जब उन्होंने लंबे समय तक फ्री कंटेंट हासिल किया हो। सच्चाई यह है कि हमारे प्रतिद्वंद्वी फ्री स्ट्रैटेजी अपना रहे थे, इस बात ने भी हमारी ग्रोथ को बाधित किया। अब कोविड के बाद की दुनिया में हम देख रहे हैं कि अधिकांश पब्लिशर्स अपने ई-पेपर को पेवॉल के पीछे ले जाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। हमें लगता है कि भविष्य में इस दिशा में और मजबूती आएगी।

पेड ऑनलाइन कंटेंट मॉडल कई देशों में पहले से चल रहा है। लेकिन वहां प्रिंट एडिशंस या तो पूरी तरह समाप्त हो गए हैं अथवा उनकी कीमतें काफी प्रभावित हुई हैं। क्या आप अपने देश में इस तरह की परिकल्पना कर रहे हैं अथवा क्या आपको लगता है कि एक बार यह बुरा दौर गुजर जाने के बाद प्रिंटेड अखबार फिर वापसी करेंगे?

हमारा मानना है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों बने रहेंगे। भारत के संदर्भ में देखें तो निकट भविष्य में प्रिंट और अधिक प्रभावी रहेंगे। वर्तमान दौर में डिस्ट्रीब्यूशन प्रक्रिया काफी बाधित होने के कारण इन दिनों प्रिंट मीडिया निश्चित रूप से काफी मुश्किल दौर से गुजर रहा है, लेकिन हमारा मानना है कि यह प्रॉडक्ट फिर जोरदार वापसी करेगा। हमें लगातार अपने पाठकों का फीडबैक मिलता है कि वे प्रिंट प्रॉडक्ट (अखबार) को मिस करते हैं और हमें विश्वास है कि एक बार स्थितियां सामान्य होने पर हम इन नुकसान की भरपाई कर सकेंगे। यहां तक कि जब हम सफल डिजिटल प्रॉडक्ट्स के अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों को देखें तो उनका प्रिंट बिजेनस (हालांकि यह डिजिटल से कम है) तब से ठीक प्रदर्शन कर रहा है, जब से वे अपने डिजिटव वर्जन को पेवॉल के पीछे ले गए हैं।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए इस ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू मॉडल के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको मार्केट डायनामिक्स के इस दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद है?

पब्लिशर्स के लिए डिजिटल एडवर्टाइजिंग बिजनेस लंबे समय से निराशाजनक रहा है। संरचनात्मक रूप से देखें तो यह तय होता प्रतीत दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं, डिजिटल की डिलीवरी कॉस्ट काफी ज्यादा है। डिजिटल पर टेक्नोलॉजी कई ऑपरेटिंग सिस्टम्स, डिवाइस और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर बंटी हुई है, जो अलग से अपने ऊपर ध्यान चाहते हैं। टेक्नोलॉजी की कीमतें प्रिंटिंग कॉस्ट में होने वाली बचत को खत्म कर देती हैं। इसका एकमात्र रास्ता डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को तैयार करना है। डिजिटल के लिए सबस्क्रिप्शन और एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का मिश्रण उचित रहेगा। यह देखते हुए हमारा मानना है कि अधिकांश प्लेयर्स को देर-सवेर सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। अधिकांश प्लेयर्स के लिए अपनी डिजिटल प्रॉपर्टी (digital assets) को एडिट संचालित प्रॉपर्टी (edit driven assets) की दिशा में ले जाना होगा। वर्तमान में अधिकांश प्लेयर्स अपने डिजिटल प्रॉडक्ट को अपने मूल प्लेटफॉर्म (native platform) के तौर पर देखते हैं, जहां पर वास्तविक न्यूज को कॉमर्शियल कंटेंट से अलग करना मुश्किल है। डिजिटल प्रॉडक्ट के लिए भुगतान करने वाले कस्टमर्स जुटाने के लिए पब्लिशर्स को इन दोनों को एक-दूसरे से अलग करना होगा। शुक्र है कि बिजनेस स्टैंडर्ड में हमारी डिजिटल प्रॉपर्टी शुरुआत से ही एडिट यानी संपादकीय के कंट्रोल में रही है। इसने हमें डिजिटल सबस्क्रिप्शन प्रॉडक्ट के रूप में अग्रणी होने में मदद की है।

आखिरी सवाल, क्या आपको उम्मीद है कि ऑनलाइन कंटेंट पढ़ने के लिए पाठकों द्वारा भुगतान करने के मामले में इंडस्ट्री एक साथ आएगी?

मुझे इसकी पूरी उम्मीद है।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अब अखबारों को इन दोनों मॉडल्स पर करना होगा काम: प्रोबल घोषाल, अमर उजाला

अमर उजाला लिमिटेड के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल ने हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के अखबारों द्वारा अपनाए जा रहे डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को लेकर रखी अपनी बात

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2020
Probal Ghosal

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खौफ के कारण देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच विभिन्न अखबारों के ई-पेपर्स और ऑनलाइन कंटेंट की मांग में काफी इजाफा हुआ है। इस बीच तमाम अखबार अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जा रहे हैं। हिंदी और प्रादेशिक भाषा के कई अखबारों द्वारा डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में बढ़ाए जा रहे कदम को लेकर हमारी सहयोगी बेवसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘अमर उजाला लिमिटेड’ के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

देश के तमाम बड़े अंग्रेजी अखबार अपने ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण (monetisation) के लिए इसे पेवॉल के पीछे ले जाने की प्लानिंग कर रहे हैं। इस बारे में आपका क्या नजरिया है। आपको क्या लगता है कि अन्य अखबार खासकर हिंदी और प्रादेशिक भाषा के अखबार भी इस राह पर चलेंगे?

हाल के दिनों में देखें तो विभिन्न अखबारों के डिजिटल कंटेंट का उपभोग (consumption) यानी इस्तेमाल काफी बढ़ा है, चाहे वह ई-पेपर का सबस्क्रिप्शन हो अथवा यूजर्स द्वारा ऑनलाइन न्यूज कंटेंट का इस्तेमाल किया जाना हो। हाल ही में आई ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे’ (IRS) की रिपोर्ट में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। इस बढ़ते हुए ट्रेंड को देखते हुए ही हमने अपने आप पहल करते हुए पिछले साल नाममात्र के मूल्य पर ई-पेपर के लिए पेड मॉडल लॉन्च किया था। हालांकि, जब हम अंग्रेजी अखबारों के सबस्क्रिप्शन प्लान्स पर नजर डालते हैं तो उनके सबस्क्रिप्शन ऑफलाइन अखबारों की कीमत के बराबर ही हैं। चूंकि, ई-पेपर पढ़ने की आदत लोगों में काफी कम है, क्योंकि ई-पेपर की रीडरशिप एक पाठक तक ही सीमित होती है, जबकि जो अखबार फिजिकल घरों में पहुंचता है, उसे तमाम पाठक आपस में शेयर कर लेते हैं। यही कारण है कि महंगे सबस्क्रिप्शन प्लान की सफलता सीमित हो जाती है।    

हमने अपने सबस्क्रिप्शन प्लान के लिए काफी नाममात्र कीमत रखी है, क्योंकि हमारा प्राथमिक उद्देश्य पाठकों में इसे पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना है। वास्तव में कोविड-19 के दौरान ई-पेपर/ऑनलाइन कंटेंट सबस्क्रिप्शन मॉडल्स के लिए यह बहुत जरूरी है, ताकि बिजनेस को निर्वाह और अस्तित्व को बनाए रखा जा सके। वर्तमान में इसकी उपलब्धता एक बड़ा इश्यू है, लोग विश्वसनीयता के कारण अपनी पसंद के अखबार को पढ़ने के लिए देख रहे हैं और यह पाठक की ब्रैंड के प्रति निष्ठा है। इसलिए यदि लोगों को अपने हाथ में अखबार नहीं मिल रहा है तो वे इसे ऑनलाइन हासिल कर रहे हैं और इसके लिए भुगतान भी करते हैं। वास्तव में, स्थिति सामान्य हो जाने के बाद भी लोग अपनी इसी आदत के कारण ई-पेपर पढ़ते रहेंगे और इस बदले हुए व्यवहार के कारण अखबारों को भी अपने कंटेंट के लिए मुद्रीकरण का अवसर मिलेगा।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? आपको इस बारे में किस तरह की उम्मीद है। यदि भारतीय कंपनियां अपने पाठकों से ऑनलाइन कंटेंट का भुगतान करने के लिए कहेंगी, तो उनके सामने किस तरह की चुनौतियां होंगी?

