Exclusive: वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल का बेबाक इंटरव्‍यू...

जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल इन दिनों पत्रकारिता के साथ समाजसेवा के कामों में जुटे हुए हैं...

Last Modified:
Monday, 30 July, 2018


समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल इन दिनों पत्रकारिता के साथ समाजसेवा के कामों में जुटे हुए हैं। वे दिल्ली, आगरा, भोपाल समेत देश के कई भागों में कार्य कर रहे वरिष्ठ पत्रकारों के गुरु हैं।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी ब्रज खंडेलवाल आगरा में यमुना की सफाई से लेकर बढ़‍ते प्रदूषण के प्रति भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उनकी पहचान न सिर्फ पत्रकार, बल्कि एक शिक्षक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी है। इनके अलावा और भी कई विशेषताएं उनमें, हैं जो उनके कार्यों और आचरण में दिखाई देती हैं। ब्रज खंडेलवाल हिंदी और अंग्रेजी भाषा, दोनों में समान रूप से मजबूत पकड़ रखते हैं और उनकी धारदार कलम हर विषय पर चलती रहती है।

'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ब्रज खंडेलवाल से उनके परिवार से लेकर करियर के शुरुआती दिनों के अलावा विभिन्‍न विषयों पर बेबाकी से चर्चा की... 

न्‍यूज को लेकर ब्रज खंडेलवाल का मानना है कि आजकल तो ये हो गया है कि न्‍यूज खुद चलकर आपके पास आ रही है। आपको उसमें से छांटना है कि कौन सी न्‍यूज लेनी है अथवा कौन सी नहीं।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

आपने अपने करियर की शुरुआत दिल्‍ली में रिपोर्टिंग से की है और काफी समय तक वहां पत्रकारिता की। इसके बाद आप आगरा शिफ्ट हो गए। आमतौर पर तो लोग छोटे से बड़े शहर की ओर जाते हैं लेकिन आप बड़े से छोटे शहर की ओर आए हैं। क्‍या आपको इस पर कभी अफसोस होता है कि जो निर्णय लिया वो समय के हिसाब से सही था?

ब्रज खंडेलवाल: यह सवाल काफी लोग मुझसे पूछा करते हैं, क्‍योंकि ट्रेंड यही है कि छोटे शहर से बड़े की तरफ जाना। इसका जवाब यही है कि पत्रकारिता को मैंने एक प्रफेशन के रूप में कभी नहीं लिया है। शुरुआत में यह मेरे लिए लड़ाई का एक हथियार थी। समाज को सुधारना, बदलना, कुछ नया करना, समाजवाद लाना आदि काफी बड़े-बड़े सपने थे। उसमें पत्रकारिता को एक हथियार के रूप में इस्‍तेमाल किया। यह काम दिल्‍ली में बैठकर हो नहीं सकता था।

इसके लिए पूरे देश में, गांव में, छोटी जगह में घूमना और वहां के लोगों से बातचीत करना, पढ़ना-लिखना, कार्यक्रमों का हिस्‍सा बनना आदि करना होता था तो छोटा-बड़ा शहर आदि मेरे लिए कोई मुद्दा नहीं था। वैसे दिल्‍ली की लाइफ स्‍टाइल भी मेरे मुताबिक नहीं थी और न ही में वहां के कल्‍चर को आत्‍मसात कर पाया। इसलिए काफी महत्‍वाकांक्षाएं लेकर वापस आए और अपना अखबार शुरू किया। मुझे न तो इसमें कुछ गलत लगा और न ही शिकायत है। अपने जीवन का भरपूर आनंद उठाया है।

दिल्‍ली में आपका सफर कैसा रहा। आपने पत्रकारिता को क्‍यों चुना? दिल्‍ली में कितने साल रहे और क्‍या किया। दिल्‍ली में आपके शुरुआती दिन कैसे रहे, इस बारे में कुछ बताएं ?

ब्रज खंडेलवाल: मुझे स्‍कूल के दिनों से ही लिखने का शौक था। इसके बाद आगरा के सेंट जॉन्‍स कॉलेज में दाखिला लिया। यहां भी लिखते रहे और 'द विंक' (The Wink)  नाम से एक पत्रिका भी लॉन्‍च की, जो काफी लोकप्रिय रही। इसके बाद हमें लगा कि शायद यही हमारी मंजिल है। आज भी उस पत्रिका का प्रकाशन कर रहा हूं।

अभी आपने सेंट जॉन्‍स कॉलेज की पत्रिका 'द विंक' के बारे में बात की। इसके बारे में थोड़ा और विस्‍तार से बताएं ?

ब्रज खंडेलवाल: कॉलेज के दिनों से ही पत्रकारिता में रुचि जागृत हो चुकी थी। अखबार में लिखना, कार्यक्रम-रैलियों की कवरेज करना शुरू कर दिया था और उसके बाद 'द विंक' नाम से 1969-70 में पत्रिका निकाली जो शुरू से ही कैंपस में काफी लोकप्रिय रही। उसके बाद अंग्रेजी से एमए कर लिया। इसके बाद लोगों ने कहा कि पत्रकारिता की भी कुछ पढ़ाई कर लो। हालांकि उन दिनों पत्रकारिता का डिप्‍लोमा या कोर्स आदि कोई करता नहीं था। उस समय मान्‍यता थी कि साहित्‍यकार की तरह पत्रकार भी जन्‍मजात होते हैं और इसमें सीखने की कोई बात नहीं होती है।लेकिन मैंने सोचा कि इसकी पढ़ाई जरूर करनी चाहिए और इसकी गहराई में जाना चाहिए और पूरी तैयारी के साथ इस प्रफेशन में उतरना चाहिए। उन दिनों दिल्‍ली के आईआईएमसी में पढ़ाई करना काफी मुश्किल था क्‍योंकि ज्‍यादातर विदेशी छात्र ही वहां प्रवेश लेते थे। सिर्फ दो-तीन लोग ही हिन्‍दुस्‍तानी होते थे। शुक्र था कि वहां दाखिला मिल गया। साल भर वहां पढ़ाई-लिखाई की और कम्‍युनिकेशन वगैहरा समझा।

उन दिनों हमें 'यूएनआई' के हेड ट्रेवर ट्यूबक एडिटिंग पढ़ाते थे, जिन्‍होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहली बायोग्राफी लिखी थी। उनकी कॉ‍पी एडिटिंग काफी कमाल की थी। बड़े-बड़े लोगों की किताबें उन्‍होंने एडिट की थीं। उन्‍होंने हमारी भी काफी ग्रूमिंग की और एडिटिंग की काफी बारीकियां सिखाईं। सबसे बड़ी बात थी कि बड़ी बातें सरल शब्‍दों में कैसे लिखीं जाए। छोटे-छोटे वाक्‍य बनाए जाएं और उसमें कम्‍युनिकेशन एंगल रहना चाहिए ताकि लोगों को समझ आए। वो बहुत अच्‍छी ट्रेनिंग थी। इसके बाद फिर 1972 में एशिया कप हुआ। उस दौरान एक दैनिक अखबार निकलता था, वहां से काम शुरू किया। उसके बाद तो यूएनआई समेत काफी लंबी लिस्‍ट है एजेंसी-अखबारों की। जब देश में आपातकाल लग गया तो उस समय भी कई अखबारों में काम करते रहे। उस समय अंडरग्राउंड रहकर उदयन शर्मा के साथ काफी लिखा। उसे बांटने के लिए काफी भागदौड़ करते थे। कभी वॉरंट निकल गए तो कभी इधर-उधर भागते रहे। कह सकते हैं कि काफी एडवेंचर था उस समय। आपातकाल जब समाप्‍त हुआ तो राजनारायण का वीकली 'जनसाप्‍ताहिक' के नाम से निकला, जिसके प्रॉडक्‍शन का काम मैंने लिया था। ढाई-तीन साल वह चला। एडिटिंग और छपाई आदि मेरे जिम्‍मे ही थी। वह काफी बेहतरीन व उपयोगी अनुभव था। एक तो हिंदी पत्रकारिता के तौर पर हिंदी को समझने के लिए और डॉक्‍टर लोहिया के विचारों को कायदे से पढ़कर जानने-समझने के लिए बहुत उपयोगी रहा। इसके बाद तो इधर से उधर और उधर से इधर आने-जाने का क्रम चलता रहा। कभी 'पॉय‍नियर', कभी 'दैनिक भास्‍कर', 'स्‍वतंत्र भारत', 'इंडिया टुडे' कभी हिंदी तो कभी अंग्रेजी। कहने का मतलब बहुत लंबी लिस्‍ट है। इतना सफर तय करने के बाद लगा कि वापस अपने शहर में चलना चाहिए। तब तक शादी भी हो गई थी। इसके बाद हमने सोचा कि आगरा वापस चलते हैं और अपना अखबार शुरू करेंगे। इसके बाद अपना प्रिंटिंग प्रेस लगाया। हम दोनों मिलकर रात में छपाई करते थे और सुबह बांटने जाते थे। करीब ढाई-तीन साल तक ऐसा ही चलता रहा। पहले यह 'समीक्षा भारती' नाम से हिंदी में था, फिर इसे अंग्रेजी में किया। इसके बाद अंग्रेजी के साप्ताहिक अखबार 'न्यूजप्रेस' (NewsPress) का प्रकाशन किया, जो अच्छा खासा चला हालांकि बाद में बंद हो गया।

आप अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ बताएं, जैसे आपने दक्षिण भारतीय परिवार में शादी की। इसके बाद आप पत्नी को दिल्‍ली से आगरा ले आए, कैसा रहा ये सफर? 

ब्रज खंडेलवाल: मैं और मेरी पत्नी पद्मिनी हम दोनों एक ही एजेंसी 'नेशनल प्रेस एजेंसी' (NPA) में काम करते थे। उन दिनों भारद्वाज जी उसके मालिक थे। वह 'पीआईबी' से रिटायर हुए थे। वह इंदिरा गांधी के काफी करीब थे। वहां लंबे समय तक काम किया। उस समय दो ही बड़ी एजेंसी 'इन्‍फा' और 'एनपीए' चला करती थीं। एनपीए में काफी बड़े-बड़े लोग जैसे कुलदीप नायर आदि लिखा करते थे। इनके लिखे हुए आर्टिकल्‍स वगैरह की एडिटिंग हम ही किया करते थे। इसके बाद कॉमनवेल्‍थ लंदन की 'जेमिनी न्‍यूज सर्विस' (Gemini news service) के साथ मैं काफी समय तक जुड़ा रहा। मैं उनके लिए फीचर्स आदि लिखा करता था और वह मुझे पूरे भारत में घुमाते रहते थे।

आईआईएमसी को लेकर दिल्‍ली में आपका सफर कितने साल रहा, उसके बाद आप आगरा कब आए?

ब्रज खंडेलवाल : करीब 12-14 साल हम दिल्‍ली में रहे। इसके बाद आगरा आए और फिर दिल्‍ली चले गए और फिर आगरा आ गए। ऐसा काफी समय तक चलता रहा। इसके बाद फाइनली 1990 के आसपास आगरा आ गए। 

आगरा लौटने के बाद किस तरह पत्रकारिता की शुरुआत की?

ब्रज खंडेलवाल: आगरा लौटकर हमने 'समीक्षा भारती' के नाम से जो अखबार लॉन्‍च किया था, वह तो फेल हो गया। कंपोजीटर्स ने हड़ताल कर दी, उस समय पैसे थे नहीं और ये प्रयोग फेल हो गया। अंग्रेजी अखबार शुरू करने का वह समय भी नहीं था और उसका मार्केट भी नहीं था। पहले वह अखबार हिंदी में था लेकिन बाद में उसी नाम से अखबार को अंग्रेजी में कर दिया गया था। हिंदी अखबार साप्‍ताहिक कर दिया था और अंग्रेजी में इसे दैनिक कर दिया था। अब इसे उस समय की मूर्खता कहें या एडवेंचर कि रोजाना चार पेज का अंग्रेजी का अखबार निकालना शुरू किया। उस समय अंग्रेजी का इतना पाठक वर्ग भी यहां नहीं था। हमें लगा था कि अपने शहर में कुछ नया करेंगे। हमें लगा था कि टूरिज्‍म इंडस्‍ट्री इसे सपोर्ट करेगी। हालांकि उन्‍होंने सपोर्ट भी किया। काफी कॉपी खरीदी भी जाती थीं। हर होटल कॉपी खरीदता था क्‍योंकि उसमें डेली इवेंट्स की कवरेज होती थी। उस समय ऑफसेट मशीन गिनती की थीं और यह अखबार लेटरप्रेस पर छपता था। छोटी मशीन थी, उसी पर छापा करते थे कंपोज कराके। दिन भर कंपोजिंग चलती थी। 10-12 लोग रखे गए थे कंपोजिंग के लिए। हालां‍कि नुकसान तो हुआ लेकिन उसका अपना मजा था। इसके बाद 'पॉयनियर' अखबार जॉइन कर लिया। कुछ दिन डेस्‍क पर काम किया फिर लखनऊ से अटैच्‍ड हो गए और वहां चले गए। फिर आगरा आकर ब्‍यूरो संभाला। पहले यह जयपुरिया समूह का था, फिर थापर्स ने खरीद लिया। उस समय विनोद मेहता एडिटर हुआ करते थे। फिर ए.के.भट्टाचार्य आए और उसके बाद चंदन मित्रा ने उसे खरीद लिया। इसके बाद हम दैनिक भास्‍कर में काम करते रहे। फिर तीन-चार साल यहां से 'हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स' में काम किया। इस तरह कभी ये और कभी वो का क्रम लगातार चलता रहा। 1995 में यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू कर दिया था। उसी साल अंग्रेजी वीकली 'न्‍यूजप्रेस' जो उस समय काफी लोकप्रिय था, में जुड़ गए। हालांकि अखबार काफी छोटा था लेकिन टीम बहुत एक्टिव थी।

उस अखबार पर आरोप था कि वह शहर की ब‍ड़ी-बड़ी शख्सियतों का काफी मजाक उड़ाया करता था?

ब्रज खंडेलवाल: वह अखबार टैब्‍लॉयड रूप में था और टैब्‍लॉयड का जो स्‍वरूप होता है, वो उसी स्टाइल में होता था। उसमें काफी खोजपरक रिपोर्ट्स रहती थीं। उस अखबार ने अपनी रिपोर्ट्स से कई लोगों को मुश्किल में भी डाल दिया था। आगरा के बड़े पत्रकार जैसे रामकुमार शर्मा, जमशेद खान व प्रवीण तालान वगैरह जो आज काफी बड़ा नाम हो गए हैं, सब उसी में काम करते थे। हालांकि उस अखबार में मिलता कुछ नहीं था पर पैशन था सभी में। मैं तो उसमें मुफ्त काम करता था। वह अखबार लगभग पांच-छह साल चला और काफी अच्‍छा चला। फिर कुछ गलतफहमी हो गईं और अखबार बंद ही हो गया। हालांकि उसे दोबारा शुरू करने की कोशिश भी की गई लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। लेकिन वह काफी मजेदार और कामयाब प्रयोग था। 'डीएवीपी' से उसे मान्‍यता भी मिल गई थी और विज्ञापन आदि भी मिलने शुरू हो गए थे। उस समय अखबार का सर्कुलेशन दस हजार था। यह 1995 की बात है। यह अखबार मथुरा से छपकर आता था क्‍योंकि वहां की प्रिंटिंग सस्‍ती और अच्‍छी थी। उस दौरान ऑफसेट की ज्‍यादातर मशीनें मथुरा में ही थीं। मथुरा प्रिंटिंग की बहुत बड़ी मंडी है। इस बीच 2002 और 2003 के बीच में देश की बड़ी न्यूज एजेंसी 'आईएएनएस' (IANS) के लिए काम करने लगा। हालांकि आईएएनएस से मैं इमरजेंसी के दिनों से ही जुड़ा हुआ था। उन दिनों गोपाल राजू का साप्‍ताहिक अखबार 'इंडिया एब्रोड' न्‍यूयॉर्क से निकलता था, बाद में उन्‍होंने इसे 'रेडिफ' को बेच दिया। उसके बाद किसी और ने ले लिया। इसके बाद 'इंडिया एब्रोड न्‍यूज सर्विस' बदलकर 'इंडो-एशियन न्‍यूज सर्विस' हो गई। तब से मैं आईएएनएस से जुड़कर पश्चिमी यूपी को कवर करता हूं।

आज यदि आप देखते हैं कि क्‍या खोया और क्‍या पाया। हालांकि लोग कहते हैं कि आपने क्‍या खोया और क्‍या पाया ये समझना मुश्किल है क्‍योंकि न आपने अपना मकान बनाया और न गाड़ी खरीदी। हालांकि ये सही बात है कि आपने सम्‍मान बहुत पाया है लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखें तो उतनी कामयाबी नहीं मिली। आने वाली पीढ़ी यदि आपको देखे तो वह तो कंफ्यूज रहती है कि सम्‍मान तो ठीक है लेकिन पैसा भी बहुत जरूरी है क्‍योंकि संत जीवन जीना बहुत मुश्किल होता है, इस बारे में क्‍या कहेंगे ?

ब्रज खंडेलवाल: मैंने कभी यह सोचकर काम ही नहीं किया कि क्‍या खोना है और क्‍या पाना है। मैं तो बस इसमें खुश रहता हूं कि चलो एक अच्‍छी स्‍टोरी हो गई। बस मेरे लिए बहुत है और यही मेरा पुरस्‍कार है। क्‍या होगा और क्‍या नहीं होगा, मैं इस बारे में ज्‍यादा नहीं सोचता क्‍योंकि मैंने पत्रकारिता को इस रूप में कभी देखा ही नहीं है कि पैसा कमाना है या गलत काम करना है। मैंने जैसा शुरू में कहा था कि यह तो लड़ाई का हथियार है। एक अच्‍छी स्‍टोरी करना समाज को बदलने के यज्ञ में आहुति देने जैसा है। इस यज्ञ में हम जो कर सकते हैं, वह यह है कि अच्‍छे विचार फेंकें। अच्‍छे लोगों से मिलें अैर उन्‍हें हाईलाइट करें। जो चीजें हाईलाइट करने के लिए जरूरी हैं, उन्‍हें उठाएं। इस हिसाब से देखें तो काफी संतोष है और इतना तो मिल ही जाता है, जिससे दाल-रोटी चल रही है। बिना बात के क्‍यों अपने सिद्धांतों से समझौता करें।   

आपने पिछले पांच दशकों से सक्रिय पत्रकारिता की है और देखी है। वर्तमान में पत्रकारिता के सामने क्रेडिबिलिटी की समस्या है, हालांकि यह हर बार रहता है लेकिन पिछले पांच-सात साल से इस पर सवाल ज्‍यादा उठ रहे हैं और तो और सोशल मीडिया को आए हुए अभी कुछ ही समय हुआ है लेकिन उसकी क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में एक पत्रकार के रूप में मीडिया की क्रेडिबिलिटी को आप किस रूप में देखते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल: पहली बात तो यह है कि प्रकृति को बदलाव चाहिए। चीजें अपनी जगह रुकी नहीं रहेंगी। समय और परि‍स्थिति बदलती रहती हैं। लोगों की पसंद-नापसंद बदलती है, उनका नजरिया बदलता है। हमें यह स्‍वीकार करना पड़ेगा। बदलाव हमेशा पॉजीटिव हो, ये भी जरूरी नहीं है। टेक्‍नोलॉजी के कारण पत्रकारिता में तमाम तरह के तत्‍व घुस आए हैं, जिनके संस्‍कार नहीं थे पत्रकारिता के, जिनकी पृष्‍ठभूमि पत्रकारिता की नहीं थी और जिनकी पढ़ाई-लिखाई पत्रकारिता की नहीं हुई, वे भी इसमें आ गए। जिन्‍हें सिर्फ कैमरा पकड़ना आता है, वे भी मैदान में कूद गए। ऐसे लोगों के अंदर पत्रकारिता की बुनियादी बातें भी नहीं हैं। पुराने जमाने में होता था कि पत्रकारिता के लिए कम से कम लिखना तो आना चाहिए लेकिन आज के समय में ये जरूरी नहीं है कि आपको लिखना आता है या नहीं। आजकल कई सारे फ्री प्‍लेटफॉर्म उपलब्‍ध हैं। बस कैमरा घुमाइए और कोई भी चीज हाईलाइट कर लीजिए। यदि आपका आइडिया हिट हो गया तो आपको पहचान मिलेगी और यदि फेल हो गया तो आप उसे दूसरे तरीके से इस्‍तेमाल कर सकते हैं। यदि आजकल की और पुराने समय की पत्रकारिता में बुनियादी अंतर की बात करें तो खास बात ये है कि आजकल के लोग रीडिंग नहीं कर रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई नहीं कर रहे हैं। हमें याद है कि हम काफी पढ़ते थे। काफी साहित्‍य और राजनीति विज्ञान पढ़ते थे। तमाम तरह की किताबें पढ़ते थे और फिर पत्रकारिता की भाषा में कहें कि अखबार को चाटते यानी गहराई से पढ़ते ही थे।

क्‍या आपको लगता है कि आज में समय में कोई ऐसा अखबार बचा है कि जिसे इतनी गहराई से पढ़ा जा सके ?

ब्रज खंडेलवाल : आजकल सभी तरह के अखबार हैं। ऐसा भी नहीं हैं कि सारे अखबार खराब ही हैं। बहुत अच्‍छे अखबार भी हैं। आजकल के दैनिक अखबारों की बात करें तो ज्‍यादातर अच्‍छे ही हैं। प्रजेंटेशन भले ही अलग और आधुनिक हो लेकिन कंटेंट तो ठीक है। संपादकीय पेज भी सभी के बढ़िया ही हैं। भाषा भी अच्‍छी है। दैनिक 'हिन्‍दुस्‍तान' भी काफी अच्‍छे एडिटोरियल दे रहा है। पिछले दिनों नदियों पर उनके संपादक शशि शेखर ने बहुत अच्छा लिखा था। मुझे नहीं लगता कि अखबारों की इतनी गिरावट हुई है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में फर्क दिखाई दे सकता है क्‍योंकि वो शायद बाजार से जुड़ा हुआ है। वो टेक्‍नोलॉजी अलग तरह की है। ये भी कह सकते हैं कि वो मेनस्‍ट्रीम मीडिया का हिस्‍सा माना जाए या न भी माना जाए क्‍योंकि वे सामान्‍यत: एजेंडा आधारित सिद्धांत पर चलते हैं। सुबह ही एक मुद्दा पकड़ लिया और दिन भर उसे खींचते रहो। अब वो समय आ गया है जब प्रिंट का कैरेक्‍टर अलग है, इलेक्‍ट्रॉनिक का अलग है। दोनों में कोई समानता ही नहीं दिखाई दे रही है।  

आप वर्तमान के अखबारों की चर्चा कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ा इश्‍यू भी है कि पहले अखबारों के मुखपृष्‍ठ को काफी महत्‍वपूर्ण माना जाता था। पहली हेडलाइन भी बहुत खास मानी जाती थी। कहा जाता था कि उसे देखकर अखबार भी बिकता था। लेकिन अब जैकेट का कल्‍चर आ गया है। इसमें न तो पहला पेज और न ही हेडलाइन का पता चलता है। कई बार तीन पेज के  जैकेट विज्ञापन होते हैं और उसके बाद चौथा पेज पहला पेज होता है। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

ब्रज खंडेलवाल : ये एक इश्‍यू तो है लेकिन इस ट्रेंड को सही साबित करने के लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका तर्क है कि पहले के पत्रकारों को आखिर मिलता ही क्‍या था। आजकल के पत्रकारों को अच्‍छे अखबारों में अच्‍छी सैलरी समेत कई सुविधाएं मिलती हैं। यानी पहले की तुलना में पत्रकारों के लिए चीजें काफी बेहतर हुई हैं। पहले तनख्‍वाह वगैरह तो कुछ मिलती नहीं थी। ज्‍यादातर लोग तो पैशन के लिए मुफ्त में काम करते थे। उनका हुलिया देखकर ही लग जाता था कि बिल्‍कुल फटेहाल हैं। आज का पत्रकार टेक्‍नोलॉजी में भी काफी आगे है। उसके कपड़े और रहन-सहन भी पहले से बेहतर है। ऐसे में अर्थशास्‍त्र के हिसाब से उसकी जरूरतें कुछ अलग हो गई हैं। इन्‍हीं सब को पूरा करने के लिए इस तरह करना पड़ता है। 

ऐसे में यह सवाल जरूर उठता है कि ये सब करते-करते पाठकों के साथ तो अन्‍याय नहीं हो जाता है, जब चौथा पन्‍ना पहला पेज बन जाता है ?

