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DD का OTT प्लेटफॉर्म अगले साल हो सकता है लॉन्च, चल रहीं तैयारियां: अपूर्व चंद्रा
सूचना-प्रसारण सचिव अपूर्व चंद्रा ने कहा कि BARC एक उद्योग-आधारित निकाय है। ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स दोनों ही इसका हिस्सा हैं। यहां सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
सरकार का ओवर-द-टॉप (ओटीटी) या स्ट्रीमिंग सर्विसेज पर कंटेंट को रेगुलेट करने का कोई इरादा नहीं है। यह कहना है सूचना-प्रसारण सचिव अपूर्व चंद्रा का। एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप की कंचन श्रीवास्तव को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) एक उद्योग निकाय है, इसलिए स्टेकहोल्डर्स को स्वयं समाधान के साथ आना चाहिए। इस दौरान चंद्रा ने मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र के लिए सरकार की योजनाओं को भी साझा किया।
यहां पढ़िए बातचीत के प्रमुख अंश:
सूचना-प्रसारण मंत्रालय की नवीनतम सांख्यिकीय पुस्तिका के अनुसार, जिसे आपने कुछ सप्ताह पहले जारी किया था, वित्त वर्ष 2012 में टेलीविजन की राजस्व वृद्धि धीमी हो गई है। अनुमान के मुताबिक, यह अगले दो वर्षों में 3.9% की दर से सबसे धीमी गति से बढ़ने वाले माध्यमों में से एक होगा। क्या आप इसे लेकर चिंतित हैं?
टीवी राजस्व उस गति से नहीं बढ़ रहा है जिस गति से पहले बढ़ता था। फिर भी, यह अभी भी बढ़ रहा है। डिजिटल साइड पर विज्ञापन अधिक बढ़ रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि टीवी राजस्व नहीं बढ़ रहा है। टीवी पर न्यूज साइड पर कंटेंट क्रिएशन लगातार बढ़ रहा है।
भारत में काफी संभावनाएं हैं और लोग टीवी और ओटीटी दोनों देख रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, कुछ सेक्टर ऊपर उठते हैं, तो कुछ में गिराटव देखने को मिलती हैं। लोगों की रुचि बनाए रखने के लिए, जनरल एंटरटेनमेंट चैनल भी कंटेंट में कुछ नया करते हैं और इसके चलते ही वे रियलिटी शो लेकर आए।
इस वर्ष अब तक आपको कितने नए टीवी चैनल के आवेदन प्राप्त हुए हैं? एमआईबी डेटा के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 में केवल 7 नए चैनल लॉन्च किए गए, जबकि उससे पहले के दो वर्षों में 20 बंद हो गए।
मेरे पास सटीक आंकड़े नहीं हैं। आवेदन आते रहते हैं। इसके अलावा, हम नई गाइडलाइंस लेकर लाए हैं, जिनमें न्यूज व करेंट अफेयर्स चैनल खोलने के लिए न्यूनतम नेट वर्थ को 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये करना शामिल है। नॉन-न्यूज चैनल्स के लिए इसे बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया। 2004 के बाद से नेट वर्थ कैप को कभी संशोधित नहीं किया गया।
क्या आपको नहीं लगता कि इसका असर सरकार के राजस्व पर भी पड़ सकता है?
हमारा मानना है कि केवल गंभीर प्लेयर्स को ही वहां होना चाहिए।' देश में 350 से अधिक न्यूज चैनल्स हैं और सैटेलाइट चैनल्स की संख्या लगभग 950 है। लेकिन आप कितने चैनल्स के नाम बता सकते हैं?
ऐसी अटकलें थीं कि अगर न्यूज चैनल उत्तेजक कंटेंट दिखाना जारी रखेंगे, तो सरकार चुनाव से पहले उनकी टीआरपी पर रोक लगा सकती है। इस पर क्या कहेंगे आप?
फिलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है। BARC ने अब चैनल्स के साथ रॉ लेवल डेटा (RLD) साझा करना शुरू कर दिया है। इससे पहले न्यूज चैनल्स ने डेटा और पारदर्शिता की कमी को लेकर शिकायत की थी। इसका उद्देश्य पारदर्शिता लाना है और चैनलों को गलत एल्गोरिदम या हेरफेर, यदि कोई हो, को ट्रैक करने की अनुमति देना है और फिर BARC इसे ठीक कर सकता है। अब, शिकायत यह है कि डेटा बड़ा है और उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। उन्हें इसका अर्थ समझने का प्रयास करना होगा।
क्या आप BARC के कामकाज से संतुष्ट हैं?
भारत एक विविध देश है, जहां बहुत सारी भाषाएं, ग्रामीण-शहरी और आर्थिक विभाजन हैं। वहां केवल 55,000 पैनल होम हैं, लेकिन आबादी का केवल एक हिस्सा ही खबरों को देखना पसंद करता है। इसलिए गलती की गुंजाइश बड़ी है।
हमें जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GECs) से शिकायतें नहीं मिलती हैं, जो राजस्व के मामले में सबसे बड़ा हिस्सा हैं। ये मुद्दे बड़े पैमाने पर न्यूज चैनल्स द्वारा उठाए जाते हैं।
BARC मीजरमेंट के खिलाफ शिकायतों के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
55,000 पैनल होम हैं। उनमें से, खबरों को देखने वाले घर 5,000-7,000 हो सकते हैं और अंग्रेजी न्यूज लगभग 500 घरों तक सीमित है। यहां तक कि एक छोटी सी गलती भी सामने आती है, तो उसे इतने छोटे सैंपल के आकार की वजह से कई गुना और बढ़ाया जा सकता है।
इससे निकलने का रास्ता क्या है? क्या एमआईबी की इस मामले में हस्तक्षेप करने की कोई योजना है?
इस मामले पर खुद न्यूज चैनल भी बंटे हुए हैं। कुछ के पास इसके बारे में एक विशेष दृष्टिकोण है, तो कुछ की पूरी तरह से अलग राय है। न्यूज चैनल्स में एकमत नहीं है।
BARC एक उद्योग-आधारित निकाय है। ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स दोनों ही इसका हिस्सा हैं। यहां सरकार की कोई भूमिका नहीं है। काउंसिल को स्वयं इसे मैनेज करना होगा।
इंडियन ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल फाउंडेशन (आईबीडीएफ) ने ट्राई से ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर को नियंत्रण मुक्त करने और प्राइज कैप को हटाने का अनुरोध किया है, जिसे कम पेड सब्सक्राइबर्स वालों के साथ-साथ डीडी फ्री डिश व ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इस पर एमआईबी का क्या रुख है?
ट्राई एक नियामक (रेगुलेटर) है और उसे सब्सक्राइबर्स और ब्रॉडकास्टर्स दोनों के हितों का ध्यान रखना है। इसमें परिदृश्य का जायजा लिया गया है। ट्राई हर दो साल में नियमों में बदलाव करता है। पहले NTO 1 (नया टैरिफ ऑर्डर) और NTO 2.0 लागू किया गया था और अब NTO 3.0 प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है। सब्सक्राइबर्स की ओर से कोई समस्या नहीं है और ब्रॉडकास्टर्स की ओर से भी कुछ खास दिक्कत नहीं है।
क्या चुनाव से पहले न्यूज ब्रॉडकास्टिंग ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को लेकर कुछ निर्देश दिए जाने की संभावना है?
