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टाटा सन्स के हरीश भट्ट ने मार्केटर्स को दिए टिप्स, किताब से दे रहे सकारात्मकता का संदेश

पिछले दिनों हुई ‘पिच सीएमओ समिट’ (Pitch CMO Summit) 2021  में ‘टाटा सन्स’ (Tata Sons) के ब्रैंड कस्टोडियन हरीश भट्ट (Harish Bhat) ने टाटा ग्रुप की सफलता की कहानी बयां की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

पिछले दिनों हुई ‘पिच सीएमओ समिट’ (Pitch CMO Summit) 2021  में ‘टाटा सन्स’ (Tata Sons) के ब्रैंड कस्टोडियन हरीश भट्ट (Harish Bhat) ने टाटा ग्रुप की सफलता की कहानी बयां की। ‘Future Proofing Brands’ थीम पर हुई इस समिट में उन्होंने बताया कि टाटा ग्रुप किस तरह से तमाम पीढ़ियों से प्रासंगिक बना हुआ है।

हमारी सहयोगी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के को-फाउंडर और डायरेक्टर नवल आहूजा ने एक सेशन को मॉडरेट किया। इस दौरान भट्ट ने अपनी किताब ‘#Tatastories’ पर भी चर्चा की और उन तथ्यों के बारे में बताया, जिन पर यह आधारित है और जिनके बारे में लोग कम जानते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ये तथ्य वर्तमान सीएमओ को कई तरह से कैसे मदद कर सकते हैं।

‘Future Proofing Brands’ के बारे में बात करते हुए भट्ट ने टाटा सन्स का उदाहरण सबके सामने रखा, जो इस साल 153 साल का हो गया है।

उन्होंने कहा, ‘टाटा ब्रैंड इस साल 153 साल का हो गया है। ऐसे कुछ ही ब्रैंड्स हैं जो 100 साल पुराने हैं और 150 साल पुराने ब्रैंड्स तो काफी कम हैं और भी भी आज की दुनिया में प्रासंगिक बने हुए हैं। टाटा समूह 100 बिलियन डॉलर का उद्यम है, जिसका बाजार पूंजीकरण (market cap) 300 बिलियन डॉलर से अधिक है। यह दुनिया के शीर्ष 100 ब्रैंड्स में एकमात्र भारतीय ब्रैंड है और दुनिया भर के 150 देशों में मौजूद है। टाटा ब्रैंड की कहानी अपने आप में काफी अनोखी है।’

इस दौरान भट्ट ने बताया कि उन्हें अपनी हालिया किताब #Tatastories की प्रेरणा कहां से मिली। भट्ट का कहना था, ‘मार्च से अप्रैल, 2020 तक दुनिया में हर जगह सब कुछ ठहर सा गया था। मैं भी घर से काम कर रहा था और यह हमारे जैसे बहुत से लोगों के लिए अच्छा समय नहीं था। तमाम लोगों की नौकरी चली गई थी और कई लोगों की कमाई घट गई थी। ऐसे में मैंने सोचा कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जो लिखना पसंद करता है, इस नकारत्मकता को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रेरक कहानियां लिखूं। टाटा समूह के साथ 34 वर्षों तक काम करने के बाद, इन स्टोरीज को खोजने के लिए टाटा समूह से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। मैंने कुछ स्टोरी लिखीं और यह देखने के लिए कि क्या यह लोगों को प्रेरित करती हैं, उन्हें लिंक्डइन पर पोस्ट कर दिया। जल्दी ही मैंने देखा कि इन्हें यूजर्स की ओर से काफी ज्यादा और अच्छी प्रतिक्रिया मिलने लगी। कई युवा महिला प्रोफेशनल्स ने मुझे लिखकर कहा कि वे रात को अपने बच्चों को सोते समय ये कहानियां पढ़कर सुनाती हैं। इससे मुझे और ज्यादा से ज्यादा लिखने का प्रोत्साहन मिला। जब मैंने 30-40 स्टोरी पूरी कर लीं तो मैंने उन्हें एक किताब की शक्ल दे दी। इस किताब की सबसे खास बात यह है कि एक स्टोरी को पढ़ने में छह मिनट से भी कम समय लगता है।’

