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सहारा के मनोज मनु ने त्रासदी के उस पल को किया याद, जब फंसी थी उनकी जान

मनोज मनु ‘सहारा’ के साथ काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और सहारा न्यूज नेटवर्क में बतौर ग्रुप एडिटर इसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने में जुटे हुए हैं। 

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

किसी समय देश-दुनिया की खबरों के लिए मशहूर ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ अब अपनी पुरानी स्थिति में लौट रहा है। हालांकि, तमाम विवादों को लेकर इसकी राह में कई कठिनाइयां भी आईं, लेकिन इस नेटवर्क ने हार नहीं मानीं और मजबूती के साथ बुरे दौर के सामने डटा रहा। मनोज मनु ‘सहारा’ के साथ काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और सहारा न्यूज नेटवर्क में बतौर ग्रुप एडिटर इसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने में जुटे हुए हैं। 

समाचार4मीडिया के डिप्टी न्यूज एडिटर विकास सक्सेना और पंकज शर्मा से बातचीत के दौरान मनोज मनु ने अपने अब तक के सफर के बारे में बताया। साथ ही, नेटवर्क के सामने आने वाली चुनौतियों और इसे नए मुकाम तक ले जाने केे बारे में खुलकर बातचीत की।  

आप आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं ग्वालियर का रहने वाला हूं। मेरी पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुई। इसके बाद शुरुआत में मैंने हिंदी दैनिक ‘स्वदेश’ और फिर ‘दैनिक भास्कर’ में काम किया। इसके बाद मैं दिल्ली आ गया और वर्ष 2003 से ‘सहारा’ के साथ जुड़ा हुआ हूं। शुरुआत में मैं एक कार्टूनिस्ट था। लेकिन मुझे लगा कि सिर्फ कार्टूनिस्ट रहने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि अखबार में एक ही कार्टूनिस्ट होता है, इसलिए मुझे यहां से बाहर निकलना ही पड़ेगा। इसके बाद मैंने वहीं रिपोर्टिंग शुरू कर दी और फिर यहां आ गया। वर्ष 2003 में मेरी ‘सहारा’ में जॉइनिंग हुई। उस समय मुझे दिल्ली में एमपी/छत्तीसगढ़ चैनल के लिए रिपोर्टिंग सौंपी गई। इसके बाद 2009/10 में मुझे इस चैनल का हेड बना दिया गया। बाद में एमपी/छत्तीसगढ़ के साथ ही राजस्थान की कमान भी मुझे सौंप दी गई। इसके बाद नेशनल चैनल की जिम्मेदारी भी मुझे दी गई। उस समय इस चैनल की टीआरपी 2.5 प्रतिशत थी, जिसे मैंने आठ प्रतिशत तक पहुंचा दिया और कई नेशनल चैनल्स को पीछे छोड़ दिया। इस बीच पुण्य प्रसून बाजपेयी ने चैनल में जिम्मेदारी संभाली और मुझे न्यूज एंकरिंग के लिए कहा। इसके बाद मैंने एंकरिंग शुरू कर दी। धीरे-धीरे समय गुजरता रहा और फिर मुझे यहां ग्रुप एडिटर बना दिया गया। अभी मैं ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ के ग्रुप एडिटर पद की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं। इस नेटवर्क में छह चैनल हैं, जिनकी कमान मेरे हाथों में है।

जैसा कि आपने बताया कि करियर की शुरुआत में आप कार्टूनिस्ट बनना चाहते थे, तो फिर बतौर प्रोफेशन कार्टूनिस्ट बनने के बारे में क्यों नहीं सोचा? 

शुरुआत में जब मैं दिल्ली आया था तो कार्टूनिस्ट की नौकरी के लिए ही आया था और मशहूर कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग से मिला था। जब मैंने उन्हें अपना कार्टून दिखाया तो उन्होंने काफी तारीफ की और यहां तक कहा कि इस कार्टून को उन्होंने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के कार्टून कॉन्टेस्ट में सलेक्ट भी किया था। हालांकि, अखबार की ओर से इस बारे में मुझे सूचना नहीं मिल पाई थी। जब मैंने तैलंग जी को कार्टूनिस्ट बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारी फैमिली में कोई बिजनेस होता है तो ठीक है। इसे साइड बिजनेस बनाना चाहते हो तो भी ठीक है, लेकिन यदि तुम कार्टूनिस्ट को बतौर करियर चुनते हो तो तुम्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए दूसरे साधन भी तलाशने होंगे, क्योंकि एक अखबार में एक ही कार्टूनिस्ट होता है, ज्यादातर अखबारों में कार्टूनिस्ट पहले से हैं और वे कम से कम दस साल तो वहां काम करेंगे ही, ऐसे में आर्थिक तौर पर काफी मुश्किल होगी। मुझे उनकी बात समझ में आ गई। फिर मैं ग्वालियर लौटा और कार्टूनिंग के साथ-साथ रिपोर्टिंग भी शुरू कर दी। 

