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अगर आप हार्डकोर रिपोर्टर नहीं हैं तो कभी भी अच्छे एंकर नहीं बन सकते हैं: भूपेंद्र चौबे

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने मीडिया जगत को बड़ी बारीकी से जाना और समझा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने मीडिया जगत को बड़ी बारीकी से जाना और समझा है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में भूपेंद्र चौबे ने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बताया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने एक लंबा सफर मीडिया में तय किया है। अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मेरा जन्म बनारस में हुआ, मेरे पिताजी (अब दिवंगत) दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक थे। मेरी चार बड़ी बहनें थीं और मैं सबसे छोटा था। पढ़ाई वैसे ही हुई जैसे एक मिडिल क्लास के बच्चे की होती है। चीजों को संभाल कर रखना, एक-एक पैसा बचाकर चलना, सच कहूं तो वो संस्कार आज भी मेरे अंदर जीवित हैं। हमारे पास स्कूल फीस भरने तक के पैसे कई बार नहीं होते थे, इसलिए उस कठिन समय की छाप आज भी मेरे अवचेतन पर मौजूद है लेकिन वो समय बेहद सुखद भी था। दरअसल, सबके पास एक-दूसरे के लिए समय होता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि जिंदगी की भागदौड़ में वो समय अब किसी के पास नहीं रहा। बचपन से ही डिबेट में भाग लेना अच्छा लगता था, निबंध प्रतियोगिता में कई बार मैं विजयी हुआ तो समाज से एक जुड़ाव तो बचपन में ही हो गया था। मुंबई में जब मैं मास्टर्स करने गया तो वहां जीवन में एक अहम मोड़ आया। दरअसल, मेरे कुछ साथियों ने मुझसे कहा कि तुम्हें सामाजिक विषयों की इतनी अच्छी समझ है तो मीडिया और संचार के फील्ड में क्यों नहीं जाते? वहीं मुझे किताबें पढ़ने और फिल्में देखने का बड़ा शौक था तो वो बात मेरे दिमाग में बैठ गई। फिर मैंने एक छोटा सा कोर्स भी कर ही लिया, उस वक्त मेरा बस एक ही सपना था कि अपनी खुद की फिल्म लिखूं और उसे खुद ही निर्देशित करूं, लेकिन जैसा कि आप जानते हैं, वो सपना अधूरा रह गया।

जैसा कि आपने बताया कि आपने मीडिया और संचार में पढ़ाई की तो पहली नौकरी आपको कैसे मिली?

वो किस्सा भी दिलचस्प है। दरअसल, मेरे सास और ससुर का शिष्य ‘आजतक’ में काम करता था। उस दौर में ‘आजतक’ सिर्फ एक घंटे का बुलेटिन बनाया करता था। उस शिष्य ने मेरी पत्नी से मेरे बारे में बात की और मेरी पत्नी ने फिर मुझसे बात की। उस वक्त ‘आजतक’ और ‘एनडीटीवी‘ दो बड़े नाम थे तो मेरी पत्नी ने ही मेरा सीवी बनाकर भेज दिया था। उन्होंने मेरा बड़ा अच्छा सीवी बनाया और लगभग हर महीने वो ऐसा करती थीं, जबकि मैं उन सब बातों को भूल चुका था। ऐसे ही एक दिन फिर मुझे प्रणब रॉय के ऑफिस से कॉल आया और उस समय में देहरादून में ऐड फिल्म की शूटिंग कर रहा था जो कि केतन मेहता जी के साथ थी। इसके बाद मैं जब प्रणव जी से मिलने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि ये जो तुम्हारा सीवी है, वो इतना परफेक्ट है कि इसकी तारीफ़ में उनके पास शब्द नहीं हैं। ये सब मेरी श्रीमती जी का कमाल था। इसके बाद मैंने प्रणव जी से कहा कि मुझे सिनेमा में रुचि है तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम बतौर वीडियोग्राफर हमसे जुड़ जाओ। वो मीडिया में मेरी पहली नौकरी थी और उस समय मैंने बिल्कुल नहीं सोचा था कि मेरी यात्रा यहां तक आ जाएगी।

आपने वीडियोग्राफर के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। एंकरिंग में आना कैसे हुआ?