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में हम पिछले कई सालों से स्थिरता देख रहे हैं। ऐसे में देश के न्यूजपेपर बिजनेस का भविष्य़ डिजिटल कंटेंट/ईपेपर के मुद्रीकरण के साथ ही अखबार की कीमत में बढ़ोतरी का मिश्रण होगा। चूंकि दोनों चीजों का सहअस्तित्व है, इसलिए एक भरोसेमंद और प्रतिष्ठित अखबार अपने अखबार के मूल्य को बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण करने में सक्षम होगा। हालांकि, टियर-दो/टियर-तीन (tier 2/tier 3) शहरों और ग्रामीण मार्केट में ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन का मूल्य जरूर प्रभाव डालेगा।

इसके साथ ही हमें यह भी समझने की जरूरत है कि अखबार पढ़ने की आदत, क्रेडिबिलिटी और इंफार्मेशन के कारण एक पाठक वर्ग हमेशा बना रहेगा। इसलिए एक प्रतिष्ठित न्यूजपेपर को ब्रैंड के लाभ को ध्यान में रखते हुए अखबार की कीमत यानी कवर प्राइस को बढ़ाने के साथ ही नई पीढ़ी के ऑडियंस/यूजर्स के लिए ऑनलाइन कंटेंट के मुद्रीकरण पर भी काम करना होगा।   

यही नहीं, निकट भविष्य में जीडीपी ग्रोथ बढ़ने के कारण टियर-दो/टियर-तीन मार्केट में प्रिंट की ग्रोथ बढ़ेगी। इसके अलावा इन मार्केट्स में अखबारों की अपनी भी वैल्यू है। इससे कुछ समय के लिए एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू को थोड़ा बल जरूर मिलेगा, लेकिन यह समग्र लाभ के दृष्टिकोण से पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे में ब्रैंड्स को ऐसे मिक्स प्लान पर काम करना होगा, जिसमें अखबार का कवर मूल्य बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन मॉडल से भी कमाई हो। हालांकि, शुरुआत में समग्र परिदृश्य में ई-पेपर के सबस्क्रिप्शन मॉडल का योगदान इसमें काफी कम होगा, लेकिन तेजी से बदलती हुईं कंज्यूमर्स की आदतों और ई-पेपर व ऑनलाइन कंटेंट की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ भविष्य में बदलाव जरूर होगा।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है: चंदन जायसवाल, डिजिटल एडिटर, नवोदय टाइम्स

कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है।

Last Modified:
Friday, 29 May, 2020
chandan Jaiswal

देश में कोरोनावायरस (COVID-19) का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है। मीडिया इंडस्ट्री पर भी लॉकडाउन के असर से अछूती नहीं रही। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है, लेकिन इसका डिजिटल पर कितना असर पड़ा है। इन्हीं तमाम मुद्दों पर समाचार4मीडिया ने 'नवोदय टाइम्स' के डिजिटल एडिटर चंदन जायसवाल से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

डिजिटल के लिए भी लॉकडाउन का समय पाठकों के लिहाज से सही रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोरोना काल के दौरान डिजिटल किसी और की पीठ पर चल के सफलता की मंजिल पर काबिज हुआ है। पिछले कई वर्षों से देखा जा रहा है कि समाचार को लेकर खास तौर पर यूथ की पसंद में बदलाव आया है और डिजिटल उन्हें यह यकीन दिलाने में सफल रहा है कि यह माध्यम उनके मन मुताबिक है और उनकी जरूरतों को पूरी भी कर रहा है। हां, ये बात जरूर कही जा सकती है कि लॉकडाउन के दौरान लोगों की गतिविधियां कम हुईं और घर में बैठे रहने के दौरान उनका रुख भी डिजिटल की और हुआ इसका असर हमें साइट पर विजिटर्स (व्युअरशिप) की बढ़ी संख्या के रुप में दिखा। समाचारों का विश्वसनीय स्रोत होने के नाते पंजाब केसरी समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी यूजर्स की संख्या बढ़ी है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

लॉकडाउन और कोरोना काल से वैश्विक स्तर पर संकट है और इसका सबसे बुरा असर यदि जिन सेक्टर्स पर देखना पड़ रहा है, उनमें मीडिया भी शामिल है। डिजिटल की बात करें तो इस संकट काल में रेवेन्यू को लेकर कोई खास असर नहीं पड़ा है, क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। हां, कोरोना काल में डिजिटल के पक्ष में एक अच्छी बात जो सामने आई है वो ये है कि कल तक जो इस माध्यम को विज्ञापन देने से हिचक रहे थे, अब तैयार नजर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि आने वाला दिन डिजिटल में रेवेन्यू के लिए बेहतर होने वाला है।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

कोरोना काल में तमाम तरह के झूठ फैलाए गए है। जैसा कि सब जानते हैं कि महज एक अफवाह के डर से दिल्ली-एनसीआर से लेकर गांवों तक तमाम लोगों ने अखबार/ मैगजींस लेना छोड़ दिया है। विज्ञापन शून्य हो जाने से एडिशन निकालना कठिन हो गया है। लेकिन यही अंतिम सत्य नहीं है। हमें इस आपदा को चुनौती के तौर पर लेना है। पहले भी पत्रकारिता चुनौतियों का सामना करती रही है। पंजाब केसरी समूह के चुनौतियों से जुझने और उससे बेहतर तरीके से निपटने का इतिहास रहा है। बुरा दौर है जो निश्चित ही जल्द खत्म होगा। हालांकि इस संकट काल में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है बल्कि पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। भविष्य को लेकर तो अभी कुछ दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन हिचकते हुए ही सही, जिस तरह से विज्ञापन देने वाली कंपनियां डिजिटल की तरफ रुख कर रही हैं...यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है। 

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

देखिए मैंने पहले ही साफ कर दिया है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों ही पत्रकारिता के आयाम तो हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसे पाठक जो कल तक अखबार पढ़ रहे थे कोरोना के बाद डिजिटल की तरफ मुखातिब हो गए हैं और सिर्फ इसलिए ही डिजिटल की गाड़ी चल निकली है। कोरोना के दौरान प्रिंट के सर्कुलेशन गिरने और डिजिटल की रीडरशिप बढ़ने की व्याख्या कुछ लोग ऐसे कर रहे हैं कि लग रहा है कि प्रिंट की 'शहादत' से ही डिजिटल फलाफूला है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

आज से 5-7 साल पहले ही देश में इंटरनेट फ्रेंडली यूजर्स की बढ़ोतरी और समाचार की सभी विधाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर सबसे पहले (कई बार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी पहले) परोस देने की खूबी के कारण डिजिटल ने प्रिंट को पीछे छोड़ दिया था। यही वह दौर था जब अखबार मालिकों ने डिजिटल पर ध्यान देना शुरू किया। इसका मतलब कही से भी यह नहीं निकालना चाहिए कि मैं कह रहा हूं कि प्रिंट आउटडेटेड हो गया। लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि आज का यूथ न्यूज के लिए प्रिंट की ओर नहीं डिजिटल की ओर देखता है। इसका कोरोना काल से कोई संबंध नहीं है। यूथ के हाथ में मोबाइल है, ऑफिस से आते-जाते महज उंगलियों की हलचल से वह दोस्तों से चैटिंग करते-करते टी-20 का स्कोर भी देख लेता है और लेटेस्ट न्यूज भी जान जाता है। न पेज पलटने की समस्या, न स्टेशन आने पर पेपर को समेट कर बैग में रखने का लोचा। ये मैंने डिजिटल की जो खूबियां गिनाई हैं, इन्हें प्रिंट के लिए खतरे के तौर पर मत देखिए। प्रिंट पर जो भी संकट है वह अस्थायी है या फिर जेनेरेशन का है। प्रिंट इन दोनों से बहुत आसानी से निपटने में सक्षम है। हम जब मीडिया में नए-नए आए थे तब से मीडिया पंडित प्रिंट के संकट की भविष्यवाणी कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक के आने के बाद तो उन लोगों ने समय भी बताना शुरू कर दिया था, जबकि हकीकत सबके सामने है।  

 इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, संकट के इस दौर में हमारे समूह के सभी साथी बहुत ही मजबूती और बहादुरी के साथ काम कर रहे हैं। डिजिटल की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी और जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआती दौर में ही सभी साथियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया। पहले हम लोग कंटेंट के लिए शिफ्ट वाइज मीटिंग करते थे, लेकिन अब सभी साथियों के साथ वर्चुअल मीटिंग करते हैं।

शुरुआत से ही हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों को ज्यादा से ज्यादा ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन उपलब्ध करा सकें। इसके लिए हमने टेक्नोलॉजी का यूज करके विशेषज्ञ चिकित्सकों को लाइव कनेक्ट किया और लोगों को कोरोनाकाल की समस्याओं से निजात पाने का उपाय बताया। लॉकडाउन में एंटरटेनमेंट की खबरों के लिए तमाम सेलिब्रिटीज से लाइव कनेक्ट कर उसको फैंस के साथ रूबरू करवाते हैं। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम इसलिए भी आसान रहा कि नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी की टीम 9 राज्यों से काम करती है जिससे डिजिटल टीम को काफी मदद मिली। 

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

मेरे हिसाब से तो मीडिया की दुनिया में बदलाव निश्चित है क्योंकि कोरोना काल इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है। डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में पहला बड़ा बदलाव जो मैं देख पा रहा हूं वह है वर्क फ्रॉम होम। कोरोना काल में यह कार्य संस्कृति एम्प्लॉयी और एम्प्लॉयर दोनों के लिए बेहतर है और यह बदलाव दोनों के लिए ज्यादा व्यापक और अर्थपूर्ण है। पत्रकारों के काम करने का तरीका भी बदलेगा, मसलन किसी का इंटरव्यू करने के लिए टेक्नोलॉजी की सहायता से घर या दफ्तर से बैठे-बैठे उसे कनेक्ट कर लिजिए। इससे समय और मैनपावर दोनों की बचत भी होगी।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

फिलहाल मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है, आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