क्या आप अब भी कार्टून बनाते हैं?

नहीं, अभी मैं कार्टून नहीं बनाता हूं, क्योंकि समय ही नहीं मिल पाता है। हालांकि, कभी-कभार मौका मिलता है तो बना भी लेता हूं। अभी दिल्ली में शाहीन बाग का मुद्दा हुआ था तो मैंने एक कार्टून बनाया था, जो ‘राष्ट्रीय सहारा’ में पब्लिश भी हुआ था। वैसे- मेरे बनाए कार्टून समय-समय पर राष्ट्रीय सहारा में पब्लिश होते रहते हैं।

अब तक के सफर में कोई ऐसा पल अथवा घटना रही हो, जो आपको अभी तक याद हो, उसके बारे में कुछ बताएं?

उत्तराखंड त्रासदी से जुड़ी एक घटना मुझे अभी भी याद है। जब उत्तराखंड में त्रासदी हुई थी, उस दौरान मेरे एक राजनेता दोस्त बद्रीनाथ जा रहे थे। दरअसल, उनकी विधानसभा क्षेत्र के कुछ लोग वहां फंसे हुए थे, जिन्हें लेने वह जा रहे थे। मैं भी उनके हेलिकॉप्टर में गया था। मैंने उनसे कहा कि मुझे केदारनाथ उतार दें, लेकिन वहां का मौसम खराब होने के कारण उन्होंने मुझे बद्रीनाथ में ही उतार दिया और कहा कि अभी कुछ लोगों को छोड़कर आने के बाद अगले राउंड में आपको वापस ले चलेंगे। लेकिन वहां का मौसम इतना खराब हो गया कि हेलिकॉप्टर की आवाजाही बंद हो गई। मैं अपने साथ गर्म कपड़े लेकर नहीं गया था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि मैं हेलिकॉप्टर से जाउंगा और उसी में वापस आ जाउंगा। अगर उस समय मैं केदारनाथ उतर गया होता तो आज आपके सामने नहीं होता, क्योंकि तीन दिन तक वहां फिर कोई नहीं जा पाया। मेरे पास कपड़े नहीं थे और हो सकता है कि ठंड के कारण मेरी जान भी चली जाती। बद्रीनाथ में जब मैं गया तो करीब दस हजार लोग वहां फंसे हुए थे। देश का एक भी मीडियाकर्मी वहां नहीं था। मैं वहां रहा दो दिन। दो दिन तो सेना ने भी बचाव कार्य में लगे अपने हवाई जहाज वहां ले जाने बंद कर दिए थे, क्योंकि मौसम काफी खराब था और वे वहां उतर ही नहीं पाते। हमने वहां रिपोर्टिंग की, चूंकि वहां लाइव्यू और ओवी वैन नहीं थी, इसलिए जब विमानों की आवाजाही शुरू हुई तो मैं उसमें बैठकर पास की एक जगह गया, जहां लाइव्यू  से इंजस्ट किया, वहां 10 हजार लोग फंसे हुए थे।

किसी जमाने में ‘सहारा समय’ यूपी का एक ब्रैंड बन चुका था। लोग यदि खबर देखते थे तो सहारा समय देखते थे, लेकिन अभी मार्केट में कई चैनल्स आ गए हैं। ऐसी स्थिति में आप अभी इस चैनल को कहां देखते हैं?