अपनी इस किताब में भट्ट ने एक अध्याय स्वामी विवेकानंद को समर्पित किया है। यह पूछे जाने पर कि कॉरपोरेट की दुनिया में कैसे एक धार्मिक विद्वान ने अपनी जगह बनाई? भट्ट ने बताया, ‘इस किताब के कवर पेज पप टाटा ग्रुप के फाउंडर जमशेद जी टाटा हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि अगर हमें प्रगति करनी है तो भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक शोध विश्वविद्यालय की आवश्यकता है।’

हरीश भट्ट के अनुसार, ‘एक बार जेआरडी टाटा जापान से कनाडा की यात्रा कर रहे थे। उस जहाज (ship) पर उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई और उन्होंने भारत का पहला शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने की बात कही। जब जेआरडी टाटा भारत में वापस आए, तो उन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारत का पहला शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार आया। अंग्रेजों ने उसमें तमाम बाधाएं डालने की कोशिश की, इसलिए जमशेदजी टाटा ने स्वामी विवेकानंद को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लिखा- आप मुझे समुद्री यात्रा के दौरान मिले थे और आपको याद होगा कि हमने एक विश्वविद्यालय के बारे में बात की थी, जिसे मैं स्थापित करना चाहता हूं। मैं उस योजना को मूर्त रूप देना चाहता हूं और क्या आप इस विश्वविद्यालय के पक्ष में एक अपील प्रकाशित करने में मेरी मदद करेंगे।’

भट्ट ने बताया, ‘स्वामी विवेकानंद ने तुरंत जवाब दिया और उस मैगजीन में इसके बारे में लिखा जिसे उन्होंने संपादित किया था। उन्होंने इसके समर्थन में जोरदार अपील की। उसके बाद, मैसूर के महाराजा ने इस विश्वविद्यालय के लिए मैसूर में अपनी जमीन दी और अन्य संसाधन जुटाए गए। आखिरकार, आज जिसे हम भारतीय विज्ञान संस्थान के नाम से जानते हैं, वह अस्तित्व में आया। यह आज भी नंबर एक रैंक वाले विश्वविद्यालय के रूप में बना हुआ है। इस तरह इस देश की भलाई के लिए इस विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उद्योगपति और धार्मिक विद्वान एक साथ आए।’

इस दौरान भट्ट ने किताब में अपने पसंदीदा अध्याय के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, ’इस किताब में मेरी पसंदीदा स्टोरी कल्पना चावला और जेआरडी हैं। जब कल्पना चावला अंतरिक्ष में गई थीं, तो तो अपने साथ एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर ले गईं जो उड़ान में जेआरडी की पहली तस्वीर थी। 1982 में 78 वर्ष की आयु में जेआरडी ने भी उड़ान भरी और कल्पना चावला इसे देख रही थीं। इससे उन्हें एक एयरोनॉटिकल इंजीनियर के रूप में अपना करियर बनाने और बाद में नासा में शामिल होने की प्रेरणा मिली।’

भरोसेमंद और टिकाऊ ब्रैंड्स के निर्माण के बारे में भट्ट ने कहा कि इसके लिए गुणवत्ता के साथ जुनून भी होना चाहिए, यह तभी संभव है। उन्होंने कहा, ‘किसी भी व्यवसाय में सबसे पहले आपको आर्थिक पक्ष तैयार करना होता है। ऐसा तब होता है जब आप प्रॉडक्ट्स और सर्विसेज में उत्कृष्टता प्रदान करते हैं ताकि कस्टमर्स वापस आते रहें।’

ब्रैंड्स कम्युनिटी को क्या वापस देते हैं, के बारे में भट्ट ने कहा कि देश में ऐसे तमाम उद्योगपति हैं जिन्होंने समाज को वापस देने का रास्ता दिखाया है। भट्ट ने कहा, ‘मेरा मानना है कि प्रतिस्पर्धी बनें, अच्छे प्रॉडक्ट बनाएं और अपने कस्टमर्स को बनाए रखें, लेकिन इसके ऊपर खुद से पूछें कि आप समाज के लिए क्या कर सकते हैं। मैंने इस समूह के लिए 34 वर्षों तक काम किया है और इस समूह के साथ इतने लंबे समय तक काम करने का एक कारण यह है कि मैं जो कर रहा हूं, वह राष्ट्र के निर्माण में मदद कर रहा है। हमारा सारा मुनाफा टाटा चैरिटेबल ट्रस्ट को जाता है, जिसके पास हमारी कंपनी का 66 फीसदी हिस्सा है।’

 


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