ब्रज खंडेलवाल : अब इसका कोई कानून तो है नहीं। ये एक परंपरा है। परंपराएं टूट भी सकती हैं, बदल भी सकती हैं और मॉडीफाई भी हो सकती हैं। अभी हमें अटपटा लग रहा है, कुछ दिनों में शायद आदत पड़ जाएगी। दूसरी वजह यह है कि अखबार वालों को भी पता है कि मुखपृष्‍ठ पर जो छप रहा है, वह पहले से ही बासी यानी पुराना हो चुका है और पाठक उस पर निर्भर नहीं है। 

कुल मिलाकर क्या अखबारों से निराश हैंखासकर उनके कंटेंट से। क्‍योंकि अमूमन एक धारणा भी लोगों के बीच बनी हुई है कि अखबार में जो  कुछ अब छप रहा है, वह टीवी सेट करता है या अखबार अब टीवी को फॉलो करते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : मैं निराश नहीं हूं, बस इस बदलाव को स्‍वीकार कर रहा हूं। ये तो ट्रेंड है जो बदलते रहते हैं और समय के साथ बदलना ही चाहिए। पुरानी मान्‍यताएं टूटती या बदलती हैं तो कुछ मिनट झटका लग सकता है लेकिन हमें इन्‍हें स्‍वीकार कर आगे बढ़ना होगा। आप कैसे इस बात को नजरअंदाज कर सकते हैं कि आज का पत्रकार कितने पैसे कमा रहा है। हिंदी अखबारों में काम कर रहे पत्रकारों की सैलरी देख लीजिए, पुराने वालों से तुलना कर लीजिए। मेरे ख्‍याल से इसका तो हमें स्‍वागत करना चाहिए। पहले एक स्‍टोरी का क्‍या मिलता था, महज पांच रुपए। पहले पांच-दस रुपए का मनीऑर्डर आता था, जिस पर हम हंसते थे। मेरा जो विदेशी मीडिया हाउस से पेमेंट आता था वह सामान्‍यत: 50 पाउंड का होता था, जो हजार-1500 रुपए होते थे एक आर्टिकल के, लोग चौंकते थे कि यार हमारी तो एक महीने की सैलरी के बराबर तेरे एक आर्टिकल से ही कमाई हो गई।

हमारे देश में हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में अंतर रहा है। इकनॉमिक्स के मामले में अंग्रेजी हमेशा हिंदी से बेहतर मानी गई है। आप भी कह रहे हैं कि अंग्रेजी अच्‍छे पैसे भी देती थी। क्‍या आपको लग रहा है कि समय के साथ बदलाव आया है या आज भी अंग्रेजी पत्रकारिता ही देश की पॉलिसी तय करती है और अंग्रेजी में ही पत्रकारिता करने वाले इस देश के बड़े पत्रकार माने जाते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : हां, ये एक कड़वी सच्‍चाई है कि हम दोहरी मानसिकता से जूझ रहे हैं। हम हिंदी के गुणगान गाते हैं लेकिन इंडस्‍ट्री की भाषा और कॉमर्स की भाषा, जहां से पैसा आता है, वह अंग्रेजी ही है। आईटी के आने के बाद तो अंग्रेजी और तेजी से बढ़ी है। हालांकि अब ट्रांसलेशन वगैरह मौजूद हैं, लेकिन मानसिकता तो अंग्रेजी की ही बनी हुई है। एक इंडिया है और एक भारत है। इसमें पत्रकारिता ही क्या करे, यह तो पूरे समाज की समस्‍या है। आजकल कौन अपने बच्‍चों को हिंदी स्‍कूल में पढ़ाना चाहता है। हिंदी के पत्रकार हों अथवा संपादक, उनके बच्‍चे भी अंग्रेजी स्‍कूलों के ही पढ़े हुए हैं और पढ़ते भी हैं।

इंडस्‍ट्री इस देश में सबसे ज्‍यादा पैसा देती है, टैक्‍स देती है। बॉलिवुड इंडस्‍ट्री पूरी हिंदी में चलती है लेकिन जब स्क्रिप्‍ट पढ़ते हैं तो अंग्रेजी में पढ़ते हैं। टीवी इंडस्‍ट्री भी पूरी हिंदी बेस है लेकिन इंटरव्‍यू वगैरह सब अंग्रेजी में देते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

ब्रज खंडेलवाल : हमारे लिए तो न अंग्रेजी विदेशी भाषा है और न हिंदी। हमारे लिए दोनों भाषाएं बराबर हैं। हिंदी ही कौन सी ज्‍यादा पुरानी भाषा है। आज के समय में दोनों भाषाओं का ज्ञान होना बहुत जरूरी है और हर पढ़े-लिखे व्‍यक्ति को द्विभाषी होना ही चाहिए। जितनी ज्‍यादा भाषाएं सीखेंगे, उतना अच्‍छा है। कभी लगता है कि हमें तमिल आदि भाषाएं भी सीख लेनी चाहिए थीं। हालांकि इसकी जरूरत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि यदि सीख जाते तो अच्‍छा लगता।

आप वर्तमान में एक पत्रकार भी हैं, आंदोलनकारी भी हैं, समाजशास्त्री भी हैं और पर्यावरणविद् भी हैं। राजनीति में भी आपका दखल रहता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि जब एक पत्रकार ये सब बन जाता है तो वह निष्‍पक्ष नहीं रह पाता है ?  

ब्रज खंडेलवाल : निष्‍पक्षता की बात तो यह है कि जिसके लिए हम काम करते हैं वह अपनी शर्तें रखता है। जो हमें सैलरी देता है वह हमारी स्‍वतंत्रता की सीमाएं तय करता है। हमें कितनी आजादी मिलेगी, हमारी कलम को कितनी आजादी मिलेगी, यह वो तय करेगा जो पैसा देता है। हमारा इसमें व्‍यक्तिगत कुछ नहीं होता है क्‍योंकि न तो हम कॉलम लिखते हैं और न ही एडिटोरियल लिखते हैं। हम तो सिर्फ रिपोर्टर हैं। जीरो ग्राउंड से रिपोर्ट करते हैं और जो आंखों देखा हाल है, वह लिखते हैं। लेकिन यह आपके ऊपर है कि आप किस चीज को हाईलाइट करते हैं। ये भी हो सकता है कि आप रीडर्स के हिसाब से काम करें, क्‍योंकि हिंदी के रीडर्स अलग हैं और अंग्रेजी के अलग, तो उस हिसाब से भी स्‍टोरी हो जाती है।          

जब कोई पत्रकार पत्रकारिता के साथ अन्‍य तमाम चीजें करता है तो कहीं न कहीं उसकी विचारधारा उस तरह की हो जाती है। फिर चाहे वह राजनीति में ही क्यों न हो, कहीं न कहीं उसका प्रभाव पत्रकार की खबरों पर दिखता है। क्‍या एक पत्रकार को ये सब करना चाहिए या सिर्फ पत्रकारिता करनी चाहिए ?

ब्रज खंडेलवाल : यह तो पत्रकार की पसंद की बात है और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। जिस तरह से एक पत्रकार को निचोड़कर रख दिया जाता है, उसके बाद न तो उसमें शक्ति बचती है और न इतना दिमाग बचता है कि वह कुछ और कर पाए। वो अपने घर का ही ख्‍याल रख ले, यही बहुत है। पहली बात तो यह है कि हम इस मामले में इसलिए भाग्‍यशाली हैं कि हमारे पास समय ज्‍यादा है। दूसरी बात ये है कि हम शुरू से ही अन्‍य गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि मेरे एजेंडे में पत्रकारिता एक हथियार है अपने विचारों को फैलाने का। मेरे आदर्श, मेरे सपने आदि जो भी हैं, उनको प्रचारित करने के लिए यह मेरा एक हथियार है। तो मैं इस तरह की बातों का बचाव नहीं करता और पत्रकारिता में अपनी बात कहने का मुझे जो भी अवसर मिलेगा, फिर चाहे वह यमुना का मामला हो, पर्यावरण का हो अथवा अत्‍याचार का हो, मैं पत्रकारिता का पूरा इस्‍तेमाल करता हूं। यानी जब भी इंसानियत के खिलाफ कुछ गलत होगा, मैं उसे नमक-मिर्च लगाकर पूरा बवाल खड़ा करूंगा। यानी यूं कह सकते हैं कि पूरा मसाला बनाकर पेश करूंगा। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता है, क्‍योंकि मैं एक पेशेवर पत्रकार नहीं हूं, इसलिए मुझे इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह मेरा पैशन है और इसके लिए कई विकल्‍पों का त्‍याग भी किया है कि मुझे गलत काम नहीं करना है या इस पर स्‍टोरी नहीं करनी है। मुझे कोई आदेशित नहीं कर पाया कि इसे हाईलाइट करना है, जबकि बाकियों के साथ ऐसा नहीं है। इस बात से मुझे नुकसान भी हुआ और मैंने झेल लिया। ऐसी परिस्थितियों में मैं चुपचाप रहा और बीच का रास्‍ता निकाल लिया लेकिन अपने मन के विपरीत जाकर नहीं किया। ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार होता है।

 देश के कई बड़े संपादकों और पत्रकारों का कहना है कि सोशल मीडिया ही ऐसा मीडिया है जिसका प्रिंट और टेलिविजन मीडिया पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है। कहा जाता है कि यह उसी तरह से है जिस तरह से बंदर के हाथ में उस्‍तरा है, जिसकी कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है। ऐसे में यह स्‍थापित मीडिया संस्‍थानों के लिए कोई चुनौती भी नहीं हैं। लेकिन आप एक ऐसे पत्रकार हैं जो लगातार सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं। कहा जाता है कि सोशल मीडिया पर हर आदमी संपादक और पत्रकार है। ऐसे में सोशल मीडिया और इसकी क्रेडिबिलिटी के बारे में आपका क्‍या कहना है ? 

ब्रज खंडेलवाल : मैंने अपने विचारों के लिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्‍तेमाल किया है। आजकल तो प्रत्‍येक मीडिया की क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया के आने से बहुत सी चीजें बदली हैं। पहले नियंत्रण मालिकों के हाथ में रहता था। वनवे ट्रैफिक रहता था। एक एडिटर ने जो परोस दिया वह आपको स्‍वीकार करना है। रीडर को न कोई सुविधा थी और न अधिकार कि वह उस पर प्रतिक्रिया दे लेकिन अब सब एक ही मैदान में है। सामने से कुछ आता है तो हम भी अपनी तरह से शुरू हो जाते हैं, यानी चीजें बराबर कर देते हैं। किसी ने गलत खबर लिख दी है तो उसे बैलेंस करने का यह अच्‍छा तरीका है। सोशल मीडिया पर स्‍टोरी भी ब्रेक हो रही हैं। अब सारा नियंत्रण पाठकों के हाथों में है। ऐसे में जो एकाधिकार बना हुआ था और मठाधीशी थी, वह खत्‍म हो रही है, जो मेरी नजर में अच्‍छी बात है यह जरूरी भी था।

वामपंथी होने के बावजूद आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी करते हैं?

ब्रज खंडेलवाल : ऐसा नहीं हैं। मै मोदी की तारीफ नहीं बल्कि नीतियों की तारीफ करता हूं और देशहित में नीतियों की तारीफ करनी भी चाहिए। कभी-कभी इन नीतियों का लाभ किसी व्‍यक्ति को भी मिल जाता है, इसलिए मोदी को इनका लाभ मिलता है। जहां पर जरूरी है तो मैं मोदी की खिंचाई भी करता हूं।

सुना है एक बार आप चुनाव भी लड़े हैं?

ब्रज खंडेलवाल : यह सही बात है। वर्ष 1993 में मैंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा था। हालंकि मैं उसमें हार गया था, मुझे सिर्फ तीन-चार सौ वोट मिले थे। 

क्‍या आपको लग रहा था कि यदि आप चुनाव जीत जाते हैं तो राजनेता हो जाएंगे?

ब्रज खंडेलवाल : ऐसी बात नहीं है। दरअसल मुझे एक प्रोजेक्‍ट करना था भारतीय निर्वाचन प्रणाली के बारे में। मैंने सोचा कि जगह-जगह जाकर पूछूं कि क्‍या होता है और कैसे होता है, इससे अच्‍छा तो यह है कि खुद ही चुनाव लड़ लो। पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कि कागजात कैसे तैयार होते हैं और जमा होते हैं। कैसे शपथ ली जाती है आदि के बारे में जानने के लिए ही मैंने चुनाव लड़ा और काफी अच्‍छी समझ हो गई।

आपने काफी सहजता से स्‍वीकार किया है कि आप वामपंथी हैं लेकिन आप देख रहे हैं कि देश में वामपंथ खत्‍म होता जा रहा है। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि ऐसा क्‍यों होता जा रहा है?

ब्रज खंडेलवाल : लेफ्ट यानी वामपंथ काफी व्‍यापक है। लोगों के दिमाग में सिर्फ कम्‍युनिस्‍टों के बारे में सोच है। पार्टी अथवा संगठन भले ही खत्‍म हो जाएं लेकिन विचारधारा के स्‍तर पर वैचारिक स्‍वतंत्रता और समानता की जो मूल भावना है, वह बुनियादी है। यानी कोई बड़ा-छोटा नहीं है, कोई अमीर-गरीब नहीं है और सब बराबर हैं। ये सब मुद्दे खत्‍म होने वाले नहीं हैं।  

आप जिन मुद्दों की बात कर रहे हैं, वे तो दक्षिणपंथी भी उठाते हैं?

ब्रज खंडेलवाल : मेरी नजर में दक्षिणपंथी (राइट) का मतलब पूंजीवादी प्रक्रिया है। वे बोलते क्‍या हैं, ये सब छोड़ो। वे लोग यथास्थितिवादी के पुजारी हैं। वे बदलाव के विरोधी हैं और किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते हैं। वे तो जातिवाद के भी हिमायती हैं, भले ही वे कुछ भी बोल लें। उनमें सामंतवाद विचारधारा भी है, भेदभाव भी है और छुआछूत भी है। लेकिन हम इन सबके खिलाफ हैं। शायद यही कारण रहा कि मैंने अपनी जाति बिरादरी में शादी भी नहीं की। वामपंथ से प्रभावित होने के कारण हमने समाज में फैली कई रुढि़वादियों का विरोध किया। 

प्रिंट मीडिया की बात करें तो कई वर्षों से सिर्फ आठ या दस बड़े अखबार ही हैं और वे ही चलते हैं। अब हर एक-दो साल में अखबार शुरू होते हैं और थोड़े समय बाद ही बंद हो जाते हैं। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि देश में यही गिने चुने आठ-दस अखबार ही हैं और बाकियों के लिए कोई स्‍कोप नहीं?   

ब्रज खंडेलवाल : सिर्फ अपने देश की बात ही नहीं है, यह तो पश्चिमी देशों में भी हुआ है। तमाम पत्रिकाएं बंद हो गईं और अखबारों का सर्कुलेशन कम हो गया। अखबारों का सर्कुलेशन कम हो जाए या बंद हो जाए, यह कोई चिंता की बात नहीं है।

कहने का मतलब यह है कि हमारे यहां प्रतिष्ठित अखबार बंद नहीं होते बल्कि जो नया वेंचर आता है, वह थोड़े समय में बंद हो जाता है। पिछले दस साल की बात करें तो शहर में आठ-दस नए वेंचर शुरू हुए लेकिन सब बंद हो गए। इसके बारे में आपका क्‍या सोचते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : यह तो एक प्रक्रिया है कि अखबार खुलते हैं और बंद होते हैं। पांच-छह अखबारों से ज्‍यादा की जरूरत ही क्‍या है।  

ऐसे में सवाल उठता है कि जब पांच-छह अखबारों से ज्‍यादा की जरूरत नहीं है तो आजकल प्रदेश में 400 से ज्‍यादा जर्नलिज्‍म इंस्‍टीट्यूट खुल गए हैं, जिनसे पढ़कर हजारों छात्र-छात्राएं बाहर निकलते हैं तो फिर वे कहां जाएंगे और उन्‍हें कहां नौकरी मिलेगी?

ब्रज खंडेलवाल : बाकी मीडिया को आप क्‍यों भूल जाते हैं, जो काफी आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम चैनल भी तो हैं।  

लेकिन इतने चैनल भी कहां हैं। दस साल पहले मुख्‍य तौर पर जो चैनल थे, वही आठ-दस चैनल आज भी सही चल रहे हैं जबकि बाकी खुलते हैं और कुछ समय बाद ही बंद हो जाते हैं। बाकी जो चल भी रहे हैं, उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहतर नहीं है। वहां पता ही नहीं रहता है कि सैलरी मिलेगी भी अथवा नहीं। जबकि आईटी और मैनेजमेंट के साथ ऐसा नहीं हैं। इनकी हजारों कंपनियां हैं, जिनमें पता है कि नए छात्र-छात्राएं पढ़ाई पूरी कर खप जाएंगे। आप तो मीडिया को काफी समय से देख रहे हैं। इस दौरान मीडिया उस तेजी से आगे नहीं बढ़ा है, जितना बढ़ना चाहिए था? 

ब्रज खंडेलवाल : ऐसी बात नहीं है। इतने वर्षों में मीडिया काफी बढ़ा है। कई नए प्‍लेटफॉर्म्‍स आ गए हैं। सूचना का प्रवाह भी काफी बढ़ा है। आजकल स्‍मार्टफोन के रूप में मीडिया में एक बड़ा हथियार आ गया है। न्‍यूज का इस्‍तेमाल ओर उसका प्रवाह काफी तेजी से बढ़ा है। रही बात छात्रों की संख्‍या और रोजगार के अवसरों की तो इसमें पढ़ाई-लिखाई करना काफी आसान है। आप साधारण तरीके से एक डिप्‍लोमा या डिग्री पूरी कर लेते हैं और अखबार में लग जाते हैं जबकि अन्‍य कोर्सों जैसे वकालत की ही बात करें तो वहां कितनी ज्‍यादा पढ़ाई करनी होती है। डॉक्‍टर की ही बात करें तो पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप में भी कितनी कड़ी मेहनत लगती है लेकिन अखबारों में तो इस तरह का कुछ होता नहीं है। करेसपॉडेंस कोर्स करके भी आप इसमें आ सकते हैं। इसमें सबसे ज्‍यादा मुश्किल पढ़ाई लिखाई यानी सेल्‍फ स्‍टडी बहुत मायने रखती है, जो आजकल अधिकार छात्र-छात्राएं करते नहीं हैं। जो इस प्रफेशन के प्रति बहुत ज्‍यादा गंभीर होते हैं, वे वास्‍तव में पढ़ाई-लिखाई बहुत करते हैं। उनका सामान्‍य ज्ञान भी बहुत बेहतर होता है। इन लोगों की भाषा भी काफी अच्‍छी होती है। हालांकि ऐसे लोग चुनिंदा होते हैं और देर-सवेर वे कहीं न कहीं नौकरी पा ही जाते हैं। बाकी जो भीड़ बचती है, वह कैमरा लेकर घूम रही है। आजकल तो काफी यूट्यूब चैनल खुल गए हैं। पहले जिस तरह ग‍ली-मोहल्‍लों में कुकरमुत्‍तों की तरह अखबार खुले होते थे, आज उनकी जगह यूट्यूब चैनल खुल गए हैं। ऐसे कई लोग खुद को पत्रकार कहते तो हैं, लेकिन इनमें पत्रकारिता के कितने गुण हैं, यह देखने की बात है।  

आजकल डिजिटल मीडिया का दौर है और इस नई सरकार में डिजिटल मीडिया पर काफी कुछ हुआ है लेकिन हम डिजिटल मीडिया के रेगुलेशन की बात करें तो कई नई वेबसाइट खुलीं लेकिन तमाम बंद हो रहीं हैं क्‍योंकि इसमें रेवेन्‍यू का कोई मॉडल तय नहीं है। आज भी उस हिसाब से पैसा नहीं आ रहा है, जिस हिसाब से आना चाहिए। 'एनडीटीवी' को छोड़ दें तो कोई भी बड़ा ऑर्गनाइजेशन डिजिटल से उतना रेवेन्‍यू नहीं जुटा पाता है, जितना जुटना चाहिए। हालांकि एनडीटीवी का प्रॉफिट टीवी के मुकाबले डिजिटल से ज्‍यादा रहता है क्‍योंकि उसका टीवी नुकसान में रहता है। ऐसे में आपको क्‍या दिखता है यह बुलबुला टाइप है जो एक दिन फूट जाएगा। क्‍योंकि अभी इसमें सिर्फ इंवेस्‍टर है, जबकि इसमें आ क्‍या रहा है यह अभी तय नहीं है। आखिर इंडस्‍ट्री में रेवेन्‍यू मॉडल तो होना ही चाहिए। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ? 

ब्रज खंडेलवाल : यदि बुलबुले फूट जाएंगे तो फूट जाएं, इसमें आखिर मुश्किल क्‍या है। दरअसल, टेक्‍नोलॉजी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इस बारे में बहुत ज्‍यादा अनुमान लगाना मुश्किल है कि कल क्‍या होगा।  

कहने का मतलब है कि आपने प्रिंट, टीवी और रेडियो इंडस्‍ट्री देखी है। वहां एक रेवेन्‍यू मॉडल है। वहां पैसे का टर्नओवर होता है और पैसा आता भी है। आपका इस बारे में क्‍या कहना है कि क्‍या डिजिटल ऐसा हो पाएगा ? 

ब्रज खंडेलवाल : मुझे इसकी ज्यादा जानकारी नहीं है। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि इंफॉर्मेशन के लिए जबरदस्‍त भूख है और इसे तैयार करने की ग्रोथ हजारों गुना हुई है। जब इंफॉर्मेशन तैयार हो रही है तो उसके लिए नेटवर्क भी होगा और सप्‍लायर्स भी होंगे यानी सब चीजें होंगी। पत्रकारिता के लिए यह महत्वपूर्ण है कि लोगों में जानने की इच्‍छा है या नहीं है। वो इंफॉर्मेशन चाहते हैं अथवा नहीं। अब कौन आएगा, कौन जाएगा और कितना कमाएगा, यह सब बहुत कारणों पर निर्भर करता है।    

बतौर शिक्षक आप 'केएमआई' में पढ़ाते थे, अब केंद्रीय हिंदी संस्‍थान में पढ़ाते हैं। ऐसे में एक शिक्षक के तौर पर आप पत्रकारिता के उन नए छात्रों के बारे में क्‍या देखते हैं कि वे क्‍यों आ रहे हैं, किस पृष्‍ठभूमि से आ रहे हैं। हमें लगता है कि इसमें तमाम लोग वे भी आ जाते हैं जिन्‍हें पत्रकार नहीं भी बनना होता है, बस उन्हें डिग्री चाहिए होती है। दूसरा सवाल ये है कि जब वे पढ़ाई पूरी कर जाते हैं तो उनकी नियुक्ति किस प्रकार होती है। इसमें कितना प्रतिशत होता है और तीसरा ये कि जब आपके पुराने शिष्‍य आपको मिलते हैं तो आप कैसा महसूस करते हैं ? 