देखिए, मेरा मानना तो ये है कि ये सब कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे न्यूज पोर्टल्स का मर्ज है। कई लोग प्रोपेगैंडा खबरों के लिए न्यूज पोर्टल्स खोल के बैठे हैं। इसके लिए सरकार को कुछ कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि फेक न्यूज की पोस्टिंग पर लगाम लगाया जा सके। सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ने वालों को भी जागरूक करना होगा कि वे हर किसी ख़बर पर आंख बंद करके भरोसा न करें।

जहां तक हमारा सवाल है तो हम लोग एक बड़े मीडिया हाउस (परम्परागत मीडिया संस्थान) से जुड़े हैं। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी समूह की पाठकों में विश्वसनीयता है। हमारे यहां संपादकीय चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था है जो वैसी खबरों को दूर रखने का काम करती है। हालांकि PV और UV के चक्कर में कई बार उतावलापन हावी होता है लेकिन क्रॉस चेक, फैक्ट चेक जैसे एथिक्स हैं जिसका दामन जितनी मजबूती से कोई संपादकीय टीम पकड़े रहेगी तब तक फेक न्यूज से बचना संभव है। यह कहना आसान है लेकिन डिजिटल मीडिया की 'सबसे पहले' वाली मानसिकता में इसे अमल में लाना उतना ही मुश्किल काम है।

न्यूज टीम के हर सदस्य के लिए भी यह समझने का विषय है कि एक ब्रैंड को तो ऐसी खबरें दागदार करती ही हैं,  खुद पत्रकारों के लिए भी ऐसी खबरों में ट्रैप होना उनके प्रोफेशनलिज़्म पर सवाल उठाता है और भविष्य में उनके सलेक्शन ऑफ न्यूज और न्यूज सेंस को भी खराब करता है।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

BBC हिंदी के एडिटर मुकेश शर्मा ने बताया, महामारी ने किस तरह बदली डिजिटल मीडिया की 'दुनिया'

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है...

Last Modified:
Tuesday, 26 May, 2020
Mukesh-sharma

इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) ने देश-दुनिया में अपना कहर बरपा रखा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। एक तरफ जहां अखबारों का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, वहीं इंडस्ट्री को मिलने वाले विज्ञापनों में काफी कमी आई है। ऐसे में इंडस्ट्री तमाम आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही है। 

हालांकि, कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच टीवी चैनल्स की व्युअरशिप तो बढ़ी है, लेकिन विज्ञापन के मामले में इस व्युअरशिप का लाभ नहीं मिल पा रहा है, वहीं डिजिटल की पहुंच इन दिनों पहले से ज्यादा हुई है। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? क्या तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर को सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे ले जाने की रणनीति रेवेन्यू के लिहाज से कारगर साबित होगी, जैसे तमाम सवालों को लेकर समाचार4मीडिया ने ‘बीबीसी हिंदी’ के एडिटर मुकेश शर्मा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

जहां तक मैंने देखा है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म की रीडरशिप काफी बढ़ गई है। उसका एक कारण यह भी रहा कि इस दौरान लोगों तक अखबार की उपलब्धता भी बाधित हुई। दूसरी बात ये कि घरों में आमतौर पर एक या दो टीवी सेट होते हैं। घर के तो सभी मेंबर लॉकडाउन में फंसे हुए हैं। कहने का मतलब ये है कि टीवी सेट भले ही एक-दो हों, लेकिन घरों में मोबाइल सेट ज्यादा हैं। इस वजह से डिजिटल का उपभोग यानी खपत (Consumption) बढ़ा है। एक मसला ये है कि पहले जो लोग न्यूज में बहुत ज्यादा रुचि नहीं भी रखते थे,उन लोगों ने भी काफी न्यूज देखी। इसका कारण ये है कि यह मुद्दा (महामारी) सीधे-सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा है। ऐसा नहीं है कि यह इलेक्शन का मुद्दा है जिसमें कुछ खास लोगों की रुचि है, या वर्ल्ड कप हो रहा है, जिसका अलग पाठक/दर्शक वर्ग है। चूंकि यह महामारी सभी के स्वास्थ्य से संबंधित है, इसलिए सभी लोग इस बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर कहां पर क्या हो रहा है। हर व्यक्ति इस बारे में अपडेट और इंफॉर्मेशन जानना चाहता है कि आखिर क्या हो रहा है, यह महामारी कंट्रोल में आ रही है अथवा नहीं, संक्रमण कितना फैल रहा है अथवा कोई इलाज मिल पा रहा है अथवा नहीं। ये बातें जानने की सभी में जिज्ञासा थी। इसकी वजह से लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख ज्यादा किया, क्योंकि वे अपडेटेड रहना चाहते हैं। अपडेट्स अथवा नई इंफॉर्मेशन के लिए वे तमाम न्यूज वेबसाइट्स पर जा रहे हैं। कई बार लोगों की किसी खास न्यूज वेबसाइट में रुचि होती है और वह उसी को पढ़ना चाहते हैं, जैसे तमाम लोग किसी एक ही अखबार को ज्यादा पसंद करते हैं और उसी को पढ़ना चाहते हैं। टीवी चैनल्स के बारे में भी आमतौर पर लोग अपनी एक राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार अपने पसंदीदा चैनल को ही देखते हैं। लेकिन इस दौरान तमाम लोगों की वह आदत भी बदली और उन्होंने विभिन्न न्यूज प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया, क्योंकि वह जगह-जगह जाकर देखना, सुनना और पढ़ना चाह रहे थे। कहने का मतलब है कि डिजिटल का इस्तेमाल कुल मिलाकर काफी बढ़ा है और यह डिजिटल के लिए काफी अच्छी बात है। ऐसे में इसने प्रिंट के लिए काफी चुनौतियां भी पेश की हैं। 

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, बीबीसी विज्ञापनों को उस तरीके से बहुत ज्यादा नहीं लेता है, इसलिए बीबीसी के लिहाज से यह कहना थोड़ा मुश्किल काम है, लेकिन अन्य मीडिया प्रतिष्ठानों के लिहाज से देखें तो मसला इस चीज भी जुड़ा था कि लॉकडाउन के दौरान तमाम बिजनेस पर असर पड़ा। इसका प्रभाव विज्ञापन देने वालों पर भी काफी पड़ा। नकदी का काफी संकट है। इस स्थिति में विज्ञापन देने वालों को अपने पैसे का बैलेंस भी देखना है कि वे कितना खर्च कर सकते हैं। चूंकि इस दौरान डिजिटल की ग्रोथ काफी आगे बढ़ी, उसने इस मार्केट में विज्ञापनदाताओं के सामने तमाम अवसर जरूर पैदा किए हैं। तमाम विज्ञापनदाता जो पहले डिजिटल को लेकर सोचते थे कि एक बंडल पैकेज में साथ में हो जाएगा, मुझे लगता है कि आने वाले समय में अब बंडल पैकेज की जगह डिजिटल अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएगा।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

देखिए, तमाम मीडिया हाउसेज सिंगल मीडिया आउटलेट नहीं हैं। कुछ ही ऐसे हैं जो सिर्फ डिजिटल में काम कर रहे हैं। ज्यादातर मीडिया हाउस ऐसे हैं जो प्रिंट में हैं और साथ में उनका डिजिटल चलता है। टेलिविजन चैनल है और साथ में सपोर्टिंग में डिजिटल चलता है। चूंकि इन जगहों पर असर पड़ा है, इसलिए डिजिटल पर भी असर आने की बात देखी गई है। लेकिन केवल डिजिटल की बात करें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महामारी और लॉकडाउन का बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। चूंकि डिजिटल की ग्रोथ काफी हुई है, इसलिए इस पर सबसे कम असर हुआ है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लोग ज्यादा आए, डिजिटल का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा। लोगों ने ज्यादा खबरें पढ़ीं। मीडिया संस्थानों ने भी डिजिटल पर ज्यादा कंटेंट उपलब्ध कराया। कहने का मतलब है कि लॉकडाउन पर डिजिटल का ज्यादा असर नहीं है, लेकिन हर मीडिया हाउस की अपनी जो वित्तीय स्थिति है, वो सब चीजों को प्रभावित करती है। जैसा हमने देखा कि जिस मीडिया हाउस पर इसका जितना प्रभाव पड़ा, उसने उसी हिसाब से अपने यहां अलग-अलग कटौतियां कीं। लेकिन जो सिर्फ डिजिटल के माध्यम हैं, अगर आप उन्हें देखेंगे तो उन्होंने प्रिंट के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया है।     

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

दुनिया के बाकी देशों में जब प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो रहा था तो भारत में अभी भी वह स्थिति नहीं थी। अब कोविड-19 के कारण जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसमें एक ये अलग चीज देखने को मिली है कि हर आयु वर्ग के लोग अब डिजिटल की ओर मुड़े हैं। मुझे लगता है कि लॉकडाउन में प्रिंट पर इसका थोड़ा असर पड़ेगा, क्योंकि पता नहीं कब लॉकडाउन पूरा हटेगा, कब उद्योग-धंधों अथवा विज्ञापनदाताओं की स्थिति थोड़ी बेहतर होगी और कब उनके पास इतना पैसा आएगा कि वे निवेश कर पाएंगे। कहने का मतलब है कि प्रिंट पर थोड़ा असर तो रहने वाला है लेकिन मुझे लगता है कि एक वक्त के बाद जब हालात थोड़े से सामान्य होंगे, तो फिर अखबार और मैगजींस का पुराना समय लौटेगा। लॉकडाउन में जरूर ऐसा हुआ है और स्थिति सामान्य होने में थोड़ा समय जरूर लगेगा, इसके बाद लोगों की प्रिंट की ओर वापसी फिर शुरू होगी।   

