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मीडिया में बढ़त बनाए रखने के लिए कंटेंट की क्वालिटी और विश्वसनीयता बहुत अहम: पंकज पचौरी

वरिष्ठ पत्रकार और डॉ. मनमोहन सिंह (अब दिवंगत) के प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान उनके मीडिया सलाहकार रहे पंकज पचौरी से पिछले दिनों समाचार4मीडिया ने खास मुलाकात की और तमाम अहम मुद्दों पर बातचीत की।

पंकज शर्मा 1 year ago

वरिष्ठ पत्रकार, GoNews India के फाउंडर और डॉ. मनमोहन सिंह (अब दिवंगत) के प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान उनके मीडिया सलाहकार रहे पंकज पचौरी से पिछले दिनों समाचार4मीडिया ने खास मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान मीडिया से जुड़े तमाम प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। इस दौरान पंकज पचौरी ने डॉ. मनमोहन सिंह के साथ अपने संबंधों पर भी विस्तार से बातचीत की और बताया कि कैसे उनका संबंध औपचारिकताओं से परे थे।

पंकज पचौरी का कहना था, ‘मेरे लिए मनमोहन सिंह जी का निधन केवल प्रोफेशनल स्तर पर नहीं, बल्कि निजी स्तर पर बहुत ही गहरे दुख का विषय है। मुझे याद है जब वर्ष 2018 में मेरे पिता का निधन हुआ था, तो मनमोहन जी ने ही सबसे पहले मुझे फोन किया था। उनके शब्दों में काफी आत्मीयता और सहानुभूति थी, जो दिलासा देने वाले थे। हमारा संबंध औपचारिकताओं से परे था। उन्होंने मेरे साथ एक दोस्त की तरह व्यवहार किया, भले ही मैं खुद को उनका 'चेला' (शिष्य) मानता था। वह अक्सर मेरे पिता के बारे में पूछते थे और फारसी और उर्दू में उनकी बौद्धिक गतिविधियों के बारे में स्टोरीज शेयर करते थे।

पचौरी का मानना ​​है कि डॉ. सिंह काफी शांत रहते थे। उनकी इस चुप्पी को अक्सर गलत समझा गया और उनकी बुद्धिमत्ता को कम सराहा गया। 26 दिसंबर को डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद से तमाम साक्षात्कार देने और कई आर्टिकल लिखने के बाद भी पंकज पचौरी को लगता है कि डॉ. सिंह के योगदान की गहराई को पूरी तरह समझ पाना अभी भी संभव नहीं है।

डॉ. सिंह के साथ अपनी यादों को शेयर करते हुए पचौरी का कहना था कि तमाम राजनेताओं के विपरीत, डॉ. सिंह को टीवी पर आने या इंटरव्यू देने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। कई प्रमुख मीडिया हस्तियां बार-बार इंटरव्यू के लिए अनुरोध करतीं, लेकिन डॉ. सिंह ने हमेशा मना कर दिया। वह इस बात पर जोर देते थे कि उनके (डॉ. सिंह के) काम को खुद बोलने देना चाहिए।

पंकज पचौरी ने बताया, ‘डॉ. सिंह को यह समझाना कि मीडिया सम्मेलनों में भाग लेना अथवा तमाम शादियों/पार्टियों में शामिल होना मीडिया में अच्छी छवि बनाए रखने के लिए जरूरी है, काफी चुनौतीपूर्ण था। डॉ. सिंह का कहना होता था कि शासन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि व्यक्तिगत प्रचार पर। लेकिन उन्हें तमाम विषयों की पूरी जानकारी रहती थी व याददाश्त भी उनकी बहुत शानदार थी, जिससे वह प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के सवालों का सहजता से जवाब दे देते थे।’

वर्ष 2012 में जब पंकज पचौरी ने डॉ. सिंह के मीडिया एडवाइजर की भूमिका संभाली, तो उन्होंने एक पत्रकार की विपरीत संपादकीय स्वतंत्रता की तुलना एक राजनीतिक सलाहकार की जिम्मेदारियों से की। वह बिजनेस और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन बनाने के अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए हाशिये पर पड़े लोगों के लिए लड़ने के महत्व पर जोर देते हैं। एक एडवाइजर के रूप में, उनकी भूमिका प्रधानमंत्री कार्यालय के बारे में संवाद करने और मीडिया प्लेटफार्म्स पर ज्यादा से ज्यादा पहुंच प्रदान करने में बदल गई।

मीडिया की घटती विश्वसनीयता

तमाम मीडिया संस्थानों की घटती विश्वसनीयता के लिए पंकज पचौरी दोषपूर्ण बिजनेस मॉडल को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका मानना है कि सरकारी विज्ञापनों पर अत्यधिक निर्भरता और सबस्क्रिप्शन आधारित रेवेन्यू मॉडल का कमजोर होना इसके पीछे मुख्य कारण है।

