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"पिक्चर अभी बाकी है": मार्कंड अधिकारी ने मीडिया की बदली दुनिया पर रखे विचार
देश की मीडिया क्रांति के चश्मदीद और श्री अधिकारी ब्रदर्स ग्रुप के चेयरमैन व MD मार्कंड अधिकारी ने एक्सचेंज4मीडिया से एक खुली और बेबाक बातचीत में इंडस्ट्री में आए बुनियादी बदलावों पर विस्तार से बात की।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago
भारत की मीडिया क्रांति के चश्मदीद और श्री अधिकारी ब्रदर्स ग्रुप के चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने एक्सचेंज4मीडिया से एक खुली और बेबाक बातचीत में इंडस्ट्री में आए बुनियादी बदलावों पर विस्तार से बात की। भारत की पहली लिस्टेड मीडिया कंपनी खड़ी करने वाले मार्कंड अधिकारी ने डिजिटल बदलाव, साउथ की फिल्मों का बोलबाला, टूटते बिजनेस मॉडल और दूरदर्शन की संभावित वापसी तक हर पहलू पर अपनी बेबाक राय रखी।
आप पिछले चार दशकों से भारत की मीडिया क्रांति का हिस्सा रहे हैं। इन वर्षों में आपको सबसे बड़ा बदलाव क्या लगता है?
सच कहूं तो बीते दस सालों में सबसे ज्यादा बदलाव हुए हैं। डिजिटल ने पूरी दुनिया ही पलट दी है। पहले लोग अपने दिन का शेड्यूल टीवी के प्रोग्रामिंग हिसाब से बनाते थे। आज टीवी भी बस एक और स्क्रीन बन गया है। ओटीटी ने टाइम-बाउंड देखने का कॉन्सेप्ट ही खत्म कर दिया है। अब लोग जो चाहें, जब चाहें, जहां चाहें, देख सकते हैं।
लेकिन इतनी सहूलियत के साथ कंटेंट की बाढ़ भी आ गई है। क्या यह कंटेंट ओवरलोड नहीं बन गया?
बिल्कुल। जब किसी चीज का उत्पादन बहुत ज्यादा हो जाता है, तो उसकी गुणवत्ता पर असर पड़ता है। कुछ कंटेंट शानदार होता है, लेकिन बहुत सारा ऐसा है जो देखने लायक नहीं। दर्शकों के पास अब विकल्प इतने ज्यादा हैं कि समझ नहीं आता वो समय कैसे निकालते हैं। प्लेटफॉर्म्स प्रोडक्शन पर भारी खर्च कर रहे हैं, लेकिन उसमें से कितना टिकता है, ये सोचने की बात है।
आपने फिक्शन, नॉन-फिक्शन और फिल्मों जैसे कई फॉर्मेट्स में काम किया है। आज के दौर में किस तरह का कंटेंट चलता है?
अधिकारी: इसका कोई फिक्स फॉर्मूला नहीं है। आखिर में दर्शक ही तय करते हैं कि क्या चलेगा। इसमें किस्मत का भी रोल होता है। जैसे देखिए, पिछले साल बॉलीवुड की सिर्फ तीन फिल्में ही ठीक से चलीं। दूसरी तरफ ‘पुष्पा’ को लें, आज का सबसे बड़ा पैन-इंडिया हीरो अल्लू अर्जुन है, कोई बॉलीवुड स्टार नहीं। उसकी फिल्म ने दुनियाभर में ₹2000 करोड़ कमाए, जिसमें से ₹850 करोड़ तो हिंदी मार्केट से आए। यह कैश में टिकट कलेक्शन है- लोगों ने जेब से पैसे देकर देखा। यह असली कामयाबी है।
और वहीं दूसरी तरफ बॉलीवुड स्टार्स ₹100 करोड़ फीस मांगते हैं?
हां, और प्राइवेट चार्टर्ड फ्लाइट्स में उड़ते हैं, जिनका खर्च प्रड्यूसर उठाता है। पहले तो स्टार्स को कमर्शियल फ्लाइट्स में देखा जाता था, अब वो भी नहीं दिखते। और विडंबना देखिए, इन फिल्मों की P&A (प्रिंट और एडवर्टाइजिंग) लागत तक नहीं निकल पाती। हमें हॉलीवुड मॉडल अपनाना चाहिए, जहां एक्टर्स और डायरेक्टर्स को फिल्म की कमाई के प्रतिशत पर भुगतान होता है। फिल्म हिट तो सबका फायदा, फ्लॉप तो किसी का नहीं। आज तो फिल्म को ₹200 करोड़ प्रोजेक्ट बता कर अनाउंस करते हैं, और रिलीज के समय कहते हैं कि ₹100 करोड़ की फिल्म थी, ताकि शर्म बचाई जा सके। जबकि वो भी रिकवर नहीं होती।
तो आप कह रहे हैं कि इंडस्ट्री का पूरा इकोनॉमिक स्ट्रक्चर ही गड़बड़ है?
