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पढ़ें: दैनिक भास्कर के प्रमोटर-डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

एडवर्टाइजिंग के नजरिये से बहुत बेहतर नहीं रहे हैं पिछले तीन साल

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

पिछले दिनों जारी हुए ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही’ (IRS Q1 2019) के डाटा आजकल काफी चर्चा में बने हुए हैं। हों भी क्यों न, आखिर ये दो साल के लंबे इंतजार के बाद जो जारी हुए हैं। यदि हम ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही के इन डाटा पर नजर डालें तो पता चलता है कि ‘एवरेज इश्यू रीडरशिप’ (AIR)  के आधार पर ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘आईआरएस 2017’ में जहां इस अखबार की रीडरशिप 1,38,72,000  थी, वह ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही में बढ़कर 1,53,95,000  है। लेकिन ‘डीबी कॉर्प लिमिटेड’ (DB Corp Ltd) ने पिछले दिनों मार्च 2018 में समाप्त वित्तीय वर्ष के जो डाटा पेश किए हैं, उनमें ‘प्रॉफिट आफ्टर टैक्स’ (PAT) में 15.4 प्रतिशत की कमी के साथ यह 273.8  करोड़ रुपए हो गया है, जबकि इसके एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है।

इस बारे में हमारी सहयोगी कंपनी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘दैनिक भास्कर ग्रुप’ के प्रमोटर और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल से बात कर जानना चाहा कि कंपनी इस बैलेंस शीट और आईआरएस के डाटा के बारे में क्या सोचती है, तो उन्होंने बताया कि आईआरएस के डाटा से स्पष्ट है कि प्रिंट को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, यह काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।

गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘मुझे लगता है कि देश में प्रिंट के बुनियादी ढांचे में सुधार हो रहा है। यदि हम पिछले दिनों जारी हुई आईआरएस रिपोर्ट की बात करें तो प्रिंट के पाठकों की संख्या में 1.8 करोड़ की वृद्धि हुई है, यानी विभिन्न भाषाओं में इतने नए पाठक प्रिंट के साथ जुड़े हैं। इनमें हिंदी में जुड़ने वाले पाठकों की संख्या 95 लाख है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इनमें युवा वर्ग के पाठक भी काफी संख्या में शामिल हैं। यदि मैं सर्कुलेशन की बात करूं तो उसमें भी काफी ग्रोथ देखने को मिली है। ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ (ABC) के अनुसार पिछले दस वर्षों में सर्टिफाइड पब्लिकेशंस की संख्या में करीब पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान पत्रकारिता की क्वालिटी और कंटेंट भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। यदि ऐसा नहीं होगा तो लोग क्यों प्रिंट खरीदेंगे और पढ़ेंगे। इंडियर रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही के आंकड़ों के अनुसार 16 से 19 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में पांच प्रतिशत और 20 से 29 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’

गिरीश अग्रवाल ने बताया कि इन डाटा को लेकर सभी पब्लिशर्स काफी उत्साहित हैं और वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में भी निवेश कर रहे हैं। गिरीश अग्रवाल के अनुसार, ‘जैसा कि पश्चिमी देशों में हुआ है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पेड मीडियम होते जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय पब्लिशर्स भी उम्मीद जता रहे हैं कि जैसे वे प्रिंट के लिए पैसे लेते हैं तो आगे जाकर वे अपने डिजिटल पब्लिकेशन के लिए भी पैसे ले पाएंगे। लेकिन इस मीडियम में पैसा मिलने में अभी भी कुछ बाधाएं हैं। क्योंकि आप कंटेंट के लिए तभी भुगतान करते हैं, जब आपको उसमें कुछ खास दिखता है। मान लीजिए कि यदि आप किसी अखबार की वेबसाइट पढ़ रहे हैं और आपको उस वेबसाइट में किसी खास टॉपिक पर बहुत ही अच्छी जानकारी मिलती है, तभी तो आप उसके लिए पैसा देने को तैयार होंगे। पब्लिशर्स इसके लिए तैयार हैं और उनके पास कंटेंट भी है। आपका कंटेंट ऐसा होना चाहिए जो काफी बेहतरीन और एक्सक्लूसिव हो, ताकि कंज्यूमर को उसके लिए भुगतान करने में किसी तरह की दिक्कत न हो।’

