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‘पत्रिका’ मप्र के स्टेट एडिटर जिनेश जैन ने कुछ यूं किया देश के 'मिजाज' का चुनावी विश्लेषण
लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही इस बारे में विश्लेषण भी शुरू हो गया है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
नीरज नैय्यर
लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर राहुल गांधी इस बार कोई कमाल दिखा पाएंगे, इसका विश्लेषण भी शुरू हो गया है। समाचार4मीडिया ने भी राजनीतिक नब्ज और आम जनता के मिजाज को भलीभांति पहचानने वाले पत्रकारों से यह जानने का प्रयास किया है कि उनकी नज़र में इस बार क्या होने जा रहा है। इसकी तीसरी कड़ी में पेश है ‘पत्रिका’ मध्यप्रदेश के स्टेट एडिटर जिनेश जैन का नजरिया।
मीडिया के लिए इस वक़्त स्थितियां काफी खतरनाक होती जा रही हैं। पहले जब हम सरकार का विरोध करते थे तो सरकार की तरफ से केवल तथ्यों को लेकर आपत्ति जताई जाती थी। कभी सरकारों ने ख़बरों को रोकने जैसा काम नहीं किया, लेकिन अब सरकार गिव-एंड-टेक कल्चर पर काम करती है, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी की क्यों न हो। आजकल अगर सरकार किसी मीडिया हाउस को विज्ञापन देती है तो वो बदले में कुछ अपेक्षा भी रखती है। ऐसे में यदि कोई मीडिया हाउस सरकार के खिलाफ लिखता है तो वो बेचैन होनी लगती है। सरकार सोचती है कि जब हम विज्ञापन दे रहे हैं तो फिर हमारा विरोध क्यों? उस स्थिति में सरकार की तरफ से मीडिया हाउस पर दबाव बनाया जाता है, जब दबाव से भी काम नहीं बनता तो सरकार उसे किसी न किसी तरह से प्रताड़ित करना शुरू कर देती है। वैसे भी आज के समय में मीडिया ने एक इंडस्ट्री का रूप ले लिया है, वो एक प्रोडक्ट के रूप में काम करती है। कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि जो पूंजी की व्यवस्था है, वो मीडिया को प्रभावित कर रही है, ऐसे में मीडिया स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाती।
आप पत्रकार हैं, राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, आपकी नज़र में इस बार का लोकसभा चुनाव कितना रोचक होगा?
वैसे तो हर चुनाव अपनी एक याद छोड़कर जाता है और उसका अपना एक इतिहास बनता है, लेकिन यह चुनाव पिछले चुनावों से काफी भिन्न नज़र आ रहा है। इस बार का लोकसभा चुनाव पूरी तरह से राष्ट्रवाद और उसकी खिलाफत करने वालों पर केंद्रित है। इसे एक सोची-समझी साजिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। क्योंकि पांच साल के दौरान जब आप खुद को साबित नहीं कर पाते या कई मुद्दों पर जब आप विफल होते हैं तो उस स्थिति में आप भावनात्मक मुद्दों को उछालते हैं। यदि हम पुलवामा घटना से पहले देखें तो ऐसा लग रहा था कि मोदी के लिए सत्ता में वापसी मुश्किल होगी, लेकिन एक ही पल में तस्वीर बदल गई। घटना के बाद जिस तरह का माहौल निर्मित हुआ और जिस तरह से उसे प्रचारित-प्रसारित किया गया, उससे यह साफ़ हो गया कि चुनाव पूरी तरह से भावनात्मक हो जायेगा और ऐसा बाकायदा हो भी रहा है। बुनियादी सवाल गौण हो चुके हैं, सत्तापक्ष इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है और विपक्ष तो इस स्थिति में ही नहीं है कि वो अपनी आवाज़ मुखर करके सरकार को कठघरे में खड़ा कर सके। भाजपा इस तरह का माहौल निर्मित कर रही है जैसे यदि देश को बचाना है तो मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं।
जैसे आपने कहा कि राष्ट्रवाद एक मुद्दा है तो आपकी नज़र में ऐसे कौन से अन्य मुद्दे हैं, जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं?