ब्रज खंडेलवाल : पहली बात तो यह है कि हम जो डिप्‍लोमा आदि करा रहे हैं, उसका सीमि‍त उद्देश्‍य नहीं है कि वह सिर्फ मीडिया में जाएं। वे अच्‍छे इंसान बनें, उनके कम्‍युनिकेशन स्किल्‍स अच्‍छे हों। आजकल बहुत सारे लोग आ रहे हैं, जो पहले से ही कहीं काम कर रहे हैं। ऐसे लोग सिर्फ अपने कम्‍युनिकेशन में धार देने के लिए जर्नलिज्‍म का डिप्‍लोमा कर रहे हैं। पब्लिक रिलेशन में उनके लिए काफी संभावनाएं हैं और वे लोग हो भी रहे हैं। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो कंप्‍टीशन की तैयारी में लगे हुए हैं। उन्‍होंने बताया है कि यह डिप्‍लोमा करने के बाद उनकी लेखन शैली बहुत अच्‍छी हुई है। इंटरव्‍यू का सामना करने में भी आसानी हुई है। तो इसे सिर्फ मीडिया में रोजगार से ही जोड़कर नहीं देख सकते हैं। ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद है कि जब मैंने अपनी एक छात्रा से पूछा कि तुम्‍हारी तो शादी हो जाएगी तुम इस डिप्‍लोमा का क्‍या करोगी तो उसका खुलकर कहना था कि हम तो इसे फ्रेम करके लगाएंगे, सास इससे ही बहुत डर जाएगी। एक और लड़की का कहना है कि हमारे ससुराल वाले तो बहुत डरे रहते हैं कि उनकी बहू पत्रकार बनकर आ रही है, पता नहीं क्‍या करेगी। यह पुराने जमाने में होता था जब मैं केएमआई में था कि हर किसी को मीडिया में ही जाना है लेकिन अब यह फोकस बिल्‍कुल बदल गया है। केंद्रीय हिंदी संस्‍थान का तो बिल्‍कुल ही बदला हुआ है। वहां कई सारे शिक्षक हैं, शिक्षामित्र हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले भी हैं। हर तरह के छात्र-छात्राएं हैं। कई तो शुरू में ही बता देते हैं कि हमें मीडिया में नहीं जाना है। सिर्फ दो-चार ही होते हैं जो कैमरा लेकर इधर-उधर घूमने के लिए तैयार हैं। नौकरी न लगे तो कुछ दिन करने के बाद वे भी खिसक जाते हैं। कहने का मतलब है कि यह अब सामान्‍य तौर पर वैल्‍यू एडिशन वाला कोर्स बन चुका है। किसी और कोर्स जैसे एमबीए आदि के साथ यह कोर्स कर लिया तो आपको आगे तरक्‍की में काफी संभावनाएं हो जाती हैं।    

आजकल एक नया कॉन्‍सेप्‍ट ईवेंट जर्नलिज्‍म का चल रहा है। इसमें तमाम पत्रकार पब्लिक रिलेशन कर रहे हैं। ईवेंट कर रहे हैं। उस पर तीखे कमेंट भी होते हैं। आपको क्‍या लगता है कि ईवेंट जर्नलिज्‍म ठीक नहीं है या पत्रकार अगर नौकरी छोड़कर पीआर बन रहा है तो आपको क्‍या आपत्ति है। क्‍या आपका मानना है कि ईवेंट जर्नलिज्‍म की वजह से जर्नलिज्‍म को खास नुकसान नहीं हो रहा है ? 

ब्रज खंडेलवाल : यह तो उसकी स्‍वतंत्रता है कि वह जो मन में आए, करे। ईवेंट्स अब मीडिया का हिस्‍सा बन चुके हैं। ऐसे में यदि वह नहीं करेगा तो कोई और करेगा। यह पीआर, प्रमोशन और बिजनेस स्‍ट्रेटजी का हिस्‍सा है। इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती है। अगर यह सार्वजनिक रूप से हो रहा है तो कोई दिक्‍कत नहीं है। यह पारदर्शी होना चाहिए, इसमें कुछ छिपा नहीं होना चाहिए। सभी लोग कोई भी काम करने के लिए स्‍वतंत्र हैं।  

इसमें एक समस्‍या यह होती है कि तमाम ईवेंट्स में जो मंचासीन लोग होते हैं, इनमें से कर्इ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं पर भी मंच पर बैठने लायक नहीं होते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? 

ब्रज खंडेलवाल : यह मीडिया का प्रॉब्‍लम नहीं है, यह तो समाज का प्रॉब्लम है। समाज में घटिया लोग भी होते हैं।  

हमारा मानना है कि मीडिया बहुत स्‍ट्रॉंग है, वह इन सब चीजों को चेक करेगा। मीडिया छापता भी है और मीडिया के लोग पीआर बनकर वह ईवेंट भी करते हैं। इस बारे में कुछ बताएं? 

ब्रज खंडेलवाल : चूंकि इस तरह के लोग फाइनेंस करते हैं तो एक तरह से वह उस मीडिया में स्‍पेस खरीद लेते हैं। आखिर पीआर क्‍या होता है, अनपेड पब्लिसिटी। आमतौर पर होता यही है कि यदि सीधे विज्ञापन के पैसे नहीं दे रहे हो तो घुमाकर दे दो इस तरह प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करके।

पिछले दो दशक से आप पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। क्‍या आपके छात्र किसी जगह पर पहुंचे हैं या आगरा से बाहर सेट हो गए हैं। आज जब आपको अपने पुराने छात्र मिलते हैं तो आपको कैसा लगता है कि आपने शिक्षक के तौर पर जो यह शुरुआत की है, उसमें भी आपने कामयाबी पाई है? 

ब्रज खंडेलवाल : मुझे ऐसे बहुत सारे लोग मिलते रहते हैं। इनमें जो पत्रकार बन गए, वे अच्‍छा कर रहे हैं। जो पत्रकार नहीं बन पाए, वे जिस फील्‍ड में भी हैं अच्‍छा कर रहे हैं। इनमें से कई डॉक्‍टर्स भी हैं, जिन्‍होंने पत्रकारिता भी की है और अब अच्‍छे डॉक्‍टर के रूप में काम कर रहे हैं। इनमें एक पुलकित है, दूसरा राजकुमार है। ये दोनों नाम तो मुझे याद हैं। एक लेखपाल बन गया है जौनपुर में कहीं पर। कहने का मतलब है कि हम सिर्फ मीडिया टेक्‍निक ही नहीं सिखाते हैं, बल्कि छात्र के सर्वांगीण विकास पर ध्‍यान देते हैं। 

सुना है कि आपके एक पुराने स्‍टूडेंट पत्रकारिता के बाद रेलवे में चले गए लेकिन सरकारी नौकरी छोड़कर फिर वे पत्रकारिता में आ गए। जबकि आजकल ज्‍यादातर पत्रकार पीआरओ बनना चाहते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? 

ब्रज खंडेलवाल : यह बात सही है। दरअसल, उसे लगा कि रेलवे की नौकरी में उसे वह संतुष्टि नहीं मिलेगी। हालांकि मैंने उसे समझाया भी था कि यहां तनाव और अनिश्चितता रहेगी लेकिन उसका कहना था कि मैं ये सब झेल लूंगा। इसके बाद फिर मैंने कहा कि यदि तुम यही चाहते हो तो ठीक है, आ जाओ। 

 

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Lava के MD सुनील रैना बोले: सिर्फ फीचर्स व कीमत से नहीं, भरोसे से बनता है बड़ा ब्रैंड

'एक्सचेंज4मीडिया' को दिए एक इंटरव्यू में सुनील रैना ने बताया कि Lava ने अपनी रणनीति बदलकर ग्राहक अनुभव (Customer Experience), भरोसे (Trust) और लंबे समय तक मजबूत ब्रैंड बनाने पर फोकस किया।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 29 June, 2026
Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
Sunil874

रुहैल अमीन, सीनियर स्पेशल कॉरेस्पोडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारतीय स्मार्टफोन कंपनी Lava International के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील रैना का मानना है कि भारत की स्मार्टफोन इंडस्ट्री कई सालों तक गलत तरह की प्रतिस्पर्धा करती रही। कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए सिर्फ फोन के फीचर्स, स्पेसिफिकेशन और भारी छूट (Discount) पर ध्यान देती रहीं, जबकि असली जरूरत ग्राहकों का भरोसा जीतने और उन्हें बेहतर अनुभव देने की थी।

'एक्सचेंज4मीडिया' को दिए एक इंटरव्यू में सुनील रैना ने बताया कि उन्होंने Lava की रणनीति बदल दी। अब कंपनी का फोकस सिर्फ ज्यादा फोन बेचने पर नहीं, बल्कि ग्राहकों को अच्छा अनुभव देने, ईमानदारी के साथ काम करने और लंबे समय तक मजबूत ब्रैंड बनाने पर है।

उन्होंने यह भी बताया कि आज Lava की सबसे बड़ी ताकत ग्राहकों का भरोसा है। साथ ही, टेक क्रिएटर्स (जैसे टेक यूट्यूबर्स और टेक रिव्युअर्स) ने कंपनी की विश्वसनीयता दोबारा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका यह भी मानना है कि असली मार्केटिंग फोन बेचने पर खत्म नहीं होती, बल्कि ग्राहक के फोन खरीदने के बाद शुरू होती है। अगर ग्राहक को अच्छा अनुभव मिलता है, तो वही आगे चलकर ब्रैंड का सबसे बड़ा प्रचारक बन जाता है।

आज स्मार्टफोन इंडस्ट्री में ज्यादातर कंपनियां फीचर्स और कम कीमत के दम पर ग्राहकों को आकर्षित करने की कोशिश करती हैं, लेकिन Lava ने इससे अलग रास्ता क्यों चुना?

साल 2017-18 के आसपास जब कंपनी मुश्किल दौर से गुजर रही थी, तब हमने खुद से एक सीधा सवाल पूछा कि आखिर हम संघर्ष क्यों कर रहे हैं और कई दूसरी मोबाइल कंपनियां बाजार से क्यों गायब हो गईं। लिहाजा, हमने तय किया कि हमें इस बिजनेस से बाहर नहीं जाना है। लेकिन सिर्फ जुनून के दम पर दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों से मुकाबला नहीं किया जा सकता। लेकिन जल्द ही हमें यह ऐहसास हुआ कि दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों से सिर्फ कम कीमत और ज्यादा फीचर्स के आधार पर मुकाबला करना हमारे लिए संभव नहीं है, क्योंकि उन कंपनियों के पास कहीं ज्यादा संसाधन हैं। अगर Lava भी वही रणनीति अपनाती, तो वह भी बाकी कंपनियों की भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाती।

इसलिए हमने अपनी रणनीति बदल दी। हमने यह सोचना शुरू किया कि ज्यादा फोन कैसे बेचें, इसकी बजाय हमनें इस पर ध्यान देना शुरू किया कि जो ग्राहक पहले ही Lava का फोन खरीद चुका है, उसे सबसे अच्छा अनुभव कैसे दिया जाए। यही बदलाव कंपनी की नई रणनीति की नींव बनी। 

आपने कई बार कहा है कि कंपनियां नए ग्राहक जोड़ने पर ज्यादा और पुराने ग्राहकों को बनाए रखने पर कम ध्यान देती हैं। ऐसा क्यों?

ज्यादातर कंपनियां अपनी 80 से 90 प्रतिशत मेहनत और बजट नए ग्राहक बनाने में लगा देती हैं। जबकि एक ग्राहक फोन खरीदने के बाद अगले दो-तीन साल तक उसी डिवाइस का इस्तेमाल करता है, लेकिन इस पूरे समय में उसके अनुभव पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। Lava ने इसी सोच को बदलने का फैसला किया। लिहाजा, हमने सोचा कि यदि ग्राहक को फोन इस्तेमाल करने के दौरान शानदार अनुभव मिलेगा, तो वह सिर्फ उसी फोन से नहीं जुड़ा रहेगा, बल्कि पूरे Lava ब्रैंड पर भरोसा करेगा। यही भरोसा आगे चलकर नए ग्राहकों को जोड़ने का सबसे मजबूत माध्यम बन जाता है।

यही कारण है कि Lava के लिए अब फोन बिकने के बाद मिलने वाला ग्राहक अनुभव सिर्फ कस्टमर सपोर्ट नहीं, बल्कि कंपनी की ब्रैंड बनाने की सबसे अहम रणनीति का हिस्सा बन चुका है।

क्या इस ग्राहक-केंद्रित रणनीति (Customer-First Approach) का कारोबार पर भी असर पड़ा?

बिल्कुल, इसका सीधा असर कंपनी की ग्रोथ पर पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत का स्मार्टफोन बाजार लगभग स्थिर रहा है। यानी कुल बाजार में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। ऐसे में अगर किसी कंपनी को आगे बढ़ना है, तो उसे दूसरी कंपनियों के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करना होगा।

उन्होंने कहा कि Lava की ज्यादातर ग्रोथ इसी वजह से हुई क्योंकि कई ग्राहकों ने दूसरे स्मार्टफोन ब्रैंड छोड़कर Lava को चुना। मैं कहूंगा कि कंपनी की इस सफलता का करीब 70 से 80 प्रतिशत श्रेय नई ग्राहक-केंद्रित रणनीति को जाता है। बाकी ग्रोथ मैन्युफैक्चरिंग, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन को मजबूत करने से मिली है।

आजकल जब लगभग हर सेक्टर में मार्केटिंग बजट पर दबाव है, तो Lava रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और ब्रैंड बिल्डिंग में निवेश का फैसला कैसे करती है?

रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) हमेशा कंपनी की सबसे बड़ी प्राथमिकता रहेगी। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों की तुलना में इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षमता के मामले में अभी भी अंतर है। इस अंतर को सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और नए प्रोडक्ट्स के विकास में लगातार निवेश करके ही कम किया जा सकता है।

मार्केटिंग समय के साथ बदलती रहती है और यह इस बात पर निर्भर करती है कि बाजार में प्रतिस्पर्धी क्या कर रहे हैं और बाजार किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन अगर किसी कंपनी का प्रोडक्ट ही मजबूत नहीं होगा, तो सिर्फ विज्ञापन और मार्केटिंग के दम पर लंबे समय तक सफलता हासिल नहीं की जा सकती।

आपने Lava के ब्रैंड की सोच को तीन शब्दों- पहचान (Visibility), भरोसा (Credibility) और गर्व (Pride) से जोड़ा है। इसका क्या मतलब है?  

उन्होंने समझाया कि सबसे पहले लोगों को यह पता होना चाहिए कि Lava जैसा कोई ब्रैंड मौजूद है, से मैं Visibility कहता हूं। इसके बाद आता है Credibility यानी लगातार अच्छी क्वॉलिटी वाले प्रोडक्ट और बेहतर सेवा देकर ग्राहकों का भरोसा जीतना जरूरी है। तीसरा और सबसे खास पहलू गर्व (Pride) है। Lava चाहता है कि ग्राहक भारतीय स्मार्टफोन ब्रैंड इस्तेमाल करने पर गर्व महसूस करें।

आज मोबाइल फोन खरीदना सिर्फ एक जरूरत पूरी करना नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की पहचान और पसंद को भी दर्शाता है। इसलिए अच्छी तकनीक बनाने के साथ-साथ ग्राहकों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाना भी उतना ही जरूरी है।

आमतौर पर कंपनियां कस्टमर सर्विस को मार्केटिंग का हिस्सा नहीं मानतीं, लेकिन Lava ने इसे अपनी रणनीति का अहम हिस्सा क्यों बनाया?

जब कंपनी ने ग्राहक की नजर से सोचना शुरू किया, तो उसे ऐहसास हुआ कि अगर किसी का फोन खराब हो जाए, तो उसे काफी परेशानी उठानी पड़ती है। ग्राहक को सर्विस सेंटर तक जाना पड़ सकता है, आने-जाने में खर्च करना पड़ता है और कई बार मरम्मत करवाने के लिए एक दिन की कमाई भी छोड़नी पड़ती है।

इससे Lava ने अपनी पूरी सोच बदल दी। अगर वारंटी के दौरान फोन में कोई दिक्कत कंपनी की वजह से है, तो उसे ठीक करना भी कंपनी की जिम्मेदारी होनी चाहिए। उनके मुताबिक जब कोई कंपनी अपने फायदे की बजाय ग्राहक की सुविधा के बारे में सोचती है, तो उसका काम करने का तरीका पूरी तरह बदल जाता है।

आपने कहा कि "ब्रैंड वह है जो आप हैं, न कि जो आप लोगों को बताते हैं।" इसका क्या मतलब है?

बहुत से लोग मानते हैं कि ब्रैंडिंग का मतलब सिर्फ विज्ञापन और प्रचार करना है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। विज्ञापन और कम्युनिकेशन सिर्फ नतीजा होते हैं। असल ब्रैंड इस बात से बनता है कि कंपनी के मूल्य (Values) क्या हैं, उसका व्यवहार कैसा है, उसके प्रोडक्ट कितने अच्छे हैं और वह ग्राहकों को कैसा अनुभव देती है।

समय के साथ तकनीक बदलेगी, मार्केटिंग के तरीके भी बदलेंगे, लेकिन अगर किसी कंपनी के उद्देश्य और मूल्य लगातार एक जैसे बने रहें, तो धीरे-धीरे लोग उस ब्रैंड पर भरोसा करने लगते हैं। यही भरोसा लंबे समय में ब्रैंड की सबसे बड़ी ताकत बनता है।

कंपनी अल्पकालिक मुनाफे और लंबे समय तक मजबूत ब्रैंड बनाने के बीच संतुलन कैसे बनाती है?

अगर कभी कंपनी को तुरंत मिलने वाले फायदे और लंबे समय की ब्रैंड बिल्डिंग में से किसी एक को चुनना पड़े, तो वह हमेशा लंबे समय के लक्ष्य को चुनेगी। हमने कई कंपनियों को देखा है जो जल्दी सफलता पाने के लिए छोटे-छोटे मौकों के पीछे भागीं, लेकिन कुछ साल बाद बाजार से गायब हो गईं।

हमारा लक्ष्य कुछ साल के लिए सफल होना नहीं है, बल्कि हमारा लक्ष्य ऐसा भारतीय ब्रैंड बनाना है जो कई दशकों तक कायम रहे। इसके लिए धैर्य, निरंतरता और हर दिन खुद को बेहतर बनाने की जरूरत होती है। 

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कंटेंट, कनेक्ट और क्रेडिबिलिटी ही ‘देश की पाठशाला’ की असली ताकत: सुशांत सिन्हा

समाचार4मीडिया से बातचीत में सुशांत सिन्हा ने ‘देश की पाठशाला’ के कॉन्सेप्ट, टीवी न्यूज की चुनौतियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव समेत कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।

pankaj sharma by
Published - Monday, 22 June, 2026
Last Modified:
Monday, 22 June, 2026
Sushant Sinha... Interview

हिंदी टीवी पत्रकारिता की दुनिया में अपनी बेबाक राय, तीखे विश्लेषण और दमदार एंकरिंग के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा ने हाल ही में हिंदी न्यूज चैनल ‘न्यूज18 इंडिया’ के साथ अपनी नई पारी शुरू की है। चैनल ने उन्हें अपने नए प्राइम-टाइम शो ‘देश की पाठशाला’ की कमान सौंपी है। यह शो पारंपरिक न्यूज प्रेजेंटेशन से अलग एक्सप्लेनर फॉर्मेट में दर्शकों तक खबरों का संदर्भ, कारण और प्रभाव पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

‘खबर सिर्फ बताने के लिए नहीं, समझाने के लिए भी होती है’ की सोच के साथ शुरू किए गए इस कार्यक्रम को लेकर सुशांत सिन्हा ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने ‘देश की पाठशाला’ के कॉन्सेप्ट, बदलते मीडिया परिदृश्य, टीवी न्यूज की चुनौतियों, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव और पत्रकारिता से जुड़े कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

‘देश की पाठशाला’ की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

मेरे हिसाब से इसकी नींव तीन चीजों पर टिकी है- कंटेंट, कनेक्ट और क्रेडिबिलिटी। सबसे पहले कंटेंट, यानी हमारी रिसर्च काफी गहरी होती है। कोशिश रहती है कि दर्शकों को किसी खबर की ऐसी जानकारी और संदर्भ मिले, जो उस समय दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर आसानी से उपलब्ध न हो।

दूसरा है कनेक्ट। हम चाहते हैं कि दर्शकों को ऐसा महसूस हो कि हम उनके साथ बातचीत कर रहे हैं, सिर्फ एकतरफा खबर नहीं सुना रहे। और तीसरा है क्रेडिबिलिटी। पत्रकारिता में दो दशक से ज्यादा समय के दौरान मैंने हमेशा भरोसा बनाए रखने को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। जब दर्शक कहते हैं कि उन्हें मेरी बात पर विश्वास होता है, तो उससे बड़ी संतुष्टि कोई नहीं होती।

आपके नए शो ‘देश की पाठशाला’ में विषयों का चयन कैसे होगा? क्या राजनीति से आगे बढ़कर इतिहास, भूगोल, विज्ञान या अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भी आपका फोकस रहेगा?

हां, देखिए, ‘देश की पाठशाला’ का पूरा फोकस ही यही है कि हम दर्शकों को खबर भी बताएं और उन्हें जागरूक भी करें। आज की तारीख में दर्शकों को ब्रेकिंग न्यूज मोबाइल पर मिल जाती है, सोशल मीडिया पर मिल जाती है। तेज खबरें हर जगह उपलब्ध हैं।

लेकिन अगर आप किसी खबर को विस्तार से, उसके हर पहलू के साथ समझना चाहते हैं, तो वह हिस्सा बड़े स्तर पर उपलब्ध नहीं है। सरल भाषा में, गहराई और रिसर्च के साथ किसी विषय को समझाने की जो कमी है, लोग उसे मिस करते हैं। ‘देश की पाठशाला’ उसी गैप को भरने का काम कर रहा है। आपको देश से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर मिले और वह इतनी गहराई व रिसर्च के साथ मिले कि उसे देखने के बाद आप खुद उस विषय के जानकार बन जाएं। आप चार लोगों को भी समझा सकें कि उस खबर की असल बात क्या है।

डिबेट शो के बजाय आपने एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर भरोसा किया। ऐसा क्यों?

देखिए, डिबेट और एक्सप्लेनर दोनों का अपना-अपना महत्व है। डिबेट में आपको अलग-अलग पक्ष सुनने को मिलते हैं। लेकिन एक्सप्लेनर का फायदा यह है कि शोर-शराबे के पीछे जो कई महत्वपूर्ण तथ्य छिप जाते हैं, उन्हें सामने लाने का अवसर मिलता है। मुझे लगा कि रात 9 बजे जब कोई व्यक्ति आराम से टीवी के सामने बैठा हो, तो उसे किसी विषय की विस्तृत जानकारी मिलनी चाहिए। इसलिए हमने एक्सप्लेनर फॉर्मेट चुना।

लेकिन अगर आप न्यूज18 इंडिया का प्राइम टाइम देखें, तो वह बहुत विविध और मजबूत है। 5 बजे डिबेट, 6 बजे प्रतीक भाई का ‘सोशल कनेक्ट’, 7 बजे अमीश की डिबेट, 8 बजे किशोर भाई का कार्यक्रम, 9 बजे ‘देश की पाठशाला’ और 10 बजे अमन का शो। यानी दर्शकों को डिबेट और एनालिसिस, दोनों भरपूर मात्रा में मिल रहे हैं।

आज कई चैनल और डिजिटल क्रिएटर्स भी एक्सप्लेनर कंटेंट बना रहे हैं। ऐसे में ‘देश की पाठशाला’ अलग कैसे है?

