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ऐडवर्टाइजर्स की जरूरतों के हिसाब से करते हैं विस्तार: सुरिंदर चावला, BCCL
चावला बताते हैं कि कंपनी अब सिर्फ प्रिंट पर नहीं, बल्कि डिजिटल, इवेंट्स और अन्य मीडिया से जुड़ी वेंचर्स पर भी फोकस कर रही है- यहां तक कि कुछ ऐसे पुराने फॉर्मैट्स को भी फिर से शुरू करने की तैयारी है
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 10 months ago
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर व ग्रुप एडिटोरियल इवैन्जिलिस्ट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
जब सुरिंदर चावला ने पिछले साल जुलाई में बैंकिंग सेक्टर से भारत के सबसे बड़े प्रिंट मीडिया हाउस बेनट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL), जिसे टाइम्स ग्रुप भी कहा जाता है, में रिस्पॉन्स डिवीजन के प्रेजिडेंट और हेड के तौर पर जिम्मेदारी संभाली, तो यह बदलाव थोड़ा नाटकीय (drastic) लग सकता था।
उस समय देश की अखबार इंडस्ट्री अब भी कोविड के बाद के झटके से उबरने की कोशिश कर रही थी और खुद टाइम्स ग्रुप भी दो हिस्सों में विभाजित होने के बाद पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था। उनका यह बदलाव कितना चुनौतीपूर्ण था? चावला मुस्कुराते हुए बताते हैं, "असल में बिजनेस का सार है मैनेजमेंट- लोगों को समझना, संचालन करना और मार्केट की गति को पकड़ना। जब ये सिद्धांत समझ में आ जाएं, तो प्रोडक्ट की कैटेगरी (जैसे बैंकिंग या प्रिंट) उतनी मायने नहीं रखती। मैंने बैंकिंग में एसेट्स और लाइबिलिटीज दोनों पर काम किया है- प्रोडक्ट बदल सकते हैं, लेकिन सिद्धांत नहीं बदलते।"
वह आगे कहते हैं, "मुझे इस नई भूमिका में ढलने में ज्यादा समय नहीं लगा और सच कहूं तो यहां किसी ने मुझे बाहरी (outsider) नहीं समझा। BCCL पहले से ही मार्केट में अग्रणी है और हमारे पास बड़े विजन हैं। हम अपने पोर्टफोलियो को बढ़ा रहे हैं, नए इनिशिएटिव्स जोड़ रहे हैं और कुछ पुराने ब्रैंड्स को दोबारा लॉन्च कर रहे हैं। यह प्रिंट मीडिया के लिए खत्म होने का समय नहीं है, जैसा कुछ लोग मानते हैं। यह एक परिपक्व (mature) मार्केट है, लेकिन अब भी इसमें जबरदस्त संभावना है।”
मुंबई मिरर की दोबारा लॉन्चिंग
BCCL (टाइम्स ग्रुप) जिन बदलावों की तैयारी कर रहा है, उनमें सबसे बड़ी और चर्चित पहल है मुंबई मिरर को फिर से एक डेली अखबार के रूप में लॉन्च करना। यह कदम दिखाता है कि ग्रुप अब भी अपने पुराने मजबूत ब्रैंड्स को दोबारा जोर देने और शहरी पाठकों से जुड़ाव बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
चावला कहते हैं, "हम मुंबई मिरर को एक डेली अखबार के तौर पर दोबारा ला रहे हैं। यह एक बहुत पसंद किया जाने वाला प्रोडक्ट रहा है और यह हमारे पोर्टफोलियो को नई रफ्तार देने की रणनीति का हिस्सा है।"
चावला बताते हैं कि कंपनी अब सिर्फ प्रिंट पर नहीं, बल्कि डिजिटल, इवेंट्स और अन्य मीडिया से जुड़ी वेंचर्स पर भी फोकस कर रही है- यहां तक कि कुछ ऐसे पुराने फॉर्मैट्स को भी फिर से शुरू करने की तैयारी है जिन्हें पहले बंद कर दिया गया था। हमारे ग्रुप ने कई चीजें अपने समय से पहले की थीं। कुछ आइडिया उस वक्त नहीं चले, लेकिन अब माहौल बदल गया है। हमें लगता है कि अब उन्हें दोबारा लाने का सही वक्त है।