टाटा का नमक, बाटा का जूता और रीजनल चैनल्स में सहारा, ये ब्रैंड हैं। सहारा-सेबी विवाद के कारण आज हमारी कुछ परिस्थितियां हैं, जिस वजह से हम थोड़ा कमजोर हुए हैं, क्योंकि टेलिविजन में डिस्ट्रीब्यूशन का रोल काफी महत्वपूर्ण होता है। डिस्ट्रीब्यूशन के लिए करीब सौ करोड़ रुपए चाहिए होते हैं, लेकिन हमारी कंपनी का पैसा सहारा-सेबी विवाद में फंसा हुआ है। आपने देखा होगा कि कई सारे चैनल्स जरा सी परेशानी होते ही अथवा टीआरपी गिरते ही 100-150 लोगों की छंटनी कर देते हैं। हम इतने बुरे दौर से गुजरे हैं, जब एंप्लाईज को सैलरी देने के लिए भी पैसे नहीं थे, तो भी चैनल बंद नहीं हुआ। क्योंकि हम सहारा को परिवार कहते हैं और यहां के चेयरमैन और कर्मचारियों के बीच जो रिश्ता है, वह एक परिवार की तरह है, इसलिए हम उस स्थिति से उबर पाए और आज बेहतर स्थिति की ओर अग्रसर हैं। आज हम टाटा स्काई पर हैं, एयरटेल पर हैं और अपने-अपने स्टेट में बेहतर पोजीशन पर हैं। मध्य प्रदेश में हम तीसरे नंबर पर हैं। यूपी में भी अच्छी पोजीशन पर हैं। उर्दू का हमारा चैनल टॉप थ्री चैनल्स में आता है। कहने का मतलब है कि चीजें पहले से बेहतर हुई हैं। हालांकि, अभी भी फंड का संकट बना हुआ है, क्योंकि केस अभी सॉल्व नहीं हुआ है। इसके बावजूद कंपनी के चेयरमैन अपने एंप्लाईज की बेहतरी के लिए हरसंभव काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि बहुत जल्द ये सारी चीजें भी ठीक हो जाएंगी। डिस्ट्रीब्यूशन बेहतर होने के बाद चैनल और मजबूत स्थिति में आ जाएगा। 

आप अभी अपने कॉम्पटीटर के रूप में किसे देखते हैं?

देखिए, नेशनल चैनल में काफी कुछ ऐसी स्थिति हुई कि हम उसमें प्रोफेशनली तौर पर उस तरह से बिहेव नहीं कर पाए, जिस तरह से मार्केट में करना पड़ता है। लेकिन, रीजनल में हम अब भी ब्रैंड हैं। रीजनल में हमारी अभी भी पकड़ बनी हुई है। आप कहीं भी जाएंगे तो वहां आप देखेंगे कि अभी भी कई ऐसे चैनल हैं जो खुल तो गए हैं, शुरू तो हुए हैं, लेकिन उनके माइक-आईडी को देखकर लोग कहते हैं कि ‘सहारा’ आ गया। 

पहले यह चैनल सहारा समय था, लेकिन अब समय से सहारा कैसे अलग हो गया?

हमारे बीच में मैनेजमेंट स्तर पर कुछ बदलाव हुए थे। नए मैनेजमेंट के फैसले के बाद इसे 'समय' किया गया था, लेकिन हमारा मानना था कि हमारी पहचान सहारा से ही है और शुरू भी यह सहारा समय के नाम से ही हुआ था। इसके बाद वापस इसे सहारा समय किया गया।  

आपका प्रोग्राम ‘एडिटर्स चॉइस’ दूसरे प्रोग्राम से कैसे बेहतर है?

इस प्रोग्राम में लड़ाई-झगड़ा नहीं होता है। लोगों को अब लड़ाई-झगड़े से चिढ़ हो गई है। टेलिविजन में चर्चा होनी चाहिए, बहस नहीं। क्योंकि जब चर्चा होगी तो वो निष्कर्ष तक पहुंचेगी और बहस कभी भी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। बहस होती है तो लोग एक दूसरे पर चिल्लाते हैं, अपने विचार एक दूसरे पर थोपते हैं, लेकिन निष्कर्ष निकालने की कोशिश नहीं करते और निष्कर्ष तभी निकलती है जब चर्चा होती है। इसलिए हमारे इस प्रोग्राम में बहस नहीं चर्चा होती है। अगर कोई बड़ी राजनीतिक घटना नहीं हुई हो, तो हम इस प्रोग्राम में पार्टी प्रवक्ताओं से दूरी बनाकर रखते हैं और उन लोगों को शामिल करते हैं जो उस विषय के जानकार हों, जिस विषय को लेकर चर्चा हो रही हो। इसके साथ ही वरिष्ठ पत्रकारों को भी शामिल किया जाता है, ताकि पूरी चर्चा को अंजाम तक ले जाया जा सके।

