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5 बड़ी वजहों के चलते मीडिया इंडस्ट्री को है बदलाव की जरूरत:विक्रम चंद्रा

आजकल सोशल मीडिया का जमाना है और यह काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

रुहैल अमीन ।।

आजकल सोशल मीडिया का जमाना है और यह काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। बदलाव की इस बयार में लोगों के न्यूज हासिल करने के पारंपरिक तरीकों में भी काफी परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में लोगों की जरूरतों को देखते हुए और मार्केट में बने रहने के लिए तमाम तरह की कवायद की जा रही हैं। इसके तहत कुछ नए ऐप भी शुरू हो रहे हैं। इसी तरह की कवायद के बीच मोबाइल फोन धारकों के लिए 'एडिटर जी' (Editor ji) नाम से एक नया विडियो न्यूज प्लेटफॉर्म लॉन्च किया गया है। यह ऐप वरिष्‍ठ पत्रकार विक्रम चंद्रा ने शुरू किया है। विक्रम चंद्रा ने अक्‍टूबर 2016 में 'एनडीटीवी' के ग्रुप सीईओ पद से इस्‍तीफा दे दिया था।

अपने नए वेंचर के बारे में जैसे- आखिर क्यों इसकी जरूरत महसूस की और इसकी प्रेरणा कहां से मिली, के साथ-साथ कैसे वे न्यूज की विश्वसनीयता को वापस लेकर आएंगे, के बारे में उन्होंने विस्तार से बताया।

पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश- 

सबसे पहले आप हमें अपने नए वेंचर 'Editor ji' के बारे में कुछ बताएं। आखिर यह क्या है और इसकी प्रेरणा आपको कहां से मिली?

मुझे लगता है कि पूरे सिस्टम में काफी बदलाव की जरूरत है। इसके पीछे पांच बड़ी वजह हैं। पहली वजह की बात करें तो आप यदि टेलिविजन न्यूज चैनलों को देखें तो पता लगेगा कि इसका सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू काफी कम है और इस पर कैरिज फीस भी है। ऐसे में आपको काफी हद तक विज्ञापन पर निर्भर रहना पड़ता है। चूंकि आपकी विज्ञापन पर निर्भरता बहुत अधिक है, ऐसे में आपको टीआरपी की तरफ भी ध्यान देना होता है और इसके लिए स्क्रीन पर आपको बेवजह चीखना-चिल्लाना और शोरशराबा करना पड़ता है। कुछ लोग ये भी कहेंगे कि वे टीआरपी के लिए काम नहीं करते हैं और उन्हें रेवेन्यू की समस्या होती है। कहने का मतलब है कि टेलिविजन न्यूज में तो यह बिजनेस मॉडल का मामला है।  

अब बात आती है, दूसरी वजह की, जो टेक्नोलॉजी से संबंधित है। आप टीवी न्यूज के कंटेंट को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं और जो भी लोग देख रहे हैं, वही आपको देखना पड़ेगा। ऐसे में जब लोग डिबेट, ओपिनियंस और व्यूज ज्यादा देख रहे हैं तो फिर आपको न्यूज कहां से देखने को मिलेगी?

अब बात करते हैं डिजिटल विडियो न्यूज की। यदि आप ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अथवा विडियो प्लेटफॉर्म पर लाइव न्यूज चैनल देखते हैं तो यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे आप टीवी देख रहे है। अंतर सिर्फ इतना है कि आप इसे अपने मोबाइल पर देख रहे हैं। आपको यहां पर भी स्क्रीन पर लोग चिल्लाते हुए दिखेंगे। ऐसे में भी आपको कोई फायदा नहीं मिलता है।

डिजिटल फॉर्मेट भी काम नहीं कर रहा है क्योंकि लोग आजकल फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऐप पर विडियो न्यूज देख रहे हैं। लेकिन इसके साथ दो बड़ी दिक्कतें हैं। एक समस्या तो यह है कि इसमें फेक न्यूज की बहुत आशंका रहती है। आप गारंटी से नहीं कह सकते हैं कि आपके वॉट्सऐप पर जो न्यूज मिली है, उसका सोर्स क्या है। इस स्थिति में आप फेसबुक और वॉट्सऐप पर मिलने वाली न्यूज को विश्वसनीय नहीं कह सकते हैं। दूसरी परेशानी यह है कि कंटेंट के कुछ अच्छे स्रोत तो हैं लेकिन उसमें डिस्ट्रब्यूशन की समस्या है। यदि आपके पास कोई अच्छी स्टोरी है भी तो आप उसे सही व्यक्ति तक कैसे पहुंचाएंगे?

इसमें एक और समस्या फॉर्म फैक्टर (form factor) की भी है। आज के समय में देश में इस फैक्टर को डिजाइन किया जाना है। वर्तमान में 250 मिलियन भारतीय ऑनलाइन विडियो देख रहे हैं और वर्ष 2020 तक यह संख्या 500 मिलियन हो जाएगी। इसका मतलब है कि 250 मिलियन और लोग अपने मोबाइल पर विडियो देखना शुरू कर देंगे। आखिर वे ऐसा कैसे करेंगे? उनके लिए कौन सा फॉर्म फैक्टर होगा? अभी वह फॉर्म फैक्टर हमारे यहां अभी तक नहीं है और इसलिए इस तरह की चीजों को आसान करने के लिए 'Editor ji' शुरू किया गया है।  

मेन स्ट्रीम मीडिया प्लेटफॉर्म से अब आपने यह स्टार्ट-अप शुरू किया है, इस बदलाव के बारे में कुछ बताएं?

