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यह स्थिति सिर्फ मीडिया ही नहीं, बल्कि संविधान के लिए भी सही नहीं है: सतीश के. सिंह
वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मीडिया जगत की अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के कई अनुसने किस्सों को साझा किया है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मीडिया जगत की अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के कई अनुसने किस्सों को साझा किया है। पेश है इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-
अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताएं। मीडिया में कैसे आना हुआ?
बचपन में जब मैं पटना में रहता था तो अखबार पढ़ने की आदत लग गई थी। उन दिनों बचपन में ऐसा लगता था कि अखबार बहुत बड़ी चीज है। धीरे-धीरे मेरी रुचि अन्य भाषाओं के अखबारों और पत्रिकाओं में भी होने लगी और साल 1977 आते-आते राजनीति जैसे विषयों की समझ विकसित होनी शुरू हो गई थी। हालांकि मेरी रुचि मीडिया में आने की नहीं थी, दरअसल मुझे खेल का मैदान रोमांचित किया करता था। उस दौरान मैं लगभग सभी बड़ी खेल पत्रिकाओं का अध्ययन किया करता था। मैं बड़ा खिलाड़ी तो नहीं बन पाया, लेकिन मैं एथलीट जरूर था। साल 1982 में पटना के एक अखबार में मेरा फोटो आया था और वो याद आज भी मेरे जहन में जिंदा है। इसके बाद मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आ गया। उसी दौरान मेरी समझ को देखकर मेरे एक मित्र ने मुझे पत्रकारिता में आने की सलाह दी। मैंने एक पत्रिका को जॉइन किया और बाद में नलिनी सिंह जी के कार्यक्रम के साथ जुड़ गया।
जैसा कि आपने कहा कि बचपन से राजनीति में रुचि थी तो किसी पार्टी से क्यों नहीं जुड़े?
देखिए, अगर मैं चाहता तो बड़ी आसानी से किसी भी राजनीतिक पार्टी से मैं जुड़ सकता था। मुझे पांच बड़े नेताओं ने ऑफर दिया था, जिसमें से चार तो आज जीवित भी नहीं हैं। देखा जाए तो फैक्ट्स आधारित पत्रकारिता करने में मुझे मजा आ रहा था और आज भी मैं उसी को एन्जॉय करता हूं। राजनीति मुझे लगता है कि मेरे बस की नहीं है। मुझे तो इस नाम से ही समस्या है। आप राजनीति क्यों कहते हैं? राष्ट्रनीति कहिए न! ये राज्य करने की नीति क्यों हो? आप इसे लोगों की सेवा करने की नीति कहिए। मीडिया की अगर बात करें तो वहां भी जनता के मुद्दे उठें, लेकिन आज आप देखिए की डिबेट में बॉक्सिंग हो रही है, लोग लड़ रहे हैं और तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। मेरा मानना है कि चुनाव तो ठीक है, लेकिन असली लोकतंत्र की परीक्षा चुनाव के बाद ही शुरू होती है।
अपने रिपोर्टिंग के अनुभव के बारे में बताएं। उस दौर में रिपोर्टिंग करना कितना चुनौतीपूर्ण था?
नलिनी सिंह जी के कार्यक्रम ‘हेलो जिंदगी‘ में काम करने के दौरान मुझे हिमाचल, पंजाब और बिहार जैसे राज्यों में जाने का मौका मिला और काफी कुछ मैंने सीखा। उसके बाद मैं ‘फर्स्ट एडिशन‘ से जुड़ गया, जहां मुझे रिसर्च का काम दिया जाता था जो मेरे लिए अच्छा भी रहा। उसके बाद साल 1996 में मुझे ‘जी टीवी‘ से जुड़ने का मौका मिला। उसी दौरान ओलंपिक हुए और मैंने डेस्क पर रहते हुए उसकी पूरी रिपोर्ट बनाई। उसके बाद मुझे चुनाव कवर करने के लिए पटना (बिहार) भेजा गया। टीवी के लिए वह मेरी पहली चुनावी रिपोर्टिंग थी। मैंने लालू यादव जी का इंटरव्यू भी किया था और उस चुनाव के बाद मुझे लगता है कि मैं एक अच्छा रिपोर्टर बन गया था। देवगौड़ा जी का इस्तीफा, गुजराल जी का पीएम बनना, कारगिल घुसपैठ जैसी खबरें मैंने ही ब्रेक की थीं। इसके अलावा कंधार विमान अपहरण और उसके समाधान की न्यूज भी मैंने ही ब्रेक की थी। इसके अलावा वाजपेयी जी के विश्वासमत हारने की खबर मैंने पहले ही बता दी थी। इसके अलावा मुझे कई बार भारत सरकार की ओर से विदेश जाने का भी मौका मिला। वहीं काम के सिलसिले में करीब 28 देशों की यात्रा करने का मौका मिला। एक और खास बात ये है कि साल 2004 से मैं चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करीब-करीब सही करता आ रहा हूं।
अगर हम 90 के दशक की बात करें तो वो देश के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण दशक था। कई बड़ी घटनाएं उस दौर में हुईं। आप उस समय और आज की पत्रकारिता में क्या बड़ा अंतर पाते हैं?
