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मनगढ़ंत और झूठी सूचनाओं से निपटना पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती: सुधीर चौधरी
जाने-माने न्यूज एंकर और हिंदी न्यूज चैनल 'आजतक' के कंसल्टिंग एडिटर सुधीर चौधरी का कहना है कि मीडिया में समय के साथ तकनीकी दृष्टिकोण से काफी बड़ा बदलाव आया है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
‘एक्सचेंज4मीडिया’ द्वारा शुरू की गई सीरीज ‘हेडलाइन मेकर्स’ (HEADLINE MAKERS) के तहत जाने-माने न्यूज एंकर और हिंदी न्यूज चैनल 'आजतक' (AajTak) के कंसल्टिंग एडिटर सुधीर चौधरी से ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन ने मीडिया से जुड़े तमाम अहम मुद्दों पर बात की है। इस दौरान सुधीर चौधरी ने टीवी पत्रकारिता में अपने तीन दशक लंबे करियर, ट्रोल्स और आलोचकों को लेकर अपनी राय और टीवी न्यूज के भविष्य समेत तमाम अहम पहलुओं पर बेबाकी से बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
'आजतक' पर आपके प्राइम टाइम शो 'ब्लैक&व्हाइट' को एक साल पूरा हो गया है। यह सफर कैसा रहा?
यह बहुत ही सुखद और संतोषजनक सफर रहा है। जब मैं ‘आजतक’ जैसे देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित प्लेटफॉर्म पर आया तो मैं यह सोचकर थोड़ा नर्वस था कि मेरे दर्शक इस नए शो को कितना पसंद करेंगे। उस समय मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं अपना सफर दोबारा से शुरू कर रहा हूं। यह एक तरह से ‘शोले2’ को बनाने और यह सुनिश्चित करने जैसा था कि यह वैसी ही सफल हो। अब, जब मैं लोगों के बीच जाता हूं तो वे मुझे बताते हैं कि उन्हें यह शो कितना पसंद है। मुझे ख़ुशी है कि दर्शकों ने इसे बहुत जल्दी स्वीकार कर लिया और अपना प्यार बरसाया।
‘सीधी बात’ को लेकर क्या कहेंगे?
मैं दोनों शो की मेजबानी का आनंद ले रहा हूं और मुझे उम्मीद है कि दर्शक मुझे इस नए फॉर्मेट में देखकर काफी खुश होंगे।
आप लगभग तीन दशक से न्यूजरूम का हिस्सा रहे हैं। इस दौरान आपकी नजर में न्यूजरूम में किस तरह के बदलाव आए हैं?
मुझे लगता है कि इस दौरान सबसे बड़ा अंतर टेक्नोलॉजी का है। करीब तीस साल पहले जब मैंने अपना करियर शुरू किया था, उस समय वह बिल्कुल अलग दौर था। वर्ष 1999 में जब मैं कारगिल युद्ध कवर कर रहा था तो उस समय सबसे बड़ी चुनौती थी कि कारगिल से दिल्ली तक फुटेज कैसे प्राप्त करें?
मैंने उस समय कैप्टन विक्रम बत्रा का एक इंटरव्यू किया था और जब वह इंटरव्यू प्रसारित हुआ, तब तक कैप्टन विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। यानी तकनीकी दृष्टिकोण से काफी बड़ा बदलाव आया है। आज हमारे पास एक स्थान पर एक पीसीआर और दूसरे स्थान पर रिपोर्टर और एंकर हो सकता है, इसलिए टेक्नोलॉजी ने हमारे बिजनेस में सब कुछ आसान बना दिया है।
न्यूज रूम के इस तकनीकी सशक्तिकरण के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपको एक ही बार में कई जेनरेशंस को अपनी सेवाएं देनी होंगी। इसके अलावा, टेक्नोलॉजी सिर्फ हमारे पास ही नहीं आई है, बल्कि इसने व्युअर्स को भी सशक्त बनाया है। यह टेक्नोलॉजी का ही कमाल है कि आज अगर मैं यहां से सीधा प्रसारण कर सकता हूं तो हमारे दर्शक भी अपने घर से सीधा प्रसारण कर सकते हैं।
आज के दौर में न्यूज सबसे पहले न्यूज चैनल्स पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाई देती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सूचना का समानांतर स्रोत बन गए हैं और इसने हमारे काम को बहुत चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यह वह समय है, जब आपको अपने फॉर्मेट्स में लगातार नए पहल और नए प्रयोग करने होंगे।
ऐसा कहा जाता है कि आजकल टीवी पर न्यूज (खबरें) कम और व्यूज (विचार) ज्यादा होते हैं। आपका इस बारे में क्या कहना है?
