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'हमारे अखबार में नहीं लगा है कॉरपोरेट का पैसा, इसलिए करते हैं जनसरोकारी पत्रकारिता'
‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज को रोकने के लिए जनजागरूकता फैलाने पर दिया जोर
अभिषेक मेहरोत्रा 6 years ago
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दिल्ली का प्रमुख अखबार ‘देशबंधु’ (Deshbandhu) अपने साठ साल पूरे करने जा रहा है। अपनी दमदार और जनसरोकार वाली पत्रकारिता के दम पर यह अखबार न सिर्फ नए आयाम छू रहा है, बल्कि समय के साथ कदम से कदम मिलाते हुए मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर भी आगे बढ़ रहा है। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए अखबार के कलेवर पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है। मीडिया के लिए मुश्किल माने जा रहे इस दौर में टिके रहने के लिए अखबार कौन सी स्ट्रैटेजी अपना रहा है और इतने सालों तक किस तरह पाठकों के मन में अपनी जगह बनाए हुए है, इन्हीं सब के बारे में ‘समाचार4मीडिया डॉट कॉम’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
आपका अखबार 60 साल का हो रहा है, पर तेवर और कलेवर बिल्कुल नए होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर में अखबार को आगे ले जाने की आपकी क्या स्ट्रैटेजी है?
देशबंधु के 60 साल हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। इस पूंजी को मेरे पूर्वजों ने मेरे हवाले किया है और मुझे लगता है कि मेरे पूर्वजों ने जो मुझे दिया है, उसे मैं आगे बढ़ाकर उसमें आने वाली पीढ़ी (पाठक) के
माना जा रहा है कि प्रिंट अब खत्म हो रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था भी बिगड़ रही है। ऐसे में अखबार की साख और अर्थव्यवस्था में सामंजस्य बिठाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?
वर्तमान समय में कहा जा रहा है कि प्रिंट मीडिया खत्म होने की ओर बढ़ रहा है और आने वाला समय डिजिटल व टेलिविजन समेत तमाम अन्य चीजों का होगा और प्रिंट मीडिया नहीं बचेगा, लेकिन मेरा मानना है कि एक दस्तावेज के रूप में आप हमेशा प्रिंट को ही इस्तेमाल करेंगे और वह कभी खत्म नहीं होगा। ये हो सकता है कि प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो जाए और मैं मान रहा हूं कि वह दौर आ गया है।
कहने का मतलब है कि चुनौतियां सर्कुलेशन के स्तर पर हैं, क्योंकि आज के दौर में अधिकांश लोगों के हाथ में मोबाइल है, वहीं कंप्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल भी बढ़ा है। ई-पेपर के रूप में भी अधिकांश अखबार लोगों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन कुछ चीजें है जो आज भी लोगों को पढ़ने के लिए छपी-छपाई चाहिए। इन चीजों को यदि आप ई-पेपर के रूप में भी लोगों तक पहुंचाते हैं, तब भी कहीं न कहीं दस्तावेज चाहिए। ऐसे में मुझे लगता है कि प्रिंट मीडिया कभी खत्म होने वाला नहीं है। रही बात चुनौतियों की तो प्रिंट मीडिया के साथ चुनौतियां नई नहीं हैं। यदि हम गुजरे जमाने की बात करें तो रेडियो के दौर में भी प्रिंट मीडिया के सामने चुनौतियां थीं। इसके बाद टेलिविजन का दौर आया, तब भी चुनौतियां थीं और अब भी बनी हुई हैं। अब सोशल मीडिया के दौर में जब लगभग हर हाथ में मोबाइल है और इंटरनेट की सुविधा है, तब भी यह चुनौतियां बनी हुई हैं। लेकिन अखबार तब भी जिंदा थे और आज भी जिंदा हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज से 20 साल बाद भी अखबार इसी तरह चलते या यूं कहें कि दौड़ते रहेंगे।
आज के डिजिटल युग के दौर में ‘देशबंधु’ किस तरह अपने पाठकों तक अपनी पहुंच बनाएगा?
प्रिंट के साथ-साथ ‘देशबंधु’ हमेशा नए माध्यमों पर भी फोकस करता रहा है। यही कारण है कि करीब 20 साल पहले जब अन्य अखबारों के वेब पोर्टल शुरू हुए थे, तभी ‘देशबंधु’ भी इंटरनेट पर आ गया
पत्रकारिता को जनसरोकार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कहीं न कहीं मीडिया इसमें चूक कर रहा है। ऐसे में देशबंधु किस तरह से आज भी जनसरोकार की पत्रकारिता से जुड़ा हुआ है?