मुझे ऐसा लगता है कि आज मुख्यधारा का पत्रकार काफी वजह से कमजोर है। आप उसे दबाब कह लें, महत्वकांक्षा कह लें या उसकी विचारधारा को कारण मान लें, लेकिन सच यही है कि आज उस दौर की तरह पत्रकारिता नहीं हो रही है। वैसे एक दौर में हमने सांप-बिच्छू वाली खबरें भी देखीं और उससे मीडिया की इमेज प्रभावित भी हुई, आज कम से कम न्यूज की शक्ल में कुछ तो लोगों को देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर आज डिजिटल मीडिया का जमाना है, जहां कमोबेश हर व्यक्ति पत्रकार बन गया है। आज आपकी एक उंगली पर दुनिया है और खबरें बड़ी तेजी से लोगों तक जा रही हैं तो उनका फैक्ट चेक भी बहुत जरूरी है। जहां तक उस दौर की बात है तो अच्छे-बुरे लोग तो हर समय में होते हैं। आज भी ऐसे कई पत्रकार हैं जो मीडिया में काफी अच्छा प्रयोग कर रहे हैं। उस समय भी तमाम नेता अपना झुंड बनाकर चलते थे, जो हर जगह उनकी बात को सही साबित करे और ये आज भी होता है। एक और चीज जो मुझे दिखाई पड़ती है, वो ये है कि आज के समय में स्टडी उतनी नहीं हो रही है। पहले पढ़ाई-लिखाई पर बड़ा जोर रहता था। इसके अलावा मैं विचारधारा के अतिरेक को भी गलत मानता हूं। चाहे कोई भी विचारधारा हो, अगर वो मीडिया पर हावी होने की कोशिश करेगी तो आप ये मानकर चलिए कि ये सिर्फ मीडिया के लिए ही नहीं बल्कि देश के संविधान के लिए भी सही नहीं है।
आज देश के ऊपर ‘फेक न्यूज‘ नाम का संकट आ खड़ा हुआ है। कई बार तो पत्रकार भी ऐसे एजेंडे में शामिल हो जाते हैं। आपका क्या मत है?
आज भले ही कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं, लेकिन आप ये भी जान लीजिए कि सिस्टम इतना मजबूत है कि आज किसी को भी कहीं से दबोचा जा सकता है। आज सरकार ने प्रसारण से जुड़े कानून बनाए हैं, लेकिन उनका पालन सख्ती से होना चाहिए। फेक न्यूज तो पहले भी थी, लेकिन आज सोशल मीडिया के कारण असर अधिक दिखाई दे रहा है, इसलिए सरकार को ऐसे लोगों से निपटने के लिए इंतजाम करना चाहिए। मेरा मत यह भी है कि ये सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। ऐसा नहीं कि कोई गलत काम करने के बाद जेल जाए और कोई बच जाए। देश के नेताओं को आज ये बात समझने की जरूरत है कि एक समय उनके खिलाफ भी अगर लिखा जाता था तो पत्रकार का कोई अपमान नहीं करता था, लेकिन आज समय बदल गया है। आज के नेताओं को सहिष्णु होना होगा।
आपकी रुचि क्या है? खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?
समय की तो मेरे पास कभी कमी हुई नहीं है और मैं अपने आप को किसी न किसी काम में व्यस्त रखता हूं। मैं बहुत पढ़ाई करता हूं और डिजिटल मीडिया को समझने की कोशिश करता हूं। इसके अलावा आज भी खेल पत्रिकाओं को पढ़ता हूं और रोज बाजार में लोगों से मिलने जाता हूं। लोगों से मिलना और उनसे बातें करना मुझे पसंद है, इससे समाज को समझने में मेरी काफी मदद हो जाती है। इसके अलावा कैसे देश का विकास हो, कैसे आम आदमी की कमाई बढ़े और कैसे सबको समान अवसर मिलें, इसी पर सोचता रहता हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास खेल को लेकर एक पूरी नीति तैयार है, लेकिन कोई पूछे तो हम कहें और कोई न पूछे तो भी क्या? हम तो अपनी मस्ती में मस्त हैं।
समाचार4मीडिया के साथ सतीश के. सिंह की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।
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