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अरनब गोस्वामी ने एडिटर्स गिल्ड से इस्तीफे की बतायी वजह
अरनब गोस्वामी ने कहा, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि गिल्ड के मेंबर्स की जांच कर यह पता लगाया जाए कि इनमें से कौन और कितने वास्तव में एडिटर्स हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
वरिष्ठ पत्रकार और ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) के एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी ने सोमवार की रात अपने चैनल पर एक लाइव शो के दौरान संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (Editors Guild of India) से इस्तीफा दे दिया था। अरनब का कहना था कि यह तात्कालिक फैसला था। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान अरनब गोस्वामी ने अपने इस निर्णय और फेक न्यूज आदि तमाम मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। आइए जानते हैं, अरनब गोस्वामी ने क्या कहा।
आपने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से इस्तीफे का फैसला क्यों किया?
आजकल विभिन्न पब्लिकेशनंस पर फेक न्यूज की ‘सुनामी’ आ गई है और एडिटर्स गिल्ड इस बारे में कुछ भी करने में अक्षम साबित हुई है। जब ‘वायर’ ने फेक न्यूज की और इस मामले में एफआईआर दर्ज हुई, तब एडिटर्स गिल्ड ‘वायर’ के समर्थन में उतर आई। वहीं, जब पालघर में हिंदू साधुओं की हत्या कर दी गई, तब इनमें से कई पब्लिकेशंस ने, जो राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और किसी न किसी तरह से एडिटर्स गिल्ड से जुड़े हुए हैं, उन साधुओं की पहचान का खुलासा करने से इनकार कर दिया।
यहां तक कि इस महामारी के दौर में जब गलत और फेक न्यूज के कारण देश की छवि धूमिल हो रही है, एडिटर्स गिल्ड ने कोई कदम नहीं उठाया है। उदाहरण के लिए, गुजरात से संबंधित फर्जी खबर कि अस्पताल में हिंदू और मुसलमानों को अलग-अलग वार्ड में रखा गया है का ही जिक्र करें तो यह साबित होने पर भी कि यह फेक न्यूज थी, एडिटर्स गिल्ड ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया। इसलिए, जब एडिटर्स गिल्ड ने यह तय ही कर लिया है कि वह न सिर्फ देश की छवि को खराब करने वाली खबरों बल्कि फेक न्यूज और दुर्भावनापूर्ण खबरों के मामलों में भी चुप रहेगी तो इस संस्था से जुड़े रहने का कोई मतलब नहीं है।
क्या आपके इस्तीफे को लेकर गिल्ड के किसी मेंबर ने आपको फोन किया?
नहीं, किसी ने ऐसा नहीं किया। सच्चाई यह है कि एडिटर्स गिल्ड संपादकों से बनी ही नहीं है। एडिटर्स गिल्ड काफी हद तक ऐसे लोगों से बनी है जो या तो पूर्व संपादक हैं या कभी भी एडिटर नहीं रहे। उन्हें सिर्फ एडिटर्स गिल्ड का नाम मिल गया है। यदि आप एडिटर्स गिल्ड की मेंबरशिप को देखें तो उसमें संपादकों की संख्या काफी कम है। जब एडिटर्स गिल्ड शुरू हुई थी, तब प्रमुख प्रिंट पब्लिकेशंस के एडिटर इसके मेंबर थे। आज इसमें ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्हें पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं है अथवा जो राजनेताओं के लिए काम करते हैं अथवा जो कभी भी एडिटर्स नहीं रहे हैं। ऐसे में एडिटर्स गिल्ड सिर्फ ऐसे लोगों का समूह बनकर रह गया है तो एडिटर्स गिल्ड में अपनी मेंबरशिप का इस्तेमाल दिल्ली में अपने प्रभाव को फैलाने के लिए करना चाहते हैं। मुझे लगता है कि यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि गिल्ड के मेंबर्स की जांच कर यह पता लगाया जाए कि इनमें से कौन और कितने वास्तव में एडिटर्स हैं।
इसलिए मूल रूप से एडिटर्स गिल्ड की मेंबरशिप ही सवालों के घेरे में है। अभी इन लोगों का समूह क्या करता है, यह सिर्फ अपने बचाव के लिए बयान जारी करने के लिए एक्टिव होता है। इस तरह से एडिटर्स गिल्ड ऐसे लोगों का समूह बन गया है जो अपने बचाव में मिलकर खड़े हो जाते हैं, फिर चाहे वे कितने ही गलत क्यों न हों। आपसी पत्र व्यवहार में एडिटर्स गिल्ड के कई सदस्य कहते हैं कि हमें साथ रहना चाहिए या हम एक साथ रहेंगे। इस तरह सिर्फ अपने बारे में सोचने का नजरिया इस तरह की संस्था के उद्देश्य को ही खत्म कर देता है।
आपने ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (NBF) शुरू की, जो न्यूज चैनल्स का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ (NBA) के समानांतर काम कर रही है। अब आपने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से इस्तीफा दे दिया है, तो क्या आप इसके समानांतर कुछ शुरू करेंगे?
‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (NBF) ऐसे लोगों का काफी बड़ा और प्रभावशाली समूह है जो चैनल्स चला रहे हैं, हजारों लोगों को रोजगार दे रहे हैं और न्यूज पब्लिश कर रहे हैं। जबकि एडिटर्स गिल्ड ऐसे लोगों का समूह है, जिनमें से कई अब सक्रिय पत्रकारिता में नहीं हैं। यह समूह तभी अपने बचाव में आगे आता है, जब कुछ गलत करता है। इसलिए एडिटर्स गिल्ड और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन जैसी संस्था के बीच किसी तरह की तुलना ही नहीं है।
आपकी नजर में चैनल्स/अखबार अथवा अन्य मीडिया संस्थान किस तरह से फेक न्यूज से मुकाबला कर सकते हैं?
सबसे पहली बात तो यह है कि फेक न्यूज का पर्दाफाश मीडिया की जिम्मेदारी है। मैं इस बात पर काफी हैरान हूं कि तथाकथित फैक्ट चेकर्स, जो यह कहकर अपनी जीविका चलाते हैं कि वे फैक्ट चेकर्स हैं, उन्होंने ‘कारवां’, ‘स्क्रॉल’ और ‘वायर’ में सामने आईं फेक न्यूज के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। यह काफी महत्वपूर्ण है कि देश के लोग और देश की मीडिया ‘कारवां’, ‘स्क्रॉल’ और ‘वायर’ के वास्तविक इरादों को उजागर करे।
दूसरी बात ये कि हर किसी को तथ्यों को लेकर अपनी रिसर्च शुरू कर देनी चाहिए। दुर्भाग्य से, ‘अल जजीरा’ और ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ जैसे कई इंटरनेशनल मीडिया संस्थान तथ्यों की क्रॉस चेकिंग किए बिना ‘कारवां’, ‘स्क्रॉल’ और ‘वायर’ से खबरें उठाते हैं। तीसरी बात में गुजरात से आई उस खबर का उदाहरण दिया जा सकता है, जिसमें कहा गया था कि अस्पताल में हिंदू और मुस्लिम को अलग-अलग वार्ड में भर्ती कराया गया है, फेक न्यूज का सबसे बड़ा उदाहरण है और इस खबर को कई अमेरिकी पब्लिकेशंस के साथ अल जजीरा ने भी उठाया था। इस तरह की खबरों को चेक करने की जरूरत है। मुझे लगता है कि इस समय इंटरनेशनल न्यूज इंफॉर्मेशन के लिए अच्छा माध्यम नहीं है।
ओपिनियन (राय) और फैक्ट (तथ्य) के बीच एक लाइन है। ओपिनियन को तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। ‘गल्फ न्यूज’ में जिस तरह के आर्टिकल पब्लिश किए गए हैं, वह बिना तथ्यों के ओपिनियन हैं। मैं भी कई ओपिनियन देता हूं, लेकिन मेरी राय तथ्यों पर आधारित होती है। आज कई पब्लिकेशंस में सिर्फ भाषणबाजी हो रही है। आप कुछ लोगों को पसंद नहीं करते हैं अथवा आपको कुछ लोगों से कुछ समस्या है तो आप इस तरह की बातें करते हैं। इस तरह की बातें करना पत्रकारिता नहीं है। दूसरी तरफ हममें से कई ऐसे हैं जो जिम्मेदारी भरी पत्रकारिता कर रहे हैं और इसी का परिणाम है कि हमारी व्युअरशिप भी काफी ऊंचाइयां छू रही है।
क्या डिजिटल मीडियम फेक न्यूज को लेकर ज्यादा संवेदनशील है?
डिजिटल माध्यम पर आजकल यह भी हो रहा है कि प्रिंट मीडिया से रिटायर होने वाले कई लोग अपना ‘छोटा कुटीर उद्योग’ (little cottage industry) शुरू कर रहे हैं और इसे वह न्यू साइट कहते हैं। इन वेबसाइट के लिए फंडिंग का कोई ज्ञात स्रोत नहीं है। हमारे जैसे बड़े नेटवर्क्स और बड़े मीडिया संस्थान या तो विज्ञापन अथवा सबस्क्रिप्शन पर निर्भर हैं। लेकिन इस तरह की तमाम वेबसाइट्स का कोई स्पष्ट फंडिंग सोर्स नहीं है। उनका रेवेन्यू सिस्टम क्या है? कौन इनमें पैसा लगा रहा है? इसके एडिटोरियल कंटेंट को कौन देखता है? इस तरह से संस्थान का वास्तविक मालिक कौन है? उनकी बैलेंसशीट कैसी है? ये अनुत्तरित प्रश्न हैं। हमने अपनी फॉलोइंग में काफी बढ़ोतरी देखी है। उदाहरण के लिए, पिछले एक महीने में ‘रिपब्लिक वर्ल्ड’ पर हमारे डिजिटल ट्रैफिक में 82 प्रतिशत का इजाफा देखा गया है। इसका मतलब साफ है कि लोगों ने अब फेक न्यूज और रियल न्यूज को पहचानना शुरू कर दिया है, क्योंकि इस तरह का ट्रैफिक तब नहीं आ सकता, जब तक कि लोग यह न समझ जाएं कि रियल न्यूज क्या है और फेक न्यूज क्या है। मुझे पूरा यकीन है कि समय के साथ प्रिंट के रिटायर्ड पत्रकारों द्वारा शुरू की गई यह कॉटेज इंडस्ट्री खुद के लिए भी उनकी उपयोगिता को रेखांकित करेगी।
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