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अच्छा कंटेंट तैयार करने का इससे बेहतर नहीं है कोई 'फॉर्मूला': मार्कंड अधिकारी
‘एक्सचेंज4मीडिया’ की फ्यूचर टॉक सीरीज के पहले एपिसोड में ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ समूह के चेयरमैन मार्कंड अधिकारी ने तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
‘एक्सचेंज4मीडिया’ की फ्यूचर टॉक सीरीज (e4m FutureTalk Series) के पहले एपिसोड में ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ (SAB) समूह के चेयरमैन मार्कंड अधिकारी के साथ ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने तमाम मुद्दों पर बातचीत की। इंडस्ट्री में करीब चार दशक से सक्रिय मार्कंड अधिकारी ने इस बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ की अब तक की यात्रा, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते दायरे और अच्छा कंटेंट तैयार करने के लिए प्लेबुक समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
सब ग्रुप के अब तक के सफर को आप किस रूप में देखते हैं?
समूह का अब तक का सफर काफी रोमांचक रहा है। हमने नब्बे के दशक की शुरू में इसकी शुरुआत की थी और मुझे याद है कि हमें प्रति एपिसोड 1.25 लाख रुपये मिलते थे। मैं ‘जी’ (Zee) के सुभाष चंद्रा को अपना गुरु मानता हूं, वह सच्चे बिजनेसमैन हैं और उस समय वह हमें प्रति एपिसोड 1.25 लाख रुपये देने के लिए सहमत हो गए थे, वह इस मामले में आगे बातचीत करना चाहते थे। हालांकि, जब मैंने उन्हें शो के कॉपीराइट की पेशकश की और पूरा पेमेंट करने की गुजारिश की तो वह मान गए। इंडस्ट्री में बाद में यह ट्रेंड बन गया।
वर्ष 1995 में हमने ‘डीडी मेट्रो’ (DD Metro) के लिए शो बनाने शुरू किए और पांच साल में हमने 3500 से ज्यादा एपिसोड पूरे कर लिए। इसके बाद वर्ष 2020 में हमने ‘सब टीवी’ (SAB TV) की स्थापना की। जैसा कि मैंने कहा कि यह सफर काफी रोमांचक रहा है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो सोचता हूं कि हमारे पक्ष में यह खास रहा कि हमने कॉमेडी का बेहतर ब्रैंड तैयार किया और सोनी-सब के बीच डील होने तक कम पूंजी में इसे चलाया। वर्ष 2000 के बाद से अब तक, सिर्फ दो जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GECs) ने अच्छा प्रदर्शन किया है। इनमें एक ‘सब टीवी’ और दूसरा ‘कलर्स’ है। अन्य ने भी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के क्षेत्र में काफी प्रयास किया है, लेकिन वे इतने सफल नहीं हुए हैं।
सफल कॉमेडी कंटेंट से लेकर न्यूज और फिर म्यूजिक में आपने काम किया, इस विविधता के पीछे क्या आइडिया रहा?
वर्ष 2005 में सोनी-सब (Sony-SAB) डील के बाद मैं अगले कदम के बारे में सोच रहा था। इस बीच हमने न्यूज जॉनर में ट्राई किया था, लेकिन मुझे एक अच्छी डील मिली थी और एक सच्चे बिजनेसमैन की तरह मैंने एक इंडस्ट्रियलिस्ट को चैनल बेच दिया। हमारा मानना था कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (GEC) के क्षेत्र में काफी प्लेयर्स हैं, इसलिए मैं म्यूजिक जॉनर में आ गया। इस बार भी हमने कॉमेडी और म्यूजिक को लेकर एक अलग पेशकश की। हमारे साथ उस समय कॉमेडी जॉनर के जाने-माने नाम जैसे राजू श्रीवास्तव और सुरेश मेनन शामिल थे। कुछ ही समय में चैनल काफी सफल चैनल बन गया। ‘मस्ती’ (Mastiii) को चार जुलाई 2010 को लॉन्च किया गया था और पांच अगस्त 2010 की रेटिंग की बात करें तो यह नंबर वन चैनल था और पिछले 10 वर्षों में इसका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है।
क्या अच्छा कंटेंट तैयार करने के लिए कोई प्लेबुक (playbook) है?
मैं कहना चाहूंगा कि एक चैनल को सफलतापूर्वक चलाने के लिए अच्छे कंटेंट की समझ होना बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। अच्छा कंटेंट तैयार करने के लिए कोई तय प्लेबुक नहीं है। चूंकि मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से आता हूं। मैंने स्ट्रगल का अनुभव किया है और इस बात ने मुझे लोगों को समझने में मदद की है और इसी के अनुसार हम शो में इसका चित्रण करते हैं। यह मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के आम आदमी की तरह है और इसी तरह मैंने अपनी जिंदगी में लोगों को देखा है। मेरा मानना है कि कंटेंट एक तात्कालिक रचना है। यह बिल्कुल ‘थम्बमार्क’ (thumbmark) की तरह होता है, यानी इसका प्रत्येक हिस्सा अपने आप में अलग होता है। यदि आप जनता की नब्ज पहचानते हैं तो आप अच्छा कंटेंट क्रिएट कर पाएंगे।
प्राइवेट टीवी चैनल्स की बात आती है तो आपकी गिनती अग्रणी में होती है। आज हम जो न्यूज टीवी चैनल्स देखते हैं, उसके बारे में आपके क्या विचार हैं?
इन दिनों न्यूज और एंटरटेनमेंट का आपस में मिश्रण हो गया है। टॉप 30-40 चैनल्स को छोड़कर बाकी के लाइजनिंग प्लेटफॉर्म्स बन गए हैं। न्यूज के लिए अब लोग डिजिटल की तरफ मुड़ रहे हैं और इस डोमेन में डिजिटल बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है।
ओवर द टॉप (OTT) कंटेंट के इस्तेमाल में काफी तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली है। आपकी नजर में क्या ओटीटी अगला मेनस्ट्रीम बन जाएगा?
इस बात में कोई शक नहीं है कि OTT आने वाला भविष्य है। डिजिटल का यह फायदा है कि आप कहीं पर भी इसे इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन टीवी के साथ ऐसा नहीं है। यही इसका एक मजबूत पॉइंट भी बन जाता है। हालांकि, हमारी संस्कृति काफी हद तक पारिवारिक है और हम रात को खाने के समय पूरे परिवार को एक साथ बैठे देखना पसंद करते हैं। परिवार के लिए यह समय ओटीटी कंटेंट देखने के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए, इस तथ्य को देखते हुए कि यह मार्केट में सबस्क्रिप्शन पर निर्भर करता है और ऐड रेवेन्यू कम हो रहा है, मैं अभी भी यही कहूंगा कि टीवी लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा है और तमाम घरों में लोग इसे अपने परिवार के साथ मिलकर देखते हैं और यह आगे भी बना रहेगा।
इस पूरी बातचीत को आप यहां इस वीडियो में देख सकते हैं।
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