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

इस महामारी के दौरान मीडिया आवश्यक सेवाओं में शामिल रहा है। मुझे लगता है कि मीडिया ने बहुत ही मजबूती के साथ और बहुत ही बहादुरी के साथ काम किया। मीडियाकर्मी लगातार घर से बाहर निकल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनके परिवार वाले चिंतित नहीं हैं, लेकिन उनका बाहर निकलना जरूरी भी है, क्योंकि लोगों तक सूचनाएं पहुंचना जरूरी हैं। यह काफी काफी चुनौती वाला रहा। बीबीसी की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी बल्कि जब जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में ये पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआत के दौर में ही यह लागू करना शुरू कर दिया था कि घरों से काम कितना शिफ्ट हो सकता है। एक वक्त ऐसा था जब सामान्य समय में नहीं लगता था कि ऐसा हो सकता है, पर आज ऐसा हो रहा है। डिजिटल का कामकाज वैसे भी घर से करना इसलिए आसान हो जाता है कि यदि कंपनी ने लैपटॉप और जरूरी सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराए हैं तो ज्यादा दिक्कत नहीं आती है और प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनल्स की तुलना में आप डिजिटल का काम घर से आसानी से कर सकते हैं।

हमने उसी स्ट्रैटेजी के तहत शुरू में बैलेंस बनाने की कोशिश की कि मिनिमम और मैक्सिमम कितने लोगों की ऑफिस में रिक्वायरमेंट होगी, जिसे देखकर यहां बाकी सभी लोगों को वर्क फ्रॉम होम करने की इजाजत दे दी गई। हमने यह भी तय किया कि एम्प्लॉयीज हर दिन ना आए, लिहाजा इसके लिए काम के घंटे तय करने की जरूरत पड़ी, तो वह भी किया। बीबीसी में हम लोगों ने पहले तो इस तरह से बैलेंस बनाने की कोशिश की कि कुछ लोग ऑफिस आएं और कुछ लोग घर से ही काम करें और दूसरा यह कि इसमें भी थोड़ा रोटेशन हो सके, तो इसके लिए यह किया कि जो लोग ऑफिस आ रहे हैं, वह कुछ समय बाद घर से काम कर सकें और घर से काम कर रहे एम्प्लॉयीज कुछ समय बाद ऑफिस आ सकें, ताकि सभी में  थोड़ी सी सेंस ऑफ सिक्योरिटी और थोड़ी सी सुरक्षा की भावना रहे। और फिर कार्यालय ने यह भी ध्यान में रखा कि ऑफिस आने के लिए क्या साधन हो सकते हैं, क्या सुविधाएं हो सकती हैं, ताकि एक्सपोजर कम से कम हो सके।

शुरुआती समय में हमने टेक्नोलॉजी को ज्यादा अडॉप्ट किया था। फील्ड में जाना रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा होता है। पर उस समय हमें यह भी समझ में आया कि एक बैलेंस बनाने की जरूरत थी और पहले वह कुछ इस तरह का होना था, जिसमें हमें अपने जर्नलिस्ट और पूरे ऑपरेशन की सेफ्टी भी देखनी थी, लिहाजा हमने न्यूज गैदरिंग के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा ज्यादा से ज्यादा लिया। लोगों से बात करने व इंटरव्यू करने के किए जूम, स्काइप या फिर अन्य माध्यमों का प्रयोग किया, ताकि जर्नलिस्ट सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकें। शुक्रगुजार हैं कि शुरुआती समय में ही हमारे यहां उठाए गए ऐहतियाती कदमों के चलते हमारा कोई भी रिपोर्टर कोरोनावायरस के संक्रमण में नहीं आया और हम अभी भी बचते हुए चल रहे हैं।

फिलहाल अपने पूरे ऑपरेशन के लिए बैलेंस बनाकर चलने की कोशिश करना पहली स्ट्रैटजी थी, जबकि दूसरी स्ट्रैजटी कंटेंट से जुड़ी है। कंटेंट से जुड़े हिस्से में हमको यह समझ में आया कि लोगों को इंफॉर्मेशन जानने की उत्सुकता तो है पर उन्हें क्रेडिबल इंफॉर्मेशन यानी भरोसेमंद सूचनाएं चाहिए। ऐसे समय पर यह बहुत बड़ी रिक्वायरमेंट है और भारत में बीबीसी को लोग एक विश्वसनीय माध्यम की तरह देखते हैं। यदि कोई ऐसी खबर है, जो उसे चेक करनी है तो वह बीबीसी पर चेक करना चाहता है। इसलिए यह जो क्रेडिबिलिटी बीबीसी के साथ जुड़ी हुई है, उसे देखते हुए ही हम चाहते हैं कि ऐसी कोई भी सूचना बीबीसी के जरिए न जाए, जो भरोसेमंद न हो। इसे पहले भी हम ध्यान में रखते थे और अब भी ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं, जब इस समय इसकी जरूरत ज्यादा महसूस की जा रही है। लिहाजा इसके लिए हमने ध्यान रखा कि सिर्फ ग्लोबल लेवल पर एक्सेप्टेड चीजें हो रही हैं, हम उसी को ब्रॉडकास्ट करें। इसके लिए हमने डब्ल्यूएचओ की एडवाइजरी ध्यान में रखी और भी बहुत सारी चीजें ध्यान में रखीं। ऐसा नहीं है कि लोकल गाइडेंस और एडवाइजर्स पर भरोसा नहीं है पर जो चीजें समय की मांग है और ग्लोबल लेवल पर अप्लाई हो रही है, हमने उस पर भरोसा किया ताकि हंड्रेड परसेंट सही सूचनाएं लोगों के पास पहुंचें।

इस पूरे समय में हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों की जो ज्यादा से ज्यादा जिज्ञासाएं हैं, उन्हें शांत किया जा सके। अन्य भारतीय भाषाओं में, जहां भी बीबीसी काम करता है, हमने सब जगह इसी स्ट्रैटेजी के साथ काम किया है। इस दौरान कोरोना से जुड़ी हुई जितनी भी ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन और जितनी जल्दी उन तक सूचनाएं पहुंचाई जा सकें, इस पर कंटेंट के लिहाज से काम किया गया।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है कि हर मीडिया संस्थान  उस स्पाइक को मेंटेन कर लेता है। स्पाइक होता है तो मुझे लगता है कि हर संस्थान में पहले के मुकाबले पाठकों और दर्शकों की संख्या बढ़ गई है। निश्चित रूप से इसमें से कुछ लोग अलग-अलग माध्यमों पर चले जाएंगे, लेकिन इनमें से कुछ लोग रिटेन भी हो जाएंगे। मुझे लगता है कि आने वाले समय में मीडिया संस्थान स्वास्थ्य संबंधी खबरों पर भी ध्यान रखेंगे। अभी तक ऐसा दिख रहा था कि जन स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें पॉलिटिकल की कवरेज के आगे कहीं पीछे छूट जाती थीं, पर मुझे यह लगता है कि अब मीडिया संस्थान के लिए यह लर्निंग का समय है। पब्लिक हेल्थ को लेकर अब हर मीडिया संस्थान को थोड़ा सा ज्यादा काम करना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा लोगों में जागरूकता लानी पड़ेगी, लिहाजा इससे पाठकों में उसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

मुझे लगता है कोविड-19 के खत्म होने के बाद हेल्थ से जुड़ी खबरों पर मीडिया संस्थान फोकस करेंगे, तो वह और लोगों को अपने साथ रोक पाएंगे। हेल्थ से जुड़ी वेबसाइट्स आगे बढ़ेंगी, लेकिन क्रेडिबिलिटी की बात जरूर आएगी। कई बार क्या होता है कि जो खबर आप पढ़ रहे हैं, उस पर आप कितना भरोसा कर रहे हैं, यह कहीं न कहीं निर्भर करेगा उस प्लेटफॉर्म पर भी, कि वह ऑथेंटिक मीडिया ऑर्गेनाइजेशंस है या नहीं। दरअसल, यहां कहना चाहूंगा कि मीडिया संस्थान जब हेल्थ के ऊपर फोकस करेंगे, तो लोग उनकी ओर ज्यादा जाएंगे, बजाय छोटी जगहों के, क्योंकि छोटी जगहों पर थोड़ा सा भरोसे का संकट बना रहता है। लेकिन मैं यह भी नहीं कहूंगा कि लोगों का आंख मूंदकर के बड़े संस्थानों पर भरोसा हो जाता है, लेकिन हां छोटे संस्थानों के मुकाबले बड़े संस्थानों में भरोसा थोड़ा ज्यादा रहता है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

देखिए, बीबीसी एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर है, लिहाजा इस नाते जनता से जो ब्रिटेन में पैसा आता है उससे बीबीसी को फंड मिलता है और उस फंड से ही बीबीसी ब्रॉडकास्टिंग करता है। तो ऐसे में बीबीसी के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू करना मुश्किल है। और वैसे भी बीबीसी दुनिया की 40 से ज्यादा भाषाओं में ब्रॉडकास्ट करता है, इसलिए अचानक से यह फैसला नहीं हो सकता और फिर यह एक जगह किया हुआ फैसला तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। बीबीसी के लिए पे मॉडल के पीछे कंटेंट ले जाना एक बहुत ही बड़ा फैसला होगा, जिसके लिए इस समय ऐसी कोई चर्चा करना मुश्किल है क्योंकि इस समय ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ऑथेंटिक सूचनाएं पहुंचाना बीबीसी की प्राथमिकता है।