पंकज पचौरी के अनुसार, अखबारों के बीच कीमतों को लेकर छिड़ी जंग ने इंडस्ट्री को और भी अधिक विकृत कर दिया है। तमाम टीवी चैनल्स अक्सर ऐसे लोगों या बिजनेसमैनों द्वारा वित्तपोषित होते हैं, जिनका पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं, जिससे मीडिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ा। सोशल मीडिया की जवाबदेही की कमी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया, जहां अक्सर बिना सत्यापन के सूचना फैल जाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि विभिन्न गैर-पत्रकारिता वेंचर्स में उलझे तमाम मीडिया मालिक किस तरह अपनी संपादकीय स्वतंत्रता से समझौता करते हैं। पत्रकारिता और बाहरी व्यापारिक उपक्रमों के बीच का यह घालमेल ऐसे मीडिया मालिकों को सरकार और कॉर्पोरेट सहायताओं पर निर्भरता के एक चक्र में फंसा देता है। इससे पत्रकारिता की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता कमजोर होती है, और मीडिया बाहरी दबावों के सामने अधिक संवेदनशील हो जाता है।

सोशल मीडिया बनाम पारंपरिक मीडिया

सोशल मीडिया बनाम पारंपरिक मीडिया के बारे में पंकज पचौरी का कहना था कि भविष्य में पारंपरिक मीडिया आउटलेट्स बड़े घरानों द्वारा कब्जे में ले लिए जाएंगे, जैसा कि ग्लोबल स्तर पर देखा गया है, जैसे जेफ बेजोस का ‘वाशिंगटन पोस्ट’ खरीदना। भारत में भी, बड़े समूह पहले से ही महत्वपूर्ण मीडिया परिसंपत्तियों (media assets) का अधिग्रहण कर रहे हैं।

गूगल, मेटा और एमेजॉन जैसे तकनीकी दिग्गजों के विशाल मार्केट पर प्रभाव को रेखांकित करते हुए पंकज पचौरी का कहना था कि इन कंपनियों का संयुक्त मूल्य अब प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की जीडीपी के बराबर है। इन कंपनियों का मीडिया उपभोग और राजनीति पर अत्यधिक प्रभाव है, जैसा कि अमेरिकी चुनावों पर ‘टेस्ला’ के मालिक एलन मस्क के प्रभाव के रूप में में देखा गया है।

इसके अलावा, पंकज पचौरी का यह भी मानना है कि वॉट्सऐप की महत्वपूर्ण भूमिका, विशेष रूप से सत्तारूढ़ दल के लिए, राजनीतिक रणनीतियों और जमीनी स्तर पर लामबंदी में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। भुगतान बैंक के रूप में काम करने की अनुमति मिलने के बाद वॉट्सऐप देश के फाइनेंसियल ईकोसिस्टम में प्रमुख जगह बना सकता है और पेटीएम जैसे मौजूदा प्लेयर को कड़ी चुनौती दे सकता है।

देश में मीडिया का भविष्य

पचौरी ने मीडिया संगठनों की वर्तमान स्थिति के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की और कहा कि पारंपरिक बिजनेस जैसा चल रहा है, वैसा दृष्टिकोण एक विकसित वैश्विक मीडिया परिदृश्य में ज्यादा नहीं चल पाएगा।

भारतीय मीडिया दिग्गजों को भी इसी तरह के दबाव का सामना करना पड़ सकता है जब तक कि वे समय के अनुसार बदलाव नहीं करते। विश्वसनीयता और गुणवत्तापूर्ण कंटेंट प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनाए रखने की चाबी है।

इस दौरान पंकज पचौरी ने यह भी कहा कि हालांकि कई छोटे प्लेटफॉर्म उभर रहे हैं, लेकिन उनकी वृद्धि विश्वसनीयता बनाए रखने और टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल खोजने पर निर्भर करती है। उन्होंने ऐसे सिस्टम तैयार करने के महत्व पर प्रकाश डाला, जहां गुणवत्तापूर्ण कंटेंट ठोस मूल्य तैयार कर सके, जो मीडिया के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बारे में पूछे जाने पर, पंकज पचौरी ने इसकी तुलना टीवी और सोशल मीडिया जैसे पिछले तकनीकी विकासों से की, जहां इन सभी को पहले मौजूदा मीडिया मॉडल के लिए खतरे और बाद में अवसरों के रूप में देखा गया था। हालांकि, पंकज पचौरी में मीडिया में प्रवेश करने वाले युवा प्रोफेशनल्स के जुनून और क्रिएटिविटी को देखते हुए मीडिया के भविष्य के बारे में आशावादी दिखे।

सफरनामा

पंकज पचौरी के मीडिया में सफरनामे की बात करें तो उन्होंने 'सेंट जॉन्स कॉलेज', आगरा से कॉमर्स में स्नातक किया और लखनऊ से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की। जून 1984 में वह दिल्ली आए थे, जबकि उनके परिवार में कोई भी पत्रकारिता में नहीं था।

अपने करियर की शुरुआत 'द पैट्रियट' समाचार पत्र से करने के बाद, पचौरी ने 'द संडे ऑब्ज़र्वर', 'इंडिया टुडे', 'बीबीसी' और 'अमेरिकन पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग सर्विस' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य किया। वह 15 वर्षों तक एनडीटीवी से जुड़े रहे।

उन्होंने 'गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार' सहित कई सम्मान प्राप्त किए हैं। 2012 में, पंकज पचौरी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार के रूप में कार्यभार संभाला। इसके बाद उन्होंने 'GoNews' नामक भारत के पहले ऐप-आधारित टीवी न्यूज चैनल की स्थापना की। 


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