मेरा मानना है कि टीवी न्यूज में आप जो भी बदलाव देखते हैं, वह दर्शकों की पसंद और नापसंद से आते हैं। रात नौ बजे का प्राइमटाइम शो टीवी चैनल का संपादकीय पेज होता है। यह लोगों को गहराई से उस न्यूज का अर्थ बताने के साथ-साथ यह भी बताता है कि यह न्यूज उन्हें कैसे प्रभावित करती है। अगर आप बिना किसी विश्लेषण के न्यूज दिखाएंगे तो वह अधूरी होगी, क्योंकि वह न्यूज तो पहले से ही सबके पास है। अब, जो बताना बाकी है वह यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है?
आज तमाम टेक कंपनियां, चाहे वह एक्स (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि हों, आपको अपनी बात कहने के लिए प्लेटफॉर्म दे रही हैं। आप वीडियो और ट्वीट आदि के माध्यम से तमाम फॉर्मेट्स में लोगों के साथ अपने व्यूज शेयर कर सकते हैं। आप इन टेक कंपनियों से अपने व्यूज शेयर करने की स्वतंत्रता खरीद रहे हैं। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे दर्शक व्यूज सुनने के लिए कितने उत्सुक हैं। यदि व्यूज हटा दिए जाएं तो आपको 24 घंटे केवल स्पीड न्यूज ही देखने को मिलेंगी। जैसे पांच मिनट में 100 न्यूज और ऐसे में आप उन न्यूज का संदर्भ कभी नहीं समझ पाएंगे।
ऐसा कहा जाता है कि आज की टीवी पत्रकारिता में हम (पत्रकार) सत्ता में बैठे लोगों से कठिन सवाल पूछना भूल गए हैं, खबरें सिर्फ प्रचार का माध्यम बन गई हैं और कुछ नहीं। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
ऐसा नहीं है। आप प्रधानमंत्री के साथ मेरे इंटरव्यूज देखें। कई लोग कहते हैं कि आप प्रधानमंत्री से कठिन प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं, लेकिन यदि आप इन सभी इंटरव्यूज को देखें तो आपको पता चलेगा कि एक भी प्रश्न ऐसा नहीं है, जो मैंने उनसे नहीं पूछा हो। प्रधानमंत्री के साथ पिछले चुनाव से ठीक पहले मेरे आखिरी इंटरव्यू में मैंने उनसे बेरोजगारी और अन्य मुद्दों के बारे में पूछा था।
इसी तरह, लोग कहते हैं कि हम अमित शाह जैसे शीर्ष मंत्रियों से कठिन सवाल नहीं पूछते हैं। आप अमित शाह के साथ मेरे सभी इंटरव्यूज देख सकते हैं और फिर मुझे बताएं कि उनमें से कौन से प्रश्न कठिन नहीं हैं।
समस्या यह है कि इस तरह की बातें फैलाने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी राजनीतिक दल के लिए काम कर रहे हैं। वे ऐसा नैरेटिव बनाते हैं कि कठिन सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं है।
अगर मैं विपक्ष की बात करूं तो जो लोग कहते हैं कि सत्ता में लोग बोलते नहीं हैं, वे बताएं कि राहुल गांधी ने अपना आखिरी इंटरव्यू कब दिया था? सोनिया गांधी ने अपना आखिरी इंटरव्यू कब दिया था? आपने नीतीश कुमार का आखिरी इंटरव्यू कब देखा था?
निजी तौर पर मैं असम्मानजनक इंटरव्यू करने में विश्वास नहीं रखता। यदि कोई व्यक्ति मेरे पास गेस्ट बनकर आता है तो उसे यह अधिकार है कि वह जो कहना चाहता है, कहे। उसे स्पेस मिलना चाहिए ताकि वह अपनी बात खुलकर रख सके।
आजकल होता यह है कि जब आप एक घंटे किसी का इंटरव्यू करते हैं, तो उसका सिर्फ एक हिस्सा सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है। कतिपय लोगों द्वारा पत्रकार को बदनाम करने के लिए अथवा निहित स्वार्थों के चलते इस तरह की गलत सूचना फैलाई जाती है। मेरा मानना है कि झूठी और मनगढ़ंत सूचनाओं से निपटना आज पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
सुधीर चौधरी के साथ इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।
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