देखिए, सबस्क्रिप्शन मॉडल का लागू करना मार्केट-टू-मार्केट पर निर्भर करता है। जैसे उन मार्केट्स में जहां लोगों के पास देने के लिए पैसा है। अब यूएस को देखिए, यहां की पब्लिक के पास ऐसी चीजें अफोर्ड करने के पैसे हैं, लिहाजा यह मॉडल यहां पहले शुरू हुआ। भारत जैसे देश में इस मॉडल को लागू करना आसान काम नहीं है। लोग पब्लिक से फंड की अपेक्षा तो कर सकते हैं, लेकिन पेवॉल के पीछे कंटेंट को ले जाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। या फिर बहुत ही छोटा वर्ग होगा, जिसको आप  टारगेट कर पाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जो अखबार या चैनल है, वे सबस्क्रिप्शन कितने कम पैसे के ऊपर देते हैं, तो ऐसे में डिजिटल को पेवॉल के पीछे ले जाना यह बहुत ही मुश्किल काम होगा और इस समय अर्थव्यवस्था की हालत तो आप देख ही रहे हैं, यह आने वाले समय में शायद और बड़ी चुनौती बन जाए। इसलिए इतना आसान नहीं है इसे लागू कर पाना। लिहाजा बीबीसी भी अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा, क्योंकि एक तो बीबीसी का इतना बड़ा ऑपरेशन है कि अगर कह भी दें कि वह ऐसा कहीं करना भी चाहे, तो बीबीसी को किसी एक मार्केट में देखना पड़ेगा, क्योंकि यूके जैसी मार्केट, जोकि प्राइमरी मार्केट है, वहां तो पहले से ही पब्लिक पैसा दे रही है, फिर वहां कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने से एक विचित्र स्थिति बन जाएगी। बीबीसी के इतने बड़े ऑपरेशन को देखते हुए यह बहुत ही मुश्किल और चुनौती भरा काम होगा। लेकिन पैसे को लेकर जब हर मार्केट में स्थिति एक जैसी है तो, बीबीसी के ऊपर भी प्रेशर होगा, लेकिन पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर होने के नाते बीबीसी के लिए यह इतना आसान नहीं है।

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

आपने देखा होगा कि बीबीसी साइट तो हमेशा से ही फेक न्यूज के खिलाफ पूरी की पूरी रीढ़ है। रियलिटी चेक और फैक्ट चेक के नाम से बीबीसी लगातार चीजें प्रोवाइड कराता है, जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि बीबीसी के साथ एक क्रेडिबिलिटी जुड़ी हुई है, तो हम उसी को और बेहतर कर सकते हैं। पहले भी हम लोगों को गलत खबरों की जांच करके बताते थे, और इस दौरान भी बीबीसी लगातार इस पर ही काम कर रहा है और वह भी दो तरह से। एक तो मेडिकल फील्ड में, जहां आपने देखा होगा कि मेडिकल फील्ड में कुछ ऐसी खबरें आने लगी है कि गर्म पानी पियो तो कोरोनावायरस का प्रभाव नहीं होगा, किसी ने कहा ठंडा पानी पियो तो कोरोना का प्रभाव नहीं होगा, तो किसी ने कहा मौसम बदलेगा तो कोरोना का असर खत्म हो जाएगा। देखिए, हर रोज कभी किसी को लेकर, तो कभी किसी के नाम की फेक चर्चा होने लगती है। बीबीसी ने इस पर बहुत सावधानी से काम किया है। बीबीसी ने लगातार ऐसी हर चीज का फैक्ट चेक करके बताया कि यह सच है या गलत है। आप जो यह बहुत सारे दावे पढ़ रहे हैं यह सच है या गलत। बीबीसी ने इस दौरान खास तौर पर यह काम किया और एक्रॉस द लैंग्वेज किया। इंग्लिश में किया और इन्हीं चीजों को हमने यहां अभी रिप्लिकेट किया। भारत में भी इस दौरान कई तरह की फेक न्यूज फैलीं और हमने उन्हें बस्ट करने का काम किया। वैसे भी बीबीसी फेक न्यूज थोड़ा ज्यादा ही बस्ट करने का काम करता है। इस दौरान भी जिन लोगों के मन में कोई मिथक बन गया है, उसे तोड़ने के लिए बीबीसी ने लगातार खास कंटेंट दिया है।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अमर उजाला के डिजिटल एडिटर जयदीप कर्णिक ने रेवेन्यू बढ़ाने के लिए इस मॉडल पर दिया जोर

देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है

Last Modified:
Saturday, 23 May, 2020
Jaydeep154

देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। ऐसे में पहले ही तमाम परेशानियों से जूझ रही इस इंडस्ट्री के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है। लोग अब डिजिटली अखबार पढ़ रहे हैं। तमाम पब्लिकेशंस भी इन दिनों डिजिटल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर हमने ‘अमर उजाला’ डिजिटल के एडिटर जयदीप कर्णिक से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

लॉकडाउन के दौरान जिस तरह टीवी की व्युअरशिप बढ़ी है, वहीं डिजिटल की व्युअरशिप में भी काफी इजाफा हुआ है। टीवी में सबसे बड़ी तब्दीली ये आई है कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) की तुलना में शुद्ध रूप से न्यूज ज्यादा देखी गई है। टेलिविजन एंटरटेनमेंट में ‘दूरदर्शन’ की व्युअरशिप काफी बढ़ी है। इस चैनल पर पिछले दिनों प्रसारित ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ काफी देखी गई हैं। जहां तक डिजिटल मीडिया की बात करें तो न्यूज वेबसाइट्स में तकरीबन सभी की 30 से 50 प्रतिशत तक रीडरशिप बढ़ी है। दरअसल, लॉकडाउन के चलते तमाम लोग घरों पर हैं। इनमें बच्चे और युवा भी हैं, जो कहीं बाहर खेलने और घूमने नहीं जा पा रहे। ऐसे में डिजिटल में ऑनलाइन गेमिंग में भी काफी इजाफा हुआ है। जो लोग घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) कर रहे हैं, उनके लिए तो ठीक है, लेकिन जिन लोगों का काम घर से बाहर निकलकर ही संभव होता है, जैसे दुकानदार आदि, ऐसे लोगों के लिए घर पर समय काटना काफी मुश्किल है, तो इनमें से ज्यादातर लोग घर पर टीवी देखकर, ऑनलाइन गेमिंग के जरिये या अन्य माध्यमों से अपना समय बिता रहे हैं।

तीसरी बात ये रही कि लॉकडाउन और कोरोनावायरस के खौफ के चलते तमाम सोसायटियों में शुरुआती दौर में अखबार नहीं पहुंच पा रहा था, तो लोगों ने ई-पेपर का सहारा लिया। ऐसे में ई-पेपर की रीडरशिप भी बढ़ी है। इसका कारण यही है कि मान लीजिए कि सुबह किसी ने अखबार पढ़ भी लिया तो भी वह पूरे दिन टीवी के सामने बैठकर समाचार नहीं देख सकता है, लेकिन उसके हाथ में अधिकांश समय मोबाइल होता है। फिर चाहे उसका दफ्तर का काम चल रहा हो या परिवार के साथ बैठा हो, तो मोबाइल पर जब भी नोटिफिकेशन आता है, कोई महत्वपूर्ण सूचना आती है अथवा वॉट्सऐप पर कोई लिंक आ जाता है तो वह उसे क्लिक करता है। हम कह सकते हैं कि कोरोना काल में डिजिटल के पाठकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

कोरोना का डिजिटल मीडिया पर भी काफी फर्क पड़ा है और यहां भी विज्ञापन घटे हैं। देखिए, विज्ञापनदाता कोई भी प्रॉडक्ट बनाता है और उसे मार्केट में बेचता है, जिसके लिए वह विज्ञापन का सहारा लेता है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से कहीं प्रॉडक्शन ही नहीं हो रहा है, तमाम उद्योग-धंधे बंद पड़े हुए हैं। हालांकि, कुछ प्रॉडक्ट्स हैं, जिनकी बिक्री बढ़ी है। किराने के सामान की बिक्री नहीं रुकी है। इसके अलावा पर्सनल हाइजीन की चीजें जैसे-साबुन आदि की मांग भी बढ़ी है। लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं (FMCG), जिनके विज्ञापन टीवी, अखबार और डिजिटल में ज्यादा देखने को मिलते हैं, उनका उत्पादन न होने की वजह से उसका प्रभाव सभी जगह दिखाई दे रहा है। डिजिटल का संकट उससे भी आगे का है, क्योंकि टेलिविजन और अखबार के पास तो फिर भी सीधे विज्ञापन आते थे और विज्ञापन से उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा आता था, लेकिन डिजिटल में ऐसा नहीं है। डिजिटल में पाठकों की संख्या तो बहुत ज्यादा रही है, पाठक अभी भी बढ़े हैं, कहने का मतलब है कि डिजिटल के लिए पाठकों की संख्या कभी संकट का विषय नहीं रहा, डिजिटल के लिए रेवेन्यू का ही संकट रहा है। कोरोना काल के दौरान यह संकट और गहरा हुआ है। हालांकि, इस दिशा में कुछ नई पहल की गई हैं। कुछ के सबस्क्रिप्शन मॉडल शुरू हुए हैं। बड़े-बड़े कई अखबार जो कभी सबस्क्रिप्शन मॉडल (Paywall) के पीछे नहीं गए, वे भी अब ‘पेवॉल’ के पीछे चले गए हैं। हम कह सकते हैं कि विज्ञापन के लिहाज से इस महामारी का प्रभाव सभी मीडिया माध्यमों पर पड़ा है और सभी इससे अपने-अपने हिसाब से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल के लिए यह प्रभाव ज्यादा गहरा इसलिए है क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। डिजिटल में एक बड़ी दिक्कत ये है कि इस प्लेटफॉर्म के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा गूगल और फेसबुक जैसे बड़े प्लेयर लेकर चले जाते हैं, नहीं तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और काफी आगे बढ़ जाते। कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए रेवेन्यू की कमी का मुद्दा और गहरा हुआ है।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