सच कहूं तो मैंने हमेशा से आगे बढ़कर कुछ नया करने के बारे में सोचा है। यही कारण है कि वर्ष 1991 में मैंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय छोड़ दिया और भारत वापस आकर ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म में काम करने का निर्णय लिया, जो तब भारत में भी नहीं था। उस समय ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म नहीं था लेकिन मेरा कहना था कि हमें इस दिशा में प्रयास करना चाहिए और यह बिल्कुल नई चीज होगी।   

वर्ष 2000 में मैंने प्रणॉय रॉय से इस बारे में बात की और कहा कि मैं एक बेवसाइट तैयार करना चाहता हूं। इसके बाद ‘NDTV.com’ को तैयार कर मुझे इसका सीईओ बना दिया गया।   

वर्ष 2008-09 में मुझे लगा कि हमें मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए अगला फॉर्म फैक्टर तलाशना होगा। इसके बाद हमने ‘एनडीटीवी ऐप ’ (NDTV app) बनाया।   

यह दो साल पहले की बात है जब मैं ‘गूगल’ के सीईओ सुंदर पिचाई का इंटरव्यू कर रहा था तो उन्होंने कहा था कि अब ‘आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस’ (AI) का जमाना आने वाला है जो यह सभी बिजनेस को प्रभावित करेगी। जो कोई भी इसके बारे में गंभीर नहीं होगा, वह काफी मुश्किल में पड़ने वाला है।    

इसलिए मैंने टीवी और डिजिटल दोनों को एक साथ रखा। मैंने 17 साल तक डिजिटल बिजनेस चलाया है और टीवी में 25 साल तक काम किया है। मैंने सोचा कि मुझे ‘AI’ के बारे में और ज्यादा समझना चाहिए कि कैसे‘AI’ थ्योरी, प्लेटफॉर्म  थ्योरी  और टीवी को डिजिटल के साथ मिलाया जा सकता है। मैंने यह भी सोचा कि कैसे चारों को मिलाकर कुछ ऐसा तैयार किया जाए जो आज के समय में बिजनेस के सामने आ रहीं सभी समस्याओं को दूर कर सके।  

आज मुझे इस बात पर गर्व है कि हमने इसे तैयार कर लिया है। इस एप्लीकेशन में हाइब्रिड सेटअप का इस्तेमाल होता है, जिसमें AI और 'ह्यूमन इंटरवेंशन' (Human Intervention) शामिल है ताकि यूजर्स को इस प्लेटफॉर्म पर विश्वसनीय खबरें मिल सकें। 

क्या आप ये कहना चाह रहे हैं कि पारंपरिक न्यूज माध्यम अप्रासंगिक होने जा रहे हैं ?

मेरा मानना है कि ऐसी कोई बात नहीं है। जब टीवी आया था तो सभी का कहना था कि प्रिंट खत्म हो जाएगा। जब डिजिटल आया तो लोगों ने कहा कि टीवी खत्म हो जाएगा। इसलिए नए फॉर्म फैक्टर्स और ‘AI’  प्लेटफॉर्म पर यह सप्लीमेंट का काम करेगा। यह फोर्स मल्टीप्लायर (Force Multiplier) मैं सभी पारंपरिक मीडिया प्लेयर्स से गुजारिश करता हूं कि वे हमें इसी रूप में देखें। सिर्फ टीवी ही नहीं, प्रिंट के लिए भी हम काफी प्रासंगिक हैं क्योंकि जिनके पास अपना टीवी चैनल नहीं है, वे विडियो दिखाना चाहते हैं तो वे हमारे साथ जुड़कर मात्र 30 सेकेंड में अपना टीवी न्यूज चैनल तैयार कर सकते हैं।

अपने रेवेन्यू मॉडल के बारे में भी कुछ बताएं, क्या इस ऐप के लिए भुगतान करना होगा ?

यह बिल्कुल फ्री है। इसका सीधा सा कारण यह है कि हम चाहते हैं कि देश के 1.3 मिलियन लोगों के पास विश्वसनीय इंफॉर्मेशन पहुंचे। चूंकि 250 मिलियन लोग और ऑनलाइन विडियो से जुड़ने जा रहे हैं तो सवाल है कि वे इसे कैसे देखेंगे और कैसे उन्हें न्यूज मिलेगी? इसलिए हमने इसे फ्री रखा है। आपको सिर्फ एक बटन दबाना है और आपको न्यूज मिलनी शुरू हो जाएगी। अभी हमें कम से कम दो साल तक फंडिंग की कोई जरूरत नहीं है।  

 आपने इसमें ‘AI’ को शामिल किया है। संपादन के दृष्टिकोण से देखें तो क्या आपको नहीं लगता कि यह पत्रकारिता के ट्रैफिक को प्रभावित करेगा?

हमने इसको लेकर भी अपनी पूरी तैयारी की है। कम से कम शुरूआती स्तर पर हम सिर्फ ‘AI’ की सहायता लेंगे और स्टोरी की पूरी कमान इसके हाथ में नहीं सौंपेगे।

 

 


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