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'पोलराइजेशन' सिर्फ मीडिया में नहीं, दर्शकों में भी है: जक्का जैकब, CNN-News18

एक ऐसे न्यूज माहौल में, जो अक्सर तेज-तर्रार बहसों और विभाजनकारी एजेंडों के लिए आलोचना का शिकार रहता है, CNN-News18 के मैनेजिंग एडिटर जक्का जैकब एक शांत बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 9 months ago

एक ऐसे न्यूज माहौल में, जो अक्सर तेज-तर्रार बहसों और विभाजनकारी एजेंडों के लिए आलोचना का शिकार रहती है, CNN-News18 के मैनेजिंग एडिटर जक्का जैकब एक शांत बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं। उनकी अगुवाई में, नेटवर्क ने एक शांत व शालीन पत्रकारिता अपनाई है, जो इस समय के ''क्लिकबाइट'' और लगातार "ब्रेकिंग न्यूज" के दौर में अब कम ही देखने को मिलती है।

'हेडलाइन मेकर्स' शो में, जक्का जैकब नए स्क्रीन डिजाइन, संपादकीय मूल्यों, बढ़ती डिजिटल प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ यह बताते हैं कि उनके लिए खबरें ही सबसे अहम हैं, न कि सिर्फ शोर।

आपका शो शांत और समझाने वाली शैली में है, जो आमतौर पर दिखने वाले शोर-शराबे के न्यूज शोज से काफी अलग है। यह फॉर्मेट कहां से आया और आपने इसे क्यों अपनाया?

COVID-19 के दौरान हमे दर्शकों से यह प्रतिक्रिया मिल रही थी कि वे शोर-शराबे वाली बहसें नहीं चाहते। वे समझना चाहते थे कि क्या हुआ, क्यों यह महत्वपूर्ण है और यह उनके लिए कैसे असरदार है। इसलिए हमने पारंपरिक पैनल डिबेट को छोड़कर गहरे विश्लेषण और समझाने वाले कंटेंट पर ध्यान दिया। शुरुआत में यह बहुत कम था, जैसे हर घंटे में 5-10 मिनट, लेकिन अब हमारे शो का 90-95% हिस्सा इसी शैली का है। यह दर्शकों की मांग पर आधारित है, ट्रेंड्स पर नहीं।

आप किस तरह से संपादकीय सीमा तय करते हैं, जहां आप आकर्षक बनें लेकिन सनसनीखेज नहीं?

आपको आकर्षक होना चाहिए, क्योंकि कोई भी बोरिंग न्यूज नहीं देखना चाहता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तथ्यों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करें। एक पत्रकार का काम सच के करीब रहना है। अगर खबर मजबूत है, तो उसे ज्यादा मसाले की जरूरत नहीं होती। जैसे फिल्मों में, अगर स्क्रिप्ट अच्छी है तो वह काम करती है, वही न्यूज पर भी लागू होता है।

यूट्यूब पत्रकारिता और डिजिटल-फर्स्ट मीडिया के बारे में आपकी क्या राय है? क्या यह प्रतिस्पर्धा है या सहयोग?

मैं इसे सहयोगात्मक मानता हूं। यूट्यूबर्स CNN-News18 जैसे बड़े ब्रांड की स्केल और इंफ्रास्ट्रक्चर से मुकाबला नहीं कर सकते। हालांकि, वे पारंपरिक मीडिया को ज्यादा लचीला और तेज बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हम यूट्यूब, इंस्टाग्राम और शॉर्ट्स के लिए टीम्स बनाकर तेजी से काम कर पा रहे हैं और युवा दर्शकों से जुड़ने में सफल हो रहे हैं।

क्या आपको लगता है कि टीवी न्यूज, खासकर युवा दर्शकों के बीच, अब उतनी लोकप्रिय नहीं रही है?