जैसा कि मैंने पहले बताया कि महामारी के इस दौर में भी पाठक संख्या के मामले में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है। पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। अब ज्यादा लोग डिजिटल पर खबरें पढ़ रहे हैं। हालांकि, कोरोना के दौर में तमाम अफवाहें भी चली हैं। यह भी देखने में आया है कि कुछ लोगों ने झूठे और दो-दो साल पुराने विडियो चलाए हैं, खबरें चलाई हैं। लेकिन कहीं न कहीं कोरोना संकट ने लोगों को ये भी समझने-समझाने पर मजबूर किया है कि जो बड़े मीडिया हाउस हैं, उनकी उपस्थिति का क्या महत्व है। उनके पास जो संपादकीय व्यवस्था है, जिससे छनकर खबरें आती हैं, वो इसलिए जरूरी है कि कुछ लोग आप तक झूठी खबरें न पहुंचाएं। देश में जो तथाकथित ‘वॉट्सऐप और फेसबुक यूनिवर्सिटी’ चल रही हैं और जिन पर पिछले कुछ सालों में झूठ का प्रसार तेजी से बढ़ा है, उस पर भी कहीं न कहीं अंकुश लगा है, क्योंकि लोगों को इस कोरोना के समय में सही और शुद्ध खबरें चाहिए। जो बड़े मीडिया हाउसेज हैं, उनकी जो मेहनत थी, उपस्थिति थी, वह मजबूती से दर्ज की गई। लोगों को ट्विटर पर आधिकारिक हैंडल और फेसबुक पर आधिकारिक पेजों का महत्व क्या है, ये समझ में आया। ऐसे में डिजिटल की पाठक संख्या में इजाफा हुआ है।

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

देखिए, खतरे की घंटी तो नहीं कहूंगा मैं इसे, ये सिर्फ कुछ वक्त की बात है, क्योंकि अभी जहां पर कई जगह स्थितियां थोड़ी बेहतर हुई हैं, ग्रीन जोन बढ़े हैं, वहां लोगों के घरों में अखबार फिर पहुंचना शुरू हुआ है। हां, ये जरूर है कि इस दौर में डिजिटल का एक नया पाठक वर्ग जुड़ा है। खास बात ये है कि जो पीढ़ी अखबार के साथ बड़ी हुई है, वो तो अखबार पढ़ने की आदत नहीं छोड़ेगी। नई पीढ़ी ने भी कहीं न कहीं अखबार को अपनाया है। अखबार उन लोगों के लिए भी है जो दिन भर नोटिफिकेशन देखते हैं, वॉट्सऐप देखते हैं, टेलिविजन भी थोड़ा-थोड़ा देखते हैं, लेकिन यदि उन्हें पूरे 24 घंटे का एक समग्र रूप में खबर पढ़ने के लिए प्लेटफॉर्म चाहिए तो वह अखबार ही दे पाता है। कहने का मतलब है कि समग्र रूप में लोगों की खबर पढ़ने की जो प्रवृत्ति है, वह अखबार ही दे पाता है। कहने को तो हम भी दिन भर खबरों के साथ जीते हैं, लेकिन फिर भी सुबह अखबार जरूर पढ़ते हैं। कोई भी आदमी दिन भर की सैकड़ों खबरों को लगातार न देख सकता है, न सुन सकता है और न पढ़ सकता है, फिर चाहे वह इस पेशे में ही क्यों न हो। लेकिन जो लोग इस पेशे में नहीं है, जैसे-मान लीजिए उनके ऑफिस में टीवी नहीं लगा हुआ है, मोबाइल पर भी उन्होंने बीच-बीच में विभिन्न साइट्स पर जाकर जो जरूरी चीजें देखनी थीं, वो देख लीं, लेकिन 24 घंटे में एक बार उन सारी खबरों पर एक बार नजर दौड़ाने की जो आदत बनी हुई है, और उसका अपना महत्व भी है, वो अखबार के अस्तित्व को न केवल जिंदा रहेगी, बल्कि उसको आगे भी बढ़ाएगी। फिलहाल जरूर इसमें कुछ दिक्कत आई है, कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद अखबार इसी तरह बने रहेंगे। 24 घंटे में एक बार खबर को प्राप्त करने की जो व्यक्ति की आदत है अथवा मानसिकता है, वह बनी रहेगी। इस बीच डिजिटल में नए पाठक जुड़ेंगे जो शायद अखबारों से ज्यादा जुड़े रहते थे, वे भी अब डिजिटल पर आए हैं। वो नया पाठक वर्ग डिजिटल के साथ बहुत हद तक बना हुआ है।

पाठक को ये समझ आ गया है कि यदि सुबह मैं अखबार पढ़ूंगा और उसके बाद दिन भर के जो अपडेट हैं, उन्हें टीवी पर या मोबाइल पर देख लूंगा तो पर्याप्त है। दरअसल, सुबह आपने कुछ खबरें देख लीं, उसके बाद शाम को भी टीवी पर थोड़ी देर खबरें देख लीं, सुबह फिर अखबार पढ़ लिया तो जिस व्यक्ति को बहुत ज्यादा खबरें ग्रहण नहीं करनी हैं, उस व्यक्ति के लिए इतना पर्याप्त है। कोरोना ने लोगों को डिजिटल की तरफ इसलिए ज्यादा मोड़ा है, क्योंकि हरेक घंटे में क्या हो जाए, पता नहीं। लोगों को लगता है कि कहीं कोरोना का नया मामला निकल आया, तो वह उनकी बिल्डिंग में या आसपास तो नहीं है। नए रेड जोन जारी हो रहे हैं. नई गाइडलाइंस जारी हो रही हैं। कोई नई अधिसूचना आ रही है, वॉट्सऐप पर तमाम इससे जुड़ीं खबरें आ रही हैं, तो इन चीजों ने डिजिटल को और मजबूत किया है। लोगों को भी यह समझ में आया है कि लगातार उन्हें यदि किसी खबर के बारे में अपडेट चाहिए तो उन्हें डिजिटल से जुड़ना पड़ेगा और यदि खबर का सार चाहिए या किसी खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा पढ़ना है या किसी खबर के बारे में 400-500 या हजार शब्दों में जानकारी चाहिए तो अगले दिन अखबार में पढ़ सकता है। लेकिन लगातार यदि किसी को खबर पढ़नी है या कोरोना को लेकर कोई बड़ा शोध प्रकाशित हुआ है और यदि उसे वह पढ़ना हो तो वह इस प्लेटफॉर्म पर पढ़ सकता है। दूसरी बात ये कि डिजिटल तीनों माध्यमों का समागम है, यानी यहां पर आपको टेक्स्ट पढ़ने को मिल जाता है, फोटो भी मिल जाते हैं और विडियो भी मिल जाते हैं। यह सुविधा अखबार में नहीं मिलती। टीवी पर भी विजुअल ज्यादा होता है और टेक्स्ट कम होता है। डिजिटल माध्यम की खूबसूरती यही है कि यहां पर टेक्स्ट के साथ फोटो गैलरी भी मिलती है, जिसमें आप एक ही घटना की कई तस्वीरें देख सकते हैं। तो कहीं न कहीं, ये सारे मीडियम एक-दूसरे को कॉम्पलिमेंट करते हुए नजर आते हैं।

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, हमने एक तो सबसे पहले इस खतरे को भांपते हुए कई एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए। उस दौरान यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैसे चीन और सिंगापुर में तब तक फैल चुका था, इटली में भी यह पहुंच चुका था। ऐसे में वहां के न्यूजरूम्स ने क्या किया, हम इससे भी लगातार जुड़े रहे। हम इस बारे में लगातार जानकारी लेते रहे। इन सबको देखते हुए अमर उजाला ऐसे शुरुआती चुनिंदा मीडिया हाउसेज में शामिल था, जिन्होंने बहुत जल्दी ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) अपना लिया था और कई साथी वर्क फ्रॉम होम पर चले गए थे। हम लोगों ने 14-15 मार्च से ही उन लोगों को वर्क फ्रॉम होम देना शुरू कर दिया था, जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से या काफी दूर से आते थे। जब तक जनता कर्फ्यू लागू हुआ था, हमारी टीम के बहुत सारे सदस्य घर से काम करना शुरू कर चुके थे। हालांकि, अभी भी कुछ लोग हैं जो ऑफिस आते हैं और ये वो लोग हैं, जिनका काम घर से नहीं हो सकता है, लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम आसान इसलिए रहा कि ऑनलाइन सीएमएस है और हमारी हाइपर लोकल की टीम कानपुर, लखनऊ व आगरा आदि जगहों से काम करती है और उनकी वर्किंग पूरी सेट है तो हमें वर्क फ्रॉम होम से बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं आई। हां, एक जो न्यूज रूम का स्पंदन होता है, न्यूजरूम की आदत होती है, पत्रकारिता में न्यूज रूम का एक जो वाइब्रेशन होता है, ऊर्जा होती है, वो जरूर बहुत से लोगों ने शुरुआत में मिस की, लेकिन धीरे-धीरे ये आदत पड़ गई और ये भी समझ में आ गया कि इस तरह भी आप बड़ी खबरों से, ब्रेकिंग खबरों से जुड़े रह सकते हैं।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