हमें चुनाव पर कोई निर्देश क्यों जारी करना चाहिए? हमारे लिए एकमात्र मुद्दा फेक न्यूज है। न्यूज चैनल्स को हर समय आचार संहिता का पालन करना पड़ता है। जब तक लोग आचार संहिता का पालन करते हैं, तब तक किसी नए निर्देश की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
हालांकि, कई न्यूज चैनल्स पर अभी भी फेक न्यूज चलाने का आरोप लगाया जा रहा है, जिसका ताजा उदाहरण इजराइल और फिलिस्तीन युद्ध है, जोकि कार्रवाई का मामला बनता है।
आचार संहिता एक सुदृढ़ व्यवस्था है। पिछले एक साल में, हमने फेक न्यूज और दुष्प्रचार फैलाने के लिए 200 न्यूज चैनल्स को ब्लॉक किया है। उनमें से कई ऐसे यूट्यूब चैनल्स थे, जिनके करोड़ों सब्सक्राइबर्स थे। उनमें से कुछ पाकिस्तान स्थित थे, और कुछ कनाडा स्थित थे, जो खालिस्तान समर्थकों द्वारा संचालित थे।
एक साल से अधिक समय हो गया है जब चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स ने अपने फ्री-टी-एयर चैनल डीडी फ्री डिश से हटा लिए हैं। इसका डीडी फ्री डिश के रेवेन्यू पर क्या प्रभाव पड़ा है?
प्रभाव इसके विपरीत है, डीडी फ्री डिश का रेवेन्यू बढ़कर 1,050 करोड़ रुपये हो गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 30-40 प्रतिशत अधिक है, जब यह 750 करोड़ रुपये था। फ्री डिश पर न्यूज चैनल इस साल ज्यादा रेवेन्यू दे रहे हैं।
ऐसे समय में जब चीजें डिजिटल हो रही हैं, भविष्य में डीडी को लेकर क्या योजना है? डीडी अपना खुद का ओटीटी प्लेटफॉर्म कब तक लॉन्च करेगा?
हम एक ओटीटी प्लेटफॉर्म विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। डीडी और एआईआर के पास बहुत सारी अभिलेखीय सामग्री है, जो किसी और के पास नहीं है। 90 के दशक तक कोई निजी चैनल नहीं थे। एम एस सुबुलक्ष्मी, भीम सेन जोशी और बड़े गुलाम अली जैसे प्रतिष्ठित कलाकारों के भाषण, चर्चाएं, साक्षात्कार टीवी धारावाहिक हमारे अभिलेखागार (आर्काइव्स) में पड़े हुए हैं।
अब, लोग ओटीटी पर हर चीज देखना चाहते हैं क्योंकि यह सुविधाजनक है। हालांकि हमारी बहुत सारा कंटेंट यूट्यूब पर उपलब्ध है, लेकिन इसकी कैटलॉगिंग से लोगों को खोजना मुश्किल हो जाता है। यदि हमारे पास अपना ओटीटी चैनल होता है, तो लोग आसानी से हमारी समृद्ध कंटेंट देख सकेंगे।
क्या डीडी का ओटीटी प्लेटफॉर्म फ्री होगा? क्या इसे चुनाव से पहले लॉन्च किया सकता है?
प्रसार भारती अभी भी इस पर काम कर रहा है। इसे अगले साल लॉन्च कि जाने की संभावना है। इसमें एक छोटी सब्सक्रिप्शन फी हो सकती है, लेकिन अभी भी बहुत सी चीजों पर काम किया जाना बाकी है।
मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में सभी टीवी चैनल्स को हर दिन कम से कम 30 मिनट के लिए राष्ट्रवादी हित कार्यक्रम प्रसारित करने का निर्देश जारी किया था। कितने चैनल्स निर्देश का पालन करते हैं?
हमने उनसे कुछ राष्ट्रीय हित कार्यक्रम प्रसारित करने के लिए कहा था। हालांकि, यह न्यूज चैनल्स ही हैं, जो बड़े पैमाने पर जनहित कार्यक्रम चलाते हैं। वैसे जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स भी सामाजिक मुद्दों पर कई कार्यक्रम चलाते हैं।
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