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आज तमाम अखबार या टीवी मीडिया के संपादक डिजिटल को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं: प्रभाष झा
‘हिन्दुस्तान’ की न्यूज वेबसाइट (livehindustan.com) में एडिटर प्रभाष झा को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 20 साल का अनुभव है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
‘हिन्दुस्तान’ की न्यूज वेबसाइट (livehindustan.com) में एडिटर प्रभाष झा को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 20 साल का अनुभव है। मूलरूप से मधुबनी (बिहार) के रहने वाले प्रभाष झा ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2000 में बतौर इंटर्न ‘जैन टीवी’ (Jain TV) से की थी। उन्होंने पत्रकारिता में अपने सफर समेत तमाम बिंदुओं पर समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए और आप मीडिया में कैसे आए?
मेरा जन्म मधुबनी (बिहार) में हुआ और बचपन की शिक्षा वहीं हुई। मेरे पिताजी टाटा स्टील, जमशेदपुर में काम करते थे। जब मैं पांचवी कक्षा में था तो पिताजी को लगा कि ये पढ़ने-लिखने में अच्छा है तो उन्होंने मुझे अपने पास ही बुला लिया और बाद में दसवीं तक मैं वहीं पढ़ा।
उसके बाद इंदौर, नागपुर में आगे की पढ़ाई की। इसके अलावा मैंने ‘आईआईएमसी’ से भी लगभग एक साल का कोर्स किया है। जब मैं नागपुर में था तो उसी समय मीडिया और खबरों से नाता जुड़ने लगा था तो कहीं न कहीं ऐसा लगता था कि शायद मीडिया में ही मेरा भविष्य है और वही हुआ।
आप बिहार से हैं और वहां तो अधिकांश युवा सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखते हैं तो आपने जब मीडिया में जाने का सोचा तो घर वालों का रिएक्शन कैसा था?
देखिए, बिहार के अधिकांश बच्चे जब स्कूल में होते हैं तो वो आईआईटी का सपना देखते हैं और जब वो कॉलेज में होते हैं तो सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखते हैं, लेकिन इन दोनों के बीच हकीकत का भी अपना एक महत्व है।
मुझे ऐसा लगता है कि मेरे घर की स्थिति ऐसी थी कि मेरे पास इतना समय नहीं था और मुझे जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना था वरना बिहार के हर बच्चे की तरह सपना तो मेरा भी सरकारी अधिकारी बनने का ही था।
आपको पहली नौकरी कैसे मिली? उस अनुभव और यात्रा के बारे में बताइए।
जब मैं ‘आईआईएमसी’ पढ़ने आया था तो ऐसा लगता था कि अब आप इधर आ गए हैं तो नौकरी आसानी से मिल ही जाएगी, लेकिन जब आप पढ़कर बाहर निकलते हैं तो आपको समझ आता है कि नौकरी करना इतना भी आसान नहीं है।
उस समय ‘जी न्यूज‘ और ‘आजतक‘ के सिवा कोई था नहीं और डिजिटल का उदय नहीं हुआ था। दीपावली के बाद जब हम छुट्टियों से वापस आए तो मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने कई जगह अपना सीवी देना शुरु किया।
हमें बस किसी जगह दो-तीन महीने अगर इंटर्न का भी काम मिल जाता तो वो आने वाले समय में नौकरी के लिए काम आ सकता था। उस समय ही मुझे ‘जैन टीवी‘ में काम करने का मौका मिला, जिसमें कमाई उतनी नहीं थी। जब अच्छा पैसा मिलने की उम्मीद जगी तो उस समय उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई।
उसके बाद या तो पैसे बहुत लेट मिलते थे या मिलते ही नहीं थे। हालांकि बाहर के कुछ अखबार थे, जहां मुझे नौकरी मिल रही थी लेकिन वो एक सोच ऐसी थी कि दिल्ली में रहोगे, तभी बड़ा पत्रकार बन पाओगे। हालांकि, समय कुछ अच्छा न होता देख मैंने भोपाल जाने का निर्णय किया और वहां ‘नवभारत‘ अखबार में मुझे नौकरी मिल गई।
उस समय रहता भोपाल में था, लेकिन मन मेरा दिल्ली में था। उसी दौरान मेरे कुछ मित्रों से जानकारी मिली कि ‘दैनिक जागरण‘ मेरठ में नौकरी है। मुझे खेल पत्रकार के तौर पर उस अखबार में नौकरी मिल गई।
अब मेरे इस काम में सबसे बड़ी समस्या यह आई कि स्पोर्ट्स डेस्क का कोई पत्रकार उस समय संपादक बन जाए, ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी और मुझे संपादक बनना था, इसलिए ये बेहद जरूरी था कि मैं जनरल डेस्क पर काम करूं।
उसी दौरान ‘अमर उजाला‘ में बात हुई और मैं देहरादून चला गया। वहां करीब आठ-नौ महीने काम करने के बाद वापस ‘दैनिक जागरण‘ नोएडा में मेरा आना हुआ। इसके बाद मैंने ‘बीबीसी‘ की हिंदी सर्विस में भी काम किया।
वर्ष 2007 में ‘नवभारत टाइम्स‘ अपने डिजिटल की योजनाओं को विस्तार देने में लगा हुआ था और उसी दौरान इसके अच्छे भविष्य को ध्यान में रखते हुए मैंने वहां नौकरी की और उसके बाद संपादक के पद तक पहुंचा। साल 2019 में लगभग 12 साल अपनी सेवाएं देने के बाद मैंने फिर ‘हिंदुस्तान‘ डिजिटल को संपादक के तौर पर जॉइन किया।
आपने शुरू में सिर्फ टीवी में इंटर्नशिप की और उसके बाद कभी टीवी के साथ काम नहीं किया! कोई खास कारण?
जहां तक बात टीवी की है तो मैं ये समझता हूं कि उस समय में टीवी में इतना लिखने का काम था नहीं और दूसरी ओर मेरा शुरुआती अनुभव ही इस प्रकार का रहा कि फिर मैंने कभी टीवी में जाना उचित नहीं समझा।
हालांकि साल 2007 में जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ को जॉइन कर रहा था उसी समय एक 24 घंटे का चैनल लॉन्च हो रहा था और मेरे कुछ वरिष्ठ सहयोगी वहां थे तो उन्होंने मुझे याद किया, लेकिन मैंने जाना उचित नहीं समझा। दूसरी बात ये कि आप किसी भी माध्यम में हों, मूल काम तो लिखना है।
अगर टीवी के शुरुआती दौर को देखें तो उस समय सिर्फ प्रिंट और रेडियो जर्नलिज्म था और जितने भी लोग टीवी में गए थे, वो यहीं से गए थे। उन लोगों को सिखाने के लिए विदेशी मीडिया के सहयोग से वर्कशॉप भी होती थीं। इसलिए मैंने प्रिंट में काम किया और बाद में डिजिटल में काम किया और मुझे इसमें बड़ी खुशी मिलती है।
‘टाइम्स ग्रुप‘ एक शो तैयार करता है, जिसका नाम ‘फेक इट इंडिया‘ है। आपको दर्शक उस शो में अभिनय करते हुए भी देखते हैं, उसके बारे में बताइए।
दरअसल, वर्ष 2015 के बाद हमने देखा कि ह्यूमर पर आधारित वीडियो काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उसी कड़ी में नीरज बधवार और हमारी टीम ने एक ऐसे ही शो की योजना बनाई। अगर आप इस शो को देखें तो इसके किरदार आपके जीवन के आस पास के वो ही लोग हैं, जो परेशान हैं।
जब एक आम आदमी की समस्या पर शो करते हैं तो वो सफल भी होता है और लोगों को पसंद भी आता है। आपने देखा होगा कि मेरा किरदार ‘पत्थर दिल बॉस‘ लोगों को पसंद आता है। ऐसे और भी कई किरदार हैं, जो लोगों को बेहद लुभाते हैं।
इस शो की पूरी स्क्रिप्टिंग नीरज बधवार करते हैं और आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इस शो के कई एपिसोड का आइडिया तो हमें फिल्म सिटी में चाय की दुकान पर बैठकर आता था।
डिजिटल को आप किस तरह से देखते हैं! क्या टीवी की न्यूज को सोशल मीडिया पर डाल देना ही डिजिटल है या वहां कुछ अलग कंटेंट देना चाहिए?
टीवी में तो अक्सर ऐसा होता है कि वो हर प्रकार के कंटेंट को डिजिटल पर डालते हैं, लेकिन वर्तमान में आप देखिए कि कई मीडिया हाउस ऐसे हैं, जो अब डिजिटल पर आधारित शो बना रहे हैं। जहां तक बात नियमावली की है तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ डिजिटल के लिए सोचा जा सकता है। आज हम सोशल मीडिया के जमाने में जी रहे हैं, जहां एक मिनट में वीडियो वायरल हो जाता है।
हालांकि आज सिर्फ प्रिंट की न्यूज को डिजिटल पर अपलोड करने की प्रवृति बदल गई है। आज तमाम जितने भी बड़े अखबार हैं या टीवी मीडिया के संपादक हैं, वो डिजिटल को ध्यान में रखते हुए ही काम कर रहे हैं।
आज डिजिटल में बड़ी प्रतिस्पर्धा है। कई छोटी-छोटी वेबसाइट्स हैं, जो फालतू और फेक न्यूज बनाकर अच्छे व्यूज ले रही हैं। इस पर आपका क्या विचार है?
पिछले दो साल में जितनी तेजी से कोरोना संक्रमण फैला, उतनी ही तेजी से डिजिटल का काम बढ़ा है। आज ‘फेसबुक‘ और ‘ट्विटर‘ पर जिसका अकाउंट है, वो एक संभावित प्रकाशक है। करोड़ों की आबादी वाले देश में अगर किसी पोर्टल ने लाखों दर्शकों तक कोई गलत सूचना प्रकाशित भी कर दी तो आप उसे किसी भी तरह से रेगुलेट नहीं कर सकते हैं।
हालांकि मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में ये अच्छा काम कर सकता है। आज आप देखेंगे कि आज से तीन चार साल पहले जो फेक न्यूज थी, वो आज कम हो गई है। आज का जो पाठक है, वो भी थोड़ा समझदार हो गया है और वो अब हर चीज को सोच समझकर शेयर करता है। हर चीज को स्थापित होने में समय लगता है और सबको मिलकर इसके लिए कोशिश करनी होगी।
आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम धन राशि में काफी अच्छा काम किया है। ऐसी कई अच्छी वेबसाइट्स हैं, जो सामाजिक मुद्दों पर बेहद अच्छा काम कर रही हैं।मुझे अंत में बस यही कहना है कि किसी माध्यम में अगर लाख अच्छाई है तो बुराई भी होगी, बस हमें उसे मिलकर दूर करना है।
समाचार4मीडिया के साथ प्रभाष झा की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।
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