आज के समय में जानकारी की कमी नहीं है। मोबाइल, वेबसाइट और सोशल मीडिया पर खबरें हर जगह मौजूद हैं। असली चुनौती यह है कि किसी जटिल विषय को इस तरह समझाया जाए कि गांव में रहने वाला व्यक्ति, शहर का दर्शक, छात्र, गृहिणी या कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी उसे आसानी से समझ सके। हमारी कोशिश रहती है कि विषय को सरल भाषा में समझाया जाए, लेकिन उसकी गहराई और रिसर्च से कोई समझौता न हो। यही चीज इसे अलग बनाती है।

सोशल मीडिया के दौर में, जहां लगभग हर किसी के पास अपनी बात रखने का मंच है, एक सफल न्यूज एंकर की पहचान क्या है?

आज लगभग हर कोई एंकर बन सकता है, लेकिन सफलता की असली कसौटी यह है कि लोग आपकी बात सुनना क्यों चाहते हैं। मेरे हिसाब से सफलता सिर्फ व्यूज या आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। इसकी असली पहचान भरोसा है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि लोग आपको पहचानते हैं या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि वे आप पर भरोसा करते हैं या नहीं। आखिरकार, पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता ही होती है।

आप एक एंकर के अलावा एक ब्रैंड भी हैं। आपका क्या मानना है, दर्शक चैनल चुनते हैं या एंकर? क्या हिंदी न्यूज में किसी पत्रकार की व्यक्तिगत ब्रैंड वैल्यू चैनल के बराबर या उससे बड़ी होती जा रही है?

देखिए, मुझे लगता है कि दोनों महत्वपूर्ण हैं। यह सही है कि कई बार दर्शकों का जुड़ाव किसी चेहरे से हो जाता है और वे उसे प्राथमिकता देते हैं। लेकिन नेटवर्क18 इस समय देश का सबसे बड़ा न्यूज नेटवर्क है। इसलिए उससे जुड़ना और खबरों को आगे ले जाने का अवसर भी बड़ा है। मुझे लगता है कि दर्शक दोनों पर विश्वास करते हैं। जब किसी बड़े नेटवर्क की ब्रैंड वैल्यू के साथ एक विश्वसनीय चेहरा जुड़ जाता है, तो वह सोने पर सुहागा हो जाता है। इसलिए दोनों का संयोजन बहुत महत्वपूर्ण होता है।

हालांकि आजकल इतने सारे प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं कि लोग यूट्यूब, एक्स (पूर्व में Twitter), सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर भी खबरें देखते हैं। ऐसे में कई लोग कुछ चेहरों या कुछ ब्रैंड्स को चुन लेते हैं, जिन पर उन्हें भरोसा होता है। इसलिए मुझे लगता है कि दोनों का कॉम्बिनेशन सबसे बेहतर काम करता है।

आप हमेशा कहते हैं कि खबर सिर्फ बताना नहीं, समझाना भी जरूरी है। आज की पत्रकारिता में आपको कौन-सी कमी दिखती है, जिसे दूर किए जाने की जरूरत है?

मुझे लगता है कि आज की पत्रकारिता में कई बार लोग किसी एक पक्ष को चुन लेते हैं। दोनों तरफ ऐसा देखने को मिलता है। इससे लोगों को लगता है कि बात एकतरफा हो रही है। ऐसे में जो लोग राष्ट्र और देश को केंद्र में रखकर काम कर रहे हैं, जो जरूरत पड़ने पर सरकार से भी सवाल पूछते हैं और विपक्ष से भी सवाल पूछते हैं, उस संतुलित दृष्टिकोण की थोड़ी कमी मुझे महसूस होती है। ‘देश की पाठशाला’ और नेटवर्क18 के माध्यम से हमारा प्रयास यही है कि हम लोगों तक वही संतुलित और तथ्यात्मक दृष्टिकोण पहुंचाएं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच पत्रकार की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

AI रिसर्च में मदद कर सकता है, कई प्रक्रियाओं को आसान बना सकता है और पत्रकारों की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है। लेकिन पत्रकारिता मूल रूप से मानवीय काम है। खबर सिर्फ सूचना नहीं होती, उसमें भावनाएं, अनुभव और मानवीय समझ भी शामिल होती है। AI जानकारी को प्रोसेस कर सकता है, लेकिन इंसानी संवेदनाओं, निर्णय क्षमता और अनुभव की पूरी तरह जगह नहीं ले सकता। इसलिए मुझे लगता है कि AI पत्रकारों की मदद जरूर करेगा, लेकिन उनकी जगह नहीं ले पाएगा।

‘देश की पाठशाला’ को लेकर दर्शकों की ओर से शुरुआती प्रतिक्रिया कैसी रही?

 रिस्पॉन्स बहुत अच्छा रहा। पहले ही दिन यूट्यूब के कॉन्करेंट व्यूअर्स में हम नंबर वन थे। एक्स के ग्लोबल ट्रेंड्स में भी ‘देश की पाठशाला’ नंबर वन पर ट्रेंड कर रहा था। यह दिखाता है कि दर्शकों को इस तरह के कंटेंट का इंतजार था। लोग लगातार पूछते थे कि आप कब आएंगे और कहां दिखाई देंगे। शो के पहले दिन जो प्रतिक्रिया मिली, वह सिर्फ नंबरों में ही नहीं, बल्कि भावनाओं में भी दिखाई दी। मैं हमेशा कहता हूं कि ‘देश की पाठशाला’ सिर्फ एक शो नहीं है, बल्कि एक इमोशन है, एक कनेक्ट है। लोगों को लगता है कि सुशांत जो बता रहे हैं और जिस तरह से बता रहे हैं, वह देशहित में है।

हम रिसर्च के साथ अपनी बात रखते हैं, इसलिए लोगों को विश्वास होता है कि हम सिर्फ बातें नहीं कर रहे, बल्कि तथ्यों के आधार पर उन्हें साबित भी कर रहे हैं। यही भरोसा और कनेक्शन हमें दर्शकों से जोड़ता है और हम इसे बनाए रखने का पूरा प्रयास करते हैं। 

लोकप्रियता के साथ आलोचना भी आती है। आप इससे कैसे निपटते हैं?

मैं यह नहीं कहूंगा कि आलोचना का कोई असर नहीं पड़ता। कई बार व्यक्तिगत टिप्पणियां परेशान भी करती हैं। लेकिन मैंने एक बात सीखी है कि न तो प्रशंसा को सिर पर चढ़ने देना चाहिए और न ही आलोचना को दिल में जगह देनी चाहिए। अगर आप सिर्फ तालियों के लिए काम करेंगे तो आलोचना आपको तोड़ देगी। वहीं अगर सिर्फ नकारात्मक बातों पर ध्यान देंगे तो उन लोगों को भूल जाएंगे जो आपके काम की सराहना करते हैं। इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

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AI से बदलेगा मीडिया बाइंग का खेल? BidVid के फाउंडर राजकुमार रेमल्ली से खास बातचीत

'एक्सचेंज4मीडिया' को दिए विशेष इंटरव्यू में BidVid के फाउंडर डायरेक्टर राजकुमार रेमल्ली ने बताया कि डिजिटल मीडिया बाइंग में अब भी कौन-सी चुनौतियां बनी हुई हैं

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 17 June, 2026
Last Modified:
Wednesday, 17 June, 2026
Rajkumar541

'एक्सचेंज4मीडिया' को दिए विशेष इंटरव्यू में BidVid के फाउंडर डायरेक्टर राजकुमार रेमल्ली ने बताया कि डिजिटल मीडिया बाइंग में अब भी कौन-सी चुनौतियां बनी हुई हैं, AI किस तरह प्रोग्रामेटिक विज्ञापन को बदल रहा है, पारदर्शिता क्यों अब भी एक बड़ा मुद्दा है और BidVid किस तरह तकनीक की मदद से ब्रैंड्स को बेहतर विज्ञापन परिणाम दिला रहा है।

आपने मीडिया और विज्ञापन उद्योग में लंबे समय तक काम किया है। BidVid की शुरुआत करते समय आप किस समस्या का समाधान करना चाहते थे?

हमने देखा कि विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा था और ब्रैंड्स को उसके बदले अपेक्षित मूल्य नहीं मिल रहा था। प्रोग्रामेटिक विज्ञापन के डिमांड और सप्लाई, दोनों पक्षों पर काम करने की वजह से हमें साफ दिखाई देता था कि ये कमियां कहां मौजूद हैं।

BidVid के पीछे सोच काफी सीधी थी। हम ईमानदारी, पारदर्शिता और बेहतर दक्षता के साथ ब्रैंड्स को अधिक मूल्य देना चाहते थे। हमारा लक्ष्य ऐसी तकनीक विकसित करना था जो ब्रैंड्स को अपनी रणनीति, ऑडियंस चयन या इन्वेंट्री बदले बिना मीडिया बाइंग को बेहतर बनाने में मदद कर सके।

मीडिया बाइंग आज भी मार्केटर्स के लिए एक बड़ा फोकस एरिया है। क्या आपको लगता है कि तकनीक में प्रगति के बावजूद यह अब भी अक्षम है?

हां, बिल्कुल। तकनीक काफी आगे बढ़ चुकी है, लेकिन उसका इस्तेमाल कई बार अब भी पूरी तरह प्रभावी नहीं है। जब तक मीडिया बाइंग में मैनुअल हस्तक्षेप अधिक रहेगा, तब तक कमियां बनी रहेंगी। तकनीक इंसानों की तुलना में तेजी और लगातार बेहतर फैसले ले सकती है, जिससे इन कमियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

आज लगभग हर एजेंसी AI इस्तेमाल करने का दावा करती है। BidVid को दूसरी AI आधारित मीडिया ऑप्टिमाइजेशन कंपनियों से अलग क्या बनाता है?

बहुत कम कंपनियां हैं जो वास्तव में वही करती हैं जो BidVid करता है।

हमारे एल्गोरिद्म खास तौर पर मीडिया बाइंग में मौजूद कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने के लिए बनाए गए हैं। समय के साथ इन सिस्टम्स को लगातार बेहतर किया गया है। हमारा उद्देश्य सिर्फ ऑटोमेशन नहीं है, बल्कि ब्रैंड्स के लिए मापने योग्य परिणाम और दक्षता पैदा करना है।

BidVid की खासियत यह है कि हमारी तकनीक विज्ञापनदाता की मौजूदा कैंपेन सेटअप का सम्मान करते हुए खरीदारी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाती है। हम लगातार अपने प्लेटफॉर्म को बेहतर बना रहे हैं ताकि ब्रैंड्स को और अच्छे परिणाम मिल सकें।

क्या AI ने वास्तव में प्रोग्रामेटिक विज्ञापन को ज्यादा स्मार्ट और प्रभावी बना दिया है?

बिल्कुल। इसका असर हमारे साथ काम करने वाले कई ब्रैंड्स में साफ दिखाई देता है। इनमें भारत और इंडोनेशिया के Marico, Jyothy Labs, Zouk, Glenmark Pharma और Unilever जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

इनमें से कई ब्रैंड्स ने AI आधारित ऑप्टिमाइजेशन से इतना फायदा देखा है कि वे अब हमेशा सक्रिय रहने वाले मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं। AI से मिलने वाली दक्षता सीधे बिजनेस परिणामों में बदल रही है।

मीडिया ऑप्टिमाइजेशन को लेकर मार्केटर्स की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?

सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि ऑप्टिमाइजेशन करने से मीडिया की गुणवत्ता कम हो जाती है।

कुछ मार्केटर्स मानते हैं कि अगर लागत कम हो रही है तो खरीदी जा रही इन्वेंट्री भी सस्ती या कम गुणवत्ता वाली होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।

BidVid इस बात को प्रभावित नहीं करता कि कोई ब्रैंड कौन सी इन्वेंट्री खरीदना चाहता है। विज्ञापनदाता अपनी पसंद की इन्वेंट्री, ऑडियंस और प्लेटफॉर्म चुनते रहते हैं। हमारी तकनीक सिर्फ उसी इन्वेंट्री को बेहतर कीमत और अधिक दक्षता के साथ खरीदने में मदद करती है।

आज डिजिटल विज्ञापन में ब्रैंड्स सबसे ज्यादा पैसा कहां बर्बाद करते हैं?

लगभग हर कैंपेन में कुछ न कुछ बर्बादी होती है।

समस्या क्षमता की नहीं बल्कि समय और संसाधनों की है। मीडिया टीमें एक साथ कई कैंपेन संभालती हैं और चौबीसों घंटे निगरानी करना संभव नहीं होता। किसी इंसान से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह दिन-रात लगातार कैंपेन ऑप्टिमाइज करता रहे।

यहीं तकनीक फर्क पैदा करती है। BidVid बिना थके और बिना रुके हर घंटे कैंपेन का विश्लेषण और ऑप्टिमाइजेशन करता रहता है।

AI आधारित ऑप्टिमाइजेशन को लेकर एजेंसियों की प्रतिक्रिया कैसी है? क्या वे इसे अपना रही हैं या इसका विरोध कर रही हैं?

शुरुआती प्रतिक्रिया अक्सर विरोध की होती है। जब भी कोई नई तकनीक ऐसे क्षेत्र में आती है जिसे अब तक लोग संभालते रहे हैं, तो यह डर पैदा होता है कि कहीं तकनीक उनकी जगह न ले ले। लेकिन जब एजेंसियां देखती हैं कि यह तकनीक उनके काम को आसान बनाती है और दोहराए जाने वाले कार्यों को संभाल लेती है, तो इसे अपनाने की गति बढ़ जाती है।

कई प्लानर्स जो शुरुआत में संदेह में थे, आज इसके समर्थक बन चुके हैं क्योंकि उन्हें अपने रोजमर्रा के काम में इसका फायदा दिखाई देता है।

क्या मार्केटर्स को कैंपेन फैसलों के लिए एल्गोरिद्म पर भरोसा दिलाना मुश्किल होता है?

शुरुआत में यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

उद्योग ने पहले भी ऑटोमेशन और AI से जुड़े कई दावे सुने हैं जो हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए। इसलिए मार्केटर्स नई तकनीकों को सावधानी से देखते हैं।

लेकिन जब वे वास्तविक परिणाम देखते हैं और खुद अनुभव करते हैं कि तकनीक कैसे काम करती है, तो उनका भरोसा तेजी से बढ़ता है। आखिरकार विश्वास प्रदर्शन और पारदर्शिता से ही बनता है।

BidVid लॉन्च करने के बाद आपकी सबसे बड़ी सीख क्या रही?

सबसे बड़ी सीख यह है कि पारदर्शिता मीडिया बाइंग के सबसे मूल्यवान लेकिन सबसे कम सराहे जाने वाले पहलुओं में से एक है।

BidVid कैंपेन को किसी बंद या ब्लैक बॉक्स सिस्टम में नहीं ले जाता। यह विज्ञापनदाता के मौजूदा इकोसिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर के भीतर काम करता है। इससे विज्ञापनदाता नियंत्रण और दृश्यता बनाए रखते हुए ऑप्टिमाइजेशन का लाभ उठा सकते हैं।

अगले पांच वर्षों में मीडिया बाइंग को आप किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?

मुझे इसमें एक बड़ा बदलाव दिखाई देता है।

भविष्य में मार्केटिंग लीडर्स सिर्फ अपने बिजनेस लक्ष्य तय करेंगे और बुद्धिमान सिस्टम खुद रणनीतियां तैयार करेंगे, संभावित परिणामों का अनुमान लगाएंगे और लक्ष्य हासिल करने के लिए कई विकल्प प्रस्तुत करेंगे।

तकनीक की भूमिका सिर्फ ऑप्टिमाइजेशन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वह रणनीतिक निर्णय लेने में भी साझेदार बनेगी।

क्या आप बता सकते हैं कि BidVid ने ब्रैंड्स के लिए कितना प्रभाव पैदा किया है?

परिणाम हर कैंपेन में अलग-अलग होते हैं, लेकिन हमने 20% से 50% तक की बचत देखी है। कुछ विशेष मामलों में यह आंकड़ा इससे भी अधिक रहा है।

बड़े वैश्विक ब्रैंड्स के लिए आमतौर पर 20 से 25 प्रतिशत तक मीडिया दक्षता में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। अगर कोई कैंपेन पहले से ही अच्छी तरह योजनाबद्ध और संचालित है, तब भी BidVid खरीदारी प्रक्रिया को बेहतर बनाकर महत्वपूर्ण बचत करा सकता है।

कई कंपनियां कैंपेन ऑप्टिमाइजेशन का दावा करती हैं। BidVid की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

अधिकांश समाधान क्रिएटिव परफॉर्मेंस, कॉपी वेरिएशन, टार्गेटिंग बदलाव या मैनेज्ड सर्विसेज पर फोकस करते हैं।

BidVid का दृष्टिकोण अलग है। हम विज्ञापनदाता द्वारा तय किए गए क्रिएटिव, टार्गेटिंग या कैंपेन सेटिंग्स में बदलाव नहीं करते। हमारा पूरा ध्यान खरीदारी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर होता है।

हमारा मानना है कि बड़े स्तर पर लगातार कुशल मीडिया बाइंग करना इंसानों के लिए सबसे कठिन कार्यों में से एक है और यही वह क्षेत्र है जहां तकनीक सबसे बड़ा प्रभाव पैदा कर सकती है।

मीडिया लीडर और टेक्नोलॉजी उद्यमी दोनों भूमिकाओं में काम करने के बाद आपको क्या लगता है कि आज विज्ञापन को बेहतर कौन समझता है?

दोनों पक्षों में बेहद सक्षम लोग मौजूद हैं। हर उद्योग की तरह यहां भी समझ और विशेषज्ञता व्यक्ति पर निर्भर करती है, न कि उसकी श्रेणी पर। मीडिया और तकनीक दोनों क्षेत्रों में ऐसे लोग हैं जो इस व्यवसाय को बहुत अच्छी तरह समझते हैं, जबकि कुछ लोग अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं।

अगले दो वर्षों में BidVid की प्राथमिकताएं क्या हैं?

राजकुमार रेमल्ली: हमारा फोकस दो प्रमुख क्षेत्रों पर है।

पहला, हम अमेरिका, कनाडा और यूरोप जैसे बड़े वैश्विक बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहते हैं। भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और मध्य-पूर्व में हम पहले ही कई बड़े ब्रैंड्स के साथ काम कर रहे हैं और पश्चिमी बाजारों में हमें बड़ी संभावनाएं दिखाई देती हैं।

दूसरा, हम अपने प्रोडक्ट रोडमैप का विस्तार कर रहे हैं। फिलहाल हमारी ताकत ओपन-वेब प्रोग्रामेटिक विज्ञापन में है, लेकिन हम Amazon और तेजी से बढ़ रहे क्विक-कॉमर्स इकोसिस्टम के लिए भी समाधान विकसित कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य डिजिटल विज्ञापन के अधिक से अधिक क्षेत्रों में वही दक्षता और पारदर्शिता लाना है।

विज्ञापन में पारदर्शिता को लेकर वैश्विक चर्चा में भारत कहां खड़ा है?

भारत की स्थिति काफी हद तक विकसित बाजारों जैसी ही है।

पारदर्शिता से जुड़ी चुनौतियां सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं। दुनिया के कई बाजारों में इसी तरह की परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। असली अवसर उन तकनीकों को अपनाने में है जो मीडिया बाइंग में अधिक दृश्यता और जवाबदेही प्रदान करती हैं।

विज्ञापनदाता अगर अधिक पारदर्शिता और बेहतर दक्षता चाहते हैं, तो आने वाले वर्षों में तकनीक आधारित समाधान उनकी सफलता में और भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं, विश्वसनीयता हर दिन कमानी पड़ती है: पलकी शर्मा

समाचार4मीडिया से बातचीत में फर्स्टपोस्ट छोड़ने से IGR लॉन्च तक पलकी शर्मा ने शेयर किया अपना विजन, कहा- ‘भारत का नजरिया दुनिया तक पहुंचाना जरूरी’

pankaj sharma by
Published - Monday, 15 June, 2026
Last Modified:
Monday, 15 June, 2026
Palki Sharma...

जानी-मानी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर पलकी शर्मा ने हाल ही में अपने नए डिजिटल न्यूज वेंचर ‘इंडिया ग्लोबल रिव्यू’ (India Global Review) यानी IGR की शुरुआत की है। अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को भारतीय दृष्टिकोण से समझाने के उद्देश्य से शुरू किए गए इस प्लेटफॉर्म को लेकर उन्होंने समाचार4मीडिया से विस्तार से बातचीत की। इस खास बातचीत में पलकी शर्मा ने फर्स्टपोस्ट छोड़ने के फैसले, IGR के विजन, संपादकीय स्वतंत्रता, विश्वसनीयता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, युवा पत्रकारों और भारतीय मीडिया की वैश्विक मौजूदगी जैसे कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने ‘फर्स्टपोस्ट’ क्यों छोड़ा? क्या अपना वेंचर शुरू करने का फैसला पहले से तय था या कोई खास टर्निंग पॉइंट रहा?

‘फर्स्टपोस्ट’ की यात्रा बहुत अच्छी रही। उससे पहले भी मेरी यात्रा अच्छी रही थी। जब मैंने ‘विऑन’ (WION)  छोड़ा था, तब भी लोगों ने पूछा था कि क्यों छोड़ा और ‘फर्स्टपोस्ट’ क्यों जॉइन किया। वह भी एक ग्रोथ स्टोरी थी। टेलीविजन से डिजिटल की ओर जाना मेरे लिए एक नया अनुभव था। फर्स्टपोस्ट में तीन साल बहुत अच्छे रहे।

मैं ‘इंडिया ग्लोबल रिव्यू’ की लॉन्चिंग को किसी एक टर्निंग पॉइंट से नहीं जोड़ूंगी। काफी समय से मेरे मन में था कि कुछ नया बनाया जाए। मैं ऐसा एक प्लेटफॉर्म बनाना चाहती थी जो सिर्फ अंतरराष्ट्रीय खबरों पर फोकस करे और वह भी भारत के दृष्टिकोण से।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान यह विचार और मजबूत हुआ। भारत ने एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया और चार दिन में उसे समाप्त भी कर दिया। इसके बावजूद हमें दुनिया भर में अपने पक्ष को समझाना पड़ा। मुझे लगा कि अगर ऐसी मीडिया व्यवस्था होती जो भारत के दृष्टिकोण को सही तरीके से दुनिया तक पहुंचा पाती, तो शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ती। वहीं मुझे यह कमी महसूस हुई और लगा कि कुछ नया करना चाहिए।

क्या आपको लगा कि अपना प्लेटफॉर्म होने से आप ज्यादा स्वतंत्र होकर अपनी बात रख पाएंगी?

नहीं, मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कहूंगी। मेरे करियर में ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं कोई बात कहना चाहती थी और मुझे कहने नहीं दिया गया। न्यूजरूम में मतभेद होना स्वाभाविक है और होना भी चाहिए। बहस और चर्चा जरूरी है, क्योंकि उसी से विचार मजबूत होते हैं। लेकिन यह कहना कि किसी ने मुझे कुछ करने नहीं दिया या मेरी बात रोक दी गई, सही नहीं होगा। जहां भी मैंने काम किया है, वहां मेरा अनुभव अच्छा रहा है और मुझे हमेशा सीखने और आगे बढ़ने का मौका मिला है।

अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू करने में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या रहीं?