बिल्कुल। सारा पैसा एक्टर्स पर खर्च हो रहा है, जबकि दर्शकों की पसंद को समझा नहीं जा रहा। दूसरी तरफ, साउथ इंडस्ट्री आगे इसलिए है क्योंकि वो लोगों को सिनेमाघर तक खींच लाने लायक अनुभव दे रही है। हिंदी दर्शक अब परिपक्व हो गए हैं। उन्हें रियलिस्टिक चीजें चाहिए और ओटीटी उन्हें वही दे रहा है।
ओटीटी अब टीवी और सिनेमा दोनों की जगह ले रहा है। क्या आप इससे सहमत हैं?
पूरी तरह से। आज फिल्मों का वजूद ओटीटी पर निर्भर है। अगर ओटीटी उन्हें न खरीदे, तो फिल्म बनना ही बंद हो जाए। कई थिएटर रिलीज उतनी कमाई भी नहीं करती जितनी ओटीटी दे देता है—क्यों देते हैं, वो खुद ही जानें। ये प्लेटफॉर्म विदेशी कंपनियों के पास हैं, जैसे Amazon, Netflix—जिन्हें भारत की जमीनी हकीकत की पूरी समझ शायद नहीं है। एक फिल्म को ₹50 करोड़ में खरीद लिया, जो बॉक्स ऑफिस पर ₹20 करोड़ भी नहीं कमा सकी। अब फिल्में ओटीटी के लिए ही बन रही हैं।
लेकिन पिछले साल से ओटीटी बजट में भी कटौती हो रही है। इसकी वजह?
क्योंकि यह मॉडल टिकाऊ नहीं है। ओटीटी कंटेंट के लिए फिल्म जैसी क्वालिटी चाहिए होती है, लेकिन इनका बिजनेस सब्सक्रिप्शन पर चलता है। और भारत में लोग ₹150 महीने का सब्सक्रिप्शन लेने से पहले भी दस बार सोचते हैं। खर्च और आमदनी में तालमेल नहीं है। फिर भी प्लेटफॉर्म्स हिंदी फिल्मों के लिए बेहिसाब पैसे दे रहे थे। यही असली समस्या है।
आपने SAB TV और मस्ती जैसे चैनल लॉन्च किए। अच्छा कंटेंट बनाने का ‘सीक्रेट सॉस’ क्या है?
कोई तय फॉर्मूला नहीं होता। कंटेंट एक 'इंस्टिंक्ट' है। आपको जनता की नब्ज पकड़नी होती है, "जमीन से जुड़ा" होना जरूरी है। जो रचनाकार जनता की भावनाओं को समझता है, वही कुछ अर्थपूर्ण बना पाता है। आज भी वेब के लिए बहुत अच्छे क्रिएटर हैं—हालांकि वो टोटल का सिर्फ 10-15% हैं, लेकिन वही असल प्रभाव पैदा कर रहे हैं।
आपने कभी जनमत न्यूज चैनल शुरू किया था जो बाद में Live India बना। फिर न्यूज से बाहर निकल आए। क्या वो सही फैसला था?
अगर आज के न्यूज टीवी बिजनेस को देखें तो हां। इसमें ज्यादा कमाई नहीं है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि शायद रुकना चाहिए था। न्यूज का अपना अलग जोश और स्पेस होता है। पर जैसा कहते हैं, जिंदगी में रीवाइंड बटन नहीं होता।
म्यूजिक ब्रॉडकास्टिंग में आप मस्ती चैनल लेकर आए। आज Spotify जैसे प्लेटफॉर्म्स के दौर में आपका चैनल कैसे टिक रहा है?
Spotify जैसे प्लेटफॉर्म मेट्रो शहरों तक सीमित हैं। लेकिन भारत बहुत बड़ा देश है। टियर 2, टियर 3 शहर और ग्रामीण भारत अभी भी पारंपरिक चैनल देखते हैं। DD Free Dish की पहुंच आज भी किसी भी DTH ऑपरेटर से ज्यादा है। बहुत सारे लोग आज भी टीवी पर म्यूजिक देखना पसंद करते हैं, यूट्यूब पर नहीं। मैं ऐसे परिवारों को जानता हूं जो हर रात वाइन के साथ मस्ती चैनल देखते हैं। नॉस्टैल्जिया की अपनी ताकत है।
दूरदर्शन दोबारा लौटने की कोशिश कर रहा है। क्या वो दोबारा अपनी पुरानी चमक हासिल कर सकता है?