‘देशबंधु’ की बैकबोन यानी रीढ़ जनसरोकार की पत्रकारिता ही है। हम हमेशा मूल्यपरक और जनभागीदारी के रूप में पत्रकारिता करते रहे हैं और यही कारण है कि आज 60 सालों बाद भी हमारा अखबार इस बाजार में टिका हुआ है। बाजार शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं कि आज कई मीडिया संस्थानों में बाजार का पैसा लगा हुआ है, कॉरपोरेट घरानों का पैसा लगा हुआ है। ऐसे में बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के 60 साल से हमारा अखबार चल रहा है और मार्केट में लोग पसंद कर रहे हैं, तो इसका मतलब है हम
ऐसे कई अखबार हैं, जो बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के आज भी चल रहे हैं और टिके हुए हैं। ऐसी स्थिति में ‘देशबंधु’ के लिए बहुत अच्छी बात ये रही है कि 1978 से लेकर अभी तक 13 बार ग्रामीण पत्रकारिता में इस अखबार को ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है। यह अवॉर्ड ‘स्टेट्समैन’ अखबार द्वारा ग्रामीण पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया है।
‘देशबंधु’ ऐसा पहला अखबार है, जिसे ग्रामीण पत्रकारिता में सबसे ज्यादा बार ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है, यह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है। ऐसा इसलिए है कि हमने ग्रामीण पत्रकारिता पर शुरू से जोर दिया है। इसके साथ ही ‘देशबंधु’ ही ऐसा अखबार है, जिसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद अन्य अखबारों ने इस बारे में हमसे काफी कुछ सीखा और आगे बढ़े। आप देखें कि आज तो हमारे पास मोबाइल फोन है, इंटरनेट है और खबर हम लोगों तक तत्काल पहुंच जाती है, लेकिन वो जमाना भी था जब लोग टेलिग्राम के द्वारा समाचार भेजते थे। हमारे संवाददाता गांवों में जाते थे और वहां दो-तीन दिन लगाकर समस्याओं को देखते थे और फिर आकर खबर लिखते थे। इसके बाद अखबार वहां तक पहुंचता था।
सिर्फ गांवों में ही नहीं, इन खबरों की गूंज दिल्ली तक होती थी। ’देशबंधु’ के साथ कई ऐसी चीजें हुई हैं कि अखबार में हमने जो रिपोर्ट छापी है, उसकी खबर दिल्ली तक आई है। यही नहीं, दिल्ली के जिम्मेदार लोगों जैसे-तत्कालीन प्रधानमंत्री, मंत्री और संबंधित अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को संज्ञान में लिया और इन मामलों में कार्रवाई भी हुई है। हमारा प्रयास यही रहता है कि जनसरोकार से संबंधित जो खबरें हैं, वो जनता तक पहुंचाई जाएं।
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में आपके अखबार का काफी प्रभाव रहता है। दिल्ली में भी इसका एडिशन है। दिल्ली में पिछले दिनों अखबार की एडिटोरियल लीडरशिप में भी बदलाव हुआ है। दिल्ली में अखबार को और प्रभावशाली बनाने के लिए आपकी क्या स्ट्रैटेजी है?
ये बहुत बड़ा सवाल है। जहां तक छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की बात है तो पिछले 60 साल से हम वहां टिके हुए हैं और वहां पर पहले से पूरा नेटवर्क है। वहां समाचार जुटाने से लेकर सर्कुलेशन तक पहले से एक प्रभावशाली सिस्टम बना हुआ है। रही बात दिल्ली को तो यहां हम करीब 12 साल पहले आए थे। हमने वर्ष 2008 में दिल्ली में लॉन्चिंग की थी और हमारी कोशिश यही रही थी कि दिल्ली से
हम चाहते हैं कि दिल्ली के मार्केट में हमारा अखबार अच्छी तरह से पहुंचे। यदि अखबार की कॉपी किसी कारण से कहीं नहीं भी पहुंच पाती है तो हम चाहते हैं कि ई-पेपर अथवा अन्य माध्यमों से पाठकों तक हम अपनी पहुंच बनाने में सफल रहें। रही बात आर्थिक पक्ष की तो इसके लिए विज्ञापन जरूरी है। विज्ञापनों के लिए भी पूरी टीम काम कर रही है। मेरा मानना है कि यदि आपका कंटेंट अच्छा है और सर्कुलेशन बेहतर है तो विज्ञापन वालों के लिए काफी सहूलियत हो जाती है। हम कंटेंट और सर्कुलेशन पर लगातार बहुत ध्यान दे रहे हैं। हमारी पूरी योजना है कि दिल्ली-एनसीआर के साथ ही अन्य हिंदीभाषी क्षेत्रों की आवाज को ‘देशबंधु’ दिल्ली में बुलंद करे। हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।
आर्थिक मोर्चे पर तो मीडिया संघर्ष कर ही रहा है, सबसे बड़ा सवाल मीडिया की क्रेडिबिलिटी का है। पिछले एक दशक की बात करें तो मीडिया की क्रेडिबिलिटी में काफी कमी आई है। इस क्रेडिबिलिटी को कैसे वापस लाया जा सकता है, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