इसके अतिरिक्त हिंदू-मुस्लिम से जुड़े मुद्दों, किसी समुदाय विशेष मुद्दों के बजाय हमारा फोकस इस बात पर ज्यादा रहता है कि हम ज्यादातर समसमायिक मुद्दों को ही अपनी चर्चा में शामिल करें। वहीं अगर ऐसे मुद्दे दिखाने ही पड़े तो हमारा ध्यान इस बात पर रहता है कि हम उन पहलुओं को अपनी चर्चा में शामिल करें, जिसे आज का मीडिया नहीं दिखाता है।    

राष्ट्रीय सहारा में शनिवार को प्रकाशित होने वाले ‘हस्तक्षेप’ ने अब टीवी की दुनिया में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है, इस बारे में कुछ बताएं?

‘हस्तक्षेप’ प्रोग्राम हमारे सीईओ व एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय ने शुरू किया है। दरअसल, एक बार हम सभी बैठे थे और उसी समय चर्चा चली कि ‘हस्तक्षेप’ हमारे अखबार राष्ट्रीय सहारा का एक ब्रैंड रहा है। देश के बड़े-बड़े दिग्गज उसमें लिख चुके हैं। क्यों न आज के दौर में जब सारी चीजें डिजिटलाइज हो रही हैं, सारी चीजें टीवी में कन्वर्ट हो रही हैं, तो फिर हस्तक्षेप को भी कन्वर्ट किया जाए। लिहाजा चर्चा के दौरान ये तय हुआ कि ‘हस्तक्षेप’ नाम से ही इस प्रोग्राम की शुरुआत की जाए। फिलहाल अब यह कार्यक्रम हाल ही में शुरू हो चुका है, जिसका बड़ा अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। खास बात ये है कि उपेंद्र राय ने इस प्रोग्राम से ही पहली बार एंकरिंग की दुनिया में कदम रखा है। वैसे तो वे ‘स्टार न्यूज’, ‘सीएनबीसी आवाज’ में भी अपना योगदान दे चुके हैं, देश के जाने-माने रिपोर्टर भी रहे हैं। उन्होंने कई बड़ी-बड़ी स्टोरीज भी ब्रेक की हैं, लेकिन एंकरिंग उन्होंने पहले कभी नहीं की। ‘हस्तक्षेप’ के जरिए ही उन्होंने पहली बार एंकरिंग शुरू की है और खास बात ये है कि लोग उन्हें पसंद भी कर रहे हैं।  

क्या टीवी और प्रिंट के लिए आप डिजिटल मीडिया को एक बड़ी चुनौती के तौर पर देखते हैं?

हां थोड़ा बहुत, क्योंकि कारण यह है कि आप मोबाइल को अपने हाथ में रखते हैं, पर टीवी को तो आप अपने साथ लेकर नहीं घूम सकते हैं। मैंने देखा है कि ज्यादातर लोग मोबाइल पर ही न्यूज देखना पसंद करते हैं। हालांकि इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि एक बड़ी आबादी टीवी को देखती है। लेकिन जो प्रोफेशनल्स हैं, वे न्यूज देखने के लिए मोबाइल का ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वैसे बहुत सी ऐसी काम की खबरें होती हैं, जो टीवी पर नहीं दिखाई देती हैं। इसलिए वे इस तरह के कंटेंट को मोबाइल पर ही देख लेते हैं।     

डिजिटल से अभी सहारा समय बहुत दूर है, क्या भविष्य में इसे लेकर कोई रणनीति बनायी गई है, जिससे इस पर भी मजबूती दर्ज करायी जा सके?   

