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मीडिया को डेटा व ग्राउंड रिपोर्टिंग के बीच बनाना होगा संतुलन: राजदीप सरदेसाई

जाने माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब '2024: द इलेक्शन दैट सरप्राइज़्ड इंडिया' को लेकर समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा से बातचीत की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago

जाने माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब '2024: द इलेक्शन दैट सरप्राइज़्ड इंडिया' (2024: The Election That Surprised India) को लेकर समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा से बातचीत की। इस किताब में उन्होंने बताया है कि टेलीविजन पत्रकारिता किस तरह से मतदाता की भावनाओं को सही ढंग से नहीं समझ पाई है। इस किताब में उन्होंने राजनीतिक कवरेज के बदलते समीकरणों को भी उजागर किया है।

'समाचार4मीडिया' को दिए गए इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने डिजिटल युग में टेलीविजन समाचारों के सामने आने वाली चुनौतियों, अतिवादी ध्रुवीकरण (हाइपर-पोलराइजेशन) के प्रभाव और इस बात पर चर्चा की कि पत्रकारिता का भविष्य कैसे इसकी विश्वसनीयता और ग्राउंड रिपोर्टिंग को फिर से स्थापित करने पर निर्भर करता है।

बातचीत के प्रमुख अंश

आपकी किताब 2024: The Election That Surprised India में आपने बताया है कि मीडिया ने राजनीतिक नैरेटिव को कैसे गढ़ा और उसे गलत तरीके से समझा। पत्रकारों से जमीनी हकीकत को समझने में क्या चूक हुई?

आधुनिक पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि वह वास्तविक, जमीनी रिपोर्टिंग के बजाय डेटा-आधारित भविष्यवाणियों, एग्जिट पोल और डिजिटल नैरेटिव पर अधिक निर्भर हो गई है। 2024 के चुनावों ने यह साफ कर दिया कि चुनाव स्टूडियो की चर्चाओं या सोशल मीडिया बहसों में नहीं, बल्कि सड़कों पर लड़े और जीते जाते हैं। कई पत्रकार, जिनमें मैं भी शामिल हूं, ग्रामीण भारत में बदलाव के उन गहरे संकेतों को नहीं पकड़ पाए, जहां असली राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। मीडिया अब ज्यादातर शहरों पर केंद्रित हो गया है और इसमें बड़े लोगों (अमीर, प्रभावशाली या शिक्षित वर्ग) की बातें ज्यादा दिखाई देती हैं। लेकिन कई बार यह जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग होती हैं। यानी, जो असली समस्याएं या मुद्दे आम लोगों, खासकर गांवों में हैं, वे मीडिया में कम दिखते हैं।

इसके अलावा, सुविधा आधारित पत्रकारिता का चलन बढ़ा है, जहां रिपोर्टर और विश्लेषक सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं, थिंक टैंक की रिपोर्टों और राजनीतिक बयानों पर निर्भर रहते हैं, बजाय इसके कि वे खुद लोगों से मिलकर उनकी राय समझें। इस तरह की दूरी के कारण न्यूज रूम की चर्चाएं एक इको चैम्बर (echo chamber) बन गई हैं, जो मतदाताओं की वास्तविक चिंताओं से कट चुकी हैं। मुख्यधारा की मीडिया में राजनीतिक नैरेटिव को अक्सर पोलस्टर्स और राजनीतिक रणनीतिकारों ने तय किया, जबकि वास्तविक लोगों की आवाजें अनसुनी रह गईं। डिजिटल चर्चाओं पर अत्यधिक निर्भरता ने एक झूठी राजनीतिक गति का भ्रम पैदा किया, जो अंततः मतदाताओं के वास्तविक व्यवहार से मेल नहीं खा सका।

भारत में राजनीतिक पत्रकारिता कैसे बदली है, और आप इसे किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?

