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डिजिटल दौर में बने रहने के लिए खुद को बदलना जरूरी: अनुज सिंघल, CNBC-Awaaz
अनुज सिंघल, जो CNBC-आवाज और CNBC-बाजार के मैनेजिंग एडिटर हैं, पिछले बीस साल से भारत में फाइनेंशियल जर्नलिज्म की जटिल दुनिया को समझते और समझाते आ रहे हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 9 months ago
रुहैल अमीन, सीनियर स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
अनुज सिंघल, जो CNBC-आवाज और CNBC-बाजार के मैनेजिंग एडिटर हैं, पिछले बीस साल से भारत में फाइनेंशियल जर्नलिज्म की जटिल दुनिया को समझते और समझाते आ रहे हैं। "e4m Headline Makers" सीरीज में एक बेबाक बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि आज की तेज रफ्तार मीडिया में सटीकता और स्पीड के बीच संतुलन कैसे बनाए रखते हैं, अलग-अलग दर्शकों के लिए वित्तीय बाजारों को कैसे सरलता से समझाते हैं और डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को किस तरह देखते हैं। उनकी बातचीत इस बात पर गहराई से सोचने का मौका देती है कि पुरानी मीडिया संस्थाएं डिजिटल दौर में कैसे अपनी अहमियत बनाए रख सकती हैं।
पढ़िए, बातचीत के मुख्य अंश:
फाइनेंशियल जर्नलिज्म में सटीकता और तुरंत विश्लेषण- दोनों की जरूरत होती है। आज की तेज रफ्तार खबरों की दुनिया में आप इस संतुलन को कैसे बनाए रखते हैं?
यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। जब मैंने 2003 में शुरुआत की थी, तब सिर्फ एक बिजनेस चैनल था और खबर दिखाने से पहले उसे अच्छे से जांचने का समय होता था। अब बहुत सारे बिजनेस और डिजिटल चैनल एक-दूसरे से पहले खबर देने की दौड़ में हैं, तो रफ्तार बेहद जरूरी हो गई है। फिर भी हमारे लिए सबसे अहम चीज है–सटीकता। हम हमेशा भरोसेमंद स्रोतों से मिली पुष्टि की गई खबर को ही प्राथमिकता देते हैं, खासकर एक्सचेंज से जुड़ी खबरों को, जिन्हें हम तुरंत और सही तरीके से दिखाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यदि खबर WhatsApp या Twitter जैसे अनौपचारिक चैनलों से आती है, तो हम बहुत सतर्क रहते हैं–पहले पुष्टि करते हैं, चाहे हमें खबर दिखाने में देर ही क्यों न हो जाए।
CNBC Awaaz मुख्य रूप से हिंदी बोलने वाले रिटेल निवेशकों और व्यापारियों के लिए है। आप जटिल फाइनेंशियल कॉन्सेप्ट को कैसे आसान बनाते हैं, बिना उसकी गहराई खोए?
हमारा एक सीधा-सा सिद्धांत है- क्या हमारी मां यह समझ पाएंगी? यदि कोई चीज हमें खुद जटिल लगे, तो हम उसे दोबारा सोचते हैं। हम जानबूझकर तकनीकी शब्दों को सरल करते हैं और यह नहीं मानते कि दर्शक सब कुछ पहले से जानते हैं। जैसे CASA (करंट और सेविंग्स अकाउंट) जैसा शब्द भी हर कोई नहीं समझता, तो हम पूरी तरह से स्पष्टता रखते हैं। हमारा मकसद है हर किसी तक पहुंचना- न सिर्फ अनुभवी निवेशक, बल्कि नए लोग, महिला निवेशक और वो युवा जो अभी मार्केट में आ रहे हैं।
जब YouTube और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का असर बढ़ रहा है, तब पुराने फाइनेंशियल न्यूज चैनल अपनी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता कैसे बनाए रखते हैं?
लगातार खुद को नया करना बहुत जरूरी रहा है। डिजिटल बदलाव को समय पर समझते हुए हमने YouTube, Instagram, Twitter और Facebook पर अपनी मौजूदगी को तेजी से बढ़ाया। आज, सोशल मीडिया के ज्यादातर पैमानों पर CNBC Awaaz टॉप बिजनेस चैनल है। मेरी अपनी डिजिटल मौजूदगी, खासकर Instagram Reels के जरिए, काफ़ी बढ़ी है जिससे मैं सीधे युवा दर्शकों से जुड़ पाता हूं। यही डिजिटल रुख हमें छोटे-छोटे फॉर्मेट में आने वाले कंटेंट की भीड़ में भी प्रासंगिक और भरोसेमंद बनाए रखता है।
खासकर मोबाइल-फर्स्ट और युवा दर्शकों में आपने क्या बड़ा बदलाव देखा है?