क्यों नहीं? दूरदर्शन एक समय में दुनिया का सबसे बड़ा टेरेस्ट्रियल ब्रॉडकास्टर था। ज्यादातर प्रोडक्शन हाउसेज ने वहीं से शुरुआत की थी—हमने भी। अब DD Waves और डिजिटल पुश के साथ वो खुद को फिर से स्थापित कर रहा है। उसकी पहुंच आज भी सबसे ज्यादा है। अगर वो क्वालिटी कंटेंट और लोकल स्टोरीटेलिंग पर फोकस करे, तो कोई नहीं रोक सकता।
आपने भारत की पहली लिस्टेड मीडिया कंपनी बनाई। आज के मीडिया स्टॉक्स की वैल्यू को आप कैसे देखते हैं?
सच कहूं तो मीडिया को अब एनालिस्ट्स खास आकर्षक सेक्टर नहीं मानते। मार्जिन कम हो गए हैं। पहले जो विज्ञापन रेवेन्यू 50 ब्रॉडकास्टर्स में बंटता था, अब वो 200 प्लेयर्स में बंट रहा है, जिनमें यूट्यूब और फेसबुक जैसे टेक दिग्गज भी हैं। इनका सबसे बड़ा हिस्सा उन्हें ही मिल जाता है। सब्सक्रिप्शन मॉडल भी भारत में खास सफल नहीं हुआ, इसलिए बड़े ब्रॉडकास्टर्स भी DD Free Dish की तरफ लौट रहे हैं।
आज रीजनल कंटेंट का बोलबाला है, क्या आपको लगता है कि भविष्य वहीं है?
बिल्कुल। आज "रीजनल" असल में लोगों की मुख्य भाषा है। साउथ की फिल्में अब सिर्फ "रीजनल" नहीं हैं, अपने क्षेत्र में वे मुख्यधारा हैं। मराठी सिनेमा बढ़िया कर रहा है। गुजराती फिल्में ऑस्कर के लिए जा रही हैं। लोग अपनी भाषा में कंटेंट चाहते हैं—इससे निजी जुड़ाव बनता है।
जियो और रिलायंस जैसे बड़े प्लेयर्स की एंट्री से इंडस्ट्री कैसे बदल रही है?
ये "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" का दौर है। इंडस्ट्रियल हाउसेज के लिए मीडिया इन्वेस्टमेंट ज्यादा जोखिम नहीं है। उनके पास वो ताकत है जिससे कंटेंट का पूरा ईकोसिस्टम स्टेबल हो सकता है। इससे ज्यादा सिनेमा बनेगा, ज्यादा कंटेंट बनेगा और क्रिएटर्स पर वित्तीय दबाव कम होगा। कंसोलिडेशन तो होगा ही। Zee-Sony मर्जर नहीं हुआ, लेकिन आगे चलकर होगा। इतना फ्रैगमेंटेशन लंबे समय तक नहीं टिकेगा।
और यूट्यूब?
आज यूट्यूब दुनिया का सबसे बड़ा ओटीटी प्लेटफॉर्म है। यह ब्रॉडकास्ट विज्ञापनों पर गहरा असर डाल रहा है। विज्ञापनदाता अब कम खर्च में ज्यादा टार्गेटेड ऑडियंस चाहते हैं। इसका सीधा असर पारंपरिक ब्रॉडकास्टर्स की कमाई पर पड़ रहा है।
इस बदलते परिदृश्य में मीडिया उद्यमियों के लिए आगे का रास्ता क्या है?
कोई एक समाधान नहीं है। टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदल रही है। हर एंटरप्रेन्योर को अपनी रणनीति खुद बनानी होगी। लेकिन इतना तय है कि भविष्य डिजिटल का है। मुनाफे वाले मॉडल मुश्किल हैं, लेकिन अनुकूलन ही कुंजी है।
कोई आखिरी पंचलाइन?
"पिक्चर अभी बाकी है!" बदलाव हमेशा अवसर लेकर आता है। मेरी अगली पीढ़ी अब मोर्चा संभाल चुकी है और वो नई स्क्रीन के लिए तैयार कर रही है। स्क्रीन का आकार जो भी हो, कंटेंट ही राजा रहेगा। इसलिए जुड़े रहिए।
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