भारत में राजनीतिक पत्रकारिता में बड़ा बदलाव आया है। जब मैंने शुरुआत की थी, तब पत्रकारिता का मतलब था- जमीन पर जाकर रिपोर्टिंग करना, निर्वाचन क्षेत्रों में घूमना, लोगों से मिलना और उनकी आकांक्षाओं को समझना। लेकिन आज न्यूजरूम्स काफी हद तक टेक्नोलॉजी, डेटा विश्लेषण और सोशल मीडिया ट्रेंड्स पर निर्भर हो गए हैं। हालांकि ये सभी उपकरण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये वास्तविक रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकते।

इसके अलावा, मीडिया में राजनीतिक ध्रुवीकरण (पोलराइज़ेशन) बढ़ गया है, जिससे निष्पक्षता पीछे छूट गई है। कई मीडिया संस्थान किसी न किसी राजनीतिक हित के साथ खड़े दिखते हैं, जिससे निष्पक्ष रिपोर्टिंग के बजाय पक्षपाती कवरेज होता है। इसका असर दर्शकों के मीडिया पर भरोसे पर पड़ा है। हालांकि, मुझे लगता है कि भविष्य में पत्रकारिता में सनसनीखेज खबरों के खिलाफ एक बदलाव देखने को मिलेगा। लोग तथ्य-आधारित और गहराई से रिसर्च की गई पत्रकारिता को पसंद करने लगे हैं, और मुझे नए पत्रकारों में उम्मीद दिखती है, जो निष्पक्ष और सच्ची कहानियां सामने लाने की चुनौती स्वीकार कर रहे हैं।

एक और बड़ा बदलाव यह है कि लोग अब खबरें कैसे देखते और समझते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से दर्शकों का ध्यान कई हिस्सों में बंट गया है। अब सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स और स्वतंत्र न्यूज क्रिएटर्स नए दौर के पत्रकार बनकर उभरे हैं। इससे मीडिया ज्यादा लोकतांत्रिक तो हुआ है, लेकिन गलत जानकारी भी तेजी से फैलने लगी है। पारंपरिक मीडिया को गहराई वाली रिपोर्टिंग और डिजिटल-फ्रेंडली कंटेंट के बीच संतुलन बनाना होगा।

क्या आपको लगता है कि मीडिया ने जमीनी रिपोर्टिंग के बजाय डेटा-आधारित भविष्यवाणियों पर ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया है?

बिल्कुल। राजनीति में डेटा विश्लेषण और चुनावी भविष्यवाणियां एक दोधारी तलवार हैं। डेटा बड़े पैमाने पर रुझान दिखा सकता है, लेकिन यह मतदाताओं की भावनाओं को पूरी तरह नहीं पकड़ सकता। 2024 के चुनावों में हमने यही देखा- कई भविष्यवाणियों ने युवाओं, ग्रामीण समुदायों और हाशिए पर खड़े वर्गों के वोटिंग पैटर्न को कम आंका। डेटा मॉडल कुछ हद तक वोटिंग व्यवहार का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन ये व्यक्तिगत परेशानियों, क्षेत्रीय परिस्थितियों और आखिरी समय में बदलने वाले राजनीतिक नजरिए को नहीं पकड़ पाते।

मीडिया को डेटा और ग्राउंड रिपोर्टिंग के बीच संतुलन बनाना होगा, ताकि आंकड़े रिपोर्टिंग की जगह न लें, बल्कि उसे मजबूत बनाएं। जब आंकड़ों को समाज के गहरे राजनीतिक और सामाजिक बदलावों के बिना देखा जाता है, तो वे भ्रामक हो सकते हैं। एक पत्रकार के रूप में, हमें अपने सुरक्षित माहौल से बाहर निकलकर हर स्तर पर लोगों से बातचीत करनी चाहिए, न कि सिर्फ आंकड़ों और ग्राफिक्स पर निर्भर रहना चाहिए।

टीवी पर चुनावी कवरेज का भविष्य आप कहां देखते हैं? क्या डिजिटल मीडिया ने राजनीतिक विमर्श को गढ़ने में पारंपरिक न्यूजरूम्स को पीछे छोड़ दिया है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि डिजिटल मीडिया ने पारंपरिक पत्रकारिता को बदलकर रख दिया है। लोग अब खबरें नए तरीके से ग्रहण कर रहे हैं, जहां सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स और स्वतंत्र प्लेटफॉर्म मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।

हालांकि, टेलीविजन की पकड़ अभी भी बनी हुई है, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण भारत में। टीवी न्यूज़ का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि वह खुद को कैसे ढालता है—उसे गहरी विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग पर ध्यान देना होगा, शोरगुल से हटकर विश्वसनीयता कायम करनी होगी। आने वाले वर्षों में ‘विश्वास’ ही सबसे बड़ी पूंजी होगी।