चुनौतियां बहुत हैं और वही आपको सिखाती भी हैं। जब आप एक न्यूजरूम में काम करते हैं तो आपका फोकस संपादकीय फैसलों पर होता है। लेकिन जब आप फाउंडर बनते हैं तो आपको हर चीज पर निर्णय लेना पड़ता है। आपको यह तय करना होता है कि कौन-सी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होगी, किस चीज पर कितना खर्च होगा और ब्रैंड किस तरह दिखेगा। कई बार हम सिर्फ इस बात पर चर्चा करते हैं कि लोगो में नीले रंग का कौन-सा शेड इस्तेमाल किया जाए। यह भी एक महत्वपूर्ण निर्णय होता है। ऐसे में जरूरी है कि आपके आसपास ऐसे लोग हों जो आपसे ज्यादा प्रतिभाशाली और समझदार हों। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे ऐसी टीम मिली है।

‘इंडिया ग्लोबल रिव्यू’ नाम रखने के पीछे क्या सोच थी?

नाम चुनना भी एक प्रक्रिया थी। हमने कई नामों पर विचार किया। हमारी कोशिश थी कि नाम सुनते ही लोगों को समझ में आ जाए कि हम क्या करने जा रहे हैं। हम वैश्विक मामलों, वैश्विक विचारों और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को भारत के दृष्टिकोण से देखना चाहते थे। इसी सोच से ‘इंडिया’ और ‘ग्लोबल’ दोनों को नाम में शामिल किया गया।

भारतीय मीडिया की वैश्विक मौजूदगी को बढ़ाने में IGR क्या भूमिका निभाएगा?

हमारी कोशिश है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मौजूदगी मजबूत करें। हमारी हायरिंग जारी है और हम कई देशों में लोगों से बात कर रहे हैं। आज टेक्नोलॉजी की मदद से आप दुनिया के किसी भी दर्शक तक पहुंच सकते हैं। लेकिन दुनिया भर से खबरें जुटाना और उन्हें सही संदर्भ में प्रस्तुत करना एक लंबी प्रक्रिया है। हम उसी दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

‘इंडिया ग्लोबल रिव्यू’ में क्या सिर्फ अंतरराष्ट्रीय विषयों पर फोकस रहेगा या क्षेत्रीय मुद्दे भी शामिल होंगे?

हमारी प्राथमिकता अंतरराष्ट्रीय मामलों को दी जाएगी। लेकिन आज दुनिया इतनी जुड़ी हुई है कि भारत और दुनिया को अलग-अलग खानों में नहीं रखा जा सकता। वाशिंगटन में लिया गया कोई फैसला बेंगलुरु को प्रभावित कर सकता है और दिल्ली में लिया गया फैसला मॉस्को पर असर डाल सकता है। इसलिए कोई भी ऐसा मुद्दा जो लोगों के जीवन को प्रभावित करता हो, वह हमारी चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

निवेशकों के रहते संपादकीय स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित होगी?

यह बहुत अच्छा सवाल है और हमेशा पूछा जाना चाहिए। मैंने उन्हीं निवेशकों के साथ काम करने का फैसला किया जिनका विजन मेरे विजन से मेल खाता है। एक अच्छा निवेशक संपादक नहीं बनना चाहता। वह निवेशक ही रहना चाहता है। इसलिए जरूरी है कि भूमिकाएं स्पष्ट हों। जहां तक मेरी समझ है, हमने यह सीमाएं स्पष्ट रूप से तय की हैं। जिन लोगों के साथ मैं काम कर रही हूं, उन पर मुझे विश्वास है और संपादकीय मामलों में किसी हस्तक्षेप की बात नहीं है।

आप अक्सर ‘इंडियन लेंस’ की बात करती हैं। इसका क्या मतलब है?

इंडियन लेंस का मतलब किसी के खिलाफ खड़ा होना नहीं है। इसका मतलब है कि दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उसे भारत के दृष्टिकोण, भारत की स्थिति और भारत के हितों के संदर्भ में देखा जाए। जब एक अमेरिकी दृष्टिकोण हो सकता है और एक यूरोपीय दृष्टिकोण हो सकता है, तो एक भारतीय दृष्टिकोण भी हो सकता है। IGR उसी को अभिव्यक्ति देने का प्रयास है।

ऐसे समय में जब मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, IGR अपनी विश्वसनीयता कैसे बनाएगा?

विश्वसनीयता किसी प्रेस रिलीज या प्रोमो से नहीं बनती। उसे हर दिन कमाना पड़ता है। पत्रकार का काम ऐसी बातें कहना है जो किसी न किसी को असहज करें। अगर आप किसी मुद्दे पर एक पक्ष को सही बताएंगे तो दूसरा पक्ष आपको गलत कहेगा। यह स्वाभाविक है। हमारे कई दर्शक हमें लिखते हैं कि हम गलत हैं, लेकिन फिर भी हमें देखते हैं। यह एक रिश्ते की तरह है। कभी आप ऐसी बात कहेंगे जो लोगों को पसंद आएगी और कभी ऐसी बात जो उन्हें पसंद नहीं आएगी। मेरे लिए महत्वपूर्ण यह है कि तथ्य सही हों और संदर्भ पूरा हो। अगर आप लगातार ऐसा करते हैं तो विश्वसनीयता अपने आप बनती है।

आजकल ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द काफी चर्चा में हैं। इस तरह की बहसों को आप कैसे देखती हैं?

मैं वही करती हूं जो मुझे सही लगता है और आज तक वही करती आई हूं। सोशल मीडिया पर जो आरोप-प्रत्यारोप और नामकरण की राजनीति चलती है, उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरे पास न उसके लिए समय है और न ही उसमें शामिल होने की इच्छा। मैं अपना काम करती हूं और मुझे लगता है कि दर्शकों को भी वह पसंद आता है, तभी वे लगातार अपना समर्थन और आशीर्वाद देते हैं।

न्यूजरूम में AI के बढ़ते इस्तेमाल को आप अवसर मानती हैं या चुनौती?

AI एक टूल है और भविष्य का हिस्सा है। टेक्नोलॉजी से लड़ने का कोई मतलब नहीं है। जब कंप्यूटर आया था तब भी लोगों ने कहा था कि नौकरियां खत्म हो जाएंगी, लेकिन आज कंप्यूटर हर जगह है। AI का न्यूजरूम में भी इस्तेमाल हो रहा है। इससे कई काम तेजी से होते हैं, लेकिन गलतियां भी होती हैं। इसलिए इसका इस्तेमाल समझदारी से करना होगा। जो काम पत्रकार का है वह पत्रकार करेगा और जो काम मशीन का है वह मशीन करेगी।

इतनी व्यस्तता में परिवार और काम के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं?

मैं संतुलन लाने की कोशिश नहीं करती। कई बार परिवार प्राथमिकता बनता है और कई बार काम। मेरे साथ काम करने वाले लोग समझते हैं कि मेरा परिवार भी है और घर वाले समझते हैं कि मेरा काम भी है। मुझे लगता है कि सबसे जरूरी है लोगों की अपेक्षाएं स्पष्ट करना। मैं एक संयुक्त परिवार में रहती हूं और मेरा सपोर्ट सिस्टम बहुत मजबूत है। मैं खासकर महिलाओं से यही कहूंगी कि मदद मांगने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। एक व्यक्ति हर काम अकेले नहीं कर सकता।

युवा पत्रकारों के लिए आप तीन कौन सी प्रमुख सलाह देना चाहेंगी?

पहली सलाह है-पढ़ते रहिए। पढ़ने का मतलब सिर्फ सोशल मीडिया नहीं, बल्कि गंभीर अध्ययन है। विषयों की समझ वहीं से आती है। दूसरी सलाह है-रोजाना लिखिए। चाहे एक पैराग्राफ ही लिखें। लिखने से विचारों को व्यवस्थित करने की क्षमता विकसित होती है। तीसरी सलाह है-धैर्य रखिए और लगातार काम करते रहिए। आज बहुत से युवा जल्दी सफलता चाहते हैं, लेकिन पत्रकारिता में समय लगता है। निरंतरता बहुत जरूरी है।

कोई ऐसी बात जो आप लोगों से कहना चाहें?

मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि अगर कोई मेरे नाम से कोई बात प्रकाशित करना चाहता है तो पहले मुझसे पूछ ले। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मेरे नाम से बहुत-सी ऐसी बातें चलती हैं जो मैंने कभी कही ही नहीं। खासतौर पर जो लोग खुद को पत्रकार कहते हैं, उन्हें कम-से-कम तथ्यों की पुष्टि जरूर करनी चाहिए। आज इंटरनेट पर इतनी गलत जानकारी मौजूद है कि बाद में उसे ठीक करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

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दर्शकों का प्यार और भरोसा मेरी सबसे बड़ी पूंजी: सुधीर चौधरी

समाचार4मीडिया से खास बातचीत में ‘डिकोड’ की सफलता, गोदी मीडिया, AI एंकर, यूट्यूब जर्नलिज्म और टीवी न्यूज इंडस्ट्री की चुनौतियों पर खुलकर बोले सुधीर चौधरी

pankaj sharma by
Published - Tuesday, 19 May, 2026
Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2026
Sudhir Chaudhary Interview

भारतीय टीवी पत्रकारिता के सबसे चर्चित चेहरों में से एक, लोकप्रिय न्यूज एंकर और डीडी न्यूज (DD News) के प्राइम टाइम शो ‘डिकोड’ (Decode) के होस्ट सुधीर चौधरी ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने पत्रकारिता, भरोसे, ‘गोदी मीडिया’, यूट्यूब जर्नलिज्म, AI एंकर, टीवी न्यूज इंडस्ट्री और अपने करियर से जुड़े कई अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। इस दौरान उन्होंने बताया कि आखिर दर्शक उनसे इतना भावनात्मक जुड़ाव क्यों महसूस करते हैं, ‘डिकोड’ की सफलता का फॉर्मूला क्या है और आज के दौर में गंभीर पत्रकारिता को बचाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रस्तुत हैं इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश:

दर्शक आपसे तुरंत जुड़ जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह क्या मानते हैं? आपकी स्टोरी टेलिंग फिलॉसफी क्या है?

मुझे लगता है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दर्शकों की भावनाएं और इमोशंस हैं। अगर आप अपने दर्शकों के साथ भावनात्मक रिश्ता बना लेते हैं तो फिर वह रिश्ता सिर्फ एंकर और दर्शक का नहीं रह जाता, बल्कि परिवार जैसा बन जाता है। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि मैं टीवी पर बैठा एक पत्रकार हूं और सामने सिर्फ दर्शक बैठे हैं। मैंने हमेशा अपने हर शो और हर प्रसारण में यही कोशिश की कि मैं खुद को उनके परिवार का सदस्य मानकर बात करूं।

मेरे लिए पत्रकारिता सिर्फ खबर सुनाना नहीं है, बल्कि लोगों को उनकी जिंदगी से जुड़े मुद्दों को सरल तरीके से समझाना भी है। दूसरी चीज स्टोरी सलेक्शन है। आपके पास एक घंटा होता है और उस एक घंटे में आपको ऐसा कंटेंट देना होता है जो पूरे परिवार के काम का हो। जैसे किसी घर में माता-पिता हैं तो उनकी चिंताएं अलग हैं, युवा हैं तो उनके करियर की चिंता अलग है, बच्चे हैं तो सोशल मीडिया और नई चुनौतियों की बातें अलग हैं। मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि शो ऐसा हो जिसमें हर वर्ग के दर्शक को लगे कि यह शो उसकी जिंदगी से जुड़ा हुआ है। मुझे लगता है कि यही वजह है कि दर्शक अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर भी मेरे साथ जुड़े रहते हैं। जहां भी मैं गया, दर्शकों का प्यार और आशीर्वाद मेरे साथ आया और वही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।

‘ब्रैंड सुधीर चौधरी’ बनने का राज क्या है?

मेरे ख्याल से इसका सबसे बड़ा राज विनम्रता और ईमानदारी है। आप दर्शकों के काम की बात कीजिए और अपने प्रसारण में ईमानदारी रखिए। हमारे देश के लोग बहुत समझदार हैं। जैसे लोग किसी कंपनी के ब्रैंड को देखकर समझ जाते हैं कि वह ईमानदार है या सिर्फ पैसा कमाना चाहती है, वैसे ही टीवी पर दिखने वाले लोगों के बारे में भी वे राय बना लेते हैं।

दर्शक बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि सामने बैठा व्यक्ति ईमानदारी से बात कर रहा है या सिर्फ अपनी बात बेचने की कोशिश कर रहा है। मैं यहां कुछ बेचने नहीं आया हूं। मैं अपनी बात ईमानदारी से दर्शकों तक पहुंचाने आया हूं और खुद को उनकी जिंदगी की यात्रा का सहभागी मानता हूं।

मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अगर दर्शक अपना कीमती समय मुझे दे रहे हैं तो उसके बदले उन्हें कुछ सार्थक मिलना चाहिए। यही कारण है कि मैंने कभी सिर्फ शोर मचाने या सनसनी फैलाने वाली पत्रकारिता में विश्वास नहीं किया। मेरे लिए भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है और उसी भरोसे ने मुझे ‘ब्रैंड सुधीर चौधरी’ बनाया।

डिकोड’ की लगातार बढ़ती लोकप्रियता के पीछे क्या फैक्टर है?

मुझे लगता है कि यह कई चीजों का कॉम्बिनेशन है—मेहनत, रिसर्च, प्रेजेंटेशन और सरल भाषा। हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों वाले दिन हमारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लगभग 55 लाख व्यूज आए थे। लेकिन इतने बड़े डेटा में से दर्शकों के लिए जरूरी 10 आसान पॉइंट निकालना बहुत कठिन काम होता है। उसके लिए लगातार रिसर्च करनी पड़ती है, डेटा को समझना पड़ता है और फिर उसे बेहद आसान भाषा में दर्शकों तक पहुंचाना पड़ता है।

मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रहती है कि कौन सी जानकारी दर्शकों के लिए जरूरी है और कौन सी अनावश्यक। मैं लगातार खुद को फिल्टर करता रहता हूं कि यह जानकारी हटानी चाहिए या रखनी चाहिए। मुझे लगता है कि मेरी सबसे बड़ी ताकत सरलता है और वही सबसे मुश्किल चीज भी है।

इसके अलावा दर्शकों को एक ओवरऑल अनुभव देना भी जरूरी है। सिर्फ खबर पढ़ देना काफी नहीं होता। दर्शकों को यह महसूस होना चाहिए कि उन्हें कुछ नया, उपयोगी और भरोसेमंद मिल रहा है। शायद यही वजह है कि ‘डिकोड’ लगातार दर्शकों के बीच अपनी जगह मजबूत कर रहा है।

डीडी न्यूज के साथ आपका अनुभव कैसा रहा? क्या सरकारी चैनल होने की वजह से कोई सीमाएं महसूस हुईं?

जब मैं डीडी न्यूज से जुड़ने जा रहा था तो कई लोगों ने मुझे बहुत तरह की बातें बताईं। कहा गया कि सरकारी चैनल में काम करने की आजादी नहीं होती, वहां सीमाएं होती हैं और बहुत प्रोफेशनल माहौल नहीं होता। लेकिन मेरा अनुभव बिल्कुल अलग रहा। मुझे वहां बहुत अच्छी टीम मिली और कभी किसी तरह का दबाव महसूस नहीं हुआ। अगर मुझे कोई नया फॉर्मेट ट्राई करना हो, नई टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी हो या शो को नए तरीके से प्रस्तुत करना हो, तो पूरा सहयोग मिला।

हमने डिजिटल लाइव व्यूअरशिप स्क्रीन पर दिखाने जैसा नया प्रयोग किया, जो उस समय कई प्राइवेट चैनलों ने भी नहीं किया था। आज हमें एक शो पर 50 लाख तक व्यूज मिल रहे हैं और एक साल में लगभग 1.3 बिलियन व्यूज मिले हैं। यह अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

जहां तक राजनीतिक दबाव की बात है, मुझे कभी कोई फोन नहीं आया कि यह करना है या नहीं करना है। लेकिन एक नेशनल ब्रॉडकास्टर होने के नाते आपकी जिम्मेदारी जरूर बढ़ जाती है। लोग आपकी राय को देश की राय मानते हैं, इसलिए संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी होता है।

आज के दौर में सार्थक और गंभीर पत्रकारिता को बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण है?

देखिए, आज ज्यादातर लोग इंफॉर्मेशन से ज्यादा अटेंशन पर फोकस कर रहे हैं। अगर कोई जोर-जोर से बोलेगा या सनसनी फैलाएगा तो लोग एक बार जरूर देखेंगे, लेकिन लंबे समय तक भरोसा नहीं बनाए रख पाएंगे। मैंने हमेशा शांत और गंभीर पत्रकारिता में विश्वास किया है।

मेरा फॉर्मेट हमेशा से ऐसा रहा है, जिसमें खबर को आराम से, विस्तार से और सरल भाषा में समझाया जाए। मेरा मानना है कि दर्शक सिर्फ शोर नहीं चाहते, वे भरोसेमंद जानकारी भी चाहते हैं। अगर आप लगातार ईमानदारी से काम करेंगे तो दर्शक आपके साथ बने रहते हैं।

आपके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है, व्युअरशिप नंबर्स या दर्शकों का भरोसा?

मेरे लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण दर्शकों का भरोसा है। अगर दर्शक आप पर भरोसा करते हैं तो वे खुद आपके पास आएंगे। लेकिन सिर्फ नंबर्स आने का मतलब यह नहीं कि लोग आप पर भरोसा भी करते हैं। आज बहुत लोग पहले अटेंशन चाहते हैं और बाद में भरोसा। लेकिन मेरी सोच इसके उलट है। मैं पहले भरोसा चाहता हूं। अगर दर्शक यह मान लें कि आप ईमानदारी से अपनी बात रख रहे हैं, तो नंबर्स अपने आप आ जाएंगे।

नंबर्स मेरे लिए बाय-प्रोडक्ट हैं। असली मंजिल भरोसा है। एक बार भरोसा टूट गया तो फिर उसे वापस पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि दर्शकों का भरोसा कभी टूटने न पाए।

आजकल बहुत ज्यादा चर्चा में रहने वाले गोदी मीडिया’ शब्द को आप कैसे देखते हैं?

मेरे हिसाब से यह सोशल मीडिया की उपज है। कुछ लोग एजेंडा चलाते हैं और वही शब्द धीरे-धीरे ट्रेंड बन जाते हैं। अगर आप जमीन पर लोगों के बीच जाएंगे तो आपको इस तरह की सोच बहुत कम दिखाई देगी। असल ‘गोदी मीडिया’ तो उस दौर में था जब बिना मजबूत जनादेश वाली सरकारें थीं और कुछ पत्रकार सत्ता के बदले फायदे लेते थे जैसे-पुरस्कार, पद, संरक्षण और दूसरी सुविधाएं। आज स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। अगर जनता किसी नेता या विचार के साथ खड़ी है और पत्रकार उसी भावना को दिखा रहा है, तो उसे गोदी मीडिया कहना गलत है। पत्रकारिता में जनता की सोच और फैसले को समझना और दिखाना भी जरूरी होता है।

न्यूजरूम में AI एंकरों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर आपकी क्या राय है?

AI एंकर कभी इंसानी एंकर जैसा भावनात्मक रिश्ता नहीं बना पाएंगे। दर्शक किसी ऐसे चेहरे पर भरोसा नहीं करेंगे जिसका कोई असली अनुभव या पहचान न हो। हां, भविष्य में ऐसा हो सकता है कि मेरा AI अवतार मेरी ही बात दर्शकों तक पहुंचाए, लेकिन वह भी तभी चलेगा जब उसके पीछे असली इंसान की विश्वसनीयता होगी। भारत जैसे देश में लोग सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि भरोसा और जुड़ाव भी देखते हैं। यही वजह है कि इंसानी एंकर की जगह AI पूरी तरह नहीं ले पाएगा।

AI के जरिए फर्जी वीडियो और आपकी आवाज के दुरुपयोग को लेकर आपने क्या कदम उठाए?

मुझे कई बार लोगों ने ऐसे वीडियो भेजे जिनमें मेरा चेहरा और आवाज इस्तेमाल की गई थी, जबकि मैंने वह बातें कही ही नहीं थीं। इसके बाद मैंने कानूनी रास्ता चुना और दिल्ली हाई कोर्ट में अपने पर्सनालिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए अर्जी लगाई।

कोर्ट से आदेश मिलने के बाद अब अगर कोई मेरे चेहरे या आवाज का गलत इस्तेमाल करता है तो उसे तुरंत नोटिस भेजा जाता है और कंटेंट हटवाया जाता है। लेकिन यह आने वाले समय की बहुत बड़ी चुनौती है। जैसे डिजिटल फ्रॉड बढ़े हैं, वैसे ही AI आधारित फेक कंटेंट भी तेजी से बढ़ेगा। इसके लिए समाज और कानून दोनों को तैयार होना पड़ेगा।

ट्रोलिंग और सोशल मीडिया हमलों को आप कैसे हैंडल करते हैं?

इतने वर्षों में अब समझ आ जाता है कि कौन सा फीडबैक असली दर्शक का है और कौन संगठित आईटी सेल का हिस्सा है। जो लोग एजेंडा चलाने के लिए ट्रोलिंग करते हैं, उन्हें मैं ज्यादा महत्व नहीं देता। लेकिन अगर कोई गंभीर दर्शक अपनी नाराजगी या सुझाव देता है तो मैं उसे बहुत गंभीरता से लेता हूं और जरूरत हो तो तुरंत सुधार भी करता हूं। सोशल मीडिया पर बहुत कुछ सिर्फ दबाव बनाने के लिए किया जाता है ताकि आप अपनी राय बदल लें, लेकिन पत्रकार को अपने काम पर फोकस रखना चाहिए।

अगर आपको अपना न्यूज चैनल शुरू करना हो तो उसमें किन चीजों पर फोकस करना चाहेंगे?

मैं पहले भरोसा और फिर नंबर्स वाले मॉडल पर काम करूंगा। आज ज्यादातर जगह पहले अटेंशन और बाद में जानकारी देने की कोशिश होती है। मेरा हमेशा से ‘स्लो जर्नलिज्म’ में विश्वास रहा है, आराम से बैठकर खबर समझाइए। जैसे कि मेरा मानना है कि अगर मैं वर्ष 2026 में चैनल शुरू करूं तो वह 2026 जैसा दिखना चाहिए। आज भी कई चैनलों का फॉर्मेट 90 के दशक जैसा लगता है। हालांकि सच यह है कि न्यूज चैनल शुरू करना बहुत महंगा काम है। 150-200 करोड़ रुपये सालाना खर्च वाली संस्था खड़ी करना आसान नहीं होता।

डीडी न्यूज से जुड़ने के दौरान आपकी सैलरी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। इस पर क्या कहेंगे?

मेरी सैलरी निजी जानकारी थी। वह कॉन्ट्रैक्ट लीक हुआ और फिर उस पर चर्चा शुरू हो गई। इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या दोनों होती हैं। लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि जो वैल्यू और आउटपुट मैं देता हूं, उसके हिसाब से उस रकम को सिर्फ मेरी सैलरी नहीं, बल्कि पूरे शो का प्रोडक्शन कॉस्ट समझना चाहिए। मैं तो चाहता हूं कि न्यूज इंडस्ट्री में भी लोगों को उतना पैसा मिले जितना क्रिकेट, सिनेमा और दूसरे क्षेत्रों में मिलता है।

मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग होकर तमाम पत्रकारों का यूट्यूब की ओर जाने को आप कैसे देखते हैं?

बहुत लोग कहते हैं कि उन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया में आजादी नहीं मिल रही थी, इसलिए वे यूट्यूब की ओर गए। लेकिन मेरी राय में ज्यादातर लोग वहां तब पहुंचे जब उन्हें मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं मिली। यूट्यूब का बिजनेस मॉडल व्यूज पर चलता है। जितनी सनसनी, उतने ज्यादा व्यूज और उतना ज्यादा पैसा। यही वजह है कि वहां कई बार भाषा और प्रस्तुति काफी आक्रामक हो जाती है। मेनस्ट्रीम मीडिया आज भी बड़ा मंच है। वहां काम करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों ज्यादा होती हैं।

आपने कुछ समय पहले फिल्म निर्माण में कदम रखा है, इस फील्ड में आने का फैसला कैसे हुआ?