सबसे बड़ा बदलाव निवेश की सोच में आया है। पहले लोग 'लॉन्ग टर्म' निवेश का मतलब कई साल मानते थे, अब वो एक ट्रेडिंग डे भी नहीं होता। इस बदलाव में 24x7 लाइव मार्केट कवरेज की बड़ी भूमिका है। इसी वजह से अब हमें दर्शकों को जिम्मेदारी के साथ निवेश करने के लिए प्रेरित करना पड़ता है। COVID-19 के बाद नए निवेशकों की बड़ी संख्या आई है, जिससे उनकी उम्मीदें भी बदल गई हैं—तेज, लेकिन सटीक विश्लेषण की जरूरत अब ज्यादा है।
बजट या RBI पॉलिसी जैसे बड़े वित्तीय इवेंट्स के लिए एडिटोरियल प्लानिंग कैसे होती है?
ऐसी कवरेज के लिए गहराई से तैयारी की जाती है। बजट के लिए प्लानिंग तीन महीने पहले से शुरू हो जाती है। हम एक्सपर्ट पैनल, जूरी डिस्कशन और खास प्रोग्रामिंग को बारीकी से प्लान करते हैं, ताकि बजट वाले दिन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार रहें। RBI पॉलिसी कवरेज के लिए भी ऐसे ही तैयारियां होती हैं, जिसमें खास तौर पर ऐसे समय में लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट की सोच को जोर दिया जाता है, जब मार्केट में हलचल हो।
जब कंटेंट एल्गोरिदम से तय हो रहा है, तब न्यूजरूम में एडिटोरियल जजमेंट की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
AI का आना अब टालना मुश्किल है। CNBC-Awaaz में हम इसे अपनाने में पीछे नहीं हैं—AI के जरिए कंटेंट डिलीवरी और एनालिसिस बेहतर किया जा रहा है। लेकिन एडिटोरियल जजमेंट अब भी बेहद अहम है। एडिटर का काम अब AI के साथ मिलकर काम करने का है, मुकाबला करने का नहीं। यदि AI को अपनाने में देरी करेंगे तो पीछे छूट सकते हैं, इसलिए बदलाव के साथ चलना और उसे अपनी ताकत बनाना जरूरी है।
क्या पारंपरिक पत्रकारिता की पढ़ाई और आज के फाइनेंशियल न्यूजरूम की जरूरतों के बीच कोई स्किल गैप है?
मेरे लिए फॉर्मल जर्नलिज्म की डिग्री कोई बड़ी प्राथमिकता नहीं है। मैं ऐसे लोगों को देखता हूं जो लाइव न्यूजरूम के दबाव में भी अच्छा काम कर सकें, टीम के साथ मिलकर चल सकें और बदलती स्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सकें। आज की मीडिया की दुनिया में असली स्किल्स, डिग्री से ज्यादा मायने रखते हैं।
टीवी पत्रकारिता को हमेशा हाई-प्रेशर जॉब माना जाता है। इतने लंबे करियर में आपने बर्नआउट से कैसे बचाव किया?
मेरी दिनचर्या में साफ़ सीमाएं तय हैं—मैं दिन की शुरुआत जल्दी करता हूं, लेकिन वर्क-लाइफ बैलेंस पर पूरा ध्यान रहता है। मैं जिम्मेदारियां बांटता हूं, अपनी टीम पर भरोसा करता हूं, जिससे थकावट नहीं आती। मेरे लिए बर्नआउट की पहचान आसान है—यदि सुबह का अनुशासित रूटीन ढीला पड़ने लगे, तो समझ जाता हूं कि कुछ बदलने की जरूरत है। अभी तक ये संतुलन मुझे मोटिवेटेड बनाए रखता है।
फाइनेंशियल जर्नलिज्म को आगे प्रासंगिक और असरदार बने रहने के लिए कौन-सी रणनीतियां अपनानी चाहिए?
डिजिटल-फर्स्ट अप्रोच और लगातार इनोवेशन अब जरूरी हो गया है। पुराने फॉर्मेट अब काफी नहीं हैं। आज जर्नलिस्ट को एक साथ कई डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्शकों से जुड़ना आता हो। इसके अलावा, AI को अपनाना भी जरूरी है ताकि कंटेंट और ऑपरेशंस दोनों में सुधार हो सके। फाइनेंशियल जर्नलिज्म को लगातार खुद को रीडिजाइन करते रहना होगा ताकि वो न सिर्फ दर्शकों की बदलती पसंद के साथ चले, बल्कि तकनीकी बदलावों से भी कदम से कदम मिला सके।
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