प्रिंट की वैल्यू कम नहीं हो रही, बल्कि और निखर रही है
जब आज का मीडिया पूरी तरह डिजिटल हेडलाइंस और एल्गोरिदमिक डेटा पर केंद्रित होता जा रहा है, चावला अब भी प्रिंट की 'गूंज' और प्रभाव को लेकर दृढ़ हैं। वह कहते हैं, "यदि आप भरोसा, विश्वसनीयता और ब्रैंड की गंभीरता चाहते हैं, तो प्रिंट से बेहतर कोई माध्यम नहीं है। हमारे कई क्लाइंट्स को प्रिंट कैंपेन से सीधे बिजनेस में असर दिखता है। इसलिए वो बार-बार लौटते हैं।"
इसका कुल मिलाकर मतलब ये है कि टाइम्स ग्रुप अब भी प्रिंट को एक मजबूत माध्यम मानता है और मुंबई मिरर जैसे ब्रैंड को दोबारा शुरू करके वे अपने पुराने ब्रैंड्स में नई जान फूंकना चाहते हैं। साथ ही वे डिजिटल और अन्य वेंचर्स के जरिए एक बहुआयामी ग्रोथ स्ट्रैटेजी पर काम कर रहे हैं।
यह सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत भरोसा है
चावला कहते हैं कि प्रिंट के प्रभाव में उनका भरोसा सिर्फ एक फिलॉसफी नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस आर्थिक तर्क भी हैं। भले ही मीडिया इंडस्ट्री में यह चर्चा हो रही हो कि प्रिंट से कंपनियां पीछे हट रही हैं, लेकिन BCCL ने प्रिंट विज्ञापनों की दरों में रणनीतिक रूप से बढ़ोतरी की है।
उनका कहना है, "यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। यह दरें मांग, महंगाई और उस स्थायी वैल्यू पर आधारित हैं जो हम अपने विज्ञापनदाताओं को देते हैं। हमारे क्लाइंट्स को ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) अच्छे से समझ आता है।"
अब कंपनियां सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अपने कैंपेन पूरे भारत में फैला रही हैं। साथ ही ब्रैंड अब अपनी ऑडियंस की जरूरतों के हिसाब से अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं (वर्नैक्युलर) के बीच शिफ्ट भी कर रहे हैं।
NIE को फिर से नया रूप दिया जा रहा है
आज के विज्ञापनदाता Gen-Z (नई पीढ़ी) के डिजिटल की ओर बढ़ते रुझान को लेकर चिंतित हैं। हालांकि, अलग-अलग उम्र के लोग आज भी प्रिंट, टीवी और दूसरे माध्यमों से जुड़े हुए हैं, लेकिन Gen-Z जो देश की सबसे बड़ी जनसंख्या है, वो अब लगभग पूरी तरह ऑनलाइन चली गई है।
जब पूछा गया कि आप अपने प्रिंट ऑफरिंग्स के जरिए विज्ञापनदाताओं की चिंताओं को कैसे संबोधित करेंगे, तो चावला ने बताया कि कोविड के दौरान डिजिटल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और फिजिकल मीडिया (जैसे अखबार) लगभग बंद हो गया था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है, नौजवान फिर से अखबारों की ओर लौट रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, कई शैक्षणिक संस्थान छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अखबार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए BCCL स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर युवाओं के लिए उपयुक्त उत्पाद तैयार कर रहा है। ऐसा ही एक प्रोग्राम है Newspaper in Education (NIE), जो अभी भी मजबूती से चल रहा है। चावला ने बताया कि इसे और अधिक रोचक और छात्रों के लिए उपयोगी बनाने के लिए इसे फिर से डिजाइन किया जा रहा है।