न्यूज और सिनेमा दोनों स्टोरी टेलिंग हैं। मुझे हमेशा लगता था कि न्यूज के बाद अगला कदम सिनेमा होगा। ‘द टेरर रिपोर्ट’ आतंकवाद पर आधारित फिल्म है। इसमें ऑपरेशन सिंदूर समेत कई घटनाएं शामिल हैं। वेव्स कॉन्फ्रेंस के दौरान मेरी और एकता कपूर की बातचीत हुई और वहीं से यह आइडिया आगे बढ़ा। इसके बाद दोनों ने मिलकर इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। आगे सिर्फ न्यूज आधारित फिल्में ही नहीं, किसी भी तरह की कहानी हो सकती है। मुझे सिनेमा की स्टोरी टेलिंग बहुत पसंद है क्योंकि उसमें ठहराव और क्रिएटिविटी की ज्यादा गुंजाइश होती है।

नवागत पत्रकारों और अपने प्रशंसकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

सफलता दूर से आसान लगती है, लेकिन उसके पीछे बहुत मेहनत और त्याग होता है। सबसे जरूरी चीज है- परिश्रम, स्किल और निरंतरता। आपके पास ऐसा क्या है कि लोग अपना कीमती समय आपको दें, इसका जवाब आपके पास होना चाहिए। सिर्फ प्रसिद्धि पाने की इच्छा काफी नहीं होती। मैं 2016 के बाद कभी छुट्टी पर नहीं गया। दर्शक जानते हैं कि रात 9 बजे मैं जरूर आऊंगा। यही निरंतरता धीरे-धीरे भरोसा बनाती है।

सफलता की सबसे बड़ी कीमत बर्नआउट और निजी जिंदगी से दूरी है। जब आप रोज एक तय समय पर लाइव शो करते हैं तो आपकी जिंदगी काफी हद तक मशीन जैसी हो जाती है। परिवार, दोस्त, छुट्टियां और सोशल लाइफ धीरे-धीरे पीछे छूटने लगते हैं। कई बार आपको बीमार होने पर भी काम करना पड़ता है। लोग दूर से सिर्फ सफलता देखते हैं, लेकिन उसके पीछे कितनी निरंतरता, अनुशासन और त्याग होता है, वह बहुत कम लोगों को दिखाई देता है।

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जब तैयारी और अवसर मिलते हैं, तभी लोग आपको भाग्यशाली कहते हैं: प्रशांत कुमार

डॉ. अनुराग बत्रा के साथ हुई बातचीत में, WPP Media South Asia के CEO प्रशांत कुमार ने बतया कैसे बदलते कंज्यूमर व्यवहार, AI की तेजी और रिजल्ट-आधारित बिजनेस मॉडल मीडिया सर्विसेज को पूरी तरह बदल रहे हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 29 April, 2026
Last Modified:
Wednesday, 29 April, 2026
PrashantKumar541

भारत का विज्ञापन बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन जो विज्ञापन एजेंसियों का पारंपरिक बिजनेस मॉडल है, उस पर दबाव बढ़ रहा है और वह पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है। ऐसे माहौल में WPP Media South Asia के CEO प्रशांत कुमार साफ कहते हैं कि अब “खेल के नियम” (rules of the game) बदल चुके हैं, यानी मीडिया और विज्ञापन का पूरा तरीका पहले जैसा नहीं रहा।

BW बिजनेसवर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक विस्तृत बातचीत में प्रशांत कुमार अपनी सोच रखते हैं कि मीडिया अब सिर्फ एक अलग (साइलो) फंक्शन नहीं रहा, बल्कि यह मार्केटिंग का मुख्य ऑपरेटिंग लेयर (मुख्य रीढ़) बन चुका है, जो डेटा, टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेटेड थिंकिंग से चलता है।  

लगातार तैयार रहने की संस्कृति

प्रशांत कुमार कह रहे हैं कि उनकी कंपनी की सफलता सिर्फ बड़ी होने की वजह से नहीं है, बल्कि उनकी एक ऐसी कार्य संस्कृति (culture) है जहां हर समय तैयार रहने की आदत है। वे अपने 22 साल के अनुभव के आधार पर बताते हैं कि असली सफलता तब मिलती है जब आपकी तैयारी सही समय पर मौके से मिलती है। इसी वजह से लोग इसे “किस्मत” कहते हैं, लेकिन उनके अनुसार यह असल में तैयारी का नतीजा होता है।

उनका कहना है कि उनकी टीम हमेशा तैयार रहने की सोच के साथ काम करती है- यानी हर समय सीखने, बदलने और नए हालात के अनुसार खुद को ढालने की मानसिकता। क्योंकि मीडिया और मार्केटिंग की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है, इसलिए पुराने तरीके हर साल काम नहीं करते।

वे यह भी समझाते हैं कि यह तैयारी एक बार की चीज नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जो जिज्ञासा और नए तरीकों को अपनाने की इच्छा से आती है। जैसे-जैसे लोगों का व्यवहार अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स और फॉर्मैट्स पर बदल रहा है, वैसे-वैसे रणनीतियां भी बदलनी पड़ती हैं।

वैसे उनका मुख्य संदेश यह है कि आज के समय में मीडिया इंडस्ट्री इतनी तेजी से बदल रही है कि कल का सफल तरीका आज के लिए पुराना हो चुका होता है।

मार्केटिंग ट्रांसफॉर्मेशन के केंद्र में मीडिया

प्रशांत कुमार कहते हैं कि अब मीडिया सिर्फ विज्ञापन दिखाने या चलाने का एक आख़िरी स्टेप नहीं रह गया है। पहले मीडिया को बस एक ऐसा हिस्सा माना जाता था जहां ब्रैंड अपना ऐड टीवी, डिजिटल या किसी प्लेटफॉर्म पर चलाते थे। लेकिन अब बदलाव यह है कि मीडिया खुद पूरी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का केंद्र बन गया है। 

उनके अनुसार अब कंपनियां मीडिया की मदद से सीधे उपभोक्ता को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं कि वह क्या देख रहा है, कब देख रहा है और किस समय उसे कौन सा संदेश सबसे ज्यादा असर करेगा। यानी मीडिया अब सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि ग्राहक को समझने और उससे जुड़ने का तरीका भी बन गया है।

वे यह भी बताते हैं कि आज कंटेंट, कॉमर्स (commerce) और डेटा तीनों एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। इसका मतलब यह है कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐड या कंटेंट को देखता है, तो उससे खरीदारी होने की संभावना बनती है और अगर वह खरीदारी करता है, तो उसका डेटा आगे और बेहतर मार्केटिंग में इस्तेमाल होता है।

इस वजह से मीडिया, मार्केटिंग और सेल्स के बीच की सीमाएं धुंधली हो रही हैं। अब एजेंसियों का काम सिर्फ विज्ञापन चलाना नहीं रह गया है, बल्कि पूरे बिजनेस और मार्केटिंग की समस्या को हल करना हो गया है।

नया एजेंसी मैनडेट: प्रॉब्लम सॉल्विंग

अब मार्केटिंग और विज्ञापन की दुनिया में सिर्फ एजेंसियां ही नहीं, बल्कि कंसल्टिंग कंपनियां, टेक प्लेटफॉर्म्स और डेटा कंपनियां भी बहुत गहराई से काम करने लगी हैं। इससे एजेंसियों के लिए कम्पटीशन पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। लेकिन प्रशांत कुमार इसे खतरे की तरह नहीं देखते। उनके अनुसार यह बदलाव एजेंसियों को और साफ सोचने पर मजबूर करता है कि उनका असली काम क्या है और वे आखिर किस समस्या को हल कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि सबसे जरूरी चीज यह है कि पहले यह बिल्कुल साफ हो कि असली समस्या क्या है। उनकी कंपनी का फोकस हमेशा ग्राहक को समझने पर रहता है, यानी लोग क्या चाहते हैं, कैसे सोचते हैं और किस तरह का संदेश उनके लिए काम करेगा। 

उनका मानना है कि अगर समस्या सही तरीके से समझ ली जाए, तो उसका सही समाधान अपने आप निकल आता है। लेकिन अक्सर दिक्कत यही होती है कि क्लाइंट और एजेंसी के बीच समस्या को समझने में ही स्पष्टता नहीं होती। इसलिए वे यह जोर देते हैं कि किसी भी मार्केटिंग काम का नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि शुरुआत में समस्या को कितनी सही और साफ तरह से परिभाषित किया गया है।

कमीशन से आगे नया बिजनेस मॉडल

पिछले 20 सालों में मीडिया और विज्ञापन एजेंसियों का बिजनेस करने का तरीका काफी बदल गया है। पहले एजेंसियां ज्यादातर कमीशन पर काम करती थीं, यानी जितना विज्ञापन खर्च होता था, उसका एक हिस्सा उन्हें मिल जाता था। लेकिन अब वह मॉडल धीरे-धीरे कम हो गया है। उसकी जगह कई नए तरीके आ गए हैं, जैसे फिक्स्ड फीस, परफॉर्मेंस पर आधारित पेमेंट, और ऐसे मॉडल जहाँ एजेंसी को तब ज्यादा फायदा होता है जब उसका काम अच्छे नतीजे देता है।

प्रशांत कुमार इसे किसी संकट की तरह नहीं देखते, बल्कि एक स्वाभाविक बदलाव मानते हैं। उनके अनुसार एजेंसियां अकेले नहीं हैं, बल्कि एक बड़े सिस्टम का हिस्सा हैं जहाँ वे ग्राहकों और पार्टनर्स के लिए समाधान बनाती हैं, और उनका असली मकसद सभी के लिए ग्रोथ लाना होता है।

वे यह भी बताते हैं कि आज अलग-अलग तरह के मॉडल मौजूद हैं। कहीं फीस मिलती है, कहीं कमीशन, और कहीं सीधे नतीजों (outcome) के आधार पर पैसा मिलता है। लेकिन हर मॉडल की असली जड़ सफलता ही है, यानी अगर काम अच्छा होगा तो कमाई भी उसी हिसाब से होगी।

उनका सबसे अहम विचार यह है कि एजेंसियों को अब जिम्मेदारी से डरना नहीं चाहिए। उन्हें अपने काम की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि आज के समय में वही एजेंसियां टिकेंगी जो अपने नतीजों की ओनरशिप खुद लेती हैं और उसे मजबूती से निभाती हैं।

पिच जीतने में टैलेंट और इंटीग्रेशन

जब किसी कंपनी को कोई बड़ा विज्ञापन या मार्केटिंग प्रोजेक्ट मिलता है, तो उसे जीतने (pitch जीतने) में सिर्फ कम कीमत या सस्ता ऑफर देना सबसे अहम चीज नहीं है।

प्रशांत कुमार के अनुसार असली फर्क उस टीम के लोगों की काबिलियत (talent) से पड़ता है। यानी कौन लोग उस काम को कर रहे हैं, उनकी सोच, अनुभव और समझ कितनी मजबूत है, यही सबसे बड़ी ताकत होती है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि आज की दुनिया में टैलेंट खुद भी लगातार बदल रहा है, इसलिए उसे संभालना और अपडेट रखना एक बड़ी चुनौती भी है।

इसके साथ ही वे यह समझाते हैं कि अब मार्केटिंग इंडस्ट्री फिर से इस दिशा में जा रही है जहाँ अलग-अलग काम (जैसे क्रिएटिव, मीडिया, डेटा, टेक्नोलॉजी) को अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखा जा रहा, बल्कि सबको मिलाकर एक साथ समाधान देने पर जोर है।

उनका कहना है कि स्पेशलाइजेशन और इंटीग्रेशन को अलग-अलग विभागों की तरह नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसे एक बड़े नतीजे (outcome) के हिसाब से समझना चाहिए, यानी ग्राहक को क्या फायदा मिला, यह सबसे अहम है।

वे एक आसान उदाहरण देते हैं कि जैसे एक ऑर्केस्ट्रा में कई अलग-अलग वाद्य यंत्र (instruments) अलग-अलग लोग बजाते हैं, लेकिन असली खूबसूरती तब बनती है जब सब मिलकर सही तालमेल में एक साथ संगीत बनाते हैं। इसी तरह मार्केटिंग में भी अलग-अलग विशेषज्ञ मिलकर काम करें तभी सबसे अच्छा रिजल्ट आता है।

क्लाइंट की तीन बड़ी प्राथमिकताएं

प्रशांत कुमार बता रहे हैं कि आज के समय में जो बड़े ब्रैंड्स के CEO और CMO होते हैं, वे मार्केटिंग फैसलों में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। पहली बात यह कि उन्हें आज ही ग्रोथ चाहिए, यानी अभी के अभी बिजनेस बढ़े और बिक्री (sales) में सुधार हो। दूसरी बात यह कि जो पैसा वे अभी विज्ञापन या मार्केटिंग में लगा रहे हैं, उससे उन्हें बेहतर performance और ज्यादा असर चाहिए, यानी हर रुपये का पूरा फायदा मिले। तीसरी बात यह कि वे सिर्फ आज के बारे में नहीं सोच रहे, बल्कि भविष्य के लिए भी खुद को तैयार करना चाहते हैं, ताकि आगे चलकर उनका ब्रैंड मजबूत स्थिति में रहे और प्रतिस्पर्धा में आगे बना रहे।

वे भारत को सिर्फ एक सामान्य बाजार नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर मानते हैं, जहाँ कंपनियां यह सोच रही हैं कि कैसे लगातार मांग (demand) बनाई जाए, आज बेहतर नतीजे कैसे मिलें और कल के लिए भी एक मजबूत बढ़त (edge) कैसे तैयार की जाए। इस वजह से मार्केटिंग पहले से ज्यादा जटिल हो गई है, क्योंकि अब कंपनियों को एक साथ आज का रिजल्ट भी चाहिए और भविष्य की तैयारी भी।

प्रशांत कुमार का मानना है कि इसका समाधान तभी निकल सकता है जब क्लाइंट, एजेंसी और बाकी पार्टनर्स मिलकर काम करें। अगर समस्या को शुरू में सही तरीके से समझ लिया जाए और पार्टनर्स को सही दिशा और आजादी दी जाए, तो बेहतर समाधान निकाले जा सकते हैं।

वे यह भी कहते हैं कि टेक्नोलॉजी, डेटा और कंटेंट अब अलग-अलग नहीं चल सकते, जब ये तीनों एक साथ आते हैं, तभी नए और बेहतर आइडिया और इनोवेशन पैदा होते हैं।

स्ट्रक्चरल प्रेशर के बीच ग्रोथ

WPP Media हाल के समय में कई नए बड़े और छोटे क्लाइंट्स जीतने में सफल रही है, और यह दिखाता है कि कंपनी बदलते हुए मार्केट के हिसाब से खुद को अच्छी तरह ढाल रही है।

प्रशांत कुमार यह बताते हैं कि कंपनी की रणनीति सिर्फ बड़े ब्रैंड्स पर निर्भर रहने की नहीं है, बल्कि वह छोटे और नए ग्राहकों पर भी उतना ही ध्यान देती है, क्योंकि आज का छोटा ग्राहक कल बड़ा बिजनेस बन सकता है। उनके लिए नया बिजनेस हासिल करना बिल्कुल नए ग्राहक जोड़ने जैसा है, जो भविष्य में बड़े अवसर बन सकता है।

लेकिन साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि पूरी इंडस्ट्री कुछ मुश्किलों का सामना कर रही है। भले ही विज्ञापन पर खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन एजेंसियों को मिलने वाला मुनाफा उतना नहीं बढ़ रहा। खासकर डिजिटल दुनिया में, जहां कुछ बड़े प्लेटफॉर्म्स का दबदबा है, वहाँ एजेंसियों पर दबाव बना हुआ है।

साधारण भाषा में समझें तो हालात यह हैं कि मार्केट बड़ा हो रहा है और काम भी बढ़ रहा है, लेकिन उस काम से एजेंसियों को उतना फायदा नहीं मिल पा रहा जितना पहले मिलता था।

डिजिटल ड्यूपोली और डाइवर्सिफिकेशन

आज विज्ञापन का बहुत बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जा रहा है, लेकिन इसके साथ कुछ चिंताएं भी बढ़ गई हैं। जैसे कि कितना पैसा सही तरीके से खर्च हो रहा है, कितना विज्ञापन असली लोगों तक पहुंच रहा है, और कहीं धोखाधड़ी (ad fraud) तो नहीं हो रही।

प्रशांत कुमार मानते हैं कि मौजूदा सिस्टम में अच्छी और बुरी दोनों बातें हैं। बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के पास बहुत बड़ा स्केल और लगातार नए इनोवेशन की ताकत है, लेकिन उसी वजह से कुछ कंपनियों का बहुत ज्यादा दबदबा भी बन गया है। इसका असर यह होता है कि बाकी नए खिलाड़ी भी बीच-बीच में नए समाधान लेकर आते हैं और पूरा सिस्टम और भी प्रतिस्पर्धी हो जाता है।

वे यह भी जोर देते हैं कि इस पूरे डिजिटल इकोसिस्टम में लगातार नजर रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि चीजें बहुत तेजी से बदलती हैं। हर कुछ दिनों में नई टेक्नोलॉजी, नया प्लेटफॉर्म या नया तरीका सामने आ जाता है, इसलिए कंपनियों को हमेशा अपडेट रहना पड़ता है।

आगे वे बताते हैं कि अब सिर्फ पारंपरिक विज्ञापन ही नहीं, बल्कि commerce media (जहाँ विज्ञापन सीधे खरीदारी से जुड़ा होता है), connected TV और performance-based OTT जैसे नए क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं। ये सब मिलकर पूरे मीडिया सिस्टम को और ज्यादा फैला रहे हैं।

उनके अनुसार WPP Media की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा अब इन नए और पारंपरिक न होने वाले क्षेत्रों से आ रहा है, जैसे कंटेंट, डेटा, एनालिटिक्स, ई-कॉमर्स और influencer marketing। और यह सिर्फ एक छोटा बदलाव नहीं है, बल्कि पूरी इंडस्ट्री के ढांचे (structure) में बड़ा बदलाव है।

अंत में उनका मतलब यह है कि अब एजेंसियां सिर्फ विज्ञापन दिखाने वाली कंपनियां नहीं रह गई हैं, बल्कि वे सीधे बिजनेस के नतीजों (business outcomes) से जुड़ रही हैं—यानी ब्रैंड को बिक्री, ग्रोथ और असली बिजनेस असर दिलाने पर ज्यादा फोकस कर रही हैं, सिर्फ व्यू या क्लिक जैसे पुराने मापदंडों पर नहीं।

इंटीग्रेशन एक स्ट्रेटेजिक जरूरत

WPP की वैश्विक (global) रणनीति अब इस दिशा में जा रही है कि अलग-अलग चीजों (जैसे डेटा, टेक्नोलॉजी और क्रिएटिविटी) को अलग-अलग काम न मानकर एक साथ जोड़कर काम किया जाए।

वे यह समझाते हैं कि अब सिर्फ बड़ी योजना बनाना काफी नहीं है, असली फर्क तब पड़ता है जब उसे जमीन पर सही तरीके से लागू किया जाए। इसलिए कंपनियां अब साझेदारी (partnership), मिलकर काम करने (co-creation) और एकीकृत (integrated) समाधान पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, क्योंकि यहीं से असली बढ़त मिलती है।

वे यह भी कहते हैं कि भले ही मार्केट में कंपनियों के बीच मुकाबला और consolidation बढ़ रहा है, लेकिन उनका फोकस मार्केट शेयर की लड़ाई पर नहीं है, बल्कि इस बात पर है कि काम कितनी अच्छी तरह से किया जा रहा है। क्योंकि आज जो समाधान काम कर रहा है, वह जरूरी नहीं कि कल भी उतना ही प्रभावी रहेगा।

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को लेकर उनका नजरिया यह है कि यह बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसे वे अकेला समाधान नहीं मानते। उनके अनुसार यह मार्केटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आगे भी बदलता रहेगा और ब्रैंड्स के साथ लोगों को जोड़ने में मदद करेगा, लेकिन इसका तरीका समय के साथ विकसित होता रहेगा।

सबसे बड़ा बदलाव वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मानते हैं। उनके अनुसार AI पहले से ही पूरी इंडस्ट्री को बदल रहा है- योजना बनाने से लेकर काम करने और उसे बेहतर करने तक हर जगह इसका असर दिख रहा है।

वे यह भी कहते हैं कि AI का असली फायदा सिर्फ काम को तेज करना नहीं है, बल्कि जो समय बचता है उसका उपयोग बेहतर क्वालिटी और बेहतर सोच के लिए करना है। यानी भविष्य में एजेंसियों की असली पहचान इस बात से होगी कि वे कितना तेज काम करती हैं, उससे ज्यादा इस बात से होगी कि वे कितना बेहतर परिणाम दे रही हैं।

लीडरशिप: ओनरशिप और ह्यूमिलिटी

प्रशांत कुमार जिस तरह से कंपनी चलाते हैं, वही सोच उनकी लीडरशिप फिलॉसफी में भी दिखती है। वे मानते हैं कि किसी भी काम में सबसे जरूरी चीज है जिम्मेदारी लेना (ownership)। उनका साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति अपने काम की जिम्मेदारी नहीं ले रहा, तो वह अपना समय सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर रहा। उनके अनुसार हर व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि वह टीम और कंपनी में क्या योगदान दे सकता है, और उसी पर ध्यान देना चाहिए।

वे यह भी कहते हैं कि काम करते हुए इंसान को अपनी असली पहचान बनाए रखनी चाहिए, और साथ ही लगातार सीखते रहना चाहिए। मेहनत का मजा लेना भी जरूरी है, लेकिन उसी के साथ लोगों को बेहतर करने के लिए प्रेरित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आगे की सोच की बात करें तो वे चाहते हैं कि उनकी कंपनी लगातार आगे बढ़ती रहे और बदलते समय के साथ खुद को अपडेट करती रहे। उनका फोकस इस बात पर है कि ग्राहकों के लिए बेहतर नतीजे दिए जाएं, भविष्य के लिए तैयार टैलेंट तैयार किया जाए, और ऐसा काम किया जाए जो इंडस्ट्री में नया मानक (benchmark) बनाए।

वे यह भी साफ कहते हैं कि उनकी कोशिश सिर्फ बड़े होने या स्केल बढ़ाने की नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति और पूरी टीम दोनों स्तर पर जीत हासिल करने की है। उनके अनुसार लक्ष्य यह है कि लगातार नया और बेहतर काम किया जाए, नए मॉडल बनाए जाएं और बिजनेस को देखने के तरीके को भी बदला जाए।

अंत में उनका पूरा संदेश यह है कि इस बदलती हुई इंडस्ट्री में सफलता सिर्फ बड़े आकार (scale) से नहीं मिलती, बल्कि इस बात से मिलती है कि कंपनी कितनी जिम्मेदारी से काम कर रही है, कितनी relevant बनी हुई है और कितनी अच्छी तरह असली बिजनेस समस्याओं को हल कर रही है।

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CMO को CEO की तरह सोचना होगा, साथ ही CFO जैसी समझ भी जरूरी: हर्ष राजदान

एक विस्तृत बातचीत में, डेंट्सू के साउथ एशिया के सीईओ हर्ष राजदान ने डॉ. अनुराग बत्रा से एजेंसी के काम करने के तरीके, अलग-अलग सर्विसेज को एक साथ देने की रणनीति, AI और अन्य कई मुद्दों पर बात की।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 28 April, 2026
Last Modified:
Tuesday, 28 April, 2026
HarshRazdan5648

देश में बड़ी ऐडवर्टाइजिंग होल्डिंग कंपनियों के बहुत कम CEO ऐसे होते हैं जो बिना पूछे यह कह दें कि उनकी सबसे बड़ी टक्कर किसी दूसरी एजेंसी नेटवर्क से नहीं, बल्कि उसी को-वर्किंग स्पेस में दो फ्लोर नीचे बैठे किसी स्टार्टअप से है। डेंट्सू साउथ एशिया के सीईओ हर्ष राजदान ऐसे ही लीडर्स में से एक हैं। BW बिजनेसवर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक लंबी बातचीत में, हर्ष राजदान ने 'डेंट्सू इंडिया' को दोबारा खड़ा करने में बिताए तीन सालों का खुलकर जिक्र किया और बताया कि वह इसे एक अलग पहचान के साथ आगे ले जाना चाहते हैं।

हर्ष राजदान ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री से नहीं, बल्कि कंसल्टिंग बैकग्राउंड से आए हैं। उन्होंने Accenture में कई साल टेक्नोलॉजी से जुड़े बदलावों पर काम किया। उनका मानना है कि इसी अनुभव ने 'डेंट्सू इंडिया' की जरूरतों को समझने में उनकी सोच को आकार दिया।

उन्होंने बताया, “जब मैं कंपनी में आया, तो पहला काम डेंट्सू को स्थिर करना था, क्योंकि कुछ समय तक हमारे पास CEO नहीं था और माहौल थोड़ा अनिश्चित था। इसलिए कंपनी और लोगों में स्थिरता और भरोसा लाना जरूरी था।” दूसरा फोकस था ग्रोथ बढ़ाना और तीसरा फेज था कंपनी को दूसरों से अलग बनाना (differentiation), लेकिन इसमें AI ने बड़ा बदलाव ला दिया। AI सबसे बड़ा डिसरप्शन रहा है। इसने मेरे तीसरे साल के टारगेट्स को पूरी तरह बदल दिया और दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया।”

एक टीम, एक बिजनेस और एक ही कमाई-खर्च का हिसाब (One dentsu, one P&L)

हर्ष राजदान 'डेंट्सू' में सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव “One dentsu ऑपरेटिंग मॉडल” के रूप में किया। इसके तहत 2024 से कंपनी के टॉप 75 क्लाइंट्स को एक ही P&L (यानी एक ही कमाई-खर्च के हिसाब) के तहत लाया गया और उनके लिए अलग-अलग डेडिकेटेड टीमें बनाई गईं, जिनका प्रदर्शन भी एक साथ आंका जाता है।

यह आइडिया उन्हें किसी रिपोर्ट या इंटर्नल ऑडिट से नहीं मिला, बल्कि उन्होंने खुद 50–60 CEOs से सीधे मिलकर समझा। उन्होंने कहा, “अगर आप उनसे सीधे नहीं मिलते, तो सही फीडबैक नहीं मिलता। हमें समझ आया कि हम अपनी सर्विस बेचने की कोशिश कर रहे थे, क्लाइंट की समस्या समझने की नहीं और क्लाइंट का सवाल था- “क्या मेरा बिजनेस बढ़ेगा?”