देखा जाए तो आज की तारीख में ये बहुत ही गंभीर सवाल है। गंभीर इसलिए क्योंकि लोग अब क्रेडिबिलिटी को लेकर मीडिया पर सीधा आरोप लगाने लगे हैं। हालांकि पहले ये आरोप सीधे-सीधे नहीं लगाए जाते थे। मीडिया पर अब उंगली उठने लगी है। इस बारे में मेरा कहना है कि हमें हमेशा इस तरह का काम करना चाहिए, जिससे लोग हमारे ऊपर उंगली न उठाएं। इसके बाद भी यदि उंगली उठ रही है तो उससे कैसे बचा जाए और यदि उंगली उठ गई है तो कैसे अपने आप को पाक साफ करके निकला जाए, यह एक बड़ा सवाल है। यदि मैं ‘देशबंधु’ की बात करूं तो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत यानी पक्ष-विपक्ष की बात खने के साथ ही जो आईना दिखाने का
ऐसे पत्रकार साथियों के लिए मैं यही कहूंगा कि यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप अपने अखबार के साथ अथवा अपने मीडिया हाउस के साथ क्या निर्णय कर रहे हैं, लेकिन मैं ये कहूंगा कि पत्रकारिता में करने के लिए बहुत कुछ है और ऐसे समय में जब मीडिया की क्रेडिबिलिटी खत्म हो रही है, तो अपने अंदर झांकना होगा कि आखिर हम कर क्या रहे हैं? अगर आपको लगता है कि आप सही कर रहे हैं तो सही दिशा में जाइए, लेकिन यदि आप गलत कर रहे हैं तो मुझे पता है कि आपकी अंतर्रात्मा जरूर कहीं न कहीं कहेगी कि आप गलत कर रहे हैं और आपने रास्त गलत चुन लिया है। ऐसे में आप उस रास्ते से अलग हटिए और सही रास्ते पर जाइए। मेरा विश्वास है कि आपकी क्रेडिबिलिटी आपके पास लौट आएगी।
सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज की समस्या तेजी से उभरी है। आपके अनुसार फेक न्यूज को कैसे रोका जाए और कैसे इससे निजात पाई जा सकती है?
सोशल मीडिया काफी बड़ा प्लेटफॉर्म है। यह ऐसा प्लेटफॉर्म है जो आज की तारीख में सही मायने में बेलगाम है। सोशल मीडिया पर कोई लगाम नहीं है। ऐसे में फेक न्यूज को रोकने के लिए जागरूक होने की जरूरत है। हालांकि, कुछ लोग जागरूक होकर जागरूकता फैला भी रहे हैं। आपको याद होगा कि पहले अखबारों के जरिये हम लोग ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन’ यानी लोगों को जागरूक करने का
एक पत्रकार होने के बावजूद अखबार के लिए जो काम किया जा रहा है, वो काम सोशल मीडिया पर नहीं हो रहा है। यही कारण है कि पिछले दो-तीन सालों में फेक न्यूज का अंबार लग गया है। लेकिन कुछ लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं। इसमें मैं ‘अल्ट न्यूज’ (Alt News) का नाम लेना चाहूंगा, यह काफी अच्छा काम कर रहा है। ‘बीबीसी’ समेत कई और भी हैं जो फेक न्यूज को रोकने के लिए काफी अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन मैं यहां हर मीडिया घराने के लिए कहना चाहूंगा कि सभी का ये कर्तव्य है कि फेक न्यूज को फैलने से रोकने में अपनी भागीदारी निभाएं, क्योंकि यह रोकना सरकार का काम नहीं है। मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि फेक न्यूज को फैलने से रोकना मीडिया संस्थानों का काम है।
मेरा सभी से यही कहना है कि यदि आपके पास फेक न्यूज आती है तो उसे फॉरवर्ड होने से बचाइए। यदि आपको पता है कि यह न्यूज गलत है तो आप इस बात की जानकारी दीजिए। इसके लिए सिर्फ चार लाइन ही तो लिखनी हैं। यदि तहकीकात कर सकते हैं तो इसके लिए टीम बनाइए। कई जगह तो फैक्ट चेक टीम बनाना शुरू भी कर दिया गया है। हम लोग भी इस पर काम कर रहे हैं। हालांकि, हम अभी इस पर वीकली काम कर रहे हैं, हमारी कोशिश है कि धीरे-धीरे इस टीम को बढ़ाया जाए।
गूगल और बाकी जगहों पर ऐसे टूल्स उपलब्ध हैं, जहां से फेक न्यूज अथवा फेक विडियो की तहकीकात की जा सकती है। इसके लिए जनजागरूकता फैलाने की जरूरत है। यदि हम लोग अलर्ट नहीं रहेंगे और लोगों को अलर्ट नहीं करेंगे तो आने वाले समय में पता नहीं क्या हो जाए। लेकिन इस दिशा में अन्य लोगों के साथ हम भी काम कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में अन्य मीडिया संस्थान भी फेक न्यूज की पहचान के लिए फैक्ट चेक टीम बनाएंगे और इस तरह की फेक न्यूज को बाहर आने से पहले उसकी तहकीकात करेंगे, जैसा कि प्रिंट में होता है।
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