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BBC हिंदी के एडिटर मुकेश शर्मा ने बताया, महामारी ने किस तरह बदली डिजिटल मीडिया की 'दुनिया'

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) ने देश-दुनिया में अपना कहर बरपा रखा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। एक तरफ जहां अखबारों का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, वहीं इंडस्ट्री को मिलने वाले विज्ञापनों में काफी कमी आई है। ऐसे में इंडस्ट्री तमाम आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही है। 

हालांकि, कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच टीवी चैनल्स की व्युअरशिप तो बढ़ी है, लेकिन विज्ञापन के मामले में इस व्युअरशिप का लाभ नहीं मिल पा रहा है, वहीं डिजिटल की पहुंच इन दिनों पहले से ज्यादा हुई है। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? क्या तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर को सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे ले जाने की रणनीति रेवेन्यू के लिहाज से कारगर साबित होगी, जैसे तमाम सवालों को लेकर समाचार4मीडिया ने ‘बीबीसी हिंदी’ के एडिटर मुकेश शर्मा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

जहां तक मैंने देखा है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म की रीडरशिप काफी बढ़ गई है। उसका एक कारण यह भी रहा कि इस दौरान लोगों तक अखबार की उपलब्धता भी बाधित हुई। दूसरी बात ये कि घरों में आमतौर पर एक या दो टीवी सेट होते हैं। घर के तो सभी मेंबर लॉकडाउन में फंसे हुए हैं। कहने का मतलब ये है कि टीवी सेट भले ही एक-दो हों, लेकिन घरों में मोबाइल सेट ज्यादा हैं। इस वजह से डिजिटल का उपभोग यानी खपत (Consumption) बढ़ा है। एक मसला ये है कि पहले जो लोग न्यूज में बहुत ज्यादा रुचि नहीं भी रखते थे,उन लोगों ने भी काफी न्यूज देखी। इसका कारण ये है कि यह मुद्दा (महामारी) सीधे-सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा है। ऐसा नहीं है कि यह इलेक्शन का मुद्दा है जिसमें कुछ खास लोगों की रुचि है, या वर्ल्ड कप हो रहा है, जिसका अलग पाठक/दर्शक वर्ग है। चूंकि यह महामारी सभी के स्वास्थ्य से संबंधित है, इसलिए सभी लोग इस बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर कहां पर क्या हो रहा है। हर व्यक्ति इस बारे में अपडेट और इंफॉर्मेशन जानना चाहता है कि आखिर क्या हो रहा है, यह महामारी कंट्रोल में आ रही है अथवा नहीं, संक्रमण कितना फैल रहा है अथवा कोई इलाज मिल पा रहा है अथवा नहीं। ये बातें जानने की सभी में जिज्ञासा थी। इसकी वजह से लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख ज्यादा किया, क्योंकि वे अपडेटेड रहना चाहते हैं। अपडेट्स अथवा नई इंफॉर्मेशन के लिए वे तमाम न्यूज वेबसाइट्स पर जा रहे हैं। कई बार लोगों की किसी खास न्यूज वेबसाइट में रुचि होती है और वह उसी को पढ़ना चाहते हैं, जैसे तमाम लोग किसी एक ही अखबार को ज्यादा पसंद करते हैं और उसी को पढ़ना चाहते हैं। टीवी चैनल्स के बारे में भी आमतौर पर लोग अपनी एक राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार अपने पसंदीदा चैनल को ही देखते हैं। लेकिन इस दौरान तमाम लोगों की वह आदत भी बदली और उन्होंने विभिन्न न्यूज प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया, क्योंकि वह जगह-जगह जाकर देखना, सुनना और पढ़ना चाह रहे थे। कहने का मतलब है कि डिजिटल का इस्तेमाल कुल मिलाकर काफी बढ़ा है और यह डिजिटल के लिए काफी अच्छी बात है। ऐसे में इसने प्रिंट के लिए काफी चुनौतियां भी पेश की हैं। 