यही सोच बदलकर (सर्विस बेचने से हटकर क्लाइंट की ग्रोथ की समस्या सुलझाने तक) अब dentsu की पूरी रणनीति बन गई है। इसी वजह से टैलेंट स्ट्रैटेजी भी अलग है। कंपनी ने अलग-अलग इंडस्ट्री से टैलेंट भी हायर किया है- जैसे अब 'डेंट्सू इंडिया' में BFSI हेड पहले Bain & Company में थे, कंज्यूमर और इंडस्ट्रियल लीड Big Four से हैं और हायरिंग Amazon और Flipkart से हो रही है।

हर्ष राजदान कहते हैं, “हमने क्लाइंट से पूछा- आप पिच किसे देंगे? उन्होंने कहा- उस व्यक्ति को जो बिजनेस की भाषा बोल रहा था। बाकी सब एक जैसे थे, लेकिन वह अलग था।” सीधे शब्दों में कहें तो रजदान के मुताबिक, पिच जीतने का फर्क क्रिएटिव से नहीं पड़ता, बल्कि इस बात से पड़ता है कि कौन क्लाइंट से “बिजनेस की भाषा” में बात कर रहा है। जो CEO की तरह सोचकर बात करता है, वही आगे निकलता है।

फिर लौटा बंडलिंग ट्रेंड

पहले इंडस्ट्री में ट्रेंड था कि एजेंसी की अलग-अलग सर्विसेज (जैसे- media, creative, PR, data और technology) को अलग-अलग कंपनियों में बांट दिया जाए (इसे unbundling कहते हैं)। लेकिन अब यह ट्रेंड वापस बदल रहा है। हर्ष राजदान का कहना है कि अब फिर से “बंडलिंग” यानी सारी सर्विसेज एक ही जगह से देने का दौर लौट रहा है, लेकिन फर्क यह होगा कि उस एक सेटअप के अंदर अलग-अलग स्पेशलिस्ट्स मौजूद होंगे।

‘One dentsu’ मॉडल इसी सोच पर आधारित है, जहां बड़े क्लाइंट चाहते हैं कि उन्हें सारी सर्विस एक ही भरोसेमंद पार्टनर से मिले। हालांकि छोटे क्लाइंट, जिनका बजट कम होता है या जिनकी जरूरतें अलग होती हैं, वे अभी भी अलग-अलग एजेंसियों के साथ काम कर सकते हैं।

हर्ष राजदान बोले, “भारत तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए दोनों मॉडल साथ-साथ चलते रहेंगे। अगले 20–25 साल तक ग्रोथ रुकने वाली नहीं है।”

इंडस्ट्री के आंकड़े भी यही दिखाते हैं। 'एक्सचेंज4मीडिया-डेंट्सू डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट' के अनुसार भारत का विज्ञापन खर्च (AdEx) लगातार बढ़ रहा है और कुल विज्ञापन खर्च करीब ₹1,75,000 करोड़ तक पहुंच गया है और डिजिटल का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। फिर भी एजेंसियां उसी रफ्तार से नहीं बढ़ रहीं।

हर्ष राजदान कहते हैं कि खासकर क्रिएटिव साइड पर थोड़ी चुनौती है और असली सवाल यह है कि क्या एजेंसियां क्लाइंट को सच में वैल्यू दे रही हैं? उनके मुताबिक, अगर एजेंसियां खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं होंगी, तो पीछे रह जाएंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ पारंपरिक प्रतिस्पर्धा (दूसरी एजेंसियां) को देखकर नहीं चलना चाहिए, क्योंकि असली खतरा उन छोटे स्टार्टअप्स से है जो तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़ सकते हैं।

जापान कनेक्शन और भारत की भूमिका

डेंट्सू की भारत में जो शुरुआत हुई, उसमें जापान का बड़ा रोल रहा। Sony, Toyota जैसे जापानी क्लाइंट्स के साथ मजबूत रिश्तों ने डेंट्सू को भारत में खड़ा होने में मदद की। लेकिन इसका एक नुकसान भी था- कंपनी का फोकस कहीं ज्यादा जापानी क्लाइंट्स पर ही न टिक जाए। आज डेंट्सू इंडिया की कुल कमाई में जापानी क्लाइंट्स का हिस्सा करीब 14–15% है।

हर्ष राजदान के मुताबिक, 2020 से 2022 के बीच कंपनी की पकड़ थोड़ी कमजोर हुई थी, लेकिन अब वह फिर से मजबूत वापसी कर चुकी है। इसमें नए ग्लोबल CEO Takeshi Sano की भी अहम भूमिका रही, जो खुद भारत आकर जापानी क्लाइंट्स से मिले हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में यह सेगमेंट और तेजी से बढ़ेगा।

लेकिन असली कमाई (65–70%) भारतीय क्लाइंट्स से आती है। इसीलिए डेंट्सू ने Tata, Reliance और Adani जैसे बड़े भारतीय ग्रुप्स के लिए अलग-अलग रिलेशनशिप मैनेजर्स तय किए हैं- ठीक वैसे ही जैसे बड़ी FMCG या कंसल्टिंग कंपनियां करती हैं।

हर्ष रजदान का कहना है कि भारतीय क्लाइंट्स बेहद अहम हैं और यहां लगातार नए मौके तलाशते रहना जरूरी है।

AI खतरा नहीं, बल्कि साथी

हर्ष राजदान का कहना है कि आज की एजेंसी स्ट्रैटेजी में AI को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका साफ मानना है कि AI काम को बेहतर और तेज बनाता है (optimise करता है), जबकि असली नए आइडिया और बदलाव इंसान लाते हैं।

उनके मुताबिक जीत उसी की होगी जो AI को सही तरीके से इस्तेमाल करना सीख जाएगा, न कि उससे डरने लगेगा। टीम के अंदर जॉब सिक्योरिटी या IP को लेकर जो डर है, उसे वह समझते हैं, लेकिन उनका मानना है कि असली खतरा जल्दी चलने में नहीं, बल्कि धीमे चलने में है।

इसीलिए 'डेंट्सू इंडिया' में AI और ओपन-सोर्स टीम सीधे उन्हें रिपोर्ट करती है, ताकि फैसले तेजी से हो सकें। उनका कहना है कि इतनी बड़ी कंपनी में बदलाव तभी होता है जब वह ऊपर से लीड किया जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि अपनी ही टेक्नोलॉजी (tools) बहुत ज्यादा बनाने के बजाय मार्केट में जो अच्छा है, उसका इस्तेमाल करना ज्यादा समझदारी है, क्योंकि टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदलती है और जल्दी आउटडेटेड हो सकती है।

जहां तक क्लाइंट्स का सवाल है, उन्होंने बताया कि AI स्टार्टअप्स तेजी और इनोवेशन देते हैं, लेकिन उनमें रिस्क भी होता है (जैसे बंद हो जाना या डेटा/IP का खतरा)। वहीं बड़ी एजेंसियों पर भरोसा इसलिए किया जाता है क्योंकि वे ब्रैंड को सुरक्षित और सही तरीके से संभालती हैं।

कुल मिलाकर AI का सही बैलेंस, स्पीड और भरोसे के साथ, ही आगे जीत दिलाएगा।

स्पोर्ट्स, एक्सपीरिएंशियल और नए दांव

हर्ष राजदान के कार्यकाल में 'डेंट्सू इंडिया' ने कुछ नई सर्विसेज शुरू की हैं, जिनमें स्पोर्ट्स और एंटरटेनमेंट पर खास फोकस है। जापान में 'डेंट्सू' की स्पोर्ट्स दुनिया (जैसे फुटबॉल, Olympic Games और anime) में मजबूत पकड़ है, इसलिए यह भारत में भी एक बड़ा मौका माना जा रहा है।

लेकिन हर्ष रजदान का नजरिया थोड़ा अलग है। उनका कहना है कि फोकस सिर्फ क्रिकेट पर नहीं होना चाहिए, बल्कि esports, e-motor racing और गेमिंग जैसे नॉन-क्रिकेट क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वहां अभी काफी ग्रोथ की गुंजाइश है। इसी वजह से उन्होंने इस वर्टिकल को संभालने के लिए एक जापानी एक्सपर्ट को जिम्मेदारी दी है, ताकि ग्लोबल अनुभव को भारत में लाया जा सके।

इसके साथ ही, लाइव इवेंट्स और experiential marketing (यानी लोगों को ब्रैंड का असली अनुभव देना) भी उनकी रणनीति का बड़ा हिस्सा है। जैसे-जैसे AI और टेक्नोलॉजी बढ़ रही है, वैसे-वैसे इंसानी अनुभव (human touch) की वैल्यू भी बढ़ रही है। यह ट्रेंड होटल इंडस्ट्री, कॉन्सर्ट्स और ब्रैंड इवेंट्स में साफ दिख रहा है।

हर्ष रजदान कहते हैं, “आज के समय में लाइव इवेंट्स खुद एक बड़ा मौका बन चुके हैं। अगर कोई ब्रैंड इन्हें नजरअंदाज कर रहा है, तो वह एक बड़ा फायदा खो रहा है।”

CMO को CFO की तरह सोचना होगा

हर्ष राजदान का का कहना है कि आज CMO (Chief Marketing Officer) की भूमिका बदल रही है और उसे भी अपने सोचने का तरीका बदलना होगा। अभी ज्यादातर क्लाइंट ब्रीफ ऐसे बनते हैं जैसे कोई सर्विस खरीद रहे हों- यानी फोकस “क्या खरीदना है” पर होता है, न कि “बिजनेस कैसे बढ़ेगा” पर।

हर्ष रजदान के मुताबिक, अगर CMO CEO की तरह सोचें और CFO की तरह पैसों को समझदारी से खर्च करें (यानी हर खर्च का मकसद ग्रोथ हो), तो ब्रीफ्स ज्यादा बेहतर और असरदार बनेंगे।

वह मानते हैं कि जो सफल CMO हैं, वे पहले ही इस दिशा में बदल रहे हैं। वे सिर्फ मार्केटिंग नहीं, बल्कि पूरे बिजनेस की जिम्मेदारी जैसा काम कर रहे हैं, ठीक CEO की तरह।

उन्होंने यह भी कहा कि इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ एजेंसियों का बेहतर होना काफी नहीं है, क्लाइंट्स (मार्केटर्स) को भी बदलना होगा। अगर मार्केटर्स सिर्फ छोटे-छोटे कामों तक सीमित रहेंगे, तो एजेंसियां चाहकर भी ज्यादा वैल्यू नहीं दे पाएंगी।

यानी सीधी बात करते हुए उन्होंने कहा कि ग्रोथ तभी आएगी जब एजेंसी और क्लाइंट- दोनों साथ मिलकर बड़े और स्मार्ट तरीके से सोचेंगे।

अगले 18 महीने 

हर्श राजदान से जब पूछा गया कि अगले एक से डेढ़ साल में 'डेंट्सू इंडिया' से क्या उम्मीद की जाए, तो उनका जवाब काफी साफ और ईमानदारी से भरा था। उन्होंने कहा कि आज AI और टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से बदल रही है कि वह तीन साल का प्लान भी साफ-साफ नहीं बता सकते कि वह अभी सिर्फ 6–8 महीने आगे तक ही सोच पा रहे हैं।

इस छोटे समय में उनका फोकस क्या है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कंपनी की डबल डिजिट ग्रोथ जारी रखना (जो पिछले 2–3 साल से हो रही है), नई सर्विसेज को और मजबूत करना, बाहर से टैलेंट लाकर टीम को और बेहतर बनाना साथ ही 'डेंट्सू इंडिया' को ग्लोबल मॉडल बनाना।

उन्होंने यह भी कहा कि जापान अब भारत को “India out” मॉडल के रूप में देख रहा है, यानी भारत में जो कामयाब मॉडल बन रहा है, उसे दूसरे देशों में भी अपनाया जा सकता है। मतलब, 'डेंट्सू इंडिया' अब सिर्फ भारत की ग्रोथ स्टोरी नहीं है, बल्कि पूरी ग्लोबल कंपनी के लिए एक उदाहरण बन सकती है।

अंत में रजदान ने कहा कि जब भविष्य में नई एजेंसी मॉडल की “किताब” लिखी जाएगी, तो वह चाहते हैं कि डेंट्सू उसका एक अहम हिस्सा हो। यानी उनका साफ इरादा है कि 'डेंट्सू इंडिया' इंडस्ट्री में एक नया रास्ता दिखाए।

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डिजिटल दौर में भी TV की अहमियत बरकरार, ‘क्रेडिबिलिटी’ ही असली ताकत: राहुल शिवशंकर

डिजिटल युग में टेलीविजन न्यूज की भूमिका, AI की एंट्री और पत्रकारिता की विश्वसनीयता जैसे अहम मुद्दों पर CNN-News18 के एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर राहुल शिवशंकर ने समाचार4मीडिया से विस्तार से बात की।

pankaj sharma by
Published - Friday, 17 April, 2026
Last Modified:
Friday, 17 April, 2026
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डिजिटल युग में टेलीविजन न्यूज की भूमिका, बदलते न्यूज कंजम्प्शन पैटर्न, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की एंट्री और पत्रकारिता की विश्वसनीयता जैसे अहम मुद्दों पर CNN-News18 के एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर राहुल शिवशंकर ने समाचार4मीडिया से विस्तार से बात की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश:

आपने हाल ही में CNN-News18 में एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाली है। न्यूज रूम को लेकर आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?

मेरे लिए इस समय तीन चीजें सबसे अहम हैं। पहली—ग्रोथ, क्योंकि हर न्यूज रूम को बदलते मीडिया माहौल में प्रासंगिक और प्रतिस्पर्धी बने रहना होता है। दूसरी—क्रेडिबिलिटी, जिसे बहुत ही गंभीरता से सुरक्षित रखना जरूरी है। और तीसरी—इम्पैक्ट, यानी खबरें सिर्फ सूचना न होकर किसी न किसी स्तर पर प्रभाव भी डालें।

ये तीनों चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं। बिना क्रेडिबिलिटी के इम्पैक्ट नहीं हो सकता और बिना इम्पैक्ट के ग्रोथ नहीं। यही मेरा काम करने का फ्रेमवर्क है। साथ ही हम एक लेगेसी ब्रैंड हैं और CNN के साथ जुड़े हैं, इसलिए जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

टीवी न्यूज की प्रस्तुति को लेकर अक्सर कहा जाता है कि यह कभी-कभी कंटेंट से ज्यादा ‘लाउड’ हो जाती है। आप इसे कैसे देखते हैं?

इस सवाल को हमें उस देश के संदर्भ में देखना चाहिए जिसमें हम रहते हैं। भारत एक बहुत ही अभिव्यक्तिपूर्ण लोकतंत्र है। यहां बहुत कुछ एक साथ घटता है और कई बार अपनी बात रखने के लिए तेज आवाज जरूरी हो जाती है। हमारा लोकतंत्र अक्सर बहसों और चर्चाओं से भरा होता है, जैसे संसद में भी होता है—जहां शोर भी है और महत्वपूर्ण काम भी। यही सार्वजनिक जीवन की वास्तविकता है। हालांकि, फर्क समझना जरूरी है—अपनी बात रखने के लिए बोलना और किसी को दबाने के लिए चिल्लाना, दोनों अलग चीजें हैं। संतुलन यहीं जरूरी है। कुछ समय टीवी न्यूज ने यह सीमा पार की है, लेकिन समय के साथ सुधार भी हुआ है।

क्या यह बदलाव इस वजह से भी है कि भारत में टीवी न्यूज अभी अपेक्षाकृत नई इंडस्ट्री है?

बिल्कुल। पश्चिमी देशों में लाइव टीवी और टॉक रेडियो दशकों से मौजूद हैं, इसलिए वहां मीडिया ने समय के साथ खुद को विकसित किया। भारत में प्राइवेट टीवी न्यूज इंडस्ट्री सिर्फ लगभग 25 साल पुरानी है। उससे पहले मुख्य रूप से सरकारी प्रसारण था। जब निजी चैनल आए तो तेजी से विस्तार हुआ और प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी, जिससे कई बार अतिशयोक्ति के दौर आए और फिर सुधार हुआ। यह एक प्राकृतिक विकास प्रक्रिया है और हम अभी भी सीख रहे हैं।

आज के डिजिटल युग में ‘प्राइम टाइम’ की अवधारणा कितनी बदल गई है?

प्राइम टाइम की परिभाषा अब पूरी तरह बदल चुकी है। पहले यह एक तय समय स्लॉट होता था और उसी से लोकप्रियता जुड़ी होती थी। लेकिन अब कोई भी कंटेंट किसी भी समय वायरल हो सकता है। यूट्यूब या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोग बिना वर्षों के अनुभव के भी बड़ा ऑडियंस बना सकते हैं। इसलिए अब मेरा मानना है—हर समय प्राइम टाइम है। हर पल महत्वपूर्ण है क्योंकि हर चीज क्लिप होकर डिजिटल दुनिया में पहुंच सकती है।

क्या अब क्रेडिबिलिटी, सीनियरिटी से ज्यादा अहम हो गई है?

बिल्कुल। क्रेडिबिलिटी उम्र या अनुभव से तय नहीं होती। कोई 30 साल काम करके भी भरोसा नहीं जीत सकता अगर वह तथ्यों के साथ लापरवाह हो। वहीं, कोई युवा पत्रकार भी सटीकता और गंभीरता से काम करके भरोसा बना सकता है। असली फर्क इसी में है कि दर्शक आप पर भरोसा करता है या नहीं।

तेज रफ्तार न्यूज साइकिल में आपके लिए क्या ज्यादा अहम है—स्पीड या सटीकता?

स्पीड जरूरी है, लेकिन कभी भी सटीकता की कीमत पर नहीं। मैं व्यक्तिगत रूप से ‘पहले आने’ पर ज्यादा जोर नहीं देता। अगर आपके पास एक्सक्लूसिव है तो आप वैसे भी पहले होंगे। लेकिन अगर जानकारी अस्थिर है, तो मैं इंतजार करना पसंद करूंगा। गलत खबर जल्दी देने से बेहतर है सही खबर थोड़ी देर से देना। अंत में दर्शक उसी पर भरोसा करते हैं जो तथ्यात्मक रूप से मजबूत हो।

क्या इंग्लिश टीवी न्यूज को खुद को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है?

हां, बिल्कुल। अब दर्शक ज्यादा ‘रियल’ और कम प्रोसेस्ड न्यूज चाहते हैं। बहुत ज्यादा एडिटेड या बनावटी कंटेंट का असर कम होता जा रहा है। साथ ही, न्यूज सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रह सकती। अब लोग सामाजिक मुद्दों, जीवन से जुड़ी कहानियों और अलग-अलग विषयों में भी रुचि रखते हैं। टीवी को इस बदलाव के साथ खुद को अपडेट करना होगा।

न्यूज रूम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फील्ड रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकता। ग्राउंड पर मौजूद रिपोर्टर की समझ और अनुभव को AI रिप्लेस नहीं कर सकता। लेकिन न्यूज रूम में यह बहुत उपयोगी है—जैसे ट्रांसलेशन, रिसर्च, स्क्रिप्टिंग और प्रोसेसिंग में। यह एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की तरह काम कर सकता है। हालांकि अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की होगी, क्योंकि तथ्य, संदर्भ और विश्लेषण की समझ AI अभी नहीं दे सकता।

क्या टीवी न्यूज का प्रभाव कम हो रहा है?

नहीं, बल्कि कई मायनों में यह आज भी बेहद प्रभावशाली है। डिजिटल दुनिया में शोर बहुत ज्यादा है—यूट्यूब, सोशल मीडिया, फॉरवर्ड्स, हर जगह जानकारी है। ऐसे में लेगेसी न्यूज ब्रैंड्स की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि वे फैक्ट-चेक, वेरिफिकेशन और जवाबदेही के साथ काम करते हैं। यही टीवी न्यूज की असली ताकत है।

क्या आज मीडिया पर्सनैलिटी-ड्रिवन हो गया है?

हां, लेकिन यह सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लोग पर्सनैलिटी को फॉलो करते हैं। लेकिन बिना क्रेडिबिलिटी के कोई भी पर्सनैलिटी लंबे समय तक नहीं टिकती। अंत में दर्शक यह देखते हैं कि आप भरोसेमंद हैं या नहीं।

आपके अनुसार एक सफल न्यूज ब्रैंड की सबसे बड़ी ताकत क्या होगी?