गिरीश अग्रवाल ने यह भी बताया कि विज्ञापन के नजरिये से चीजें इतनी धीमी क्यों हैं और वह रफ्तार क्यों नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा, ‘यदि हम एडवर्टाइजिंग के नजरिये से देखें तो मुझे लगता है कि पिछले तीन साल काफी अच्छे नहीं रहे हैं। कई कैटेगरी में विज्ञापनों में कमी रही है, जैसे- सरकारी विज्ञापनों को ही ले, सरकार प्रिंट में बहुत ज्यादा विज्ञापन देती हैं, उनमें कमी आई है। हालांकि, पिछले साल डीएवीपी (DVP) रेट में इजाफा हुआ है और अधिकांश पब्लिशर्स ने इस कैटेगरी में काफी अच्छी ग्रोथ दिखाई है। अन्य कैटेगरी की बात करें तो चूंकि जीडीपी (GDP) नहीं बढ़ रही है, इसलिए ‘एफएमसीजी सेक्टर’(FMCG sector) के सिवाय विज्ञापन में भी कमी हो रही है।’

यह पूछे जाने पर कि प्रिंट के मुकाबले टीवी पर विज्ञापन ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है, अग्रवाल ने कहा, ‘ऐसा इसलिए हो रहा है कि टीवी पर 50-60 प्रतिशत विज्ञापन एफएमसीजी ब्रैंड्स से आता है, इसलिए इस कैटेगरी के द्वारा ही टीवी पर विज्ञापन में ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन 6-7 प्रतिशत की ग्रोथ के बावजूद प्रिंट मजबूती से टिका हुआ है। इसके बावजूद इसमें सरकारी, ऑटो, बैंकिंग और फाइनेंस और रियल एस्टेट कैटेगरी बाजी मार रही हैं। आने वाले समय में इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।’ गिरीश अग्रवाल ने यह भी उल्लेख किया कि अखबार की कीमत में 20 से 50 पैसा बढ़ाने की गुंजाइश है।

ग्रुप जिन मार्केट्स में छाया है, उनके अलावा नए मार्केट में अपनी मौजूदगी नहीं बढ़ा रहा है। यह इन्हीं मार्केट्स में अपनी मौजूदगी को और बढ़ाने की योजना बनाता है और जरूरत पड़ने पर इसमें वह बड़ा निवेश करने में भी नहीं हिचकता है। इस बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘हमारे पास पहले से ही बहुत बड़ा आधार है। हम इन क्षेत्रों में और गहराई में जाना और विस्तार करना चाहते हैं। इसमें ज्यादा से ज्यादा प्रिंटिंग सेंटर खोलना भी शामिल है। राजस्थान में हमारे पास 16 प्रिंटिंग सेंटर हैं। हम चाहते हैं कि हमारा अखबार सुबह चार बजे डिलीवर हो जाए, क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर को अखबार उठाने और लोगों के घरों तक पहुंचाने में करीब दो घंटे लगते हैं। हमारा टार्गेट है कि लोगों के घरों पर सुबह छह बजे से पहले अखबार पहुंच जाना चाहिए। इसके लिए हमें रास्ते में लगने वाले समय को और कम करना होगा।’