चुनावी कवरेज को केवल सतही बहसों और पैनल चर्चाओं से आगे बढ़ाना होगा। टीवी न्यूज़ चैनलों को खोजी पत्रकारिता, गहन रिपोर्टिंग और समुदाय-केंद्रित खबरों में निवेश करना चाहिए। दर्शक अब वास्तविकता और गहराई चाहते हैं, और जो चैनल सनसनी फैलाने के बजाय सार्थक खबरें देंगे, वे ही लंबे समय तक टिक पाएंगे।

क्या आपको लगता है कि आज पत्रकारों पर कॉरपोरेट और राजनीतिक दबाव पहले से ज्यादा है? क्या आपकी नजर में न्यूजरूम्स में अब ‘आत्म-सेंसरशिप’ (Self-Censorship) सीधा राजनीतिक हस्तक्षेप से भी बड़ी समस्या बन गई है?

यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। राजनीतिक दबाव न्यूजरूम्स पर हमेशा रहा है, लेकिन आज की सबसे खतरनाक चुनौती ‘आत्म-सेंसरशिप’ है। पत्रकार, संपादक और मीडिया संस्थानों के मालिक खुद ही अंदाजा लगाकर कई खबरें रोक देते हैं, खासकर वे जो ‘विवादास्पद’ या ‘व्यवसाय के लिए जोखिमभरी’ मानी जाती हैं। यह माहौल सीधे सरकारी हस्तक्षेप से भी ज्यादा नुकसानदायक है, क्योंकि इसमें असहज करने वाले सच को ही रिपोर्ट नहीं किया जाता।

सच्ची पत्रकारिता के लिए साहस की जरूरत होती है, और हमें ऐसे पत्रकारों की आवश्यकता है जो कठिन सवाल पूछने की हिम्मत रखते हों, चाहे नतीजे कुछ भी हों। दुर्भाग्य से, कई मीडिया संस्थान अब जवाबदेही से ज्यादा सत्ता तक पहुंच को प्राथमिकता देते हैं, जिससे वे प्रभावशाली लोगों को चुनौती देने से बचते हैं। यदि इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो मीडिया की विश्वसनीयता लगातार गिरती चली जाएगी।

आपकी किताब में गलत सूचना और सोशल मीडिया प्रोपेगेंडा का जिक्र है। क्या आपको लगता है कि अब टीवी न्यूज वॉट्सऐप फॉरवर्ड से कुछ बेहतर है? आप टीवी के 24X7 आक्रोश-आधारित कंटेंट को कैसे देखते हैं?

यह एक तीखा लेकिन सही सवाल है। पत्रकारिता और प्रोपेगेंडा के बीच की रेखा अब और धुंधली हो गई है, खासकर टीवी न्यूज़ में। कई प्राइम-टाइम डिबेट अब सूचना देने के बजाय एक तमाशे में बदल गई हैं—इनका मकसद दर्शकों को उकसाना होता है, न कि जानकारी देना। इसका नतीजा यह होता है कि व्हाट्सएप फॉरवर्ड और फेक न्यूज़ और ज्यादा फैलते हैं।

इसका समाधान यह है कि संपादकीय अनुशासन को दोबारा स्थापित किया जाए, सनसनी के बजाय तथ्यों पर ध्यान दिया जाए और पत्रकारिता को सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं, बल्कि जनसेवा के रूप में देखा जाए। जब तक हम आक्रोश-आधारित कंटेंट से मुद्दों पर केंद्रित रिपोर्टिंग की ओर नहीं बढ़ते, तब तक हमारी विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने का खतरा रहेगा।

2024 के चुनावी कवरेज को देखते हुए, क्या कोई एक चीज़ है जो आप चाहते कि मुख्यधारा की मीडिया अलग तरीके से करती?

काश हमने जमीन पर ज्यादा समय बिताया होता, असली लोगों की बात सुनी होती, बजाय स्टूडियो और आंकड़ों पर निर्भर रहने के। पत्रकारिता विश्वास पर टिकी होती है, और यह विश्वास वहीं बनता है जहां खबरें घट रही होती हैं। अगर 2024 के चुनावों ने हमें कुछ सिखाया है, तो वह यह कि मीडिया को गढ़ी हुई कहानियों के बजाय असली रिपोर्टिंग की ताकत को फिर से खोजने की जरूरत है।


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