क्रेडिबिलिटी, क्रेडिबिलिटी और क्रेडिबिलिटी। यही सबसे महत्वपूर्ण है। अब दर्शक सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं चाहते, वे समझना चाहते हैं कि असल में क्या हो रहा है। जो न्यूज ब्रैंड तथ्य, भरोसे और पारदर्शिता के साथ काम करेगा, वही आगे सफल होगा। 

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AI और डिजिटल के दौर में एजेंसियों पर संकट, बोले संदीप गोयल- ‘खेल पूरी तरह बदल चुका है’

बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ रेडिफ्यूजन के मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप गोयल ने तमाम अहम मुद्दों पर खुलकर बात की।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 11 April, 2026
Last Modified:
Saturday, 11 April, 2026
Sandeep Goyal

भारतीय ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस सिस्टम के अंदर रहकर भी काम किया हो और बाहर से भी इसे समझा हो। बहुत ही कम लोगों ने बड़ी एजेंसियों को चलाया है, उन्हें बेचा है, टेक्नोलॉजी कंपनियां बनाई हैं, आर्ट कलेक्ट किया है, किताबें लिखी हैं और फिर दोबारा इस फील्ड में लौटे हैं- वो भी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपने काम के प्रति प्यार की वजह से।

'रेडिफ्यूजन ब्रैंड सॉल्यूशंस' के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. संदीप गोयल ऐसे ही लोगों में से एक हैं। 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक लंबी बातचीत में, गोयल ने बिना किसी लाग-लपेट के एजेंसी बिजनेस की हालत, प्लेटफॉर्म्स का दबदबा, बड़े आइडिया का खत्म होना और चार दशक तक इस इंडस्ट्री में टिके रहने के असली फॉर्मूले पर खुलकर बात की।

एजेंसियों पर सीधी राय: साफ-साफ और तथ्यों के साथ

बातचीत की शुरुआत सीधे मुद्दे से हुई। 'पिच मैडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट' के मुताबिक, भारत की ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री 2025 तक 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार जाने वाला है। यानी पैसे बढ़ रहे हैं, लेकिन एजेंसियां उस हिसाब से नहीं बढ़ रहीं। संदीप गोयल ने साफ कहा, “सीधी बात ये है कि आज के समय में जैसा विज्ञापन का बिजनेस हम जानते हैं, वो खत्म हो चुका है।” उन्होंने कहा कि जिस तरह हम विज्ञापन को समझते हैं, जहां क्लाइंट एजेंसियों को पैसे देते हैं, वो मॉडल अब धीरे-धीरे नए प्लेटफॉर्म्स की तरफ जा रहा है। यानी एजेंसियां खत्म हो सकती हैं, लेकिन Google और Meta जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स बचेंगे।

संदीप गोयल ने साफ कहा, “सीधा जवाब है- आज के समय में ऐडवर्टाइजिंग बिजनेस खत्म हो चुका है।” 

यह बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है। GroupM के अनुमान के मुताबिक, आज भारत में कुल विज्ञापन खर्च का करीब 70% डिजिटल पर जा रहा है, जो पांच साल पहले सिर्फ 15-20% था। पारंपरिक एजेंसी मॉडल- जो रिटेनर, कमीशन और लंबे रिश्तों पर चलता था- अब कमजोर पड़ चुका है। पैसा प्लेटफॉर्म्स के पास चला गया है और एजेंसियां अब बचा-खुचा पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

संदीप गोयल ने खासतौर पर क्रिएटिव बिजनेस की हालत पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “एजेंसियों की कमाई नहीं बढ़ रही है। क्रिएटिव काम, जो रिटेनर पर चलता है, सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। अब ज्यादा से ज्यादा क्लाइंट रिटेनर सिस्टम से दूर जाना चाहते हैं।”

उन्होंने WPP के नए मॉडल का जिक्र किया, जिसमें काम के रिजल्ट के आधार पर पेमेंट की बात हो रही है। गोयल का मानना है कि इससे एजेंसियों की मुश्किलें और बढ़ेंगी। उन्होंने कहा, “ये बदलाव हमारे जीवनकाल में ही होगा और इससे एजेंसियों का अंत और तेज हो जाएगा। एजेंसियां इस तरह के बदलाव के लिए न सोच के स्तर पर तैयार हैं, न ही फिलॉसफी के स्तर पर।”

Google सर्च और AI का असर- क्या बदल रहा है?

अगर विज्ञापन एजेंसियों का पारंपरिक मॉडल कमजोर हो रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन पर भी बदलाव और खतरे का असर पड़ सकता है। संदीप गोयल का कहना है कि AI के दौर को लेकर जो बातें हो रही हैं, उनमें बहुत शोर है, लेकिन असली बात यह है कि यह बदलाव गहरा और बड़ा है।

संदीप गोयल एक उदाहरण देकर समझाते हैं। वे कहते हैं कि पहले वे क्लाइंट्स से पूछते थे कि दुनिया की सबसे महंगी “जगह” कौन सी है, और जवाब होता था- Google का सर्च बार, क्योंकि वहीं से सबसे ज्यादा विज्ञापन का पैसा आता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। लोग अब सर्च कम कर रहे हैं और सीधे सवाल पूछ रहे हैं। और जब वे सवाल पूछते हैं, तो जरूरी नहीं कि वे Google पर ही जाएं, वे ChatGPT, Gemini, Anthropic या Perplexity जैसे AI टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। यानी Google की जो 20 साल से सर्च पर पकड़ थी, वही अब कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि अगर लोग सर्च ही कम करेंगे, तो उसका पूरा बिजनेस मॉडल प्रभावित होगा।

संदीप गोयल की यह बात सिर्फ राय नहीं है, बल्कि आंकड़े भी इसे सही ठहराते हैं। McKinsey की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, AI के जरिए जानकारी ढूंढना और सवाल-जवाब करना बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि पारंपरिक सर्च की जगह अब बातचीत वाले AI सिस्टम ले रहे हैं। इससे सिर्फ Google ही नहीं, बल्कि उसके आसपास बना पूरा डिजिटल विज्ञापन सिस्टम भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए गोयल का कहना है कि बड़े प्लेटफॉर्म्स को भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे हमेशा सुरक्षित रहेंगे।

डेंट्सु के दिन: सही समय पर सही दांव

रेडिफ्यूजन और अपने खुद के बिजनेस से पहले, संदीप गोयल के करियर के आठ साल ऐसे थे जिन्हें वह अपने प्रोफेशनल जीवन का सबसे बेहतरीन समय मानते हैं। इस दौरान उन्होंने Dentsu के साथ मिलकर भारत में एक बहुत मजबूत और प्रभावशाली एजेंसी खड़ी की, जो इंडस्ट्री में अलग पहचान रखती थी।

2003 में उन्होंने देखा कि दुनिया की टॉप 20 कंपनियों में से 9 जापान की थीं। उन्होंने सोचा कि बाकी मार्केट पर ध्यान देने के बजाय जापानी कंपनियों पर पूरा फोकस किया जाए। इसके लिए उन्होंने हर जापानी क्लाइंट के साथ एक जापानी लीडर जोड़ा, ताकि भाषा और काम करने के तरीके को बेहतर समझा जा सके। इससे क्लाइंट की जरूरत समझना आसान हो गया और उसे भारतीय दर्शकों के हिसाब से ढालना भी सरल हो गया। इस रणनीति की वजह से उन्होंने भारत में जापानी कंपनियों के बिजनेस का लगभग 90% हिस्सा अपने पास कर लिया। उनके क्लाइंट्स की लिस्ट में Toyota, Honda, Suzuki, Sony, Panasonic और Yamaha जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं।

Dentsu के साथ काम करते समय गोयल ने बड़े-बड़े जोखिम लिए, जो उस समय भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री में बहुत कम देखने को मिलते थे। 2005-06 में उन्होंने क्रिकेट वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी का पूरा विज्ञापन समय Sony पर 500 करोड़ रुपये में खरीद लिया। जब भारत टूर्नामेंट से जल्दी बाहर हो गया, तो यह फैसला गलत लगने लगा। लेकिन 2008 में IPL शुरू हुआ और स्थिति बदल गई। उन्होंने IPL के पहले सीजन के हर मैच में 800 सेकंड से ज्यादा विज्ञापन समय खरीदा, जो आगे चलकर बड़ा फायदा साबित हुआ। इससे यह दिखता है कि Dentsu में बड़े रिस्क लेने की क्षमता थी।

जब Dentsu से बाहर निकलने का समय आया, तो वह भी एक सोचा-समझा फैसला था। गोयल का कहना है कि बिजनेस में यह जानना जरूरी है कि कब शुरुआत करनी है और कब बाहर निकलना है। Dentsu के पास ज्यादा पैसा था और वह आगे और बड़े निवेश करना चाहता था, जिसमें गोयल उतना हिस्सा नहीं ले सकते थे क्योंकि उनकी हिस्सेदारी 26% थी। ऐसे में जब उन्हें अच्छा ऑफर मिला, तो उन्होंने अपनी हिस्सेदारी बेच दी। इस सौदे में उन्हें कई गुना फायदा हुआ और वह शांत तरीके से कंपनी से बाहर निकल गए, जैसे वह आत्मविश्वास के साथ इसमें आए थे।

रेडिफ्यूजन: नीचे से उठकर फिर खड़ा होना

संदीप गोयल ने करीब पांच साल पहले रेडिफ्यूजन को खरीदा और उन्होंने खुद माना कि इस फैसले में थोड़ा भावनात्मक लगाव (nostalgia) भी था। लेकिन सिर्फ पुरानी यादों के सहारे किसी कमजोर कंपनी को दोबारा खड़ा नहीं किया जा सकता। 2008 में जब मार्टिन सोरेल की अगुवाई में WPP ने रेडिफ्यूजन से दूरी बना ली थी, तब Airtel, Colgate, Citibank और Ford जैसे बड़े क्लाइंट्स भी साथ चले गए थे। इसके बाद एजेंसी लगभग एक दशक तक संभलने की कोशिश करती रही, लेकिन पूरी तरह खड़ी नहीं हो पाई।

संदीप गोयल बताते हैं कि जब Diwan Nanda ने उन्हें एजेंसी संभालने के लिए कहा, तब उसकी हालत बहुत खराब थी, यानी बिल्कुल नीचे जा चुकी थी। लेकिन पिछले पांच साल में उन्होंने एजेंसी को न सिर्फ जिंदा रखा, बल्कि हर साल मुनाफा भी कमाया। यानी उन्होंने धीरे-धीरे इसे घाटे से निकालकर एक स्थिर और फायदे में चलने वाली कंपनी बना दिया।

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण उनका पारंपरिक एजेंसी मॉडल से हटना था। उन्होंने टेक्नोलॉजी और नए तरीकों पर फोकस किया। रेडिफ्यूजन ने एक एडवांस AI डिजाइन लैब बनाई, जहां एक साल में 400 से ज्यादा वीडियो तैयार किए गए, जिनमें से कम से कम 40 टीवी पर पूरी क्वालिटी के साथ दिखाए गए। इसके साथ ही उन्होंने Rediffusion Narrative नाम से एक नया कंटेंट डिवीजन शुरू किया, जिसे Amitabh Nanda लीड कर रहे हैं। इसका मकसद एजेंसी को सिर्फ विज्ञापन (creative) तक सीमित न रखकर कंटेंट के बड़े बिजनेस में ले जाना है।

कंपनी एक तीसरे नए क्षेत्र (स्पेशलाइज्ड एक्सपीरियंस मार्केटिंग) पर भी काम कर रही है, जो अभी तैयार होने के आखिरी चरण में है।

संदीप गोयल मानते हैं कि टेक्नोलॉजी ने कंटेंट बनाने और लोगों तक पहुंचाने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन कई एजेंसियां अभी तक इस बदलाव को ठीक से समझ नहीं पाई हैं। उनका कहना है कि टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल और कम्युनिकेशन के बदलते तरीके मिलकर पूरी एजेंसी इंडस्ट्री को नए रूप में ढाल रहे हैं।

टैलेंट की कमी और इंडस्ट्री की चुनौती

विज्ञापन इंडस्ट्री में एक बड़ी और थोड़ी असहज करने वाली समस्या चल रही है- अच्छे टैलेंट की कमी। संदीप गोयल के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह एजेंसियों की कमाई में गिरावट है। पहले एजेंसियां करीब 15% तक कमाती थीं, लेकिन अब यह घटकर 3% रह गई है, और बाकी सेवाएं जोड़कर भी मुश्किल से 5-6% तक पहुंचती है। जब कमाई इतनी कम हो जाती है, तो एजेंसियों के पास अच्छे कॉलेजों और टॉप टैलेंट को हायर करने के लिए पर्याप्त पैसा ही नहीं बचता।

संदीप गोयल बताते हैं कि पहले बड़ी एजेंसियां मुंबई के प्राइम लोकेशंस जैसे Nariman Point में होती थीं, फिर वे Lower Parel शिफ्ट हुईं और अब और सस्ते इलाकों की तरफ जा रही हैं। उनका कहना है कि अब हालत ऐसी हो रही है कि अगला पड़ाव पुणे जैसे शहर हो सकता है, क्योंकि एजेंसियां न तो महंगे ऑफिस का खर्च उठा पा रही हैं और न ही अच्छे लोगों को हायर कर पा रही हैं। यानी धीरे-धीरे उनकी वैल्यू और ताकत कम होती जा रही है।

संदीप गोयल ने हायरिंग के लिए अपना एक फॉर्मूला बताया है- “Breeding, Brains और Beauty”। वे साफ करते हैं कि Breeding का मतलब परिवार या बैकग्राउंड नहीं, बल्कि पढ़ाई-लिखाई और सोच से है। पहले के समय में  Arun Nanda, Balakrishnan और Ambi Parameswaran जैसे लोग टॉप बिजनेस स्कूल्स से आते थे, जिससे क्लाइंट्स के सामने उनकी एक अलग पहचान और सम्मान होता था। Brains यानी मजबूत समझ और सोच, और Beauty का मतलब है कि आप क्लाइंट के सामने खुद को कैसे पेश करते हैं- आपका व्यक्तित्व और प्रेजेंस कैसी है। गोयल कहते हैं कि अगर आप किसी क्लाइंट के पास जाते हैं और वह आपको गंभीरता से नहीं लेता, तो उसकी एक वजह यह भी होती है कि आप उस स्तर के नहीं दिखते या वैसा प्रभाव नहीं डालते।

संदीप गोयल क्लाइंट और एजेंसी के रिश्ते पर खुलकर बात करते हैं। उनका कहना है कि एजेंसियों ने खुद ही क्लाइंट्स को इतना ताकतवर बना दिया कि वे अब हावी हो गए हैं। पिछले 20 सालों में एजेंसियों ने क्लाइंट्स की हर तरह की मांग मान ली, चाहे वह जरूरी हो या नहीं और कभी विरोध नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों के बीच पेशेवर सम्मान कम हो गया और अब एजेंसियां उसी का नुकसान उठा रही हैं। उनका कहना है कि अगर आप एक ही बार में सब कुछ दे देंगे, तो आगे काम करने के मौके ही खत्म हो जाएंगे।

 बड़े आइडिया की जगह मीडिया का पैसा

आज के समय में विज्ञापन की दुनिया में “बड़ा आइडिया” (creative idea) उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है, जितना पहले हुआ करता था। अब “मीडिया पर पैसा खर्च करना” ज्यादा ताकतवर हो गया है। उदाहरण के तौर पर IPL जैसे बड़े इवेंट में सिर्फ 2024 में ही ₹5,000 करोड़ से ज्यादा का विज्ञापन खर्च हुआ। यानी ब्रैंड्स अब इस बात के लिए पैसे दे रहे हैं कि उन्हें बड़ी संख्या में लोग देख लें, चाहे उनका विज्ञापन कितना भी खास क्यों न हो।

संदीप गोयल यह साफ कहते हैं कि आज अगर किसी ब्रैंड को दिखना है, तो उसे अच्छे आइडिया की जरूरत नहीं है, बल्कि बहुत बड़े बजट की जरूरत है। अगर आपके पास IPL में ₹200 करोड़ खर्च करने की क्षमता है, तो आपका विज्ञापन अपने आप मशहूर हो जाएगा- यदि वह क्रिएटिव तौर पर कमजोर ही क्यों न हो। पहले जो “बड़ा आइडिया” ब्रैंड को पहचान दिलाता था (जैसे Airtel या Maruti के कैंपेन), अब उसकी वैल्यू कम हो गई है। अब अच्छे आइडिया अक्सर छोटे बजट वाले क्लाइंट्स तक सीमित रह जाते हैं, जो उन्हें सिर्फ YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर ही दिखा पाते हैं।

यह पूरा बदलाव इंडस्ट्री में एक बड़ा स्ट्रक्चरल चेंज है। ऐसे समय में अगर कोई एजेंसी फिर से “क्रिएटिविटी” को केंद्र में रखकर काम कर रही है, जैसे Rediffusion कर रही है, तो वह थोड़ा अलग (contrarian) रास्ता चुन रही है, लेकिन शायद यही आगे चलकर जरूरी भी साबित हो।

संदीप गोयल एक सिंपल लेकिन गहरी बात कही- “जो भी करो, मजे लेकर करो।” उनके 40 साल के अनुभव, कई बिजनेस, म्यूजियम और सफल टर्नअराउंड के बाद यह सलाह और भी ज्यादा वजनदार लगती है। मतलब साफ है-  इंडस्ट्री चाहे कितनी भी बदल जाए, काम में आनंद होना सबसे जरूरी है।

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Zee की नई पहल पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगी: डॉ. सुभाष चंद्रा

डॉ. सुभाष चंद्रा ने बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से खास बातचीत में कई मुद्दों पर बेबाक राय रखी।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 10 April, 2026
Last Modified:
Friday, 10 April, 2026
Dr Subhash Chandra.....

भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के इतिहास में कई बड़े बदलाव आए हैं—1990 के दशक का केबल बूम, 2000 के दशक की DTH प्रतिस्पर्धा और अब डिजिटल व स्ट्रीमिंग का दौर। लेकिन इन सभी बदलावों के बीच कुछ ही लोग ऐसे रहे हैं, जिन्होंने इन बदलावों को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि उन्हें आकार भी दिया। ‘एस्सेल समूह’ (Essel Group) के चेयरमैन और जी एंटरटेनमेंट (Zee Entertainment) को देश-विदेश में पहचान दिलाने वाले डॉ. सुभाष चंद्रा ऐसे ही व्यक्तित्व हैं।

अपने 75वें जन्मदिन के अवसर पर डॉ. सुभाष चंद्रा ने बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपने करियर, असफलताओं, Zee के उतार-चढ़ाव और भविष्य की योजनाओं पर खुलकर अपनी बात रखी।

उम्र सिर्फ एक संख्या

30 नवंबर 2025 को 75 वर्ष के हुए डॉ. चंद्रा का कहना है कि उनके लिए उम्र का कोई विशेष महत्व नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यह सिर्फ एक संख्या है, मैं आज भी खुद को 35-37 साल जैसा महसूस करता हूं।’
डॉ, सुभाष चंद्रा ने बताया कि उनकी जिंदगी की असली सीख 1966 में मिली, जब परिवार के बिजनेस के संकट के कारण उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। उस समय वह महज 17 साल के थे। इसके बाद उन्होंने छोटे स्तर पर कारोबार शुरू किया और धीरे-धीरे अपने प्रयासों से एक बड़ा बिजनेस खड़ा किया।

Zee का सफर और चुनौतियां

करीब 34 साल पुरानी Zee Entertainment आज भी भारतीय भाषा के टेलीविजन नेटवर्क्स में एक मजबूत ब्रैंड मानी जाती है, हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कंपनी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। डॉ. चंद्रा ने माना कि 2018-19 के IL&FS संकट के बाद Essel Group पर आए वित्तीय दबाव का असर Zee पर भी पड़ा। 25 जनवरी 2019 की घटनाओं के बाद प्रमोटर हिस्सेदारी 42% से घटकर 5% से भी कम रह गई।

उन्होंने कहा कि इसके बाद कंपनी कई समस्याओं में उलझ गई—होस्टाइल टेकओवर की कोशिश, SEBI की कार्यवाही और Sony के साथ तीन साल तक चला मर्जर, जो अंततः सफल नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि इन सभी वजहों से Zee का फोकस भटक गया और जो बदलाव उस समय जरूरी थे, वे नहीं हो पाए।

43,000 करोड़ का कर्ज और बड़ा फैसला

डॉ. चंद्रा ने बताया कि उन्होंने और उनके बेटों—पुनीत और अमित—ने सभी कर्ज चुकाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने अपनी कई अहम संपत्तियां बेच दीं।
उन्होंने कहा, ‘हमने 43,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया। मुझे इसका कोई पछतावा नहीं है, बल्कि अब मैं खुद को पहले से ज्यादा हल्का और खुश महसूस करता हूं।’

Zee में वापसी और बदलाव

जब 2022-23 में Zee के बोर्ड ने उन्हें वापस बुलाया, तो उन्होंने पाया कि कंपनी अपनी पुरानी सफलता के आराम में जी रही थी।
उन्होंने कहा, ’मुझे बदलाव करना पड़ा। कई लोगों से अलग होना पड़ा, क्योंकि वे असफलता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। मेरा मानना है कि जब तक आप अपनी गलती नहीं मानते, सुधार संभव नहीं है।’ इसके बाद Zee ने कंटेंट स्ट्रेटजी में बदलाव किया और omni-content approach अपनाई—यानी कंटेंट अब सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल, सोशल और कनेक्टेड टीवी प्लेटफॉर्म्स पर भी फोकस किया गया। आज Zee TV के कई शो टॉप 10 में जगह बना रहे हैं और चैनल की दर्शक हिस्सेदारी 17% से बढ़कर 18.8% तक पहुंच गई है। कंपनी का लक्ष्य इसे 20% से आगे ले जाना है।

विज्ञापन और बिजनेस अप्रोच में बदलाव

डॉ. चंद्रा ने बताया कि उन्होंने हाल ही में विज्ञापन सेल्स टीम के सैकड़ों लोगों से मुलाकात की और उन्हें साफ संदेश दिया कि सिर्फ रेट और रेटिंग पर ध्यान देना काफी नहीं है।
उन्होंने कहा, ’आपको अपने क्लाइंट की समस्या समझनी होगी, वही आपकी सैलरी दे रहा है। हम कहीं न कहीं बहुत ज्यादा ट्रांजैक्शनल हो गए थे।’

ICL की गलती पहली बार स्वीकारी

डॉ. चंद्रा ने 2007 में शुरू हुई इंडियन क्रिकेट लीग (ICL) को लेकर भी बड़ी बात कही। उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ICL के बंद होने के पीछे उनकी अपनी गलतियां थीं।
उन्होंने कहा कि अगर कुछ फैसले अलग होते, तो यह लीग सफल हो सकती थी और चौथे साल से मुनाफा देना शुरू कर देती। बाद में इसी फॉर्मेट को आगे बढ़ाते हुए IPL ने बड़ी सफलता हासिल की।

Zee News और ’नंबर वन’ की सोच से हटा फोकस

Zee News को लेकर उन्होंने कहा कि नंबर वन बनने के बाद संगठन में अहंकार जैसा आ गया था और फोकस दर्शकों से हटकर अन्य चीजों पर चला गया। उन्होंने संकेत दिया कि अब इस दिशा में सुधार किया जा रहा है।

भविष्य की बड़ी योजना

डॉ. चंद्रा ने संकेत दिया कि Zee अगले दो वर्षों में एक ऐसा प्रोजेक्ट लेकर आ सकता है, जो पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगा—सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी। उन्होंने कहा, ’अगर हम इसमें सफल होते हैं, तो यह इंडस्ट्री के लिए बहुत बड़ा बदलाव होगा।’ अपने अनुभव को एक लाइन में समेटते हुए उन्होंने कहा, ’आज आप जो ऊर्जा और मेहनत लगाते हैं, उसका असर भविष्य में जरूर दिखता है।’

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