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न्यूज रूम में विविधता क्यों जरूरी? रुबिका लियाकत ने साझा किए अपने विचार

एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप द्वारा आयोजित 'वुमेन समिट' में जानी-मानी पत्रकार और न्यूज18 इंडिया की कंसल्टिंग एडिटर रुबिका लियाकत ने न्यूज रूम में विविधता के महत्व पर अपनी बेबाक राय रखी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 11 months ago

एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप द्वारा आयोजित 'वुमेन समिट' में जानी-मानी पत्रकार और न्यूज18 इंडिया की कंसल्टिंग एडिटर रुबिका लियाकत ने न्यूज रूम में विविधता के महत्व पर अपनी बेबाक राय रखी। 'समाचार4मीडिया' के संपादक पंकज शर्मा के साथ बातचीत में उन्होंने पत्रकारिता में संतुलित प्रतिनिधित्व और बदलाव की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि विविधता न सिर्फ पत्रकारिता को समृद्ध बनाती है, बल्कि दर्शकों तक अधिक प्रभावी और संतुलित खबरें पहुंचाने में भी मदद करती है।

हाल ही में हमने वूमेंस डे मनाया। क्या आपको लगता है कि ऐसे दिन केवल एक दिन तक सीमित रहते हैं, या इन मुद्दों पर हमेशा चर्चा होनी चाहिए?

मैंने इस सवाल पर बहुत मंथन किया है। एक दिन मनाना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह एक चिंगारी की तरह काम करता है। जो जन्म होता है, वो एक ही दिन होता है, पर 364 दिन आपको काम करना होता है। कई लोग हैं, जो सिर्फ एक दिन ही ऐसे कार्यक्रमों को मनाते या चर्चा करते हैं। लेकिन कई लोग हैं, जो पहली बार इस तरह के कार्यक्रमों को सुन रहे होते हैं और ऐसे में इस दस मिनट की चर्चा में यदि उनके दिल में 30 सेकंड भी कुछ बातें बैठ जाए, तो वह बदलाव ला सकता है। इसलिए, भले ही यह अजीब लगे, लेकिन यह जरूरी है।

आपने पत्रकारिता में एक अलग पहचान बनाई है। एक महिला के तौर पर क्या इस दौरान आपको किसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा?

चुनौतियां बहुत सारी होती हैं। मैं एक किस्सा शेयर करना चाहूंगी। मैं तीन महीने प्रेग्नेंट थी और ऑफिस में किसी को नहीं बताया था। 'माझी' फिल्म रिलीज होने वाली थी। बिहार में जहां पर वह पहाड़ तोड़ा गया था वहां पर पूरी टीम को ले जाया जा रहा था और जब मैंने रोहित सरदाना जी को बताया कि मैं प्रेग्नेंट हूं, तो उन्होंने हंसकर कहा, "मजाक कभी और करना, मना करने के और भी तरीके होते हैं! और तुम ही तो कहती थी एडवेंचर वाली जगह पर जाना है, तो अब जा।" लिहाजा मैं उस जगह गई, जहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं। वो जगह ऐसी है, जहां पर आज भी मिट्टी के घर हैं तो आप समझ लीजिए उस वक्त ना तो शौचालय नाम की कोई चीज होती थी और वाशरूम जाना होता था, तो औरतों को झाड़ियों में जाना पड़ता था, लेकिन चूंकि वहां पर इतने तादाद में एक्टर्स और एक्ट्रेसेस मौजूद थे, वीवीआईपी लोग थे, तो चारों तरफ वहां झाड़ियों में भी पुलिस वाले खड़े हो गए थे और मैं इतना तकलीफ में थी मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अब करूं तो करूं। मुझे प्यास लग रही थी लेकिन मैं पानी नहीं पी सकती थी क्योंकि बार-बार मुझे वॉशरूम इस्तेमाल करना पड़ता। वहां रेस्ट रूम भी नहीं थे। तब मुझे रिलाइज हुआ कि वहां मर्दों के लिए तो बड़ा आसान था, लेकिन मेरे लिए बहुत सारी दिक्कतें थी, पर शुक्र है एक बुजुर्ग औरत का जिसको मैंने अपनी समस्या बताई, तो वह अपने घर के पीछे मुझे ले गई, जहां चढ़कर मुझे जाना पड़ा। साड़ी से चारों तरफ बांधा हुआ था। यह सब देख मैं डर गईं, तब मुझे लगा कि यह कोई मजाक नहीं है।  कुछ और देर रुक गई तो मैं क्या करूंगी। यह छोटा सा चैलेंज है और ऐसे बहुत सारे चैलेंज महिलाओं के सामने  आते हैं लेकिन फिर आप उससे सीखते हैं और उससे ही आप आगे बढ़ते हैं।

क्या आपको लगता है कि न्यूज रूम में विविधता जरूरी है?

बिल्कुल! लेकिन धर्म और जाति से ज्यादा जरूरी है टैलेंट। जब मैं आई थी, तब मेरे माथे पर नहीं लिखा था कि मैं मुसलमान हूं। मुझे एडमिशन इसलिए नहीं मिला कि मैं महिला हूं या मुस्लिम हूं, बल्कि इसलिए कि मुझमें टैलेंट था।

क्या विविधता से खबरों की कवरेज पर असर पड़ता है?

नहीं, ऐसा नहीं है। अगर न्यूज रूम में महिलाएं ज्यादा होंगी, तो महिला सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दे ज्यादा उठेंगे। लेकिन आज के समय में यह कहना गलत होगा कि महिलाओं को मौके नहीं मिल रहे। न्यूज रूम में विविधता बढ़ रही है और यह बदलाव जरूरी भी है।

आंकड़ों के अनुसार, न्यूज इंडस्ट्री में महिलाओं की भागीदारी 12-20% के बीच है। क्या इसे बढ़ाने की जरूरत है?

हां, लेकिन यह सिर्फ संख्या का सवाल नहीं है। यह महिलाओं की जिद और जज्बे का भी सवाल है। 12% महिलाएं जो इस फील्ड में बनी हुई हैं, वे कठिन परिस्थितियों के बावजूद आगे बढ़ रही हैं। आसान होता है छोड़ देना, लेकिन हमें लड़ते रहना होगा।

सोशल मीडिया पर नेगेटिव कमेंट्स को आप कैसे डील करती हैं?

शुरू में बहुत बुरा लगता था, क्योंकि मेरे माता-पिता भी सोशल मीडिया पर हैं। लेकिन फिर समझ आया कि जो लोग मुझे जानते ही नहीं, वे क्या कह रहे हैं, इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए। अब मैं सोशल मीडिया को भोपू की तरह इस्तेमाल करती हूं - अपनी बात कहती हूं और फिर उसे साइड रख देती हूं!

अंत में, आप इस मंच से क्या संदेश देना चाहेंगी?

बदलाव लाने के लिए हमें खुद आगे बढ़ना होगा। यदि आप में टैलेंट है, तो आपको कोई रोक नहीं सकता। चुनौतियां आएंगी, लेकिन हार मान लेना कोई हल नहीं है। हमें अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी होगी।  

ये पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:


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