हमारे यहां एंकरिंग को एक अलग कला माना जाता है, जो कि ठीक नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि अगर आप हार्डकोर रिपोर्टर नहीं हैं तो कभी भी एक अच्छे एंकर नहीं बन सकते हैं। रिपोर्टर को ही मुद्दों की सही और सटीक समझ होती है। मैंने अपने शुरुआती दस साल सिर्फ ग्राउंड वर्क को दिए थे और उसके बाद किसी चीज में कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई। वर्तमान में एंकर सबको बनना है, लेकिन हार्डकोर रिपोर्टिंग में मेहनत भी नहीं करनी है। उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था, मोबाइल कम थे, किसी से मिलने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी और बड़ा अनुशासन था। मैं तो आह्वान करता हूं मीडिया के लोगों का कि जब आप किसी को एंकरिंग करने का मौका दें तो पहले ये देखें कि क्या उस व्यक्ति ने जीवन में अच्छी रिपोर्टिंग की है या नहीं की? मैं स्टूडियो कल्चर को अपनाने वाला आदमी नहीं हूं। मैं अपने शो में एक रिपोर्टर की भावना को लेकर शो को संचालित करता हूं और जब आप ऐसा करते हैं तो लोग आपको अपने आप पसंद करने लग जाते हैं।

आपने बहुत कम मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है और बड़ा लंबा काम किया है। ‘सीएनएन न्यूज18’ में यात्रा कैसे शुरू हुई?

दरअसल, मेरे जीवन पर राजदीप सरदेसाई का बड़ा गहरा प्रभाव रहा है। मैं उन्हें दूसरी और अपने आप को तीसरी पीढ़ी के तौर पर गिनता हूं। जब उन्होंने वहां से निकलने का मन बनाया तो उसके बाद अरनब ने भी छोड़ने का निर्णय ले लिया था। इसके बाद मैं भी राजदीप जी के साथ साल 2005 में जुड़ गया। मुझे प्रणव जी की तरफ से रोकने की भी कोशिश हुई लेकिन मैंने जीवन में आगे बढ़ने का निर्णय ले लिया था। हमने साथ में काम किया और एक से एक नायाब स्टोरी कीं। मुझे लगता है कि इंसान को जीवन में समय के साथ निर्णय लेना सीखना चाहिए। आज मैं ‘इंडिया अहेड‘ से जुड़ा हूं और देखता हूं कि कितने युवा, ऊर्जावान और विद्वान मेरे साथी हैं। अगर मैं वहीं 25 साल ‘एनडीटीवी‘ में रहता तो शायद आज जो अनुभव कर रहा हूं, वो नहीं कर पा रहा होता।

जैसा कि आपने बताया कि ‘इंडिया अहेड‘ में बड़े ऊर्जावान साथियों के साथ आप काम कर रहे हैं। डिजिटल के भविष्य को किस तरह से देखते हैं?

मुझे बड़ा गर्व है कि ‘इंडिया अहेड‘ सही मायनों में देश का पहला डिजिटल न्यूज चैनल है, जहां बाकायदा डिजिटल फॉर्मेट में हम कंटेंट तैयार कर रहे हैं, न कि जो टीवी पर चल रहा है, उसी को डाल रहे हैं। आप टीवी और डिजिटल को एक नहीं कर सकते हैं। ऋचा अनिरुद्ध जैसी बुद्धिमान एंकर और लेखिका हमसे जुड़ी हुई हैं। उनका आप शो देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि क्यों वो सबसे श्रेष्ठ कही जाती हैं! मैं शर्तिया कह सकता हूं कि डिजिटल में इतनी गहराई के साथ कोई शो नहीं कर सकता है। मेरी टीम में सुमित पांडेय, अद्वैता काला जैसे गुणी लोग हैं तो हम बिल्कुल अलग काम कर रहे हैं। ‘इंडिया अहेड‘ सिर्फ न्यूज फॉर्मेट है, जिसकी कमी महसूस की जा रही थी।

क्या आपको लगता है कि देश में पत्रकारों को लिखने और बोलने की आजादी नहीं है? एक बड़ा वर्ग है जो इस प्रकार की बातें करता है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

मेरा मत यही है कि इस देश में कोई आपातकाल नहीं है। दरअसल, समस्या यह है कि कुछ लोग जो ये समझते थे कि पत्रकारिता सिर्फ उन्हीं के हिसाब से चलेगी, समस्या उनको हो रही है। उनको लगता था कि देश की जनता की राय बनाने में सिर्फ उनका हाथ है और वो अब अपना काम कर नहीं पा रहे! देश की जनता अब पूरी तरह से जागरूक हो चुकी है और वो फैक्ट्स को जांचना और परखना सीख गई है। ‘सीएनएन आईबीएन‘ में एक हफ्ते तक प्राइम टाइम शुरू होने से पहले और उसके खत्म होने तक पी चिदंबरम जी के लिए माफीनामा चलाया गया था। डॉक्टर स्वामी को एक बार सिर्फ इसलिए बोलने नहीं दिया गया कि मंत्री जी नाराज हो जाएंगे। ये कोई नई चीज नहीं है और सब संस्थानों में पहले भी होती थी। पहले सोशल मीडिया नहीं था तो बात उतनी आगे तक नहीं जाती थी अब कोई भी चीज आग की तरह फैल जाती है और लोग कुछ भी आरोप लगाना शुरू कर देते हैं।

समाचार4मीडिया के साथ भूपेंद्र चौबे की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।


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