देखिये, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में ‘न्यूनतम रोज़गार गारंटी’ योजना के तहत 72 हजार रुपए देने की जो बात कही है, वो काफी असरकारक हो सकती है। लेकिन समस्या यह है कि कांग्रेस उस तबके तक इस बात को सही ढंग से पहुंचा नहीं पा रही है, जिसे इसका लाभ मिलना है। इसके उलट भाजपा केवल राष्ट्रवाद पर केंद्रित है और वो बहुत प्रभावी तरीके से अपनी बात को लोगों तक पहुंचा रही है। इसमें कहीं न कहीं कांग्रेस कमजोर नज़र आ रही है। ऐसी स्थिति में मुद्दे के नाम पर तो कुछ ख़ास है नहीं। आप अमित शाह या नरेंद्र मोदी के भाषण ही सुन लीजिये, आपको राष्ट्रवाद और भावनाओं के मिश्रण के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।
झटका तो बिल्कुल है, लेकिन यहां सवाल भी खड़ा होता है कि आखिर केंद्रीय एजेंसियों के निशाने पर विपक्ष के मुख्यमंत्री ही क्यों हैं? आप सत्ता पक्ष के लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं करते, क्या वो गंगाजल लेकर चुनाव में उतरे हैं? आप जब सत्तापक्ष में होते हैं तो माना जाता है कि आप विपक्ष के मुकाबले कई गुना ज्यादा धन खर्च करेंगे तो फिर वहां कार्रवाई क्यों नहीं? जिस तरह से मध्यप्रदेश में छापे मारे गए और जिस तरह से आयकर विभाग का इस्तेमाल किया गया, मैं इस्तेमाल शब्द इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि स्थानीय टीम और पुलिस को विश्वास में नहीं लिया गया। सबकुछ दिल्ली से संचालित किया गया, उससे केंद्र की मंशा पर संदेह होता है। बीते दिनों जिस तरह से सीबीआई एवं आयकर विभाग पर आरोप लगे हैं और जिस तरह से उनका दुरुपयोग हुआ है, उसमें इस तरह की कार्रवाई यह स्पष्ट करती है कि आप (केंद्र सरकार) विपक्ष के खिलाफ दुर्भावना से काम कर रहे हैं, आप चुनाव में किसी तरह विपक्ष को वित्तीय नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।
मध्यप्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, आप कितनी सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर देखते हैं?
यदि हम मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव की बात कर रहे हैं तो हमें सबसे पहले इसके ट्रेंड को समझना होगा। छत्तीसगढ़ का गठन 2000 में हुआ था और उससे पहले यहां दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उस वक़्त से ही यहां कांग्रेस के खाते में 12-13 सीटें आती रही हैं। यानी जब भाजपा के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां थीं, तब भी उसका प्रदर्शन यहां अच्छा रहता था। तो हम इतिहास और मौजूदा हालातों को देखकर मान सकते हैं कि चुनाव भाजपा के पक्ष में बढ़ेगा। अब तक जिस तरह से टिकटों का बंटवारा किया गया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि कांग्रेस 10-12 सीटों तक पहुंच सकती है। वैसे, इस चुनाव में भी मोदी फैक्टर काम कर रहा है, यदि वो पूरी तरह से प्रभावी रहता है तो फिर अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी। 2014 की बात करें तो प्रदेश की 29 में से 27 सीटें भाजपा के पास थीं। जहां तक बात रोचक मुकाबले की है तो सबसे ज्यादा कड़ी टक्कर भोपाल में देखने को मिल सकती है। यह भाजपा की परंपरागत सीट रही है, लेकिन दिग्विजय के मैदान में आने से समीकरण बदल गए हैं। हालांकि, यह काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भाजपा उनके मुकाबले किसे खड़ा करती है। वहीं इंदौर में भी दिलचस्प मुकाबला होने की उम्मीद है।