हालांकि इस बदलाव की सारी जानकारी अभी तय नहीं है, लेकिन मकसद साफ है, युवाओं में अखबार पढ़ने की आदत को फिर से विकसित करना। लोगों को लगता है कि यह आदत अब खत्म हो चुकी है, लेकिन चावला का मानना है कि इसके पुनरुत्थान के संकेत मिलने लगे हैं।
रणनीतिक गहराई के साथ रीजनल विस्तार
महामारी के बाद क्षेत्रीय समाचार पत्रों ने अपनी स्थिति को फिर से सुधार लिया है। जैसे कि दैनिक भास्कर ने हाल ही में अपनी प्रसार संख्या में जबरदस्त बढ़त देखी है।
जब पूछा गया कि Times Group इस विकास का लाभ उठाने की योजना बना रहा है या नहीं, तो यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि टाइम्स ग्रुप ने पहले अपना बांग्ला दैनिक Ei Samay बेचा था और अपनी कुछ लोकप्रिय सप्लीमेंट्स और टैब्लॉयड्स Mumbai Mirror और Pune Mirror बंद कर दिए थे।
Chawla ने कहा, "हम अपने प्रतिस्पर्धियों की तरह हर राज्य में उच्च प्रसार संख्या का पीछा नहीं करते हैं। बीसीसीएल का क्षेत्रीय विकास ज्यादा सटीक और क्लाइंट-केंद्रित है। हम संख्याओं के खेल में नहीं हैं। हम वहां जाते हैं जहां हमारे विज्ञापनदाता चाहते हैं कि हम हों—नेतृत्व के साथ या फिर वहां पहुंचने का स्पष्ट मार्ग। हमारा ध्यान उन महत्वपूर्ण घरों में परिणाम देने पर है, जहां निर्णय लिए जाते हैं।"
यह बयान दर्शाता है कि बीसीसीएल अपने विकास को रणनीतिक क्षेत्रों तक सीमित रखेगा और हर जगह समान रूप से विस्तार नहीं करेगा। यह जियोग्राफिक क्षेत्रों के बारे में चयनात्मक है और प्रमुख स्थानों में मार्केट नेतृत्व प्राप्त करने का लक्ष्य रखता है।
Measurability, Digital Fatigue, और Hybrid Futures पर चर्चा करते हुए Chawla ने कहा कि जैसे-जैसे विज्ञापनदाता अपनी कैम्पेन के ROI और मापनीयता की मांग कर रहे हैं, प्रिंट के मीट्रिक को और व्यापक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, "डिजिटल आंकड़े प्लेटफार्मों से आते हैं, लेकिन जो सच में मायने रखता है वह यह है कि आपने जिन 100 लोगों तक पहुंच बनाई, उनमें से कितनों ने आपका उत्पाद खरीदा?"
Chawla ने डिजिटल थकावट (digital fatigue) को भी महसूस किया और कहा, "डिजिटल शोर करता है, लेकिन कन्वर्जन की कहानियां हमेशा मेल नहीं खातीं। स्मार्ट मार्केटर्स अब संतुलित मिश्रण की तलाश कर रहे हैं—प्रिंट, डिजिटल, टीवी, और आउट-ऑफ-होम—जो उनके उत्पाद और दर्शकों से मेल खाता हो।"
Industry Growth के बारे में बात करते हुए Chawla ने कहा कि उनकी कंपनी का विकास उद्योग के प्रदर्शन से जुड़ा है। उनका कहना है कि जब आप पहले से ही 45-47% मार्केट हिस्सेदारी के साथ काम कर रहे होते हैं, तो आपका विकास उद्योग के साथ जुड़ा होता है। जितना अधिक उद्योग बढ़ता है, उतना ही आपका विकास होता है और इसके विपरीत भी। यह बीसीसीएल का मुख्य ध्यान है—उद्योग-व्यापी वृद्धि को प्रोत्साहित करना।
आखिरकार, Indian Readership Survey (IRS) के बारे में पूछे जाने पर Chawla ने कहा कि यह निर्णय उद्योग निकायों पर निर्भर करता है और वे वर्तमान में इस पर विचार कर रहे हैं।
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