मेरा मानना है कि निश्चित तौर पर बदलाव आएगा। बहुत सारे लोग ऐसे भी विचार कर रहे हैं कि इस वर्क फ्रॉम होम को और कुछ समय तक चलाया जाए। केवल डिजिटल के लोग ही नहीं, बल्कि प्रिंट के लोग भी धीरे-धीरे घर से काम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल, लोगों को समझ आ गया है कि कोरोना इतनी जल्दी खत्म होने वाला है नहीं। ऐसे में ये जो कार्य संस्कृति पनपी है, इसे लोग चलाएंगे। ऐसे भी कई लोग हैं, जिनके पास अपनी बिल्डिंग नहीं है और वे किराए के दफ्तरों से काम चला रहे हैं, इनमें से कुछ तो इस किराए को बचाने की कोशिश करेंगे। मेरा मानना है कि कार्य संस्कृति में तो क्रांतिकारी तब्दीलियां आने वाली हैं और कोरोना से पहले की मीडिया की दुनिया और कोरोना के बाद की मीडिया की दुनिया निश्चित ही अलग होने वाली है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

भरपाई हो न हो, लेकिन सबस्क्रिप्शन मॉडल को सफल होना पड़ेगा, क्योंकि डिजिटल में रेवेन्यू की कमी पहले से ही बहुत ज्यादा चुनौती बनी हुई थी। आज से दो-तीन साल पहले तक जिस बैनर के इम्प्रेशंस के लिए आपको 150-200 रुपए मिल जाया करते थे, उसके अब 20,25 या फिर 50 रुपए मिलने लगे हैं, तो आप ज्यादा पेजव्यू लाकर भी उतना पैसा नहीं कमा पाते हैं, जितना आप पहले कमा लिया करते थे और ये धीरे-धीरे खराब ही हो रहा है, क्योंकि डिजिटल में एंट्री लेवल बहुत ही आसान है। आज कोई भी व्यक्ति दो लैपटॉप लेकर एक वेबसाइट शुरू कर सकता है। एंट्री लेवल की आसानी होने और बहुत सारे प्लेयर्स होने से और बड़ा पैसे का हिस्सा फेसबुक और गूगल के पास जाने से दिक्कतें काफी समय से थीं। जो विदेशों में मॉडल अपनाया गया, जिसकी चर्चा बार-बार होती है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का जो अधिकतर पैसा आ रहा है, वो डिजिटल के सबस्क्रिप्शन से आ रहा है। कई संस्करण को बंद करके उन्होंने डिजिटल कर दिया। भारत में भी पैसे देकर आलेख पढ़ने की संस्कृति विकसित नहीं हुई थी, लेकिन इसके प्रयोग पिछले दो साल से बहुत तेजी से होने लगे थे। खासतौर से मैं कहूंगा कि पिछले साल भर के देश के तमाम पब्लिशर्स सबस्क्रिप्शन मॉडल के बारे में विचार कर रहे थे। लेकिन उस पर काम करने में संकोच कर रहे थे। अमर उजाला ही ऐसा चुनिंदा मीडिया हाउस है, जिसने अपने ई-पेपर को आज से पांच-छह महीने पहले ही सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे डाल दिया था। हम उससे आगे बढ़े हैं। अंग्रेजी में ‘द हिन्दू’ जैसे कुछ एक प्रकाशकों ने पहले ऐसा किया था, लेकिन हम हिंदी के पहले ऐसे डिजिटल मीडिया हाउस हैं, जिसने अपने कंटेंट को पेवॉल) के पीछे डाला है। अगर आप अमर उजाला की वेबसाइट देखेंगे तो अमर उजाला प्रीमियम करके हमने नया सबस्क्रिप्शन मॉडल तैयार किया है। उसको लेने पर आपको वेबसाइट पर दिखाई देने वाले विज्ञापन नहीं दिखेंगे। दरअसल, डिजिटल के रेवेन्यू का सोर्स ही यही विज्ञापन हैं और कई पाठकों की दिक्कत होती है कि उन्हें ये विज्ञापन बोझिल लगते हैं। इसलिए अमर उजाला प्रीमियम से पाठकों को ऐसा अनुभव मिलेगा, जिसमें कोई विज्ञापन नहीं होगा। तो पाठकों को शुद्ध रूप से सामग्री पढ़ने को मिलेगी। समाचार पढ़ने को मिलेंगे, वीडियो देखने को मिलेंगे।

दूसरा, अमर उजाला प्रीमियम के सबस्क्राइबर्स को हम उसी मेंबरशिप में अपना ई-पेपर, जिसे हमने पेड कर रखा है, उपलब्ध कराएंगे और तीसरा, हम कुछ शो आधारित आलेख तैयार करवा रहे हैं, ऐसे आर्टिकल तैयार करवा रहे हैं, जो सिर्फ उन पाठकों को मिलेंगे, जो हमारे अमर उजाला प्रीमियम के सदस्य बनेंगे। तो ये बड़ी पहल हमने एक मीडिया समूह के रूप में की है, जिसको हम लॉन्च कर चुके हैं और इसका रिस्पॉन्स भी हमें बहुत अच्छा मिला है। तो जब आपके पास विज्ञापन से पैसा नहीं आएगा, तो कहीं न कहीं पाठकों को पैसा तो देना पड़ेगा ही।

देखिए, मीडिया इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दिक्कत यही रही है कि इसकी जो इकनॉमिक है, आर्थिक गुणाभाग है, वो खराब रही है, फिर चाहे टेलिविनज चैनल हों, या फिर अखबार हों। दुनिया में ऐसा कौन सा उत्पाद होगा, जो भला अपनी लागत मूल्य से बहुत कम में बिकता हो। आज एक अखबार की कीमत 20-22 रुपए बैठती है, वो 5-6 रुपए में बाजार में बिकता है। टेलिविजन चैनलों के लिए उपभोक्ता सीधे-सीधे पैसे नहीं देते, वो तो बीच में जो डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं, उनका पैसा देते हैं, फिर चाहे, टाटा स्काई हो या फिर एयरटेल हो। इसी तरह से डिजिटल पर भी व्यक्ति कंटेंट को पढ़ने का कोई पैसा नहीं दे रहा है। पैसा तो विज्ञापनों से ही मिल रहा था। आखिरकार कहीं न कहीं आप अच्छी सामग्री पढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पैसा देना पड़ेगा और जब पैसा देंगे तो जो कंटेंट आपको मिलेगा, उसकी गुणवत्ता बेहतर होगी। निरंतर अच्छी सामग्री आपको मिलेगी। क्योंकि उपभोक्ता पैसे देगा तो निश्चित ही न्यूजरूम्स की जवाबदेही बढ़ेगी और लगातार उसको बेहतर कंटेंट उपलब्ध कराना होगा। इसलिए यही मॉडल है, जिसके माध्यम से भविष्य में डिजिटल मालिकों का पैसा बन सकता है। इसलिए अन्य प्रकाशक भी पेवॉल के पीछे गए हैं और अमर उजाला ने भी ये प्रयोग किया है। सबसे पहले प्रयोग करने वाला अमर उजाला ही है। हिंदी प्रकाशन माध्यमों में तो पूरे कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने की जो सबस्क्रिप्शन  की, मेंबरशिप की व्यवस्था शुरू की गई है, उसमें अमर उजाला ने पहल की है, जिसका हमें रिस्पॉन्स भी अच्छा मिल रहा है। हमें लगता है कि अगर विज्ञापन से आय घट रही है तो आपको आय के नए तरीके खोजने पड़ेंगे, जिससे आपकी आय हो सके।   