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, बीबीसी विज्ञापनों को उस तरीके से बहुत ज्यादा नहीं लेता है, इसलिए बीबीसी के लिहाज से यह कहना थोड़ा मुश्किल काम है, लेकिन अन्य मीडिया प्रतिष्ठानों के लिहाज से देखें तो मसला इस चीज भी जुड़ा था कि लॉकडाउन के दौरान तमाम बिजनेस पर असर पड़ा। इसका प्रभाव विज्ञापन देने वालों पर भी काफी पड़ा। नकदी का काफी संकट है। इस स्थिति में विज्ञापन देने वालों को अपने पैसे का बैलेंस भी देखना है कि वे कितना खर्च कर सकते हैं। चूंकि इस दौरान डिजिटल की ग्रोथ काफी आगे बढ़ी, उसने इस मार्केट में विज्ञापनदाताओं के सामने तमाम अवसर जरूर पैदा किए हैं। तमाम विज्ञापनदाता जो पहले डिजिटल को लेकर सोचते थे कि एक बंडल पैकेज में साथ में हो जाएगा, मुझे लगता है कि आने वाले समय में अब बंडल पैकेज की जगह डिजिटल अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएगा।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

देखिए, तमाम मीडिया हाउसेज सिंगल मीडिया आउटलेट नहीं हैं। कुछ ही ऐसे हैं जो सिर्फ डिजिटल में काम कर रहे हैं। ज्यादातर मीडिया हाउस ऐसे हैं जो प्रिंट में हैं और साथ में उनका डिजिटल चलता है। टेलिविजन चैनल है और साथ में सपोर्टिंग में डिजिटल चलता है। चूंकि इन जगहों पर असर पड़ा है, इसलिए डिजिटल पर भी असर आने की बात देखी गई है। लेकिन केवल डिजिटल की बात करें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महामारी और लॉकडाउन का बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। चूंकि डिजिटल की ग्रोथ काफी हुई है, इसलिए इस पर सबसे कम असर हुआ है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लोग ज्यादा आए, डिजिटल का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा। लोगों ने ज्यादा खबरें पढ़ीं। मीडिया संस्थानों ने भी डिजिटल पर ज्यादा कंटेंट उपलब्ध कराया। कहने का मतलब है कि लॉकडाउन पर डिजिटल का ज्यादा असर नहीं है, लेकिन हर मीडिया हाउस की अपनी जो वित्तीय स्थिति है, वो सब चीजों को प्रभावित करती है। जैसा हमने देखा कि जिस मीडिया हाउस पर इसका जितना प्रभाव पड़ा, उसने उसी हिसाब से अपने यहां अलग-अलग कटौतियां कीं। लेकिन जो सिर्फ डिजिटल के माध्यम हैं, अगर आप उन्हें देखेंगे तो उन्होंने प्रिंट के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया है।     

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

दुनिया के बाकी देशों में जब प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो रहा था तो भारत में अभी भी वह स्थिति नहीं थी। अब कोविड-19 के कारण जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसमें एक ये अलग चीज देखने को मिली है कि हर आयु वर्ग के लोग अब डिजिटल की ओर मुड़े हैं। मुझे लगता है कि लॉकडाउन में प्रिंट पर इसका थोड़ा असर पड़ेगा, क्योंकि पता नहीं कब लॉकडाउन पूरा हटेगा, कब उद्योग-धंधों अथवा विज्ञापनदाताओं की स्थिति थोड़ी बेहतर होगी और कब उनके पास इतना पैसा आएगा कि वे निवेश कर पाएंगे। कहने का मतलब है कि प्रिंट पर थोड़ा असर तो रहने वाला है लेकिन मुझे लगता है कि एक वक्त के बाद जब हालात थोड़े से सामान्य होंगे, तो फिर अखबार और मैगजींस का पुराना समय लौटेगा। लॉकडाउन में जरूर ऐसा हुआ है और स्थिति सामान्य होने में थोड़ा समय जरूर लगेगा, इसके बाद लोगों की प्रिंट की ओर वापसी फिर शुरू होगी।   

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

इस महामारी के दौरान मीडिया आवश्यक सेवाओं में शामिल रहा है। मुझे लगता है कि मीडिया ने बहुत ही मजबूती के साथ और बहुत ही बहादुरी के साथ काम किया। मीडियाकर्मी लगातार घर से बाहर निकल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनके परिवार वाले चिंतित नहीं हैं, लेकिन उनका बाहर निकलना जरूरी भी है, क्योंकि लोगों तक सूचनाएं पहुंचना जरूरी हैं। यह काफी काफी चुनौती वाला रहा। बीबीसी की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी बल्कि जब जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में ये पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआत के दौर में ही यह लागू करना शुरू कर दिया था कि घरों से काम कितना शिफ्ट हो सकता है। एक वक्त ऐसा था जब सामान्य समय में नहीं लगता था कि ऐसा हो सकता है, पर आज ऐसा हो रहा है। डिजिटल का कामकाज वैसे भी घर से करना इसलिए आसान हो जाता है कि यदि कंपनी ने लैपटॉप और जरूरी सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराए हैं तो ज्यादा दिक्कत नहीं आती है और प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनल्स की तुलना में आप डिजिटल का काम घर से आसानी से कर सकते हैं।

हमने उसी स्ट्रैटेजी के तहत शुरू में बैलेंस बनाने की कोशिश की कि मिनिमम और मैक्सिमम कितने लोगों की ऑफिस में रिक्वायरमेंट होगी, जिसे देखकर यहां बाकी सभी लोगों को वर्क फ्रॉम होम करने की इजाजत दे दी गई। हमने यह भी तय किया कि एम्प्लॉयीज हर दिन ना आए, लिहाजा इसके लिए काम के घंटे तय करने की जरूरत पड़ी, तो वह भी किया। बीबीसी में हम लोगों ने पहले तो इस तरह से बैलेंस बनाने की कोशिश की कि कुछ लोग ऑफिस आएं और कुछ लोग घर से ही काम करें और दूसरा यह कि इसमें भी थोड़ा रोटेशन हो सके, तो इसके लिए यह किया कि जो लोग ऑफिस आ रहे हैं, वह कुछ समय बाद घर से काम कर सकें और घर से काम कर रहे एम्प्लॉयीज कुछ समय बाद ऑफिस आ सकें, ताकि सभी में  थोड़ी सी सेंस ऑफ सिक्योरिटी और थोड़ी सी सुरक्षा की भावना रहे। और फिर कार्यालय ने यह भी ध्यान में रखा कि ऑफिस आने के लिए क्या साधन हो सकते हैं, क्या सुविधाएं हो सकती हैं, ताकि एक्सपोजर कम से कम हो सके।

शुरुआती समय में हमने टेक्नोलॉजी को ज्यादा अडॉप्ट किया था। फील्ड में जाना रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा होता है। पर उस समय हमें यह भी समझ में आया कि एक बैलेंस बनाने की जरूरत थी और पहले वह कुछ इस तरह का होना था, जिसमें हमें अपने जर्नलिस्ट और पूरे ऑपरेशन की सेफ्टी भी देखनी थी, लिहाजा हमने न्यूज गैदरिंग के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा ज्यादा से ज्यादा लिया। लोगों से बात करने व इंटरव्यू करने के किए जूम, स्काइप या फिर अन्य माध्यमों का प्रयोग किया, ताकि जर्नलिस्ट सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकें। शुक्रगुजार हैं कि शुरुआती समय में ही हमारे यहां उठाए गए ऐहतियाती कदमों के चलते हमारा कोई भी रिपोर्टर कोरोनावायरस के संक्रमण में नहीं आया और हम अभी भी बचते हुए चल रहे हैं।

फिलहाल अपने पूरे ऑपरेशन के लिए बैलेंस बनाकर चलने की कोशिश करना पहली स्ट्रैटजी थी, जबकि दूसरी स्ट्रैजटी कंटेंट से जुड़ी है। कंटेंट से जुड़े हिस्से में हमको यह समझ में आया कि लोगों को इंफॉर्मेशन जानने की उत्सुकता तो है पर उन्हें क्रेडिबल इंफॉर्मेशन यानी भरोसेमंद सूचनाएं चाहिए। ऐसे समय पर यह बहुत बड़ी रिक्वायरमेंट है और भारत में बीबीसी को लोग एक विश्वसनीय माध्यम की तरह देखते हैं। यदि कोई ऐसी खबर है, जो उसे चेक करनी है तो वह बीबीसी पर चेक करना चाहता है। इसलिए यह जो क्रेडिबिलिटी बीबीसी के साथ जुड़ी हुई है, उसे देखते हुए ही हम चाहते हैं कि ऐसी कोई भी सूचना बीबीसी के जरिए न जाए, जो भरोसेमंद न हो। इसे पहले भी हम ध्यान में रखते थे और अब भी ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं, जब इस समय इसकी जरूरत ज्यादा महसूस की जा रही है। लिहाजा इसके लिए हमने ध्यान रखा कि सिर्फ ग्लोबल लेवल पर एक्सेप्टेड चीजें हो रही हैं, हम उसी को ब्रॉडकास्ट करें। इसके लिए हमने डब्ल्यूएचओ की एडवाइजरी ध्यान में रखी और भी बहुत सारी चीजें ध्यान में रखीं। ऐसा नहीं है कि लोकल गाइडेंस और एडवाइजर्स पर भरोसा नहीं है पर जो चीजें समय की मांग है और ग्लोबल लेवल पर अप्लाई हो रही है, हमने उस पर भरोसा किया ताकि हंड्रेड परसेंट सही सूचनाएं लोगों के पास पहुंचें।

इस पूरे समय में हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों की जो ज्यादा से ज्यादा जिज्ञासाएं हैं, उन्हें शांत किया जा सके। अन्य भारतीय भाषाओं में, जहां भी बीबीसी काम करता है, हमने सब जगह इसी स्ट्रैटेजी के साथ काम किया है। इस दौरान कोरोना से जुड़ी हुई जितनी भी ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन और जितनी जल्दी उन तक सूचनाएं पहुंचाई जा सकें, इस पर कंटेंट के लिहाज से काम किया गया।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है कि हर मीडिया संस्थान  उस स्पाइक को मेंटेन कर लेता है। स्पाइक होता है तो मुझे लगता है कि हर संस्थान में पहले के मुकाबले पाठकों और दर्शकों की संख्या बढ़ गई है। निश्चित रूप से इसमें से कुछ लोग अलग-अलग माध्यमों पर चले जाएंगे, लेकिन इनमें से कुछ लोग रिटेन भी हो जाएंगे। मुझे लगता है कि आने वाले समय में मीडिया संस्थान स्वास्थ्य संबंधी खबरों पर भी ध्यान रखेंगे। अभी तक ऐसा दिख रहा था कि जन स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें पॉलिटिकल की कवरेज के आगे कहीं पीछे छूट जाती थीं, पर मुझे यह लगता है कि अब मीडिया संस्थान के लिए यह लर्निंग का समय है। पब्लिक हेल्थ को लेकर अब हर मीडिया संस्थान को थोड़ा सा ज्यादा काम करना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा लोगों में जागरूकता लानी पड़ेगी, लिहाजा इससे पाठकों में उसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

मुझे लगता है कोविड-19 के खत्म होने के बाद हेल्थ से जुड़ी खबरों पर मीडिया संस्थान फोकस करेंगे, तो वह और लोगों को अपने साथ रोक पाएंगे। हेल्थ से जुड़ी वेबसाइट्स आगे बढ़ेंगी, लेकिन क्रेडिबिलिटी की बात जरूर आएगी। कई बार क्या होता है कि जो खबर आप पढ़ रहे हैं, उस पर आप कितना भरोसा कर रहे हैं, यह कहीं न कहीं निर्भर करेगा उस प्लेटफॉर्म पर भी, कि वह ऑथेंटिक मीडिया ऑर्गेनाइजेशंस है या नहीं। दरअसल, यहां कहना चाहूंगा कि मीडिया संस्थान जब हेल्थ के ऊपर फोकस करेंगे, तो लोग उनकी ओर ज्यादा जाएंगे, बजाय छोटी जगहों के, क्योंकि छोटी जगहों पर थोड़ा सा भरोसे का संकट बना रहता है। लेकिन मैं यह भी नहीं कहूंगा कि लोगों का आंख मूंदकर के बड़े संस्थानों पर भरोसा हो जाता है, लेकिन हां छोटे संस्थानों के मुकाबले बड़े संस्थानों में भरोसा थोड़ा ज्यादा रहता है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

देखिए, बीबीसी एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर है, लिहाजा इस नाते जनता से जो ब्रिटेन में पैसा आता है उससे बीबीसी को फंड मिलता है और उस फंड से ही बीबीसी ब्रॉडकास्टिंग करता है। तो ऐसे में बीबीसी के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू करना मुश्किल है। और वैसे भी बीबीसी दुनिया की 40 से ज्यादा भाषाओं में ब्रॉडकास्ट करता है, इसलिए अचानक से यह फैसला नहीं हो सकता और फिर यह एक जगह किया हुआ फैसला तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। बीबीसी के लिए पे मॉडल के पीछे कंटेंट ले जाना एक बहुत ही बड़ा फैसला होगा, जिसके लिए इस समय ऐसी कोई चर्चा करना मुश्किल है क्योंकि इस समय ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ऑथेंटिक सूचनाएं पहुंचाना बीबीसी की प्राथमिकता है।

देखिए, सबस्क्रिप्शन मॉडल का लागू करना मार्केट-टू-मार्केट पर निर्भर करता है। जैसे उन मार्केट्स में जहां लोगों के पास देने के लिए पैसा है। अब यूएस को देखिए, यहां की पब्लिक के पास ऐसी चीजें अफोर्ड करने के पैसे हैं, लिहाजा यह मॉडल यहां पहले शुरू हुआ। भारत जैसे देश में इस मॉडल को लागू करना आसान काम नहीं है। लोग पब्लिक से फंड की अपेक्षा तो कर सकते हैं, लेकिन पेवॉल के पीछे कंटेंट को ले जाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। या फिर बहुत ही छोटा वर्ग होगा, जिसको आप  टारगेट कर पाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जो अखबार या चैनल है, वे सबस्क्रिप्शन कितने कम पैसे के ऊपर देते हैं, तो ऐसे में डिजिटल को पेवॉल के पीछे ले जाना यह बहुत ही मुश्किल काम होगा और इस समय अर्थव्यवस्था की हालत तो आप देख ही रहे हैं, यह आने वाले समय में शायद और बड़ी चुनौती बन जाए। इसलिए इतना आसान नहीं है इसे लागू कर पाना। लिहाजा बीबीसी भी अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा, क्योंकि एक तो बीबीसी का इतना बड़ा ऑपरेशन है कि अगर कह भी दें कि वह ऐसा कहीं करना भी चाहे, तो बीबीसी को किसी एक मार्केट में देखना पड़ेगा, क्योंकि यूके जैसी मार्केट, जोकि प्राइमरी मार्केट है, वहां तो पहले से ही पब्लिक पैसा दे रही है, फिर वहां कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने से एक विचित्र स्थिति बन जाएगी। बीबीसी के इतने बड़े ऑपरेशन को देखते हुए यह बहुत ही मुश्किल और चुनौती भरा काम होगा। लेकिन पैसे को लेकर जब हर मार्केट में स्थिति एक जैसी है तो, बीबीसी के ऊपर भी प्रेशर होगा, लेकिन पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर होने के नाते बीबीसी के लिए यह इतना आसान नहीं है।

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

आपने देखा होगा कि बीबीसी साइट तो हमेशा से ही फेक न्यूज के खिलाफ पूरी की पूरी रीढ़ है। रियलिटी चेक और फैक्ट चेक के नाम से बीबीसी लगातार चीजें प्रोवाइड कराता है, जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि बीबीसी के साथ एक क्रेडिबिलिटी जुड़ी हुई है, तो हम उसी को और बेहतर कर सकते हैं। पहले भी हम लोगों को गलत खबरों की जांच करके बताते थे, और इस दौरान भी बीबीसी लगातार इस पर ही काम कर रहा है और वह भी दो तरह से। एक तो मेडिकल फील्ड में, जहां आपने देखा होगा कि मेडिकल फील्ड में कुछ ऐसी खबरें आने लगी है कि गर्म पानी पियो तो कोरोनावायरस का प्रभाव नहीं होगा, किसी ने कहा ठंडा पानी पियो तो कोरोना का प्रभाव नहीं होगा, तो किसी ने कहा मौसम बदलेगा तो कोरोना का असर खत्म हो जाएगा। देखिए, हर रोज कभी किसी को लेकर, तो कभी किसी के नाम की फेक चर्चा होने लगती है। बीबीसी ने इस पर बहुत सावधानी से काम किया है। बीबीसी ने लगातार ऐसी हर चीज का फैक्ट चेक करके बताया कि यह सच है या गलत है। आप जो यह बहुत सारे दावे पढ़ रहे हैं यह सच है या गलत। बीबीसी ने इस दौरान खास तौर पर यह काम किया और एक्रॉस द लैंग्वेज किया। इंग्लिश में किया और इन्हीं चीजों को हमने यहां अभी रिप्लिकेट किया। भारत में भी इस दौरान कई तरह की फेक न्यूज फैलीं और हमने उन्हें बस्ट करने का काम किया। वैसे भी बीबीसी फेक न्यूज थोड़ा ज्यादा ही बस्ट करने का काम करता है। इस दौरान भी जिन लोगों के मन में कोई मिथक बन गया है, उसे तोड़ने के लिए बीबीसी ने लगातार खास कंटेंट दिया है।


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