ये सही है कि सहारा समय डिजिटल से अभी बहुत दूर है, ऐसा इसलिए क्योंकि कभी हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया। पिछले मैनेजमेंट ने भी इस पर ज्यादा काम नहीं किया। फिलहाल, डिजिटल को लेकर हमारी एक टीम है, जो इस पर काम कर रही है। मैनेजमेंट का फोकस भी अब इस पर है, लिहाजा इसे लेकर कुछ भर्तियां भी की गईं हैं। बहुत ही जल्द डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सहारा समय अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएगा। फिलहाल अभी सहारा समय के फेसबुक पेज पर 5 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स सक्रिय हैं।

रीजनल मीडिया में स्ट्रिंगर्स का रोल काफी अहम होता है, लेकिन पेशेवर पत्रकार के तौर पर न उन्हें मान्यता मिलती है और न ही उन्हें मूलभूत सुविधाएं, इस बारे में आप क्या कहेंगे?

देखिए, कोई भी रीजनल चैनल है, वो विशेषकर स्ट्रिंगर्स की दम पर ही चलता है और इसलिए स्ट्रिंगर्स को रखा जाता है। वैसे देखा जाए तो ये उनके लिए पार्ट टाइम जॉब है, क्योंकि ये जरूरी नहीं हो पाता है कि हर दिन उनके जिले की खबर चलाई ही जाए। इसलिए देखा गया है कि जिस तरह से नेशनल चैनल ब्यूरो में अपने लोग रखता है, वैसे ही रीजनल चैनल जिले में अपने स्ट्रिंगर्स को रखता है। हां, ये बात सही है कि उन्हें मूलभूत सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए, क्योंकि उनका पेमेंट खबरों के आधार पर होता है। जिस तरह से अखबारों के लिए मजीठिया को लागू किया गया है, ऐसे ही मेरा मानना है कि टीवी के लिए भी मजीठिया लागू होनी चाहिए और बहुत ही जल्द लागू भी होगी, क्योंकि सरकार शायद इस पर काम भी कर रही है।          

पत्रकारिता में आने वाली पीढ़ी को आप किस तरह से देखते हैं और क्या आप उन्हें कोई संदेश देना चाहेंगे?

थोड़ा सा ज्ञान का अभाव है। उन्हें पता ही नहीं वे कर क्या रहे हैं और करना क्या चाहते हैं। बहुत सारी भर्तियां हमने की है, जिसमें एंकर्स, रिपोर्ट्स और इंटर्न्स आदि शामिल हैं। इंटरव्यू के दौरान कई ऐसे लोग देखने को मिले हैं कि जिन्हें अपने राज्य की ही जानकारी नहीं है। यहां तक कि वे अपने राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री का नाम भी नहीं जानते हैं। उपराष्ट्रपति कौन है, उन्हें नहीं पता होता है। खबर क्या है, खबर का तथ्य क्या है, खबर कैसे लिखी जाती है, उन्हें नहीं पता होता है। पढ़ाई तो कर लेते हैं, पर कहीं न कहीं ज्ञान की कमी रहती है। हम लोग व्यवहारिक पत्रकारिता कर आगे बढ़े हैं। यानी पढ़ाई तो बाद में की, लेकिन पत्रकारिता पहले ही शुरू कर दी। लेकिन मुझे लगता है कि अब जो नई पौध आ रही है, उन्होंने किताबें तो पढ़ ली हैं, लेकिन व्यवहारिक पत्रकारिता का ज्ञान नहीं है। और ऐसा नहीं कि सभी ऐसे हैं, कुछ ऐसे बच्चे भी हैं, जो बहुत अच्छे हैं और बहुत कम समय में बहुत आगे निकल गए हैं।

दूसरी बात यहां कहना चाहूंगा कि हर किसी को एंकर या रिपोर्टर बनना है। वे ये जानते ही नहीं है कि एंकर और रिपोर्टर जिन लोगों के भरोसे रहते हैं वह उन्हीं लोगों से ही जाना जाता है। इसलिए उन्हें ये जान लेना चाहिए कि एंकर और रिपोर्टर के अलावा भी बहुत से लोग हैं इस मीडिया इंडस्ट्री में।  

इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बीच आप परिवार के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं और वीकेंड पर क्या कुछ खास प्लान करते हैं?

परिवार को मैं पूरा समय देता हूं, क्योंकि मैं ऑफिस खत्म करने के बाद इधर-उधर नहीं भागता हूं। मैं अपने शरीर पर भी ध्यान देता हूं। अपने दोस्तों को भी समय देता हूं, क्योंकि बहुत ज्यादा मेरे दोस्त नहीं है। वीकेंड पर मैं बच्चों के साथ प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलना पसंद करता हूं।  


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