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यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है: चंदन जायसवाल, डिजिटल एडिटर, नवोदय टाइम्स
कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
देश में कोरोनावायरस (COVID-19) का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है। मीडिया इंडस्ट्री पर भी लॉकडाउन के असर से अछूती नहीं रही। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है, लेकिन इसका डिजिटल पर कितना असर पड़ा है। इन्हीं तमाम मुद्दों पर समाचार4मीडिया ने 'नवोदय टाइम्स' के डिजिटल एडिटर चंदन जायसवाल से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:
कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?
डिजिटल के लिए भी लॉकडाउन का समय पाठकों के लिहाज से सही रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोरोना काल के दौरान डिजिटल किसी और की पीठ पर चल के सफलता की मंजिल पर काबिज हुआ है। पिछले कई वर्षों से देखा जा रहा है कि समाचार को लेकर खास तौर पर यूथ की पसंद में बदलाव आया है और डिजिटल उन्हें यह यकीन दिलाने में सफल रहा है कि यह माध्यम उनके मन मुताबिक है और उनकी जरूरतों को पूरी भी कर रहा है। हां, ये बात जरूर कही जा सकती है कि लॉकडाउन के दौरान लोगों की गतिविधियां कम हुईं और घर में बैठे रहने के दौरान उनका रुख भी डिजिटल की और हुआ इसका असर हमें साइट पर विजिटर्स (व्युअरशिप) की बढ़ी संख्या के रुप में दिखा। समाचारों का विश्वसनीय स्रोत होने के नाते पंजाब केसरी समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी यूजर्स की संख्या बढ़ी है।
टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?
लॉकडाउन और कोरोना काल से वैश्विक स्तर पर संकट है और इसका सबसे बुरा असर यदि जिन सेक्टर्स पर देखना पड़ रहा है, उनमें मीडिया भी शामिल है। डिजिटल की बात करें तो इस संकट काल में रेवेन्यू को लेकर कोई खास असर नहीं पड़ा है, क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। हां, कोरोना काल में डिजिटल के पक्ष में एक अच्छी बात जो सामने आई है वो ये है कि कल तक जो इस माध्यम को विज्ञापन देने से हिचक रहे थे, अब तैयार नजर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि आने वाला दिन डिजिटल में रेवेन्यू के लिए बेहतर होने वाला है।
अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?
कोरोना काल में तमाम तरह के झूठ फैलाए गए है। जैसा कि सब जानते हैं कि महज एक अफवाह के डर से दिल्ली-एनसीआर से लेकर गांवों तक तमाम लोगों ने अखबार/ मैगजींस लेना छोड़ दिया है। विज्ञापन शून्य हो जाने से एडिशन निकालना कठिन हो गया है। लेकिन यही अंतिम सत्य नहीं है। हमें इस आपदा को चुनौती के तौर पर लेना है। पहले भी पत्रकारिता चुनौतियों का सामना करती रही है। पंजाब केसरी समूह के चुनौतियों से जुझने और उससे बेहतर तरीके से निपटने का इतिहास रहा है। बुरा दौर है जो निश्चित ही जल्द खत्म होगा। हालांकि इस संकट काल में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है बल्कि पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। भविष्य को लेकर तो अभी कुछ दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन हिचकते हुए ही सही, जिस तरह से विज्ञापन देने वाली कंपनियां डिजिटल की तरफ रुख कर रही हैं...यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है।
वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?
देखिए मैंने पहले ही साफ कर दिया है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों ही पत्रकारिता के आयाम तो हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसे पाठक जो कल तक अखबार पढ़ रहे थे कोरोना के बाद डिजिटल की तरफ मुखातिब हो गए हैं और सिर्फ इसलिए ही डिजिटल की गाड़ी चल निकली है। कोरोना के दौरान प्रिंट के सर्कुलेशन गिरने और डिजिटल की रीडरशिप बढ़ने की व्याख्या कुछ लोग ऐसे कर रहे हैं कि लग रहा है कि प्रिंट की 'शहादत' से ही डिजिटल फलाफूला है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
आज से 5-7 साल पहले ही देश में इंटरनेट फ्रेंडली यूजर्स की बढ़ोतरी और समाचार की सभी विधाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर सबसे पहले (कई बार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी पहले) परोस देने की खूबी के कारण डिजिटल ने प्रिंट को पीछे छोड़ दिया था। यही वह दौर था जब अखबार मालिकों ने डिजिटल पर ध्यान देना शुरू किया। इसका मतलब कही से भी यह नहीं निकालना चाहिए कि मैं कह रहा हूं कि प्रिंट आउटडेटेड हो गया। लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि आज का यूथ न्यूज के लिए प्रिंट की ओर नहीं डिजिटल की ओर देखता है। इसका कोरोना काल से कोई संबंध नहीं है। यूथ के हाथ में मोबाइल है, ऑफिस से आते-जाते महज उंगलियों की हलचल से वह दोस्तों से चैटिंग करते-करते टी-20 का स्कोर भी देख लेता है और लेटेस्ट न्यूज भी जान जाता है। न पेज पलटने की समस्या, न स्टेशन आने पर पेपर को समेट कर बैग में रखने का लोचा। ये मैंने डिजिटल की जो खूबियां गिनाई हैं, इन्हें प्रिंट के लिए खतरे के तौर पर मत देखिए। प्रिंट पर जो भी संकट है वह अस्थायी है या फिर जेनेरेशन का है। प्रिंट इन दोनों से बहुत आसानी से निपटने में सक्षम है। हम जब मीडिया में नए-नए आए थे तब से मीडिया पंडित प्रिंट के संकट की भविष्यवाणी कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक के आने के बाद तो उन लोगों ने समय भी बताना शुरू कर दिया था, जबकि हकीकत सबके सामने है।
इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?