दर्शकों के देखने का तरीका बदल चुका है। अब लोग पहले से तय वक्त पर न्यूज नहीं देखते। कंटेंट को अब मोबाइल, कनेक्टेड टीवी और सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म्स पर पहुंचाना पड़ता है। दर्शक अब भी न्यूज चाहते हैं, लेकिन वे उसे ऐसे फॉर्मेट में चाहते हैं, जो वे समझ सकें। एक मिनट के एक्सप्लेनर्स, रील्स, वर्टिकल स्टोरीटेलिंग – यह सब अब की न्यूज का हिस्सा बन चुका है।

हाल में हुए आपके चैनल की दृश्यात्मक बदलावों के बारे में बताएं। नए स्क्रीन डिजाइन के पीछे क्या सोच थी?

यह भी दर्शकों की प्रतिक्रिया पर आधारित था। उन्हें स्पष्टता चाहिए थी, ना कि अव्यवस्था। हम अब सेलेब्रिटी विजुअल्स, शोर-शराबा और चटकीले रंगों से दूर हो गए हैं। यहां तक कि मोबाइल पर भी, दर्शक साफ और आसानी से समझने वाले विजुअल्स चाहते हैं। हम यह कहना चाहते हैं कि "CNN-News18 आपके दुनिया, आपके दिन और आपके हेडलाइंस को समझता है।" यही हमारे नए स्क्रीन दर्शन का आधार है।

क्या आपको लगता है कि टीवी न्यूज पिछले कुछ सालों में ज्यादा समझदार हो गई है?

मुझे लगता है, हां। अब दर्शक ज्यादा अर्थपूर्ण कंटेंट चाहते हैं। वे हमें और ज्यादा तेज और सोच-समझ कर न्यूज देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हम अब कम शोर-शराबे वाली बहसें करते हैं और गहरे विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह शोर को कम करने और इसके बजाय प्रकाश डालने के बारे में है।

आज के टीवी न्यूज के बारे में सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?

यह है कि हम या तो बिके हुए हैं या बहुत लिबरल हैं। असलियत कहीं ज्यादा जटिल है। हम अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे हैं: सत्ता को जवाबदेह ठहराना, सच को सामने लाना और सीमाओं के भीतर काम करना। पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) केवल मीडिया में नहीं है, यह दर्शकों में भी है।

आज के समय में एक न्यूज रूम लीडर के रूप में आपकी सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

प्रतिभा को आकर्षित करना और उसे बनाए रखना। युवा पत्रकार अक्सर दो या तीन साल के बाद छोड़ देते हैं, लेकिन असली ग्रोथ चार या पांच साल बाद होता है। हमें ऐसा माहौल बनाना होगा जहां वे खुद को मूल्यवान महसूस करें और भविष्य देख सकें।

क्या आपको लगता है कि भारतीय न्यूज चैनल्स वैश्विक स्तर पर प्रभाव बना रहे हैं?

हां, बढ़ते हुए। जैसे-जैसे भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हो रही है, वैसे-वैसे हमारी बातों में भी दिलचस्पी बढ़ रही है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और गाजा युद्ध के दौरान, दुनिया ने भारत के दृष्टिकोण को सुना। हमारे जैसे चैनल्स इन दृष्टिकोणों को स्पष्ट करने और भारत की आवाज को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने में मदद करते हैं।

आखिर में, आप टीवी न्यूज के भविष्य को कैसे देखते हैं? क्या लीनियर टीवी टिकेगा?

मीडिया में बदलाव आएगा, लेकिन जिज्ञासा कभी नहीं मरेगी। लोग हमेशा जानना चाहेंगे कि क्या हो रहा है, क्यों यह महत्वपूर्ण है। चाहे टीवी हो, मोबाइल हो, या सोशल मीडिया, काम वही रहेगा। दर्शक जहां हैं, वहीं जाइए। उन्हें मूल्य दीजिए। उनकी दुनिया को समझाइए।


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