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मीडिया को अपने अधिकारों के लिए खुद लड़ना होगा: अनंत नाथ
इस विशेष इंटरव्यू में अनंत नाथ ने इस पर चर्चा की कि कैसे मीडिया संगठनों को मिलकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए और सरकारी नियमों व सेंसरशिप के दबाव का सामना कैसे करना चाहिए।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago
ऐसे में जब प्रेस की स्वतंत्रता पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और उस पर दबाव बढ़ रहा है, उस समय बॉम्बे हाई कोर्ट का हालिया फैसला मीडिया की स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण जीत साबित हुआ है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अनंत नाथ ने इस फैसले के व्यापक प्रभावों, मीडिया संगठनों द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आगे का रास्ता स्पष्ट रूप से बताया।
इस विशेष इंटरव्यू में अनंत नाथ ने इस पर चर्चा की कि कैसे मीडिया संगठनों को मिलकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए और सरकारी नियमों व सेंसरशिप के दबाव का सामना कैसे करना चाहिए।
भारत में मीडिया की स्वतंत्रता के संदर्भ में हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का कितना महत्व है?
यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले ने सरकार के उस प्रयास को खारिज कर दिया है, जिसमें वे एक मजबूत सेंसरशिप तंत्र बनाना चाहते थे। सरकार ने एक फैक्ट-चेकिंग यूनिट की स्थापना की योजना बनाई थी, जिसे सरकार से जुड़ी खबरों को गलत, भ्रामक, या झूठा बताने का अधिकार होता। अगर उन्हें कंटेंट सही नहीं लगता, तो वे उसे हटा सकते थे, जो सेंसरशिप से कम नहीं है।
कोर्ट ने इस निर्णय को असंवैधानिक बताया और इसे तीन मौलिक अधिकारों - अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन माना। यह सरकार को अपनी ही बातों पर न्यायाधीश और पीड़ित बनने जैसा था, जिसे कोर्ट ने गलत ठहराया। यह फैसला संविधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ी जीत है।
क्या आपको लगता है कि यह फैसला भविष्य में सरकार के ऑनलाइन कंटेंट को नियंत्रित करने के प्रयासों को प्रभावित करेगा?
मुझे पूरी उम्मीद है। यह फैसला एक मजबूत मिसाल पेश करता है कि भविष्य में अगर सरकार ऑनलाइन मीडिया और अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश करेगी, तो उसे उच्च स्तर की न्यायिक समीक्षा का सामना करना पड़ेगा। सरकार केवल यह तय नहीं कर सकती कि क्या सही है और क्या गलत और इसे हटाने का निर्णय नहीं कर सकती जब तक कि इसका उचित न्यायिक निरीक्षण न हो। हालांकि, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आईटी एक्ट जैसी अन्य कानूनी प्रावधान सरकार को कुछ शक्तियां देते हैं, जिनसे कंटेंट को हटाया जा सकता है। इन नियमों को विभिन्न हाई कोर्ट्स में चुनौती दी जा रही है, लेकिन इस तरह के फैसले प्रेस की स्वतंत्रता के मामले को मजबूत करते हैं।
आपके विचार में, सरकार कैसे गलत जानकारी पर लगाम लगाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकती है?
इसका समाधान एक स्वतंत्र नियामक निकाय में है, जिसमें मीडिया, नागरिक अधिकार संगठनों, न्यायपालिका और शायद कुछ हद तक सरकार का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। लेकिन सरकार की भूमिका सीमित होनी चाहिए। सरकार ने फैक्ट-चेकिंग यूनिट के जरिये खुद को सर्वशक्तिमान बनाने की कोशिश की थी, जो सही नहीं है। नियामक ढांचे में विभिन्न पक्षों की भागीदारी होनी चाहिए, ताकि स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित हों।
आपको क्या लगता है कि इस फैसले का लोकतंत्र के संबंध में भारत की वैश्विक छवि और प्रेस स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ेगा?
यह फैसला भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग को तुरंत सुधारने में मदद नहीं करेगा, लेकिन यह इसे और खराब होने से जरूर बचाएगा। हमारी रैंकिंग कई अन्य कारकों से प्रभावित हुई है, जिनमें सरकार से आर्थिक और कानूनी दबाव शामिल हैं। अगर अदालत ने फैक्ट-चेकिंग यूनिट के पक्ष में फैसला सुनाया होता, तो हमारी छवि और खराब हो जाती। यह फैसला सुनिश्चित करता है कि हमारी स्वतंत्रता और न घटे।
मीडिया संगठनों को सरकार की मनमानी कार्रवाइयों से खुद को बचाने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेस संगठनों को सक्रिय और सामूहिक होना चाहिए। जब मीडिया संगठन एक साथ सरकार की कार्रवाइयों को चुनौती देते हैं, तो उन्हें सफलता मिलती है, जैसे कि फैक्ट-चेकिंग यूनिट के मामले में हुआ। सामूहिक रूप से काम करना और अधिकारों के लिए लड़ना जरूरी है।
इस फैसले के बाद संपादकों की गिल्ड के भीतर क्या भावना है?
हम उत्साहित और प्रेरित हैं। संपादकों की गिल्ड देशभर में संवाद कार्यक्रम आयोजित कर रही है, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता, मीडिया नियमन और नई तकनीकों के प्रभाव पर चर्चा की जा सके। हम आने वाले समय में और भी कानूनी लड़ाइयां लड़ने के लिए तैयार हैं, ताकि प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके।
क्या आपको लगता है कि निकट भविष्य में मीडिया के लिए और अधिक स्वतंत्रता का माहौल बन सकता है?
मुझे लगता है कि राजनीतिक बदलावों के चलते मीडिया के लिए कुछ जगह बन सकती है, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि सरकार ज्यादा समझदार हो गई है, बल्कि राजनीतिक विपक्ष की मजबूती के कारण होगा। जैसे-जैसे विपक्ष मजबूत होगा, प्रेस के लिए स्वतंत्रता की गुंजाइश भी बढ़ेगी।
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