देखिए, संकट के इस दौर में हमारे समूह के सभी साथी बहुत ही मजबूती और बहादुरी के साथ काम कर रहे हैं। डिजिटल की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी और जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआती दौर में ही सभी साथियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया। पहले हम लोग कंटेंट के लिए शिफ्ट वाइज मीटिंग करते थे, लेकिन अब सभी साथियों के साथ वर्चुअल मीटिंग करते हैं।
शुरुआत से ही हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों को ज्यादा से ज्यादा ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन उपलब्ध करा सकें। इसके लिए हमने टेक्नोलॉजी का यूज करके विशेषज्ञ चिकित्सकों को लाइव कनेक्ट किया और लोगों को कोरोनाकाल की समस्याओं से निजात पाने का उपाय बताया। लॉकडाउन में एंटरटेनमेंट की खबरों के लिए तमाम सेलिब्रिटीज से लाइव कनेक्ट कर उसको फैंस के साथ रूबरू करवाते हैं। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम इसलिए भी आसान रहा कि नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी की टीम 9 राज्यों से काम करती है जिससे डिजिटल टीम को काफी मदद मिली।
आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?
मेरे हिसाब से तो मीडिया की दुनिया में बदलाव निश्चित है क्योंकि कोरोना काल इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है। डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में पहला बड़ा बदलाव जो मैं देख पा रहा हूं वह है वर्क फ्रॉम होम। कोरोना काल में यह कार्य संस्कृति एम्प्लॉयी और एम्प्लॉयर दोनों के लिए बेहतर है और यह बदलाव दोनों के लिए ज्यादा व्यापक और अर्थपूर्ण है। पत्रकारों के काम करने का तरीका भी बदलेगा, मसलन किसी का इंटरव्यू करने के लिए टेक्नोलॉजी की सहायता से घर या दफ्तर से बैठे-बैठे उसे कनेक्ट कर लिजिए। इससे समय और मैनपावर दोनों की बचत भी होगी।
रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
फिलहाल मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा
आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है, आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?
देखिए, मेरा मानना तो ये है कि ये सब कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे न्यूज पोर्टल्स का मर्ज है। कई लोग प्रोपेगैंडा खबरों के लिए न्यूज पोर्टल्स खोल के बैठे हैं। इसके लिए सरकार को कुछ कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि फेक न्यूज की पोस्टिंग पर लगाम लगाया जा सके। सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ने वालों को भी जागरूक करना होगा कि वे हर किसी ख़बर पर आंख बंद करके भरोसा न करें।
जहां तक हमारा सवाल है तो हम लोग एक बड़े मीडिया हाउस (परम्परागत मीडिया संस्थान) से जुड़े हैं। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी समूह की पाठकों में विश्वसनीयता है। हमारे यहां संपादकीय चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था है जो वैसी खबरों को दूर रखने का काम करती है। हालांकि PV और UV के चक्कर में कई बार उतावलापन हावी होता है लेकिन क्रॉस चेक, फैक्ट चेक जैसे एथिक्स हैं जिसका दामन जितनी मजबूती से कोई संपादकीय टीम पकड़े रहेगी तब तक फेक न्यूज से बचना संभव है। यह कहना आसान है लेकिन डिजिटल मीडिया की 'सबसे पहले' वाली मानसिकता में इसे अमल में लाना उतना ही मुश्किल काम है।
न्यूज टीम के हर सदस्य के लिए भी यह समझने का विषय है कि एक ब्रैंड को तो ऐसी खबरें दागदार करती ही हैं, खुद पत्रकारों के लिए भी ऐसी खबरों में ट्रैप होना उनके प्रोफेशनलिज़्म पर सवाल उठाता है और भविष्य में उनके सलेक्शन ऑफ न्यूज और न्यूज सेंस को भी खराब करता है।
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