यह पूछे जाने पर कि इसके लिए किस तरह के इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी, अग्रवाल ने कहा, ‘यदि किसी निश्चित समय अवधि के दौरान 100 करोड़ रुपए इंवेस्ट करने की जरूरत होती है, जैसे बिहार मार्केट में हमने 200 करोड़ रुपए का इंवेस्ट किया था, तो हमें आगे बढ़ने के लिए दोबारा से ऐसा करने में खुशी होगी।’ पिछले साल जरूरत न होने पर भी उन्होंने 30-34 करोड़ रुपए का इंवेस्टमेंट किया था। इस बारे में गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘न्यूज प्रिंट की बढ़ी कीमतों के बावजूद इस साल हमने कंपनी की बैलेंस शीट को ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और बढ़ी कीमत के साथ 521 करोड़ रुपए पर क्लोज किया है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम इसे करीब 700 करोड़ रुपए पर क्लोज करते।’

उनका कहना था, ‘प्रॉफिट में 15.4 प्रतिशत की जो कमी हुई है, वह वास्तव में न्यूजप्रिंट की बढ़ी कीमतों के कारण हुई है। इस साल सभी पब्लिकेशंस के प्रॉफिट में कमी आई है, क्योंकि न्यूजप्रिंट की कीमतें 40 प्रतिशत तक बढ़ गई थीं। हालांकि अब न्यूजप्रिंट की कीमतें घट रही हैं और इससे हमें काफी राहत मिलेगी। इसके अलावा पब्लिशर्स को एडवर्टाइजर्स के साथ ज्यादा से ज्यादा संवाद बढ़ाने की जरूरत है। आजकल आ रहे नए-नए मीडियम के बीच हमें लोगों को प्रिंट के बदलते बुनियादी ढांचे के बारे में भी बताने की जरूरत है।‘

दैनिक भास्कर ग्रुप की रेडियो डिविजन ‘MY FM की ग्रोथ के बारे में अग्रवाल ने कहा, ‘हम 30 स्टेशनों को फिलहाल ऑपरेट कर रहे हैं और इनके प्रदर्शन से काफी खुश हैं। हमारा ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और प्रॉफिट इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा की लिस्ट में शामिल है। यूपी के मार्केट पर हमारी ज्यादा नजर है। पिछले तीन सालों में ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) 30-40 प्रतिशत से ज्यादा रहा है और यह इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा है। हालांकि मेट्रो शहरों में एंट्री करने का हमारा फिलहाल कोई प्लान नहीं है, लेकिन अगले फेज की नीलामी में बोली लगाना चाहते हैं।’

अगले साल के लिए डीबी ग्रुप को एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में दोहरे अंकों (डबल डिजिट) की ग्रोथ की उम्मीद है। इस बारे में गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘पिछले दो सालों के दौरान हमारा सर्कुलेशन और रीडरशिप दोनों में 10 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। हम साल दर साल (Y-O-Y) सर्कुलेशन ग्रोथ में पांच प्रतिशत की वृद्धि जारी रखना चाहते हैं। इस पांच प्रतिशत सर्कुलेशन ग्रोथ से हमें 7.2 प्रतिशत एडवर्टाइजिंग ग्रोथ मिली है। इसलिए मार्केट की स्थिति सुधरने पर हमें डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिलेगी। अब न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी आ रही है और ऐसे में प्रॉफिट को 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ना चाहिए।’

‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ के बीच के अंतर को दूर करने के बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘सच कहूं तो मैं दैनिक जागरण को प्रतियोगिता में नहीं मानता हूं। उनका कोर मार्केट यूपी है, जहां पर हम नहीं हैं। यदि आप ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट देखें तो हमारी 43 लाख कॉपियां हैं, जबकि दैनिक जागरण की 34 लाख कॉपियां हैं। इसका मतलब कि हमारी कॉपियां दैनिक जागरण से नौ लाख ज्यादा हैं। यूपी और बिहार में आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा होने से अखबारों की रीडरशिप वहां बहुत ज्यादा है, जबकि गुजरात और मध्य प्रदेश में यह कम है। इसलिए रीडरशिप का यह आंकड़ा दैनिक जागरण के पक्ष में जाता है।’

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