सुमित्रा महाजन ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। भाजपा और कांग्रेस ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। कयास लगाये जा रहे हैं कि भाजपा कैलाश विजयवर्गीय पर दांव खेल सकती है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। क्योंकि आलाकमान पहले ही उनके बेटे को टिकट दे चुका है और अब यदि पिता को लोकसभा चुनाव की टिकट मिलता है तो पार्टी में घमासान तय है। ऐसे में संभावना है कि भाजपा किसी नए चेहरे को मैदान में उतारे और यदि कांग्रेस उसके मुकाबले में कोई अच्छा उम्मीदवार पेश कर पाती है, तो मुझे लगता है इंदौर भाजपा के लिए खतरे वाली सीट साबित हो सकता है। ग्वालियर की बात करें तो वहां अभी कांग्रेस ने पत्ते नहीं खोले हैं। अगर कांग्रेस वहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी को प्रत्याशी बनाती है, तो भाजपा के लिए वहां भी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। इसी तरह छिंदवाडा में भी कांग्रेस का पलड़ा भारी रख सकता है, क्योंकि भाजपा ने वहां से जो उम्मीदवार घोषित किया है वो कमलनाथ के बेटे नकुल की तुलना में काफी कमजोर है। भोपाल की तरह जबलपुर और मुरैना में भी हमें कड़ी टक्कर देखने को मिल सकती है। अभी कुल मिलाकर यदि हम 25 सीटों की बात करें तो 12 से 15 सीटें कांग्रेस के पक्ष में जा सकती हैं। हालांकि, इसमें नफा-नुकसान भी हो सकता है। अगर मोदी फैक्टर प्रभावी रहता है, तो कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे मैंने अब तक जितने इलाकों का दौरा किया है, वहां यही नज़र आया कि मोदी फैक्टर मध्यम वर्ग तक सीमित है, निचले तबके में इसका प्रभाव नहीं है।
यदि ऐसा होता है तो दिग्विजय सिंह को मुश्किल हो सकती है। वैसे भी ये सीट भाजपा की परंपरागत सीट रही है। हां, अगर भाजपा शिवराज या उमा भारती को मैदान में नहीं उतारती तो पलड़ा दिग्विजय के पक्ष में झुक सकता है। शिवराज या उमा के आने से ध्रुवीकरण की स्थिति उत्पन्न होगी, क्योंकि भोपाल में करीब 3 लाख मुस्लिम मतदाता हैं, जिसका फायदा निश्चित रूप से भाजपा को मिलेगा।
आपकी नज़र में क्या भाजपा पिछली बार के आंकड़े से आगे निकल पाएगी?
देखिये अब तक का जो माहौल है या जिस तरह से यह लोग राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रहे हैं, उसे देखते हुए मुझे लगता है कि राजग 300 से ज्यादा सीटों पर कब्ज़ा कर सकती है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि यदि मोदी फैक्टर थोड़ा भी कमजोर पड़ता है, तो फिर यह आंकड़ा पौने तीन सौ के आसपास रह जायेगा। हालांकि, इतना तय है कि भाजपा पुन: सत्ता में आ रही है। हमारी टीम और खुद मैं भी अलग-अलग इलाकों में जनता की नब्ज टटोल रहे हैं, उससे जितना कुछ अब तक समझ आया है उससे यह साफ़ है कि केंद्र की सत्ता पर भाजपा नीत राजग का कब्ज़ा बरक़रार रहेगा। कांग्रेस इस दौड़ में कमजोर दिखाई दे रही है। मोदी जिस तरह से राष्ट्रवाद को लेकर विपक्ष पर हमले बोल रहे हैं, उसका कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं है। दूसरा यह है कि जिस तरह से भाजपा और उसके नेता ब्रैंडिंग पर खर्च कर रहे हैं, उसमें भी कांग्रेस कमजोर प्रतीत हो रही है। तो ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए यह मानना कि वो सत्ता में आ जाएगी, बहुत कठिन है और देश का मिजाज भी मोदी को दोबारा बहुमत देने का नज़र आता है।
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