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

देखिए, कुछ उपाय तो चलन में आ चुके हैं। जैसे कि मैं शुरू में जिक्र कर रहा था लोगों को ये समझना पड़ेगा कि जो एक पारंपरिक मीडिया संस्थान है, उसका महत्व क्या है? वहां पर जो संपादकीय व्यवस्था की छलनी लगी है, वो क्यों लगी है। तो बता दूं कि वो इसलिए ही लगी है, कि इस तरह की झूठी खबरें और अफवाहें बाजार में न फैलें। उससे होने वाले नुकसान बहुत घातक हैं। लड़ाइयां होती हैं, दंगे होते हैं। कहा जाता है कि झूठ के पैर नहीं होते हैं और यह बहुत तेजी से फैलता है। लिहाजा हर कोई व्यक्ति अब फैक्ट चेक भी करने लगा है क्योंकि झूठी खबरों का बाजार इतना गर्म है और इतनी तेजी से फैलता है कि अच्छे-बड़े मीडिया संस्थानों के न्यूजरूम में कई बार गफलत हो जाती है और गलत न्यूज प्रकाशित कर बैठते हैं। तो इसी को लेकर सभी को सामूहिक रूप से प्रयत्न करने पड़ेंगे। हमारी जो पत्रकारिता की बुनियादी शिक्षा है कि आप जब तक उस खबर को एक दो स्रोत से कंफर्म नहीं करेंगे, तब तक प्रकाशित नहीं करेंगे, उसका मजबूती से पालन करना होगा। आपके संवाददाता की भी खबर हो, तो उसे भी क्रॉस चेक कर लिया जाए, एजेंसी की खबरों में भी तथ्यों को जांच लिया जाए। ये जो पुरानी पारम्परिक पत्रकारिता है, उसका माध्यम बदल सकता है। पत्रकारिता के नियम और खबरों की सत्यता जांचने की तकनीक नहीं बदल सकती है। खबर को आपको सत्यापित करके ही प्रकाशित करना होगा, यही काम सारे जवाबदेह मीडिया संस्थानों का होता है और उनको आगे और मजबूती से यह करना होगा, क्योंकि तमाम सोशल मीडिया माध्यमों ने झूठी खबरों को तेजी से फैलाने का काम किया है। जो खबरें आपसी चर्चा में, नुक्कड़ में गप्प बनकर रह जाती थीं, वो अब बहुत तेजी से इधर-उधर फैलने लग जाती हैं। उन पर लगाम लगाने के लिए मीडिया हाउसेज को बेहतर तरीके से व्यवस्था करनी पड़ेगी और लोगों को भी ये जागरूक करना पड़ेगा कि वे किन समाचार माध्यमों पर भरोसा कर सकते हैं और किन पर नहीं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

TOI के सबस्क्रिप्शन मॉडल के पीछे यह रही बड़ी वजह: शिवकुमार सुंदरम

बीसीसीएल की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन बोले, अधिकतर लोग अखबार के प्रिंट संस्करण को देते हैं प्राथमिकता, जबकि ई-पेपर अंतरिम विकल्प है

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
Sivakumar Sundaram

देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (The Times of India) ने पिछले हफ्ते अपने ई-पेपर को पढ़ने के लिए इस पर सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू किया है। यानी अब इस अखबार का ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों को इसे सबस्क्राइब करना होगा, जिसके लिए शुल्क भी चुकाना होगा। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ द्वारा यह फैसला लिए जाने के बाद इंडस्ट्री में यह चर्चा जोरों पर उठने लगी है कि क्या अन्य प्रिंट प्लेयर्स भी इसका अनुसरण करेंगे और गिरते रेवेन्यू को बचाने के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाएंगे। अखबार द्वारा उठाए गए कदम और इंडस्ट्री में चल रहीं इस तरह की चर्चाओं के बीच तमाम सवालों को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ (BCCL) की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने पिछले दिनों सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाने का फैसला लिया है। इसके पीछे क्या कारण रहा, इस बारे में कुछ बताएं

कोरोनावायरस (कोविड-19) ने हमारे जीने के अंदाज और लोगों से संपर्क करने के तरीकों को बदल दिया है। कोरोनावायस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर ही हैं। इस दौरान किए गए तमाम सर्वेक्षणों से पता चला है कि लोगों द्वारा अखबार पढ़ने में बिताए जाने वाले औसत समय में काफी बढ़ोतरी हुई है। हमने नोटिस किया है कि प्रिंट वर्जन को काफी प्राथमिकता मिल रही है, लेकिन महामारी के दौर में कुछ मार्केट्स में डिस्ट्रीब्यूशन संबंधित चुनौतियां सामने आ रही हैं, ऐसे में ई-पेपर/डिजिटल पीडीएफ वर्जन बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है और डिस्ट्रीब्यूशन अस्थायी रूप से उस ओर शिफ्ट हो गया है। महामारी के इस दौर में विश्वसनीय खबरें सिर्फ आवश्यक ही नहीं है, बल्कि इनकी बहुत ज्यादा जरूरत है। लॉकडाउन के कारण हमारे अखबार की डिलीवरी हमारे सभी पाठकों तक सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, ऐसे में हमारी ड्यूटी है कि लोगों तक हम प्रमाणिक खबरें पहुंचाएं। ऐसे में मुफ्त में ई-पेपर उपलब्ध होने पर शरारत करने वाले तत्व समाचारों को डाउनलोड कर उनसे साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं अथवा फेक न्यूज को प्रसारित कर सकते हैं। ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाकर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जो पाठक न्यूज का ऑरिजिनल वर्जन पढ़ना चाहते हैं वे इसकी प्रमाणिकता पर पूरा भरोसा कर सकते हैं।     
इस तरह हम अखबार के डाउनलोड किए गए और फॉरवर्ड किए गए वर्जन की खपत (consumption) को हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि इस नाजुक समय में यह हमारे समाज के लिए भ्रामक और खतरनाक हो सकता है। वॉट्सऐप ग्रुप्स पर जो भी मुफ्त में और फॉरवर्ड होकर मिलता है, उसका कोई महत्व नहीं है। कंटेंट को तैयार करने और उसे सहेजने में हम काफी समय, श्रम और पैसा खर्च करते हैं। ऐसे में अपने ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल को अपनाने के पीछे हमारा मकसद इस प्रयास को प्रदर्शित करना और इसे वह सम्मान देना है, जिसका वह हकदार है।

क्या यह कदम सीधा लॉकडाउन से जुड़ा हुआ है या पहले से ही इसकी तैयारी थी?

यह कदम लॉकडाउन में जरूर उठाया गया है, लेकिन लंबे समय से यह एक अनिवार्यता थी। हमारा मानना है कि अखबार का प्रिंट वर्जन अभी भी सबसे बेहतर है। इसके बाद ई-पेपर का नंबर आता है। अखबारों का प्रिंट संस्करण ऐसी आदत है जो पूरे दिन को एक आकार देती है। यह उन समाचारों का एक क्यूरेटेड फीड है जो हमारे द्वारा रोजाना दुनिया के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी की आवश्यकता को पूरा करता है। हमारा कोई भी मीडिया प्लेटफॉर्म चाहे प्रिंट हो, टीवी हो, आउट ऑफ होम (OOH) हो या रेडियो अथवा डिजिटल हो, उसकी अपनी एक अलग वैल्यू है, अलग अपील है और अपना खुद का बिजनेस मॉडल है। इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने ऑडियंस के लिए अपने कंटेंट को बेहतर तरीके से तैयार किया है और उसके द्वारा ऑडियंस के बीच अपना भरोसा स्थापित किया है। बिना सोचे समझे वॉट्सऐप ग्रुप्स पर ई-पेपर्स को फॉरवर्ड किया जा रहा है। यह भी एक कारण है कि इंडस्ट्री अपने अखबार को सबस्क्रिप्शन मॉडल पर रख रही है और वॉट्सऐप पर ई-पेपर्स को फॉरवर्ड करने को गैरकानूनी बता रही है।     

यह फैसला लॉकडाउन खत्म होने के बाद आपके बिजनेस की गतिशीलता (dynamics) को किस प्रकार बदल देगा?

अपने पाठकों की न्यूज पढ़ने की आदतों के बारे में हमारे द्वारा कराए गए शोध के कई हालिया नतीजों से स्पष्ट पता चलता है कि उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक पाठक अखबार के प्रिंट वर्जन को प्राथमिकता देते हैं। ई-पेपर अंतरिम विकल्प है और मेरा अनुमान है कि लॉकडाउन के बाद परिदृश्य लॉकडाउन के पहले जैसी स्थिति में वापस आ जाएगा।  

भारतीय बाजार के लिए इस सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? इस दिशा में मार्केट की गतिशीलता के बारे में आपको क्या उम्मीद है?

अपने देश में अखबारों समेत विभिन्न मीडिया में सबस्क्रिप्शन मॉडल प्रचलन में रहा है। यह नई बात नहीं है। आगे जाकर संभवत: यह इसी दिशा में आगे बढ़ेगा। अधिकांश न्यूज मीडिया रेवेन्यू के मुख्य सोर्स के रूप में एडवर्टाइजिंग पर भरोसा रखना जारी रखेंगे। एडवर्टाइजर्स के नजरिये से देखें तो अखबार उपभोक्ताओं के प्रोफाइल, तत्काल पहुंच का प्रभाव, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता का अनूठा संयोजन है। यह विस्तृत जानकारी देने का अवसर प्रदान करता है। निकट भविष्य में भी अखबार के ये एडवांटेज बने रहेंगे। मुझे मुझे कोविड-19 के वर्तमान दौर में इस तरह के बदलाव की उम्मीद नहीं है।

इस दृष्टिकोण से निकट भविष्य में और लंबे समय के लिए आप कितने प्रतिशत रेवेन्यू प्राप्त होने की उम्मीद कर रहे हैं?

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि यह कवायद रेवेन्यू जुटाने के मकसद से शुरू नहीं की गई है। रही बात रेवेन्यू  की तो मेरा मानना है कि ई-पेपर का रेवेन्यू अभी और भविष्य में भी मामूली ही रहेगा।

क्या आप इंडस्ट्री से उम्मीद करते हैं कि वह इस बिजनेस मॉडल को सर्वसम्मति से अपनाने के लिए मिलकर एक साथ आए?

यह बिजनेस मॉडल में बदलाव नहीं है। हां, सबस्क्रिप्शन मॉडल पर इंडस्ट्री निश्चित रूप से एक साथ है और मुझे पूरा विश्वास है कि प्रत्येक प्रिंट पब्लिकेशन जल्द ही अपनी योजनाओं की घोषणा करेगा। अधिकांश तो ऐसा कर भी चुके हैं।  

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए