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अमर उजाला के डिजिटल एडिटर जयदीप कर्णिक ने रेवेन्यू बढ़ाने के लिए इस मॉडल पर दिया जोर
देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। ऐसे में पहले ही तमाम परेशानियों से जूझ रही इस इंडस्ट्री के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है। लोग अब डिजिटली अखबार पढ़ रहे हैं। तमाम पब्लिकेशंस भी इन दिनों डिजिटल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर हमने ‘अमर उजाला’ डिजिटल के एडिटर जयदीप कर्णिक से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?
लॉकडाउन के दौरान जिस तरह टीवी की व्युअरशिप बढ़ी है, वहीं डिजिटल की व्युअरशिप में भी काफी इजाफा हुआ है। टीवी में सबसे बड़ी तब्दीली ये आई है कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) की तुलना में शुद्ध रूप से न्यूज ज्यादा देखी गई है। टेलिविजन एंटरटेनमेंट में ‘दूरदर्शन’ की व्युअरशिप काफी बढ़ी है। इस चैनल पर पिछले दिनों प्रसारित ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ काफी देखी गई हैं। जहां तक डिजिटल मीडिया की बात करें तो न्यूज वेबसाइट्स में तकरीबन सभी की 30 से 50 प्रतिशत तक रीडरशिप बढ़ी है। दरअसल, लॉकडाउन के चलते तमाम लोग घरों पर हैं। इनमें बच्चे और युवा भी हैं, जो कहीं बाहर खेलने और घूमने नहीं जा पा रहे। ऐसे में डिजिटल में ऑनलाइन गेमिंग में भी काफी इजाफा हुआ है। जो लोग घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) कर रहे हैं, उनके लिए तो ठीक है, लेकिन जिन लोगों का काम घर से बाहर निकलकर ही संभव होता है, जैसे दुकानदार आदि, ऐसे लोगों के लिए घर पर समय काटना काफी मुश्किल है, तो इनमें से ज्यादातर लोग घर पर टीवी देखकर, ऑनलाइन गेमिंग के जरिये या अन्य माध्यमों से अपना समय बिता रहे हैं।
तीसरी बात ये रही कि लॉकडाउन और कोरोनावायरस के खौफ के चलते तमाम सोसायटियों में शुरुआती दौर में अखबार नहीं पहुंच पा रहा था, तो लोगों ने ई-पेपर का सहारा लिया। ऐसे में ई-पेपर की रीडरशिप भी बढ़ी है। इसका कारण यही है कि मान लीजिए कि सुबह किसी ने अखबार पढ़ भी लिया तो भी वह पूरे दिन टीवी के सामने बैठकर समाचार नहीं देख सकता है, लेकिन उसके हाथ में अधिकांश समय मोबाइल होता है। फिर चाहे उसका दफ्तर का काम चल रहा हो या परिवार के साथ बैठा हो, तो मोबाइल पर जब भी नोटिफिकेशन आता है, कोई महत्वपूर्ण सूचना आती है अथवा वॉट्सऐप पर कोई लिंक आ जाता है तो वह उसे क्लिक करता है। हम कह सकते हैं कि कोरोना काल में डिजिटल के पाठकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।
टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?
कोरोना का डिजिटल मीडिया पर भी काफी फर्क पड़ा है और यहां भी विज्ञापन घटे हैं। देखिए, विज्ञापनदाता कोई भी प्रॉडक्ट बनाता है और उसे मार्केट में बेचता है, जिसके लिए वह विज्ञापन का सहारा लेता है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से कहीं प्रॉडक्शन ही नहीं हो रहा है, तमाम उद्योग-धंधे बंद पड़े हुए हैं। हालांकि, कुछ प्रॉडक्ट्स हैं, जिनकी बिक्री बढ़ी है। किराने के सामान की बिक्री नहीं रुकी है। इसके अलावा पर्सनल हाइजीन की चीजें जैसे-साबुन आदि की मांग भी बढ़ी है। लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं (FMCG), जिनके विज्ञापन टीवी, अखबार और डिजिटल में ज्यादा देखने को मिलते हैं, उनका उत्पादन न होने की वजह से उसका प्रभाव सभी जगह दिखाई दे रहा है। डिजिटल का संकट उससे भी आगे का है, क्योंकि टेलिविजन और अखबार के पास तो फिर भी सीधे विज्ञापन आते थे और विज्ञापन से उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा आता था, लेकिन डिजिटल में ऐसा नहीं है। डिजिटल में पाठकों की संख्या तो बहुत ज्यादा रही है, पाठक अभी भी बढ़े हैं, कहने का मतलब है कि डिजिटल के लिए पाठकों की संख्या कभी संकट का विषय नहीं रहा, डिजिटल के लिए रेवेन्यू का ही संकट रहा है। कोरोना काल के दौरान यह संकट और गहरा हुआ है। हालांकि, इस दिशा में कुछ नई पहल की गई हैं। कुछ के सबस्क्रिप्शन मॉडल शुरू हुए हैं। बड़े-बड़े कई अखबार जो कभी सबस्क्रिप्शन मॉडल (Paywall) के पीछे नहीं गए, वे भी अब ‘पेवॉल’ के पीछे चले गए हैं। हम कह सकते हैं कि विज्ञापन के लिहाज से इस महामारी का प्रभाव सभी मीडिया माध्यमों पर पड़ा है और सभी इससे अपने-अपने हिसाब से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल के लिए यह प्रभाव ज्यादा गहरा इसलिए है क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। डिजिटल में एक बड़ी दिक्कत ये है कि इस प्लेटफॉर्म के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा गूगल और फेसबुक जैसे बड़े प्लेयर लेकर चले जाते हैं, नहीं तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और काफी आगे बढ़ जाते। कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए रेवेन्यू की कमी का मुद्दा और गहरा हुआ है।
अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?
जैसा कि मैंने पहले बताया कि महामारी के इस दौर में भी पाठक संख्या के मामले में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है। पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। अब ज्यादा लोग डिजिटल पर खबरें पढ़ रहे हैं। हालांकि, कोरोना के दौर में तमाम अफवाहें भी चली हैं। यह भी देखने में आया है कि कुछ लोगों ने झूठे और दो-दो साल पुराने विडियो चलाए हैं, खबरें चलाई हैं। लेकिन कहीं न कहीं कोरोना संकट ने लोगों को ये भी समझने-समझाने पर मजबूर किया है कि जो बड़े मीडिया हाउस हैं, उनकी उपस्थिति का क्या महत्व है। उनके पास जो संपादकीय व्यवस्था है, जिससे छनकर खबरें आती हैं, वो इसलिए जरूरी है कि कुछ लोग आप तक झूठी खबरें न पहुंचाएं। देश में जो तथाकथित ‘वॉट्सऐप और फेसबुक यूनिवर्सिटी’ चल रही हैं और जिन पर पिछले कुछ सालों में झूठ का प्रसार तेजी से बढ़ा है, उस पर भी कहीं न कहीं अंकुश लगा है, क्योंकि लोगों को इस कोरोना के समय में सही और शुद्ध खबरें चाहिए। जो बड़े मीडिया हाउसेज हैं, उनकी जो मेहनत थी, उपस्थिति थी, वह मजबूती से दर्ज की गई। लोगों को ट्विटर पर आधिकारिक हैंडल और फेसबुक पर आधिकारिक पेजों का महत्व क्या है, ये समझ में आया। ऐसे में डिजिटल की पाठक संख्या में इजाफा हुआ है।
वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?
देखिए, खतरे की घंटी तो नहीं कहूंगा मैं इसे, ये सिर्फ कुछ वक्त की बात है, क्योंकि अभी जहां पर कई जगह स्थितियां थोड़ी बेहतर हुई हैं, ग्रीन जोन बढ़े हैं, वहां लोगों के घरों में अखबार फिर पहुंचना शुरू हुआ है। हां, ये जरूर है कि इस दौर में डिजिटल का एक नया पाठक वर्ग जुड़ा है। खास बात ये है कि जो पीढ़ी अखबार के साथ बड़ी हुई है, वो तो अखबार पढ़ने की आदत नहीं छोड़ेगी। नई पीढ़ी ने भी कहीं न कहीं अखबार को अपनाया है। अखबार उन लोगों के लिए भी है जो दिन भर नोटिफिकेशन देखते हैं, वॉट्सऐप देखते हैं, टेलिविजन भी थोड़ा-थोड़ा देखते हैं, लेकिन यदि उन्हें पूरे 24 घंटे का एक समग्र रूप में खबर पढ़ने के लिए प्लेटफॉर्म चाहिए तो वह अखबार ही दे पाता है। कहने का मतलब है कि समग्र रूप में लोगों की खबर पढ़ने की जो प्रवृत्ति है, वह अखबार ही दे पाता है। कहने को तो हम भी दिन भर खबरों के साथ जीते हैं, लेकिन फिर भी सुबह अखबार जरूर पढ़ते हैं। कोई भी आदमी दिन भर की सैकड़ों खबरों को लगातार न देख सकता है, न सुन सकता है और न पढ़ सकता है, फिर चाहे वह इस पेशे में ही क्यों न हो। लेकिन जो लोग इस पेशे में नहीं है, जैसे-मान लीजिए उनके ऑफिस में टीवी नहीं लगा हुआ है, मोबाइल पर भी उन्होंने बीच-बीच में विभिन्न साइट्स पर जाकर जो जरूरी चीजें देखनी थीं, वो देख लीं, लेकिन 24 घंटे में एक बार उन सारी खबरों पर एक बार नजर दौड़ाने की जो आदत बनी हुई है, और उसका अपना महत्व भी है, वो अखबार के अस्तित्व को न केवल जिंदा रहेगी, बल्कि उसको आगे भी बढ़ाएगी। फिलहाल जरूर इसमें कुछ दिक्कत आई है, कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद अखबार इसी तरह बने रहेंगे। 24 घंटे में एक बार खबर को प्राप्त करने की जो व्यक्ति की आदत है अथवा मानसिकता है, वह बनी रहेगी। इस बीच डिजिटल में नए पाठक जुड़ेंगे जो शायद अखबारों से ज्यादा जुड़े रहते थे, वे भी अब डिजिटल पर आए हैं। वो नया पाठक वर्ग डिजिटल के साथ बहुत हद तक बना हुआ है।
पाठक को ये समझ आ गया है कि यदि सुबह मैं अखबार पढ़ूंगा और उसके बाद दिन भर के जो अपडेट हैं, उन्हें टीवी पर या मोबाइल पर देख लूंगा तो पर्याप्त है। दरअसल, सुबह आपने कुछ खबरें देख लीं, उसके बाद शाम को भी टीवी पर थोड़ी देर खबरें देख लीं, सुबह फिर अखबार पढ़ लिया तो जिस व्यक्ति को बहुत ज्यादा खबरें ग्रहण नहीं करनी हैं, उस व्यक्ति के लिए इतना पर्याप्त है। कोरोना ने लोगों को डिजिटल की तरफ इसलिए ज्यादा मोड़ा है, क्योंकि हरेक घंटे में क्या हो जाए, पता नहीं। लोगों को लगता है कि कहीं कोरोना का नया मामला निकल आया, तो वह उनकी बिल्डिंग में या आसपास तो नहीं है। नए रेड जोन जारी हो रहे हैं. नई गाइडलाइंस जारी हो रही हैं। कोई नई अधिसूचना आ रही है, वॉट्सऐप पर तमाम इससे जुड़ीं खबरें आ रही हैं, तो इन चीजों ने डिजिटल को और मजबूत किया है। लोगों को भी यह समझ में आया है कि लगातार उन्हें यदि किसी खबर के बारे में अपडेट चाहिए तो उन्हें डिजिटल से जुड़ना पड़ेगा और यदि खबर का सार चाहिए या किसी खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा पढ़ना है या किसी खबर के बारे में 400-500 या हजार शब्दों में जानकारी चाहिए तो अगले दिन अखबार में पढ़ सकता है। लेकिन लगातार यदि किसी को खबर पढ़नी है या कोरोना को लेकर कोई बड़ा शोध प्रकाशित हुआ है और यदि उसे वह पढ़ना हो तो वह इस प्लेटफॉर्म पर पढ़ सकता है। दूसरी बात ये कि डिजिटल तीनों माध्यमों का समागम है, यानी यहां पर आपको टेक्स्ट पढ़ने को मिल जाता है, फोटो भी मिल जाते हैं और विडियो भी मिल जाते हैं। यह सुविधा अखबार में नहीं मिलती। टीवी पर भी विजुअल ज्यादा होता है और टेक्स्ट कम होता है। डिजिटल माध्यम की खूबसूरती यही है कि यहां पर टेक्स्ट के साथ फोटो गैलरी भी मिलती है, जिसमें आप एक ही घटना की कई तस्वीरें देख सकते हैं। तो कहीं न कहीं, ये सारे मीडियम एक-दूसरे को कॉम्पलिमेंट करते हुए नजर आते हैं।
इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?
देखिए, हमने एक तो सबसे पहले इस खतरे को भांपते हुए कई एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए। उस दौरान यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैसे चीन और सिंगापुर में तब तक फैल चुका था, इटली में भी यह पहुंच चुका था। ऐसे में वहां के न्यूजरूम्स ने क्या किया, हम इससे भी लगातार जुड़े रहे। हम इस बारे में लगातार जानकारी लेते रहे। इन सबको देखते हुए अमर उजाला ऐसे शुरुआती चुनिंदा मीडिया हाउसेज में शामिल था, जिन्होंने बहुत जल्दी ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) अपना लिया था और कई साथी वर्क फ्रॉम होम पर चले गए थे। हम लोगों ने 14-15 मार्च से ही उन लोगों को वर्क फ्रॉम होम देना शुरू कर दिया था, जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से या काफी दूर से आते थे। जब तक जनता कर्फ्यू लागू हुआ था, हमारी टीम के बहुत सारे सदस्य घर से काम करना शुरू कर चुके थे। हालांकि, अभी भी कुछ लोग हैं जो ऑफिस आते हैं और ये वो लोग हैं, जिनका काम घर से नहीं हो सकता है, लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम आसान इसलिए रहा कि ऑनलाइन सीएमएस है और हमारी हाइपर लोकल की टीम कानपुर, लखनऊ व आगरा आदि जगहों से काम करती है और उनकी वर्किंग पूरी सेट है तो हमें वर्क फ्रॉम होम से बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं आई। हां, एक जो न्यूज रूम का स्पंदन होता है, न्यूजरूम की आदत होती है, पत्रकारिता में न्यूज रूम का एक जो वाइब्रेशन होता है, ऊर्जा होती है, वो जरूर बहुत से लोगों ने शुरुआत में मिस की, लेकिन धीरे-धीरे ये आदत पड़ गई और ये भी समझ में आ गया कि इस तरह भी आप बड़ी खबरों से, ब्रेकिंग खबरों से जुड़े रह सकते हैं।
आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?
मेरा मानना है कि निश्चित तौर पर बदलाव आएगा। बहुत सारे लोग ऐसे भी विचार कर रहे हैं कि इस वर्क फ्रॉम होम को और कुछ समय तक चलाया जाए। केवल डिजिटल के लोग ही नहीं, बल्कि प्रिंट के लोग भी धीरे-धीरे घर से काम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल, लोगों को समझ आ गया है कि कोरोना इतनी जल्दी खत्म होने वाला है नहीं। ऐसे में ये जो कार्य संस्कृति पनपी है, इसे लोग चलाएंगे। ऐसे भी कई लोग हैं, जिनके पास अपनी बिल्डिंग नहीं है और वे किराए के दफ्तरों से काम चला रहे हैं, इनमें से कुछ तो इस किराए को बचाने की कोशिश करेंगे। मेरा मानना है कि कार्य संस्कृति में तो क्रांतिकारी तब्दीलियां आने वाली हैं और कोरोना से पहले की मीडिया की दुनिया और कोरोना के बाद की मीडिया की दुनिया निश्चित ही अलग होने वाली है।
रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
भरपाई हो न हो, लेकिन सबस्क्रिप्शन मॉडल को सफल होना पड़ेगा, क्योंकि डिजिटल में रेवेन्यू की कमी पहले से ही बहुत ज्यादा चुनौती बनी हुई थी। आज से दो-तीन साल पहले तक जिस बैनर के इम्प्रेशंस के लिए आपको 150-200 रुपए मिल जाया करते थे, उसके अब 20,25 या फिर 50 रुपए मिलने लगे हैं, तो आप ज्यादा पेजव्यू लाकर भी उतना पैसा नहीं कमा पाते हैं, जितना आप पहले कमा लिया करते थे और ये धीरे-धीरे खराब ही हो रहा है, क्योंकि डिजिटल में एंट्री लेवल बहुत ही आसान है। आज कोई भी व्यक्ति दो लैपटॉप लेकर एक वेबसाइट शुरू कर सकता है। एंट्री लेवल की आसानी होने और बहुत सारे प्लेयर्स होने से और बड़ा पैसे का हिस्सा फेसबुक और गूगल के पास जाने से दिक्कतें काफी समय से थीं। जो विदेशों में मॉडल अपनाया गया, जिसकी चर्चा बार-बार होती है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का जो अधिकतर पैसा आ रहा है, वो डिजिटल के सबस्क्रिप्शन से आ रहा है। कई संस्करण को बंद करके उन्होंने डिजिटल कर दिया। भारत में भी पैसे देकर आलेख पढ़ने की संस्कृति विकसित नहीं हुई थी, लेकिन इसके प्रयोग पिछले दो साल से बहुत तेजी से होने लगे थे। खासतौर से मैं कहूंगा कि पिछले साल भर के देश के तमाम पब्लिशर्स सबस्क्रिप्शन मॉडल के बारे में विचार कर रहे थे। लेकिन उस पर काम करने में संकोच कर रहे थे। अमर उजाला ही ऐसा चुनिंदा मीडिया हाउस है, जिसने अपने ई-पेपर को आज से पांच-छह महीने पहले ही सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे डाल दिया था। हम उससे आगे बढ़े हैं। अंग्रेजी में ‘द हिन्दू’ जैसे कुछ एक प्रकाशकों ने पहले ऐसा किया था, लेकिन हम हिंदी के पहले ऐसे डिजिटल मीडिया हाउस हैं, जिसने अपने कंटेंट को पेवॉल) के पीछे डाला है। अगर आप अमर उजाला की वेबसाइट देखेंगे तो अमर उजाला प्रीमियम करके हमने नया सबस्क्रिप्शन मॉडल तैयार किया है। उसको लेने पर आपको वेबसाइट पर दिखाई देने वाले विज्ञापन नहीं दिखेंगे। दरअसल, डिजिटल के रेवेन्यू का सोर्स ही यही विज्ञापन हैं और कई पाठकों की दिक्कत होती है कि उन्हें ये विज्ञापन बोझिल लगते हैं। इसलिए अमर उजाला प्रीमियम से पाठकों को ऐसा अनुभव मिलेगा, जिसमें कोई विज्ञापन नहीं होगा। तो पाठकों को शुद्ध रूप से सामग्री पढ़ने को मिलेगी। समाचार पढ़ने को मिलेंगे, वीडियो देखने को मिलेंगे।
दूसरा, अमर उजाला प्रीमियम के सबस्क्राइबर्स को हम उसी मेंबरशिप में अपना ई-पेपर, जिसे हमने पेड कर रखा है, उपलब्ध कराएंगे और तीसरा, हम कुछ शो आधारित आलेख तैयार करवा रहे हैं, ऐसे आर्टिकल तैयार करवा रहे हैं, जो सिर्फ उन पाठकों को मिलेंगे, जो हमारे अमर उजाला प्रीमियम के सदस्य बनेंगे। तो ये बड़ी पहल हमने एक मीडिया समूह के रूप में की है, जिसको हम लॉन्च कर चुके हैं और इसका रिस्पॉन्स भी हमें बहुत अच्छा मिला है। तो जब आपके पास विज्ञापन से पैसा नहीं आएगा, तो कहीं न कहीं पाठकों को पैसा तो देना पड़ेगा ही।
देखिए, मीडिया इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दिक्कत यही रही है कि इसकी जो इकनॉमिक है, आर्थिक गुणाभाग है, वो खराब रही है, फिर चाहे टेलिविनज चैनल हों, या फिर अखबार हों। दुनिया में ऐसा कौन सा उत्पाद होगा, जो भला अपनी लागत मूल्य से बहुत कम में बिकता हो। आज एक अखबार की कीमत 20-22 रुपए बैठती है, वो 5-6 रुपए में बाजार में बिकता है। टेलिविजन चैनलों के लिए उपभोक्ता सीधे-सीधे पैसे नहीं देते, वो तो बीच में जो डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं, उनका पैसा देते हैं, फिर चाहे, टाटा स्काई हो या फिर एयरटेल हो। इसी तरह से डिजिटल पर भी व्यक्ति कंटेंट को पढ़ने का कोई पैसा नहीं दे रहा है। पैसा तो विज्ञापनों से ही मिल रहा था। आखिरकार कहीं न कहीं आप अच्छी सामग्री पढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पैसा देना पड़ेगा और जब पैसा देंगे तो जो कंटेंट आपको मिलेगा, उसकी गुणवत्ता बेहतर होगी। निरंतर अच्छी सामग्री आपको मिलेगी। क्योंकि उपभोक्ता पैसे देगा तो निश्चित ही न्यूजरूम्स की जवाबदेही बढ़ेगी और लगातार उसको बेहतर कंटेंट उपलब्ध कराना होगा। इसलिए यही मॉडल है, जिसके माध्यम से भविष्य में डिजिटल मालिकों का पैसा बन सकता है। इसलिए अन्य प्रकाशक भी पेवॉल के पीछे गए हैं और अमर उजाला ने भी ये प्रयोग किया है। सबसे पहले प्रयोग करने वाला अमर उजाला ही है। हिंदी प्रकाशन माध्यमों में तो पूरे कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने की जो सबस्क्रिप्शन की, मेंबरशिप की व्यवस्था शुरू की गई है, उसमें अमर उजाला ने पहल की है, जिसका हमें रिस्पॉन्स भी अच्छा मिल रहा है। हमें लगता है कि अगर विज्ञापन से आय घट रही है तो आपको आय के नए तरीके खोजने पड़ेंगे, जिससे आपकी आय हो सके।
आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?
देखिए, कुछ उपाय तो चलन में आ चुके हैं। जैसे कि मैं शुरू में जिक्र कर रहा था लोगों को ये समझना पड़ेगा कि जो एक पारंपरिक मीडिया संस्थान है, उसका महत्व क्या है? वहां पर जो संपादकीय व्यवस्था की छलनी लगी है, वो क्यों लगी है। तो बता दूं कि वो इसलिए ही लगी है, कि इस तरह की झूठी खबरें और अफवाहें बाजार में न फैलें। उससे होने वाले नुकसान बहुत घातक हैं। लड़ाइयां होती हैं, दंगे होते हैं। कहा जाता है कि झूठ के पैर नहीं होते हैं और यह बहुत तेजी से फैलता है। लिहाजा हर कोई व्यक्ति अब फैक्ट चेक भी करने लगा है क्योंकि झूठी खबरों का बाजार इतना गर्म है और इतनी तेजी से फैलता है कि अच्छे-बड़े मीडिया संस्थानों के न्यूजरूम में कई बार गफलत हो जाती है और गलत न्यूज प्रकाशित कर बैठते हैं। तो इसी को लेकर सभी को सामूहिक रूप से प्रयत्न करने पड़ेंगे। हमारी जो पत्रकारिता की बुनियादी शिक्षा है कि आप जब तक उस खबर को एक दो स्रोत से कंफर्म नहीं करेंगे, तब तक प्रकाशित नहीं करेंगे, उसका मजबूती से पालन करना होगा। आपके संवाददाता की भी खबर हो, तो उसे भी क्रॉस चेक कर लिया जाए, एजेंसी की खबरों में भी तथ्यों को जांच लिया जाए। ये जो पुरानी पारम्परिक पत्रकारिता है, उसका माध्यम बदल सकता है। पत्रकारिता के नियम और खबरों की सत्यता जांचने की तकनीक नहीं बदल सकती है। खबर को आपको सत्यापित करके ही प्रकाशित करना होगा, यही काम सारे जवाबदेह मीडिया संस्थानों का होता है और उनको आगे और मजबूती से यह करना होगा, क्योंकि तमाम सोशल मीडिया माध्यमों ने झूठी खबरों को तेजी से फैलाने का काम किया है। जो खबरें आपसी चर्चा में, नुक्कड़ में गप्प बनकर रह जाती थीं, वो अब बहुत तेजी से इधर-उधर फैलने लग जाती हैं। उन पर लगाम लगाने के लिए मीडिया हाउसेज को बेहतर तरीके से व्यवस्था करनी पड़ेगी और लोगों को भी ये जागरूक करना पड़ेगा कि वे किन समाचार माध्यमों पर भरोसा कर सकते हैं और किन पर नहीं।
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